एक ही घोंसले वाले पाँच पक्षी उड़ कर पाँच प्रयोजन पूरे करते रहे 

2 फरवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद – एक ही घोंसले वाले पाँच पक्षी उड़ कर पाँच प्रयोजन पूरे करते रहे 

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ऑनलाइन ज्ञानरथ के स्तम्भ – शिष्टाचार, आदर, सम्मान, श्रद्धा, समर्पण, सहकारिता, सहानुभूति, सद्भावना, अनुशासन, निष्ठा, विश्वास, आस्था

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आज के ज्ञानप्रसाद में परमपूज्य गुरुदेव हमें उन पांच कार्यों का वर्णन कर रहे हैं जो उन्होंने मथुरा प्रस्थान से पहले सम्पन्न किये और वह पांच कार्य जिन्हे वह आने वाले दिनों में पूर्ण करने की योजना बनाये हुए थे। आगामी पांच कार्यों में से हमने केवल एक (प्रेम ) पर ही चर्चा की है। इतना विस्तृत विषय, इतने कम शब्दों में बांधना बहुत ही कठिन है। गुरुदेव के साथ- साथ हमने भी कुछ कहने का साहस किया है। 

आज के 24 आहुति संकल्प में 3 सहकर्मी 40 अंक प्राप्त करते हुए bracketed हैं। तीनों को हमारी व्यक्तिगत शुभकामना। अनुभूतियों को अभूतपूर्ण response मिल रहा है- आज भी बहिन सुनीता जी ने अपनी अनुभूति भेजी है- धन्यवाद् सुनीता जी। 

तो चलते हैं आज के ज्ञानप्रसाद की ओर : 

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परमपूज्य गुरुदेव बता रहे हैं :

परिजनों में से हर कोई जानता है कि हमने 16 से 40 वर्ष की आयु तक प्रतिदिन 6 घण्टे गायत्री उपासना में बिताए। अगर इन 6 घंटों को निकाल लिया जाये तो दिन के 18 घंटे ही बचते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हमने 24 वर्षों में 18 वर्ष सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश कर कुछ काम किया है। इस थोड़ी सी अवधि में हमने 5 पाँच प्रमुख कार्य किये हैं जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है: 

(1) भारतीय धर्म के आर्ष साहित्य का आदि से अन्त तक सरलीकरण एवं संसार भर में प्रसार। 

(2) गायत्री महाविद्या का अन्वेषण, उसका विश्वव्यापी विस्तार, 50 लाख व्यक्तियों को नैष्ठिक उपासना की शिक्षा दीक्षा, चार हजार शाखाओं वाले गायत्री परिवार संगठन का सृजन, गायत्री तपोभूमि जैसी अनुपम संस्था का निर्माण 

(3) गायत्री यज्ञ के माध्यम से धर्म भावनाओं का व्यापक उभार, देशभर में हजारों विशालकाय सम्मेलन, मथुरा का वह सहस्र कुण्ड गायत्री यज्ञ जिसमें 4 लाख व्यक्ति एकत्रित हुए थे। 

(4) युग-निर्माण योजना का जन-मानस परिवर्तन एवं विचार-क्राँति का विश्व-व्यापी अभियान। 

इस सन्दर्भ में लगभग 500 पुस्तकों का लेखन, दो पत्रिकाओं (अखंड ज्योति और युग निर्माण योजना का मथुरा से प्रकाशन, 7 हजार झोला पुस्तकालयों का प्रचलन, नव-निर्माण के विशाल साहित्य का संसार की प्रमुख भाषाओं में अनुवाद प्रकाशन। इस प्रयोजन में हजारों कार्यकर्ताओं का समावेश। 

(5) सतत तप-साधना द्वारा उपार्जित शक्ति का सत्पात्रों की भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति के लिए अनुदान की व्यवस्था। 

यह पाँचों ही कार्य बहुत बड़े परिणाम में हुए हैं और उनकी शाखा, प्रशाखाएँ इतनी अधिक फूटी हैं कि उनमें से प्रत्येक शाखा की कम से कम एक शरीर द्वारा करने पर कम से कम साठ-साठ वर्ष का एक पूरा जीवन लगना चाहिये। 

क्या यह सारे कार्य एक ही शरीर द्वारा सम्पन्न हुए हैं ?-नहीं

पाँच अत्यंत परिष्कृत व्यक्ति सारा जीवन उस कार्य में पूरी तरह लगें और उनके पास विपुल साधन हों तभी यह कार्य सम्भव हो सकते हैं। एक व्यक्ति मात्र 18 वर्षों में उन्हें किसी भी प्रकार पूरा नहीं कर सकता। इतने पर भी यह कार्य जिस सफलता से हुए उनका रहस्य यही है कि 

दिखने में यह कार्य एक ही शरीर द्वारा होते लगते हैं, वस्तुत एक ही घोंसले में बैठे रहने वाले पाँच पक्षी पाँच दिशाओं में उड़ कर पाँच प्रयोजन पूरे करते रहे थे। 

इस आश्चर्यजनक सच्चाई के अनेक प्रमाण ऐसे हैं जो आने वाले दिनों में इस वस्तुस्थिति को प्रकट कर देंगे, परन्तु अभी इस स्थिति में परिपक्वता नहीं आई है और हमारे मार्गदर्शक से इसके प्रकटीकरण की आज्ञा भी नहीं मिली है । इसलिए उस तथ्य को सार्वजनिक रूप से उद्घोषित नहीं किया गया और न उसकी प्रामाणिकता के लिए चुनौती दी गई है।

ऐसे ही कुछ कारण हैं जिनके कारण हमारे लिए समग्र आत्मकथा कह सकना सम्भव न होगा, पर जो कुछ लोकहित में है, उस सभी को परिजनों से कह कर जायेंगे। ऐसा करने से भले ही किसी का लाभ न भी होता हो पर हमें अपना चित्त हल्का कर लेने और दूसरों की जानकारी में एक कड़ी जोड़ देने का अवसर तो मिल ही जायेगा। हमारे जीवन के रहस्यमय भाग हमारे जाने के बाद में ही प्रकट हों, यह दूसरी बात है पर अभी तो इतना ही पर्याप्त होगा कि हमारे अनुभवों, निष्कर्षों और अभिव्यक्ति को जान लिया।

परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लिखित इन पंक्तियों को जब हम आपके समक्ष रख रहे हैं तो हमें भी बिल्कुल इसी प्रकार का आभास होता है। ऐसा लिख कर हम अपनेआप की गुरुदेव से तुलना कतई नहीं कर रहे हैं। कहाँ वह दिव्य सत्ता और कहाँ हम (अरुण त्रिखा) जैसे तुच्छ प्राणी। अपने सभी समर्पित सहकर्मियों से विचार-वार्तालाप करके हमारा भी मन बहुत ही हल्का हो जाता है, शांति और तस्सली का अनुभव होता है कि हम कसीस के काम आ पाए। इसी उदेश्य को ह्रदय में धारण करते हम हर समय अपनी अल्प बुद्धि के अनुसार नई-नई योजनाओं की उधेड़ बुन में लगे रहते हैं और जब किसी के परिणाम सामने आते हैं तो ह्रदय में प्रसन्नता दौड़ सी जाती है। 

गुरुदेव आगे लिखते हैं:जिस प्रकार हमने पिछले दिनों के कार्यों का व्यौरा दिया है, उसी तरह अगले दिनों के पाँच कार्य भी हमारे सामने हैं। ये कार्य भी पिछलों की तुलना में कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं । इनकी थोड़ी चर्चा इन पंक्तियों में कर देना कुछ अनुपयुक्त न होगा।

(1) प्रेम: हमारा सबसे प्रथम और महत्वपूर्ण कार्य प्रेम है। प्रेम हमारी प्रमुख सम्पदा है। इसी के बल पर तप, संतोष, विवेक, सेवा, स्वाध्याय, श्रम आदि अन्य सद्प्रवृत्तियों को स्थिर रूप से प्राप्त करने का अवसर मिला है। आत्म-विश्लेषण चिन्तन, मनन और अन्तःमन्थन के आधार पर हम सुनिश्चित रूप से कह सकते हैं कि यदि हमें अन्तरंग विभूतियाँ प्राप्त हुई हैं और उनके आधार पर बाह्य जगत में कुछ हलचलें उत्पन्न करने का अवसर मिला है तो इसका एकमात्र कारण हमारे अन्तःकरण में आदि से अन्त तक लबालब भरा हुआ प्रेम ही है। ईश्वर को माध्यम बनाकर उसके खेत में खेती करते गए , प्रेम के बीजों की खेती, और जब वह फसल उगकर तैयार हुई तो प्रेमरूपी फसल का प्रकाश निकटवर्तियों से लेकर दूरवर्तियों तक व्यापक क्षेत्र में फैलता ही गया। उस प्रेमरूपी फसल की सुगंध इतनी सुहावनी थी कि दूरस्थ बैठे लोगों ने भी उसका लाभ उठाया। हम स्वयं हर घड़ी उस स्वर्गीय उल्लास की अनुभूति करते रहे। उसी आवेश-जोश की उत्तेजना से लोक-सेवा और आत्मबल संवर्धन के वे कार्य बन पड़े जो वस्तुतः तुच्छ हैं पर दूसरे उन्हें बहुत बढ़ा-चढ़ा देखते हैं।

गायत्री-उपासना, जीवन-साधना, नव-निर्माण आदि की कईं शिक्षायें परिजनों को देते चले आ रहे हैं, अब विचार है अगले दो-ढाई वर्षों में प्रेम को अंतःकरण में उगाने और उसे विकसित करने की अपनी अनुभूतियाँ भी लोगों को बतायें और इस अमृत को उपलब्ध करने की शिक्षा देते चलें। 

प्रेम की बात करना साहित्य का नहीं समीपता का विषय है। इससे थोड़ा आगे जाएँ तो यह अंतःकरण की समीपता का विषय है। इसलिए सोचते हैं कि जितने अधिक परिजनों से, जितने अधिक समय तक सान्निध्य और सामीप्य सम्भव हो सके, प्राप्त करें और अपनी “छूत” दूसरों को भी लगाते चलें।

जब गुरुवर प्रेम के लिए “छूत” का शब्द प्रयोग कर रहे हैं तो हमें “Love is Contagious” जैसी बहुचर्चित सुक्ति याद आती है। पता नहीं कोरोना वायरस के लिए contagious शब्द प्रयोग करना उचित रहेगा कि नहीं, लेकिन हम कहेंगें कि जितनी स्पीड से कोरोना फैलता है उससे भी अधिक स्पीड से यह प्रेम नामक छुआछात की बीमारी फैलती है। जिस किसी को भी हमारी इस स्टेटमेंट में शंका है तो स्वयं ऑनलाइन ज्ञानरथ में आकर अनुभव कर ले।

गुरुवर कहते हैं: लोग प्रेम करना सीखें। किस-किस से प्रेम करना सीखें। हम से, अपनेआप से, अपनी आत्मा से, अपने जीवन से, परिवार से, समाज से, कर्तव्य से और ईश्वर से। प्रेम केवल opposite sex के साथ अश्लील सेक्स ही नहीं होता। हाँ पति-पत्नी opposite sex के हैं, लेकिन उनमें अगर पवित्र, अटूट प्रेम हो जाये तो पारिवारिक जीवन कितना ऊर्जावान हो जाये। दसों दिशाओं में प्रेम बिखेरना और उसकी लौटती हुई प्रतिध्वनि (echo) का भावभरा अमृत पीकर धन्य हो जाना, यही है हमारे जीवन की सफलता का रहस्य । बचपन में कभी न कभी हम सब ने कुँए में आवाज़ लगा कर वापिस आती उस echo को, प्रतिध्वनि को अवश्य सुना होग, ऐसी ही होती है प्रेम की प्रतिध्वनि।

गुरुदेव कह रहे हैं हमारी इच्छा है कि जितना भी संभव हो सके,जिस प्रकार भी सम्भव हो सके, आप अपने परिवार को हमारी इस मूल प्रवृत्ति (basic instinct) से परिचित कराएं और जहाँ जितनी मात्रा में सम्भव हो, इस प्रेमरूपी अमृत के प्रकट होने की क्रिया को आगे बढ़ाने में पूरा-पूरा सहयोग करें। प्रेम की विभूति के यदि थोड़े-थोड़े कण भी लोग उपलब्ध कर सकें तो निश्चय ही “देवत्व उनके चरणों में दौड़ता चला आयेगा।” उपाय सोचेंगे और ढूँढेंगें कि किस प्रकार अपने परिवार में प्रेम की प्रवृत्ति का अधिकाधिक प्राकट्य और अभिवर्धन सम्भव है। जो सूझेगा उसे पूरी तत्परता से कार्यान्वित करेंगे। हमें विश्वास है कि नये मानव का,नये विश्व का तत्त्व-दर्शन यह “प्रेमधर्म” ही होगा।

आज के ज्ञानप्रसाद को यहीं पर अल्प विराम करने की आज्ञा चाहते हैं -INTERVAL 

To be continued

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

1 फरवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत इस बार आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 11 समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परमपूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य युगसैनिक निम्नलिखित हैं :

1) सरविन्द कुमार पाल – 40, (2) अरूण कुमार वर्मा जी – 40, (3) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 40, (4) संध्या बहन जी – 31, (5) सुमन लता बहन जी – 29, (6) प्रेरणा कुमारी बिटिया रानी – 27, (7) संजना कुमारी बिटिया रानी – 27, (8) विदुषी बहन जी – 26, (9) कुसुम बहन जी – 26, (10) निशा भारद्वाज बहन जी – 25,(11)डॉ अरुण त्रिखा-25,(12) डॉ अरुण त्रिखा-24 

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युगसैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत-बहुत साधुवाद, हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है।आज के 24 आहुति संकल्प में 3 सहकर्मी 40 अंक प्राप्त करते हुए bracketed हैं। तीनों हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई स्वीकार करें। हमारी दृष्टि में सभी सहकर्मी विजेता ही हैं जो अपना अमूल्य योगदान दे रहे हैं,धन्यवाद् जय गुरुदेव


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