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क्रोध, लोभ और मोह का positive पक्ष 

25 फरवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद- क्रोध, लोभ और मोह का positive पक्ष 

परम पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखित लघु पुस्तिका “इन्द्रिय संयम का महत्त्व” पर आधारित आदरणीय संध्या कुमार जी की लेख श्रृंखला का यह पांचवां पार्ट है। इस पार्ट में हम उन वृतियों पर चर्चा करेंगें जिन्हे अक्सर negative sense में ही लिया जाता रहा है। काम ,क्रोध ,लोभ,मोह ,अहंकार जैसी वृतियां मनुष्य के विनाश का कारण बताई गयी हैं लेकिन क्या सच में ऐसा है !! कदापि नहीं, आइये देखें कितना सरलता से परमपूज्य गुरुदेव अपने बच्चों को समझा रहे हैं। 

हम अपने सहकर्मियों से निवेदन करते हैं कि ज्ञानप्रसाद के अंत में 24 आहुति संकल्प का इतिहास अवश्य पढ़ें। समय समय पर हम अपने सहकर्मियों के साथ ऑनलाइन ज्ञानरथ के स्तम्भ और 24 आहुति संकल्प का इतिहास शेयर करने अपना कर्तव्य समझते हैं। 

कल वाला ज्ञानप्रसाद इस श्रृंखला का छठा एवं अंतिम पार्ट होगा। 

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क्रोध भी एक उत्तेजना ही है, इसका होना भी परम आवश्यक है, यदि क्रोध ना हो तो बुराईयों का नाश किस प्रकार से किया जा सकेगा। यदि मानव स्वभाव से क्रोध वृति को हटा दिया जाये तो बुराईयों का प्रतिकार असम्भव है। रावण, कंस, हिरण्यकशिपु, दुर्योधन ,महिषासुर जैसों के प्रति यदि क्रोध की भावना नहीं पनपती तो इनका वध या नाश कैसे सम्भव होता। यदि पराधीन भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रोध ना पनपता तो भारतमाता को पराधीनता की जंजीरों से कैसे मुक्त कराया जाता। अतः सही समय पर, सही विषय पर क्रोध भी उचित ही होता है किंतु क्रोध का दुरुपयोग सर्वथा अनुचित कहा जायेगा। क्रोध को अपने स्वभाव में शामिल कर लेना,स्वयं को ऊंचा साबित करने के लिये एवं दूसरों को निम्नस्तर साबित करने के लिये क्रोध का उपयोग सर्वथा अनुचित है। कई परिवारों में परिवार का मुखिया, या कुछ शिक्षक अपने छात्रों पर, या कुछ बॉस अपने सहकर्मियों पर, अपना प्रभुत्व साबित करने के लिये क्रोध को एक शस्त्र की भांति उपयोग करते हैं, जो सर्वथा अनुचित है। इससे लाभ होने के बजाय हानि होती है। क्रोध से भय का वातावरण बनता है जो सभी की शारीरिक-मानसिक कार्य क्षमता का नाश कर देता है। यह परमात्मा द्वारा प्रदत्त विशेषता का सर्वथा दुरुपयोग ही कहा जायेगा।

लोभ वृति को भी बुराई की संज्ञा दी जाती है जबकि लोभ ही मनुष्य को क्रियाशील बनाता है स्वास्थ्य, विद्या,धन, प्रतिष्ठा, स्वर्ग, पुण्य, मुक्ति आदि का लोभ ही मनुष्य को क्रियाशील बनाता है। वास्तव में लोभ को उन्नति का मूल माना जा सकता है। पहलवान, व्यापारी, विद्यार्थी, लोकसेवी, किसान, मजदूर, पुण्यात्मा, ब्रह्मचारी, तपस्वी, दानी, योगी आदि सभी तो अपने-अपने क्षेत्र में लोभी ही तो हैं। जिसको जिस क्षेत्र में नाम कमाना है, आगे बढ़ना है वह उसके संचयन में लगा हुआ है। अन्य लोभ की तरह धन संचयन का लोभ भी बुरा नहीं माना जा सकता, किंतु धन का दुरुपयोग बुरा है। भामाशाह, जमुना लाल बजाज आदि ने धन संचय किया और धन का सदुपयोग परमार्थ कार्य में कर संसार का कल्याण किया। संसार में इनके अलावा और भी अनेक उदाहरण हैं जिन्होंने धन अर्जन कर अपने धन से अनेक जन कल्याण के कार्य किये। अनुचित तरीके से धन कमाना और अनुचित कार्यों में धन को लगाना, दोनों ही अपराध की श्रेणी में आते हैं। अपने धन द्वारा जाति और धर्म के दंगे करवाना, समाज को तोड़ना, बांटना, असामाजिक तत्वों को बढ़ावा देना सर्वथा अनुचित है। धन के लोभ में पारिवारिक कलह को बढ़ावा देना गलत है किंतु लोभ को गलत नहीं कहा जा सकता है, उसका दुरुपयोग अवश्य गलत है वरना लोभ का सदुपयोग तो उन्नति का कारण ही बनता है। 

मोह भी उपयोगी वृति है, मोह के कारण ही सारे रिश्ते बनते हैं, मोह के बिना कोई रिश्ता नहीं बन सकता, यहाँ तक कि माँ और बच्चे के रिश्ते में भी मोह ही होता है अतः मोह त्याज्य नहीं है उसका दुरुपयोग त्याज्य है।

अतः यह सिद्ध हो जाता है कि कोई भी इंद्रिय, सोच य क्रिया निंदनीय य त्याज्य नहीं है, हानि इनके दुरुपयोग से होती है। दुरुपयोग रोक कर सदुपयोग कर जीवन को उन्नत एवं आनन्दमय बनाना श्रेयस्कर है। 

हम प्रतिदिन पढ़ते आ रहे हैं कि मानव ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है। ईश्वर ने समस्त इन्द्रियां मानव को सहयोग एवं आनन्द के लिये ही प्रदान की हैं। अतः मानव को अपनी इंद्रियों का सदुपयोग कर लाभ उठाना चाहिए परन्तु कई बार मानव इंद्रियों का, वृत्तियों का दुरुपयोग करने के कारण हानि उठाता है और स्वयं को दोष न देकर इन्द्रिय य वृति को दोष देने लगता है। य़ह तो वैसी ही बात हुई कि ‘नाच न जाने आंगन टेढ़ा’ अतः आवश्यकता है, सभी शारीरिक एवं मानसिक मनोवृतियों को पूर्ण नियंत्रण रख इंद्रियों का सदुपयोग किया जाये। जिस तरह रसायन शास्त्री विष का मारण, शोधन कर उसे अमृत तुल्य औषधि बना देता है, उसी प्रकार विवेक द्वारा मनोवृतियों का मारण शोधन कर इंद्रियों का सदुपयोग किया जाए तो सभी इन्द्रियां सुपरिणाम ही पैदा करेंगी, तब निंदा का प्रश्न ही खड़ा नहीं होता।

आत्म संयम एवं अस्वाद भोजन:

आत्म संयम एवं अस्वाद भोजन पर गुरुदेव ने अत्याधिक बल दिया है। परिजनों ने देखा होगा कि युगतीर्थ शांतिकुंज के माता भगवती देवी भोजनालय में रेगुलर निशुल्क सात्विक भोजन तो मिलता ही है, उसी भोजनालय के एक सेक्शन में अस्वाद भोजन की भी व्यवस्था है। गुरुदेव का मानना है कि अस्वाद भोजन से मनुष्य को जिव्हा पर नियंत्रण रखने का बल मिलता है। अस्वाद भोजन का यह अर्थ कदापि नहीं है कि मनुष्य संसार में प्राप्त भोज्य पदार्थ या रसों का सेवन ना करे। अस्वाद भोजन का तात्पर्य है, मनुष्य जिव्हा का गुलाम न बने। जो उसके स्वास्थ्य के लिये उत्तम है उसे ही ग्रहण करे। इस संदर्भ में भूदान लहर के जनक आदरणीय विनोबा भावे जी (1895-1982) ने चम्मच का उदाहरण देते हुए समझाया है कि मनुष्य चम्मच से हलवा उठाये या दाल भात, चम्मच तनिक भी प्रभावित नहीं होता, वही स्थिति हमारी जिव्हा की होनी चाहिये। इसी संदर्भ में श्री राव बहादुर महादेव गोविंद राणाडे (1842 -1901) जी जो जस्टिस राणाडे के नाम से लोकप्रिय थे,का अनुभव भी अति प्रेरणाप्रद है। राणाडे जी को उनके मित्र ने अपने खेत के स्वादिष्ट आम भेंट में दिये, श्री राणाडेजी ने अपनी पत्नी से, आम काट कर देने का आग्रह किया, पत्नी ने उन्हें तुरंत आम काट कर दे दिये, किन्तु श्री राणाडे जी ने मात्र दो टुकड़े ही आम के खाये, पत्नि ने आश्चर्य से पूछा क्या आम स्वादिष्ट नहीं हैं, आपने बहुत कम खाये। श्री राणाडे जी ने शांति से कहा आम तो बहुत स्वादिष्ट हैं इतने स्वादिष्ट आम मैंने पहली बार ही खाये हैं। तब पत्नि ने चिंतित होते हुए कहा क्या आपकी तबियत ठीक नहीं है? राणाडे जी ने उन्हें समझाते हुए कहा मैं पूर्णतः स्वस्थ्य हूँ, आप चिंता ना करें। आम कम खाने के समबन्ध में मैं आपको अपने जीवन का एक अनुभव सुनाता हूँ। जब मैं बंबई में पढ़ता था, उस समय मेरे पड़ोस में एक बहुत साधारण आर्थिक स्थिति वाली महिला अपने बेटे के साथ रहती थी, जो बहुत दुःखी रहती थी। एक दिन सहानुभूति वश मैंने उनसे उनके दुःख का कारण जानना चाहा तो उस महिला ने बताया कि वह पहले काफी सम्पन्न आर्थिक स्थिति की थी किन्तु उसने अपने धन का उपयोग विवेक से नहीं किया। उसने स्वास्थ्य की परवाह किए बिना जो जिव्हा को अच्छा लगा खाया। इस वज़ह से उसका स्वास्थ खराब रहने लगा, इलाज में धन बर्बाद कर वह साधारण आर्थिक स्थिति की होकर रूखा सूखा खाकर जीवन यापन के लिये मजबूर हो गयी। आज वह परेशान रहती है क्योंकि उसकी जिव्हा को स्वादिष्ट भोजन की आदत लगी हुई है और जिव्हा के कारण वह महिला परेशान, बैचेन रहती है,उसे न दिन में चैन है न रात को नींद। श्री राणाडे जी ने शांति से कहा उस दिन से मैंने यह निश्चय ही कर लिया जो भोजन जिव्हा को ज्यादा रुचिकर लगे, वह कम ही खाया जाये क्योंकि इससे जिव्हा हमारी गुलाम रहेगी स्वामी बन कर मनमानी नहीं करेगी। 

 गुरुदेव सतर्क करते हुए कहते हैं कि किसी भी भोजन को ग्रहण करने से पहले स्वयं से यह सवाल अवश्य किया जाये कि यह भोजन स्वस्थ्य के लिये हितकारी है या नहीं,मात्र जिव्हा को सन्तुष्ट करने के लिये भोजन नहीं ग्रहण किया जाये अस्वाद भोजन से शारीरिक, मानसिक या सामाजिक किसी भी प्रकार की हानि नहीं होती है वरना लाभ ही लाभ है। गुरुदेव अस्वाद भोजन को मनुष्य के लिये हितकारी बताते हुए कहते हैं कि यदि मनुष्य अस्वाद भोजन के प्रति अभ्यासित होता है, तो ज्ञान, भक्ति य कर्म किसी भी मार्ग से योग द्वारा सच्चा सुख और शांति प्राप्त कर सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भोजन का संतुलित होना अनिवार्य है क्योंकि उसका मन पर व्यापक प्रभाव पड़ता है, कहा भी गया है कि ‘जैसा खाओ अन्न वैसा होवे मन’।

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। 

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24 आहुति संकल्प सूची एवं इतिहास :

जो सहकर्मी हमारे साथ लम्बे समय से जुड़े हुए हैं वह जानते हैं कि हमने कुछ समय पूर्व काउंटर कमेंट का सुझाव दिया था जिसका पहला उद्देश्य था कि जो कोई भी कमेंट करता है हम उसके आदर-सम्मान हेतु रिप्लाई अवश्य करेंगें। अर्थात जो हमारे लिए अपना  मूल्यवान समय निकाल रहा है हमारा कर्तव्य बनता है कि उसकी भावना का सम्मान किया जाये। कमेंट चाहे छोटा हो य विस्तृत ,हमारे लिए अत्यंत ही सम्मानजनक है। दूसरा उद्देश्य था एक परिवार की भावना को जागृत करना। जब एक दूसरे के कमेंट देखे जायेंगें ,पढ़े जायेंगें ,काउंटर कमेंट किये जायेंगें ,ज्ञान की वृद्धि होगी ,नए सम्पर्क बनेगें, नई प्रतिभाएं उभर कर आगे आएँगी, सुप्त प्रतिभाओं को जागृत करने के अवसर प्राप्त होंगें,परिवार की वृद्धि होगी और ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार का दायरा और भी विस्तृत होगा। ऐसा करने से और अधिक युग शिल्पियों की सेना का विस्तार होगा। हमारे सहकर्मी जानते हैं कि हमें किन -किन सुप्त प्रतिभाओं का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, किन-किन महान व्यक्तियों से हमारा संपर्क संभव हो पाया है। मस्तीचक हॉस्पिटल ,जयपुर सेंट्रल जेल, मसूरी इंटरनेशनल स्कूल जैसी कुछ संस्थाएं भी इस संपर्क से अछूती नहीं रह पायी हैं। इन्ही काउंटर कमैंट्स के चलते ऑनलाइन ज्ञानरथ को एक महायज्ञशाला की परिभाषा दी गयी है जिसमें विचाररूपी हवन सामग्री से कमैंट्स की आहुतियां दी जा रही हैं। अपनी यात्रा के आजकल के पड़ाव पर यह प्रक्रिया “अपनों से अपनी बात” जैसी प्लेटफॉर्म बन चुकी है जिससे अपनत्व और परिवार की भावना को और बल मिल रहा है।  

 24 फ़रवरी 2022 वाले लेख के स्वाध्याय के उपरांत 4 सहकर्मियों ने संकल्प पूर्ण किया है 

यह सहकर्मी निम्नलिखित हैं :

(1) रेणुका गंजीर-25,(2 )अरुण वर्मा-32,(3 )सरविन्द पाल -28,(4) निशा भरद्वाज-24 अरुण वर्मा जी 32 अंक प्राप्त करते हुए गोल्ड मैडल विजेता घोषित किये जाते हैं। सभी सहकर्मी अपनी अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद्


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