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स्वामी विवेकानंद और जमशेदजी टाटा की अवस्मरणीय भेंट वार्ता

24 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद – स्वामी विवेकानंद और जमशेदजी टाटा की अवस्मरणीय भेंट वार्ता

“आदरणीय अरुण वर्मा जी को गोल्ड मैडल जीतने के लिए हमारी शुभकामना लेकिन गोल्ड मैडल की पिक्चर भेजने में असमर्थ हैं, क्षमा प्रार्थी हैं”  

आज का ज्ञानप्रसाद प्रारम्भ करने से पूर्व इस लेख की पृष्ठभूमि बताना बहुत ही आवश्यक है। टाइम टेबल में तो एक नए लेखों की श्रृंखला का आरम्भ था लेकिन शुक्रवार  को ही हमने एक वीडियो देखी जिसमें विश्वगुरु  स्वामी विवेकानंद जी के जीवन की तीन भेंट वार्ताओं  का वर्णन था। यह तीन भेंट वार्ताएं  थीं 1. सुप्रसिद्ध भारतीय उद्योगपति जमशेदजी टाटा   के साथ, 2.सुप्रसिद्ध अमरीकी उद्योगपति  John D Rockefeller के साथ  और  3. सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक Nikola Tesla के साथ। केवल 11 मिंट की इस वीडियो ने हमें इस तरह उलझा दिया कि लगातार दो दिन हम इसी उधेड़ बुन  में रहे कि इन तीनों मुलाकातों  पर आधारित एक लेख लिख दिया जाये। लेकिन स्वामी जी के विशाल व्यक्तित्व के बारे में, जिसने हमें सदैव ही प्रभावित किया है, इतने कम शब्दों में लिखना लगभग असम्भव सा लगा। हमने  केवल एक ही मुलाकात -जमशेदजी टाटा  के साथ वाली का चयन किया।  इस चयन का भी एक विशेष ही कारण था – Indian Institute of Science-Tata Institute की स्थापना। शिकागो की धर्म संसद में जाने से पूर्व स्वामी विवेकानंद ने समस्त भारत के चप्पे-चप्पे की यात्रा कर ली थी और आम भारतीयों की स्थिति देख अति चिंतित  थे। स्वामी जी  जिस उदेश्य से  विदेश गए उससे हम सब भली भांति परिचित हैं। स्वामी जी द्वारा  भारत की अध्यात्म शक्ति को पश्चिम की उद्योगिक शक्ति से साथ  connect करना सम्पूर्ण विश्व के लिए एक गर्व की बात है।    

 Indian Institute of  Science Bengaluru के लिए हमारे ह्रदय में एक विशेष स्थान है ,जब भी, कहीं भी, इस इंस्टिट्यूट के बारे में सुनते हैं ,जानते हैं ,देखते हैं तो एक सिहरन सी उभरती है।  केवल 21 वर्ष की आयु में हमें इस Institute में कुछ समय व्यतीत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के साथ काम करने ,विचार विमर्श ,वार्तालाप करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। इस इंस्टिट्यूट को Mecca of Chemistry नाम से प्रसिद्धि प्राप्त है। हमें तो आज तक विश्वास नहीं हुआ  कि 50 विद्यार्थिओं की M.Sc. की क्लास में से हमारे HOD प्रोफेसर AC Jain  ने  बैंगलोर भेजने के लिए हमारा  चयन किस आधार पर किया था। यह भी कोई बात नहीं थी कि हम क्लास में topper  थे या हमारी उनके साथ कोई विशेष जान पहचान थी। आज जब इस घटना का चिंतन करते हैं तो यही निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जिस प्रकार शांतिकुंज की भूमि एक संस्कारित भूमि है ,अवश्य ही टाटा इंस्टिट्यूट की भूमि ने भी हमें हमारे रिसर्च करियर की पृष्ठभूमि बनाने हेतु हमें अपनी ओर खींचा होगा। एक साधारण निर्धन परिवार की बैकग्राउंड में इस तरह के चमत्कार केवल गुरुदेव और माँ गायत्री  द्वारा ही सम्पन्न किया जा सकते  हैं।

तो आइये ज़रा संक्षिप्त सी  नज़र दौड़ाएं अध्यात्म के विश्वगुरु और उद्योग के बादशाह के बीच संक्षिप्त मुलाकात का विवरण। यह मुलाकात इतनी महत्वपूर्ण है कि इन दोनों के बीच का पत्र  भी गूगल पर देखा जा सकता है।

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31 मई 1893 का दिन था, एक समुद्री जहाज़  में दो महान भारतीय जापान के योकोहामा नगर से कनाडा के वैंकूवर जाते  हुए  पहली बार मिले। एक थे उद्योगपति  जो आगे चलकर भारत के सबसे महान दूरदर्शी, जमशेदजी टाटा   बने और  दूसरे थे एक भिक्षु स्वामी विवेकानंद  जो भारत की आध्यात्मिक परंपरा को पहले से कहीं अधिक प्रभावी ढंग से पश्चिम में ले जाने के लिए  प्रयासरत रहे। यह  अति आकर्षक कहानी  भारत के इतिहास में  तो बहुत ही कम जानी जाती  है  लेकिन  महत्वपूर्ण क्षण को चिह्नित करती है।

जमशेदजी शिकागो में एक औद्योगिक प्रदर्शनी के लिए जा रहे थे। मई की  दोपहर में इस  शानदार जोड़ी ने योकोहामा बंदरगाह से  SS Empress of India  स्टीमशिप में  वैंकूवर के लिए  यात्रा शुरू की। 

जमशेदजी और विवेकानंद पहले भी मिले थे लेकिन दोनों के पास कोई  लंबी बातचीत करने  का समय नहीं था।अब जब वे  जहाज के promenade  पर मिले  तो कुछ बातचीत आरम्भ हुई । विवेकानंद जी  ने जमशेदजी  को अपने अनुभवों के बारे में बताया जो उन्होंने  सत्य की खोज में एक भटकते हुए साधु के रूप में भारत के एक कोने से दूसरे  कोने की  यात्रा के दौरान प्राप्त किए थे । उन्होंने अपने साथी भारतीयों के अथक उत्पीड़न और दमन के बारे में बातें  कीं  जो उन्होंने औपनिवेशिक अधिकारियों ( Colonial authorities)  के हाथों देखे थे। इसके अलावा स्वामी जी ने  बताया कि चीन की  यात्रा के दौरान उन्हें बौद्ध मठों में कई संस्कृत और बंगाली पांडुलिपियां (manuscripts)  मिलीं। स्वामी जी ने  यह भी बताया  कि विश्व धर्म संसद की उनकी यात्रा का मिशन  भारतीय आस्था  को पश्चिम में ले जाना और विश्व  के प्रमुख धर्मों के बीच एकता का आह्वान करना है ।

विश्व धर्म संसद  एक ऐसी सभा थी जिसमें 5,000 से अधिक धर्म गुरुओं, विद्वानों और प्रमुख विश्व धर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाले इतिहासकारों ने अपना योगदान दिया। यह सभा  आधुनिक इतिहास में पहली वैश्विक अंतरधार्मिक घटना मानी जाती है। इस विशाल संसद का  शिकागो में World Columbian Exhibition  के एक  हिस्से के रूप में 11 से 27 सितंबर, 1893 के बीच आयोजन  किया गया था।

दोनों हस्तियों ने  जापान की  प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति और भारत में स्टील  उद्योग की नींव रखने की जमशेदजी की योजना पर भी चर्चा की। भारत के सबसे बड़े  उद्योगिक समूहों में से एक के संस्थापक, जमशेदजी ने यह भी बताया कि वह ऐसे उपकरणों और प्रौद्योगिकी की तलाश में हैं  जो भारत को एक मजबूत औद्योगिक राष्ट्र बनाने में मदद करें। विवेकानंद जी  ने अत्यंत उत्साह के साथ इस दृष्टि का समर्थन किया, और कहा कि हमारे देश  की असली आशा  लाखों  करोड़ों सामान्य भारतीयों  की समृद्धि और प्रगति में है। उन्होंने यह भी कहा कि जापान से माचिस आयात करने के बजाय, जमशेदजी को उनका निर्माण भारत में ही करना चाहिए और   ग्रामीण गरीबों को आजीविका प्रदान करने में मदद करनी चाहिए। विवेकानंद जी के विज्ञान और गहरी देशभक्ति के विचारों से प्रभावित होकर, जमशेदजी ने स्वामी जी से  भारत में एक शोध संस्थान की स्थापना के अभियान में  मार्गदर्शन का अनुरोध किया। स्वामी जी की आयु उस समय केवल 30 वर्ष की थी और जमशेदजी लगभग दुगनी ,54 वर्ष के थे। दूरदर्शी साधु स्वामी जी  मुस्कुराए, अपना आशीर्वाद दिया और कहा:

” कितना अच्छा हो यदि हम पश्चिम की वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों को भारत के तप और मानवतावाद के साथ जोड़ सकें!”

उस यात्रा के बाद जमशेदजी और स्वामीजी  कभी नहीं मिले। लेकिन इन शब्दों ने उद्योगपति के दिल में एक स्थान  बना लिया  और पांच साल बाद उन्होंने स्वामी जी  को निम्नलिखित पत्र लिखा:

__________

एस्प्लेनेड हाउस, बॉम्बे।

23 नवंबर 1898

प्रिय स्वामी विवेकानंद,

मुझे विश्वास है, आपको याद होगा कि   जापान से शिकागो की  यात्रा पर मैं आपके साथ एक सहयात्री था। मुझे उस  समय भारत में तपस्वी भावना के विकास और कर्तव्य को  उपयोगी साधनों  में बदलने के बारे में आपके विचार याद हैं।  

भारत के लिए अनुसंधान संस्थान की मेरी  योजना के बारे में आपने निस्संदेह सुना या पढ़ा होगा और उसके संबंध में आपके  विचार भी  याद हैं।  मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस आत्मा के प्रभुत्व वाले पुरुषों के लिए मठों या आवासीय हॉल की स्थापना से बेहतर तपस्वी भावना का कोई बेहतर उपयोग नहीं किया जा सकता है, जहां उन्हें सामान्य शालीनता के साथ रहना चाहिए और विज्ञान- प्राकृतिक और मानवतावादी- की खेती के लिए अपना जीवन समर्पित करना चाहिए 

मेरा मानना ​​है कि अगर आप जैसे  तपस्वी  और सक्षम नेता द्वारा  मार्गदर्शन किया जाता है, तो यह तपस्या, विज्ञान और हमारे सामान्य से देश को विशेष बनाने  में बहुत मदद करेगी । मैं  जानता हूँ  कि इस तरह के अभियान के लिए  विवेकानंद से अधिक उपयुक्त सेनापति कोई नहीं हो सकता ।

क्या आपको लगता है कि आप इस संबंध में हमारी प्राचीन परंपराओं को जीवंत करने के मिशन में अपनेआप  को लागू करेंगे? शायद, आपने इस मामले में भारत के  लोगों को जागृत  करने वाले एक ज्वलंत पैम्फलेट के साथ बहुत ही अद्भुत  शुरुआत की है । मैं खुशी-खुशी प्रकाशन का सारा खर्च उठाऊँगा।”

आदर के साथ,

मैं हूँ, प्रिय स्वामी,

आपका विश्वासी,

जमशेदजी टाटा

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रामकृष्ण मिशन की स्थापना में व्यस्त, विवेकानंद प्रस्ताव को स्वीकार करने में असमर्थ थे, लेकिन उन्होंने तुरंत अपनी शिष्या, सिस्टर निवेदिता को जमशेदजी से मिलने के लिए भेजा। दोनों ने इक्क्ठे कार्य  करके  अनुसंधान संस्थान के लिए एक विस्तृत योजना तैयार की। लेकिन तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्ज़न  ने इसे तुरंत रिजेक्ट कर  दिया।

हालाँकि जमशेदजी ने इन योजनाओं पर काम करना जारी रखा और आश्वस्त किया कि भारत  की भविष्य की प्रगति विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान पर महत्वपूर्ण रूप से निर्भर है और एक ऐसे   संस्थान की परिकल्पना की जो इसे प्रोत्साहित करे।

1898 में, वह  ऐसी संस्था के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश में थे, वे मैसूर के दीवान शेषाद्री अय्यर से मिले और अपने विचार पर चर्चा की। उन दोनों ने मैसूर के तत्कालीन शासक कृष्णराजा वोडेयार चतुर्थ को बंगलौर नगर  के मध्य में लगभग 372 एकड़ मुफ्त भूमि दान करने और अन्य आवश्यक सुविधाएं प्रदान करने के लिए राजी किया।

जुलाई 1902 में स्वामी विवेकानंद की मृत्यु हो गई और जमशेदजी की दो साल बाद मृत्यु हो गई।  जमशेदजी  इस बात से अनजान थे कि उनकी साझा दृष्टि पांच साल बाद साकार होगी। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस का जन्म 1909 में हुआ था और 1911 में इसका नाम बदलकर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISC) कर दिया गया। आज यह  इंस्टिट्यूट भारत का गौरव है और विश्व के प्रमुख शोध संस्थानों में से एक है। टाटा समूह के बाद के उपक्रमों में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज TISS,मुंबई  (1930 के दशक में) और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च TIFR मुंबई  (1940 के दशक में) की स्थापना भी शामिल थी।

इन सभी संस्थानों में हमें कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। धन्यवाद् 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

22 जनवरी 2022 का अमृत तुल्य ज्ञान प्रसाद के रूप में अपलोड किया गया वीडियो देखने के उपरांत आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के 9 सूझवान व समर्पित देवतुल्य युग सैनिकों ने 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य करके पुरुषार्थ कमाने का सराहनीय व प्रशंसनीय कार्य किया है इसके लिए आप सब बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और वह देवतुल्य युग सैनिक निम्नलिखित हैं l 

(1) अरूण कुमार वर्मा जी – 68, (2) सरविन्द कुमार पाल – 57, (3) संध्या बहन जी – 56, (4) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 51, (5) प्रेरणा कुमारी बिटिया रानी – 48, (6) डा.अरुन त्रिखा जी – 31, (7) निशा भारद्वाज बहन जी – 29, (8) रेणुका बहन जी – 24, (9) विदुषी बहन जी – 24

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युगसैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद। अरुण कुमार वर्मा  जी को एक  बार फिर 68 अंक  प्राप्त कर  स्वर्ण पदक जीतने  पर  हमारी  व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। हमारी दृष्टि में सभी सहकर्मी  विजेता ही हैं जो अपना अमूल्य योगदान  दे रहे हैं,धन्यवाद् जय गुरुदेव


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