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क्या हम अध्यात्मवाद को भूल कर भौतिकवादी हुए जा रहे हैं ?

3 फरवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद – क्या हम अध्यात्मवाद को भूल कर भौतिकवादी हुए जा रहे हैं ?

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ऑनलाइन ज्ञानरथ के स्तम्भ – शिष्टाचार, आदर, सम्मान, श्रद्धा, समर्पण, सहकारिता, सहानुभूति, सद्भावना, अनुशासन, निष्ठा, विश्वास, आस्था, प्रेम, स्नेह, नियमितता 

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कल वाले ज्ञानप्रसाद में गुरुदेव आने वाले दिनों में सम्पन्न करने वाले पांच महत्वपूर्ण कार्य बता रहे थे। पहले कार्य पर, प्रेम के कार्य पर हमने कल चर्चा की थी। अगले तीन कार्य ,”युग निर्माण योजना ”, “उग्र तपश्चर्या” और “अध्यात्म शक्ति” पर आज संक्षेप में चर्चा करेंगें। ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने से पूर्व हम अपनी व्हाट्सप्प सहकर्मी सुनीता शर्मा जी की बात आपके समक्ष रखना चाहेंगें। कल ही उन्होंने अपनी अनुभूति लिख कर भेजी थी, पता नहीं किस सन्दर्भ में हमने कहा था कि किसी भी कार्य के लिए नियमितता बहुत ही आवश्यक है। बहिन जी कमेंट तो भेजते ही रहते हैं लेकिन इतनी नियमितता से नहीं। आज कमेंट के अंत में जब उन्होंने लिखा कि इस कमेंट को लिखने में दोपहर से शाम हो गयी है तो मन में बहुत सारे सहकर्मियों का विचार आया। सभी की अपनी -अपनी परिस्थितियां हैं, दिनचर्या है,कार्यक्षमता है,विवशताएँ हैं -लेकिन एक बात अवश्य समझ में आयी कि “अपनों से अपनी बात” में व्यक्त किये गए विचारों का और कमैंट्स की communication से हमारे सहकर्मियों के अंतःकरण पर अवश्य ही प्रभाव पड़ता है। प्रसन्नता होती है जब हम किसी को गुरुकार्य में योगदान देने हेतु प्रेरित करने में सफल हो पाते हैं। END RESULT तो यही है न कि अधिक से अधिक परिजनों को गुरुदेव की तप शक्ति का अंश मिल सके। यह तभी संभव है जब परिजन नियमितता से समय निकाल कर कुछ न कुछ विचारों का आदान- प्रदान करते रहें। गुरुदेव ने स्वयं कहीं लिखा है -गायत्री उपासना कोई pass-time नहीं है ,कभी कर ली ,कभी नहीं। अगर परिणाम देखने हैं तो इसे तपस्या की भांति करना चाहिए। हमारे सभी सहकर्मी इस तथ्य के साक्षी हैं कि ऑनलाइन ज्ञानरथ से जुड़कर क्या-क्या कायाकल्प हुए हैं – थोड़ी प्रतीक्षा कीजिये -अनुभूतियाँ आ रही हैं। तो चलते हैं ज्ञानप्रसाद की ओर 

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(2) अगले ढाई वर्षों में युग-निर्माण योजना की मजबूत आधारशिला रखे जाने का अपना मन है। यह निश्चित है कि निकट भविष्य में ही एक अभिनव संसार का सृजन होने जा रहा है। उसकी प्रसव पीड़ा में अगले दस वर्ष अत्यधिक अनाचार, उत्पीड़न, दैवकोप, विनाश और क्लेश, कलह से भरे बीतने हैं। दुष्प्रवृत्तियों का परिपाक क्या होता है, इसका दण्ड जब भरपूर मिल जायेगा, तब मानव बदलेगा। यह कार्य महाकाल करने जा रहा है। हमारे हिस्से में नवयुग की आस्थाओं और प्रक्रियाओं को अपना सकने योग्य जन-मानस तैयार करना है। लोक-मानस में विवेक जागृत करना है और समझाना है कि पूर्व मान्यताओं का मोह छोड़कर जो उचित उपयुक्त है केवल उसे ही स्वीकार करने का साहस करें। सर्वसाधारण को यह विश्वास करना है कि धन की महत्ता का युग अब समाप्त हो चला, अगले दिनों व्यक्तिगत सम्पदायें न रहेंगी, धन पर समाज का स्वामित्व होगा। लोग अपने श्रम एवं अधिकार के अनुरूप सीमित साधन ले सकेंगे। दौलत और अमीर दोनों ही संसार से विदा हो जायेंगी। इसलिए धन के लालची बेटे-पोतों के लिए जोड़ने वाले कंजूस अपनी मूर्खता को समझें और समय रहते संतोषी बनने एवं शक्तियों को संचय उपयोग से बचाकर लोकमंगल की दिशाओं में लगाने की आदत डालें। ऐसी बहुत बातें लोगों के गले उतारनी हैं, जो आज बे सिर पैर जैसी लगती हैं।

इन वाक्यों को लिखते समय हम (अरुण त्रिखा) यह सोचने पर मजबूर हो गए कि क्या 50 वर्षों में ऐसा हुआ है। अवश्य हुआ है। हमारे पाठक स्वयं देख सकते हैं कि पहली पीढ़ी से हम कितना बदल चुके हैं।

संसार बहुत बड़ा है, कार्य अति व्यापक है, हमारे साधन सीमित हैं। सोचते हैं एक मजबूत प्रक्रिया ऐसी चल पड़े जो अपने पहिये पर लुढ़कती हुई उपरोक्त महान् लक्ष्य को सीमित समय में ठीक तरह पूरा कर सके। युग-निर्माण योजना का केन्द्र-बिन्दु अभी गायत्री तपोभूमि में बनाया है। इसे अगले दिनों समस्त विश्व में, अगणित योजनाओं और प्रक्रियाओं के रूप में विकसित होना है, सो विचार यह है कि अगले ढाई वर्षों में इतने व्यक्ति, इतने साधन और इतने सूत्र उपलब्ध हो जाएँ, जिससे हमारी सन् 2000 तक चलने वाली तीस वर्षीय (1970-2000) योजना का क्रम विस्तार नियत निर्धारित गति से यथावत होता रहे। इन ढाई वर्षों में ऐसा साधन तन्त्र खड़ा कर देंगे, जो नव-निर्माण की, विचार क्रिया की ,असम्भव को सम्भव बनाने की,विश्व के कायाकल्प की भूमिका सफलतापूर्वक सम्पादित कर सके।

(3) उपरोक्त दो कार्य ( प्रेम और युग निर्माण) ऐसे हैं, जो ढाई वर्षों में संतोषजनक स्थिति पकड़ लें। तीन काम ऐसे हैं, जो यहाँ से चले जाने के बाद आरम्भ करेंगे और तब तक उसी प्रकार चलाते रहेंगे, जब तक यह शरीर जीवित रहेगा। ऐसे कार्यों में पहला “उग्र तपश्चर्या”, दूसरा लुप्त प्रायः “अध्यात्म की शक्ति”, और तीसरा है “विद्या की शोध साधना।” हम जहाँ कहीं भी रहेंगे परिजनों की अभीष्ट सहायता करते रहेंगें और वहीं से यह तीन कार्य अनवरत रूप से करते रहेंगे।

यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि पिछले दिन, रामकृष्ण परमहंस, योगी अरविन्द और महर्षि रमण की अनुपम साधनायें भारत के भाग्य परिवर्तन के लिए हुई। उनमें सूक्ष्म वातावरण को ऐसा गरम किया कि कितने ही आश्चर्यजनक चक्रवात अनायास ही प्रकट हो गये। पिछले थोड़े ही दिनों में भारत ने उच्चकोटि के नेता दिये जिनकी तुलना अन्यत्र नहीं मिलती। इन महामानवों ने जनता को आश्चर्यजनक उत्साह दिया और असम्भव लगने वाली राजनैतिक स्वतन्त्रता सम्भव करके दिखा दी। अभी भाग्य निर्माण का अधिकार मात्र मिला है। अभी करना तो सब कुछ बाकी पड़ा है।

भारत को अपना घर ही नहीं सम्भालना है। हर क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व भी करना है। इसके लिए उपयुक्त स्थिति उत्पन्न कर सकने वाले ऐसे महामानवों की आवश्यकता है, जो स्वतन्त्रता संग्राम वालों से भी अधिक भारी हों। लड़ाई करने की तुलना में निर्माण का कार्य अधिक कुशलता और क्षमता का है, सो हमें अगले दिनों ऐसे मूर्धन्य महामानवों की आवश्यकता पड़ेगी, जो अपने उज्ज्वल प्रकाश से सारा वातावरण प्रकाशवान कर दें।

इसके लिए उपरोक्त तीन तपस्वियों की बुझी पड़ी परम्परा को फिर सजीव करना है और सूक्ष्म लोक को फिर इतना गरम करना है कि उसमें से उत्कृष्ट स्तर के महामानव पुनः अवतरित हो सकें। गंगावतरण के लिए भागीरथ का तप आवश्यकता था, नये युग की सुधा-सरिता का अवतरण भी ऐसे ही तप की अपेक्षा करता है। देवत्व को निगल जाने वाले वृत्तासुर का वध दधीचि के अस्थि-पिंजर से बने वज्र की अपेक्षा करता था। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का अनाचार पिछले रावण, कंस, हिरण्यकश्यप आदि से भी बड़ा-चढ़ा हैं, उसका निराकरण भी पूर्वकाल जैसे अस्थि वज्र की अपेक्षा करता है, हमें इसके लिए आगे बढ़ना होगा, जो हम बढ़ भी रहे हैं। अगले दिन जिन महान् प्रयोजन के लिए समर्पित होने जा रहे हैं उसे देखते हुए-वर्तमान विरह वेदना के बावजूद-हमें और हमारे परिवार को गर्व ही होगा कि हमारे कदम जिधर बढ़े वे उचित और आवश्यक थे।

(4) वर्तमान भौतिकवादी मनोवृत्तियों का विकास भौतिक विज्ञान क साथ-साथ हुआ है। विज्ञान सदा मनुष्य के भौतिक और आत्मिक जीवन को प्रभावित करता है। आधुनिक विज्ञान का आधार भौतिक है, फलतः उसका भावनात्मक प्रभाव भी वैसा ही होना चाहिये। आज लोग भौतिक दृष्टि से सोचते हैं और इन्हीं आकांक्षाओं से प्रभावित होकर अपनी गतिविधियां निर्धारित करते हैं। यही है आज की विपन्न परिस्थितियों का विश्लेषण। प्राचीनकाल में अध्यात्मवाद का प्रचलन था। आत्मा की अनन्त शक्ति का प्रयोग करके लोग अपनी आन्तरिक और भौतिक प्रगति का पथ प्रशस्त करते थे, तब लोक मानस भी वैसा ही था और रीति-नीति में आध्यात्मिक आदर्शों का समावेश रहने से सर्वत्र स्वर्गीय सुख-शान्ति विराजती थी। 

हमारे प्राचीन अध्यात्म की केवल ज्ञान शाखा जीवित है। विज्ञान शाखा लुप्त हो गई। धर्म, नीति, सदाचरण आदि की शिक्षा देने वाले ग्रन्थ एवं प्रवक्ता तो मौजूद है पर उस विज्ञान की उपलब्धियाँ हाथ से चली गयी जो शरीर में विद्यमान् अन्नमय,मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय और आनन्दमय शक्ति-कोशों की क्षमता का उपयोग करके व्यक्ति और समाज की कठिनाइयों को हल कर सकें। पातंजलि योग दर्शन, मंत्र महार्णव, कुलार्णव तंत्र आदि शक्ति विज्ञान के ग्रन्थ तो कई है पर उनमें वर्णित सिद्धियों को जो प्रत्यक्ष कर दिखा सके, ऐसे मिश्रित साधन न के बराबर शेष गये हैं।

आवश्यकता इस बात की है कि उन लुप्त विद्याओं को फिर खोज निकाला जाय और उसे सार्वजनिक ज्ञान के रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जाय कि प्राचीनकाल की तरह उसका उपयोग सुलभ हो सके। ऐसा सम्भव हुआ तो भौतिक विज्ञान ( Physical Science ) को परास्त कर पुनः अध्यात्म विज्ञान ( Spiritual Science ) की महत्ता प्रतिष्ठापित की जा सकेगी और लोकमानस को उस सतयुगी प्रवाह की ओर मोड़ा जा सकेगा जिसकी हम अपेक्षा करते हैं।

हिमालय गंगातट, एकांत, जन-सम्पर्क पर प्रतिबन्ध जैसी कष्ट साध्य गतिविधियाँ अपनाने के पीछे एक रहस्य यह भी है कि वह प्रदेश एवं वह वातावरण ही उच्च आध्यात्मिक स्तर की शोधों के लिये उपयुक्त हो सकता है। स्थान की दृष्टि से वह स्थान अध्यात्म शक्ति तत्त्वों का ध्रुव केन्द्र या हृदय ही कहा जा सकता है, जहाँ हमें अगले दिनों जाना है, रहना हैं वहाँ ऐसी विभूतियाँ अभी भी जीवित हैं जो इस महान् कार्य में हमारा मार्ग-दर्शन कर सकें। इस प्रकार की शोध-साधना अपने व्यक्तिगत वर्चस्व के लिये नहीं, विशुद्ध रूप से “लोक-मण्डल” के लिये करने जा रहे हैं और जो कुछ हमें मिलेगा,उसे सार्वजनिक ज्ञान के रूप में प्रस्तुत करते रहेंगे। जीवन का अन्त होने से पूर्व शरीर को वैज्ञानिक विश्लेषण के लिये इसलिये वसीयत किया है कि शरीर शास्त्री यह जान सकें कि अध्यात्म साधना से देह के किन रहस्यमय शक्ति संस्थानों को कितना विकसित किया जा सकता है और इस प्रकार के विकास से मनुष्य जाति क्या लाभ उठा सकती है?

आज के ज्ञानप्रसाद को यहीं पर अल्प विराम करने की आज्ञा चाहते हैं -INTERVAL 

To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

2 फरवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत परिवार के 11 समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हमारा मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परमपूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य युगसैनिक निम्नलिखित हैं :

1) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 54, (2) अरूण कुमार वर्मा जी – 49, (3) सरविन्द कुमार पाल – 46, (4) डा.अरुन त्रिखा जी – 41, (5) प्रेरणा कुमारी बिटिया रानी – 33, (6) संध्या बहन जी – 31, (7) संजना कुमारी बिटिया रानी – 31, (8) पिंकी पाल बिटिया रानी – 29, (9) शशी बहन जी – 28, (10) रजत कुमार जी – 25, (11) कुसुम बहन जी – 24

आज के 24 आहुति संकल्प में रेनू श्रीवास्तव बहिन जी ने 54 अंक प्राप्त करके top पोजीशन जीती है । बहिन जी हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई स्वीकार करें । 


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