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आत्मा और परमात्मा से सच्चे प्रेम की तीन धाराएं 

20 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद -आत्मा और परमात्मा से सच्चे प्रेम की तीन धाराएं 

परमपूज्य गुरुदेव की मथुरा से विदाई के क्षणों पर आधारित 9 लेखों की श्रृंखला का अंतिम लेख अपने सहकर्मियों के श्रीचरणों में समर्पित करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। यह सभी लेख वर्ष 1969 की  अखंड ज्योति पत्रिका पर आधारित हैं। हम सबने इन लेखों से क्या-क्या अद्भुत ज्ञान प्राप्त किया, परमपूज्य गुरुदेव के निर्देशों का हमने  कितना पालन किया, आपके द्वारा अनवरत पोस्ट होते कमेंटस  स्वयं ही बता रहे हैं कि ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में अपने गुरु के  प्रति समर्पण का कितना उत्साह और जिज्ञासा है। सभी परिवारजन, वरिष्ठ-बच्चे-स्त्री-पुरष कंधे से कंधा  मिलाकर आगे ही आगे बढ़े जा रहे  हैं । उन सभी सहकर्मियों के हम सदैव आभारी रहेंगें जो अपने व्यक्तिगत कमेंट लिखने के उपरांत अन्य सहकर्मियों के कमेंटस पर भी बड़ी ही पैनी दृष्टि बनाये रखते हैं। जिस प्रकार अर्जुन को केवल मछली की आंख ही दिखाई देती थी, उसी प्रकार हमारे इन  सहकर्मियों को केवल अपना लक्ष्य ही दिखाई देता रहता है-संपर्क का लक्ष्य। जितना अधिक संपर्क होगा, उतने अधिक परिजन प्रेरित होंगें और उतना ही अधिक गुरुवर  के विचारों का प्रसार होगा। ऐसे ही  सहकर्मियों ने  अपने कठिन परिश्रम के आधार से स्वर्ण पदक प्राप्त किए और वह भी  एक बार नहीं ,दो बार नहीं बल्कि कई-कई बार। इन  सभी सहकर्मियों को हमारा नमन एवं बधाई।लेकिन संकल्प सूची में  शामिल हो रहे बाकि सहकर्मियों के परिश्रम को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। गाड़ी को चलाने के लिए तो केवल चार पहियों की आवश्यकता होती है लेकिन ऑनलाइन ज्ञानरथ को तो 13-13 पहिये गति दे रहे हैं। धन्य है ऐसे सहकर्मी।        

परमात्मा से प्रेम करने का अर्थ होता है अपनी आत्मा को प्यार करना है और इसी सिद्धांत को परमपूज्य गुरुवर  ने  वसुधैव कुटुंबकम का उदाहरण देते हुए हम सबको प्रेम और समर्पण की शिक्षा दी है। यही वह सूत्र है जिसने  हम सब परिवारजनों को बंधा हुआ है। आज के युग में परिवारों के टूटने का सबसे बड़ा कारण मानवीय मूल्यों का पालन न करना ही है। हम सब समय-समय पर शिष्टाचार ,अनुशासन ,समर्पण, सहकारिता ,सहभागिता ,आदर ,सम्मान ,निष्ठां,श्रद्धा ,विश्वास, सहकर्मिता और अपनत्व को स्मरण करते रहते हैं।  

ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में योगदान देने के  उत्साह और जिज्ञासा की बात हुई है तो हम आदरणीय  निशा भारद्वाज और निशा दक्षित जी का उदाहरण देना चाहेंगें।  आपने इस बहनों के जिज्ञासा भरे कमेंटस और हमारे रिप्लाई अवश्य ही देखे होंगें। इन्होने पूछा  था “ हम ऑनलाइन ज्ञानरथ के लिए  क्या कर सकते हैं ?” हमने तो यही रिप्लाई किया था कि परमपूज्य गुरुदेव स्वयं हर सहकर्मी की योग्यता देख परख कर ही चयन करते हैं।  जो कोई भी गुरुकार्य में इस समय सलग्न है उसके पास अवश्य ही  एक स्पैशल skill है जिसे गुरुदेव ने देखा ,परखा और एक ही बात कही “तू मेरा काम कर “ जो जो इस पुनीत कार्य में योगदान दे रहे  हैं  ,छोटा या बड़ा बहुत ही सौभाग्यशाली है beacause he is selected from a pool of outstanding talented individuals. यह सौभाग्य सभी को प्राप्त नहीं होता, इसके लिए पात्रता विकसित करनी पड़ती है। जिसके पास भी कुछ देने की प्रवृति है वह इस योगदान से वंचित नहीं रह सकता। 

इन्ही शब्दों से आरम्भ करते हैं आज के  बहुत ही संक्षिप्त ज्ञानप्रसाद की अमृतपान 

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आत्मा और परमात्मा से सच्चे प्रेम की प्रथम धारा सदाचरण, संयम, उत्कृष्टता, आदर्शवादिता, उदारता, सहृदयता, सज्जनता जैसी सत्प्रवृत्तियों को उगाने और बढ़ाने में जादू जैसा कार्य करती है और कितनी आध्यात्मिक विशेषताओं का उदय एवं अभिवर्धन सहज ही दृष्टिगोचर होता चला जाता है। यह सत्प्रवृत्तियाँ ही हैं, जो आवश्यकता से  ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में प्रयुक्त की जा सकती है। दुष्ट दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्तियों से घिरे-भरे मनुष्य में कोई दिव्य एवं अलोकिक विभूतियाँ न कभी रही हैं, न आगे हो सकती है।

हमारे प्रेम की दूसरी धारा अपने मार्ग-दर्शक गुरुदेव के चरणों में निरन्तर प्रवाहित रही। श्रद्धा और विश्वास का विकास करने के लिए आरम्भ में किसी सजीव देहधारी महामानव की सहायता इच्छित  होती है, जिससे देवत्व की समुचित मात्रा विद्यमान् हो। मनोभूमि को  परिपुष्ट करने वाली  श्रद्धा और  विश्वास के दोनों तत्त्वों को गुरु भाव ही विकसित करता है। एकलव्य को द्रोणाचार्य की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर अपनी श्रद्धा को  परिपक्व करते हुए शक्ति उपलब्ध करने का साधन बनाना पड़ा था। परमपूज्य गुरुदेव को   संयोगवश एक दिव्य सत्ता  का सहारा मिल गया तो उससे लाभ क्यों न उठया जाता ? उसी दिव्य सत्ता की  अहैतुकी कृपा से गुरुदेव का  रोम-रोम कृतज्ञता से भर गया और अपने को एक “अधिकारी शिष्य” सिद्ध करने की तीव्र उत्कण्ठा जग पड़ी। गुरुदेव ने अपना मन दिव्य सत्ता के  मन के साथ जोड़ दिया और अपना शरीर उनके आदेशों के अनुरूप गतिविधियां  अपनाने के लिए प्रस्तुत कर दिया। सांसारिक सम्पदायें नगण्य थी, जो थीं  उनकी राई-पत्ती उसी प्रयोजन में होम दी, जो उन्हें प्रिय था। सच्चे शिष्य अपनी पात्रता इसी  प्रकार के समर्पण से सिद्ध करते रहे हैं। गुरु तत्त्व को द्रवीभूत( liquefied ) और वशीभूत कर लेने की शक्ति किसी शिष्य को ऐसे ही समर्पण से मिलती है। अध्यात्म मार्ग के पथिकों की इस सनातन परम्परा को हमने अपनाया। फलतः वह सब कुछ मिलता रहा जो हमारी  पात्रता के अनुरूप था। हमने गुरुदेव की असीम और अलौकिक कृपा  पाई है लेकिन  इसे कोई संयोग न माना जाय। उस अनुग्रह को हमने “अपनापन देकर” खरीदा है। दूसरे धूर्तों  की तरह अपने भौतिक सुखों की रट लगाकर दण्डवत प्रणाम  करते रहते तो हमारी तुच्छता उन्हें कहाँ द्रवीभूत कर पाती, कदापि नहीं , और वैसा  वात्सल्य और आकाश जैसा अनुदान कदापि उपलब्ध न हो सका होता।

रामकृष्ण परमहंस ने जिस प्रकार विवेकानन्द और समर्थ गुरु रामदास ने जैसे  अपनी शक्ति शिवाजी को हस्तान्तरित की थी, वैसी ही कृपा किरण परमपूज्य गुरुदेव  को भी मिली। यह कृपा किसी वस्तु या सुविधा के रूप में नहीं बल्कि धैर्य, साहस, शौर्य, पुरुषार्थ, श्रद्धा, विश्वास, ब्रह्म वर्चस्व, तप-प्रवृत्ति उदार, सहृदयता के रूप में उपलब्ध हुई। इन  विभूतियों ने गुरुदेव के  व्यक्तित्व को निखारा।  निखरा हुआ  व्यक्ति तो  अनायास ही आवश्यक साधन, सुविधा एवं सहायता दबोच लेता है। वैसे ही अवसर हमें भी मिलते रहे। अपार जन-सहयोग और  सम्मान का अधिकारी कोई व्यक्ति तब तक नहीं हो सकता जब तक उसमें उपरोक्त सत्प्रवृत्तियाँ न हों। गुरु अनुग्रह से अन्तरंग में जिन सद्भावनाओं का उदय हुआ, वे ही हमारे द्वारा सम्पन्न हो सकने वाले कार्यों की अदृश्य आधार शिलाएँ हैं। प्रेम की दूसरी धारा गुरुचरणों पर बहाई और उसकी नकल  ने हमें धन्य बना दिया।

प्रेम की तीसरी धारा परिवार क्षेत्र में प्रवाहित होती रही। पत्नी को उसने अपने रंग में रंग दिया और वह अनन्य अनुचरी की तरह हमारी छाया बनी फिरती है। घर, परिवार में जो सौजन्य प्रसन्नता  का वातावरण है, उससे हमें परम संतोष है। इससे बढ़कर अपना गायत्री परिवार और युग-निर्माण परिवार है, जिसमें 50 लाख से ऊपर विशाल जनसमूह एक सूत्र श्रृंखला में बंधा हुआ  है। इस विशाल जनसमूह को जिस सूत्र ने  मजबूती से जकड़कर बाँध रखा गया है, वह है हमारी गहन आत्मीयता,अजस्र  ममता, प्रगाढ़ सद्भावना और कौटुम्बिक घनिष्ठता इस आधार पर इतने लोगों की शुभेच्छायें सम्पादित की हैं। उनके जीवनक्रम में ऐसे परिवर्तन किये हैं, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। परिवार के आधे से अधिक सदस्य अपना आन्तरिक कायाकल्प हुआ अनुभव करते हैं।

जीवन की अनमोल उपलब्धि:

उपासना एवं साधना के शुष्क एवं नव-निर्माण के कठिन कष्टकर कार्यों में इतना विशाल जनसमूह लगा हुआ है, उसके पीछे शिक्षा, उपदेश या लेख, प्रवचन ही काम नहीं कर रहें, असली प्रेम सम्बन्ध हैं  जिनके  दबाव से अनिच्छा और असुविधा के होते हुए भी  लोगों का उस दिशा में सुधबुध खोनी ही  पड़ती  है, जो हमें चाहत है। इस प्रयोग में लोगों के  जीवन सुधरे हैं,  समाज का हित हआ है और हमें सम्मान, सद्भाव  मिला है। परिवार को प्रेम देकर, उनके दुःख-दर्द में हिस्सा बंटाकर जितना दिया है, उससे असंख्य गुना पाया है। नये युग का नया निर्माण कर सकने जैसा साहस और विश्वास जिस आधार पर किया जा सका है वह  केवल लक्ष-लक्ष परिजनों की अनन्य आत्मीयता, श्रद्धा और सद्भावना ही है। इसे हम अपने जीवन की अनमोल उपलब्धि मानते हैं।

प्रेम-भावना के इन  त्रिकोणीय अध्याओं से हमें पग-पग पर सद्गुणों और सद्भावनाओं की वे विभूतियाँ मिलती चली गई हैं, जिनसे जीवन की हर उपलब्धि और सफलता को सम्भव कर दिखाया। हमारी उपासना पद्धति के मध्यांतर  में सन्निहित यह प्रेम साधना ही थी, अपने गुरु के साथ आत्मा का मिलन ही था जिसने  सामान्य को  असामान्य में और  तुच्छता को महानता में परिणित करने का चमत्कार दिखाया 

विदा होते समय जो ऐंठन अन्तरंग में होती है, वह मोह-ममता कायरता या विवशता जन्य नहीं बल्कि “चिरसंचित उच्च प्रेम साधना” की सहज परिणित है, जिसे हमने अपने परिवार के लिये कलेजे की गहराई में उगाया  और बढ़ाया है।हम सब जानते हैं कि  प्रेम का उपहार कसक ही है, तो फिर हमें ही उस कसक से  वंचित क्यों रहना पड़ता।

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

19  जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत इस  बार  आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के  7  समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परमपूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य सप्तऋषि  निम्नलिखित हैं :

(1) सरविन्द कुमार पाल – 48, (2) अरूण कुमार वर्मा जी – 30, (3) प्रेरणा कुमारी बिटिया रानी – 27, (4) संध्या बहन जी – 26, (5) संजना कुमारी बिटिया रानी – 26, (6) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 24, (7) पिंकी पाल बिटिया रानी – 24

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युगसैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है। सरविन्द  कुमार  जी को एक  बार फिर 48   अंक  प्राप्त कर  स्वर्ण पदक जीतने  पर  हमारी  व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। जय गुरुदेव

हमारी दृष्टि में सभी सहकर्मी  विजेता ही हैं जो अपना अमूल्य योगदान  दे रहे हैं,धन्यवाद् जय गुरुदेव


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