आत्मा से प्रेम करना ही परमात्म-प्रेम का आधार 

19 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद -आत्मा से प्रेम करना ही परमात्म-प्रेम का आधार 

हम अक्सर कहते हैं जिन प्रेम कियो तिन प्रभु पाओ -तो आइये आज देखते हैं  सिख धर्म के सुप्रसिद्ध दशम ग्रन्थ की इन पंक्तियों को कैसे आत्मसात किया जाता है। अत्यंत गूढ़ ज्ञान से भरपूर Only those who love,realize God. हमारा आज का ज्ञानप्रसाद शायद बहुतों को प्रेम की सही परिभाषा समझने में सहायक हो सके ,हमारे परमपूज्य गुरुदेव ने भी इसी स्तर का प्रेम करके अपने मार्गदर्शक  के साथ सम्बन्ध बनाये और परनाम हम सबके समक्ष हैं। प्रेम की तीन धाराओं की चर्चा के साथ कल  इस श्रृंखला का अंत होगा।  आज केवल आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व पर चर्चा करेंगें।     

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हम अक्सर बात करते हैं “वसुधैव कुटुम्ब्कम की” जिसका अर्थ होता है -सारा विश्व मेरा परिवार है, सारी  धरती मेरा कुटुम्ब  है। यह वाक्य भारत के संसद  भवन के द्वार पर भी अंकित है, परन्तु यह सब   होते हुए भी कुटुम्ब यानि परिवार उन्ही  तक सीमित रह जाता है, जिन तक हमारा सम्पर्क क्षेत्र है। ऐसा  इसलिए है कि  “प्रेम” के लिए परिचय आवश्यक है। किसी अपरिचित से प्रीति कैसे हो? ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार, गायत्री परिवार, युग-निर्माण परिवार के सदस्य चूँकि हमारे परिचय क्षेत्र की परिधि में आते हैं इसलिए  हम अपनी सीमा के अनुसार  उन्हें अपने साथ प्रेम के बंधन  में बांधते हैं। इस  प्रेम साधना का क्षेत्र जैसे-जैसे बढ़ता है विराट् ब्रह्म की आराधना का व्यवहारिक अवसर भी अधिक व्यापकता के साथ उपलब्ध होने लगेगा। यह एक ऐसा अवसर है जिससे अनंत प्रेम की ,श्रद्धा की और समर्पण की धारा बहती ही चली जाती है।  अपने सहकर्मियों में हम दिन प्रतिदिन इस प्रेम की धारा की व्यापकता का अनुभव करने के साथ-साथ भौतिक परिणाम भी देख रहे हैं जो हम सबके  अन्तःकरण में उतरते जा रहे हैं। अन्तःकरण में से उद्भूत प्रेम-तत्त्व जिन तीन दिशाओं  में, धाराओं में प्रवाहित होता  है, वह विधि शोक संतापों को धो डालती है।इन तीन धाराओं पर हम अगले लेख में चर्चा करेंगें, पहले आज यह तो देख लें कि  जिस प्रेम-तत्व को  परमपूज्य गुरुदेव हमें समझाने की बात कर रहे हैं आखिर है क्या।

आत्मा से प्रेम करना ही परमात्म-प्रेम का आधार  

परमात्मा से प्रेम करने का अर्थ होता है अपनी आत्मा को प्यार करना है। क्या यह स्वार्थ नहीं हुआ ? बात  कर रहे हैं हम  वसुधैव कुटुम्ब की, यानि सारे विश्व को प्रेम करने की और कह रहे अपनेआप को प्रेम करने की, है न कितना confusing . नहीं, नहीं बिल्कुल confusing नहीं है। अपने को प्यार करना अर्थात् जीवन लक्ष्य को, आत्म-कल्याण को सर्वोपरि महत्व देना। इस स्तर की निष्ठा निरन्तर यही प्रेरणा देती  है कि शरीरिक  सुख और मन की ललक के लिए कोई ऐसा काम न किया जाय, जो आत्म-लक्ष्य की प्रगति में अवरोध उत्पन्न करे। वासना और तृष्णा की तुच्छता समझ में आ जाने से आत्मा को प्रेम करने वाला संयम सदाचरण का समुचित ध्यान रखे रहता है और उन कषाय- कल्मषों- कुसंस्कारों  के भार से बच जाता है, जो प्राणी को पतन के गर्त में निरन्तर घसीटती रहती है।

मन उन तथ्यों को सोचने और उन कामों को करने में लगता है, जो उत्कर्ष की भूमिका बना सकें। शरीर एवं मन को छोटा  और आत्मा को प्रमुख स्थान जब मिलने लगा तो उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की नीति ही कार्यान्वित होती है और “भौतिक प्रलोभनों” का आकर्षण अत्यन्त ही तुच्छ एवं छिछोरा प्रतीत होता है। आत्मा से प्रेम करना ही परमात्म-प्रेम का आधार है।  इस श्रेय पथ पर जब कदम बढ़ चलें  तब वे लक्ष्य पूर्ति की मंजिल पर पहुँचकर ही रुकते हैं। कल वाले लेख में भी हमने लिखा था “जिन प्रेम कियो तिन प्रभु पायो”

विश्व की समस्त शक्तियों और परम्पराओं का भण्डारगृह परमात्मा है, उसके साथ आत्मा को जोड़ देने का अर्थ  है परमात्मा के शक्ति प्रवाह को आत्मा में भरने लगने का आधार विनिर्मित कर देना। बिजली घर में विनिर्मित शक्ति के साथ जब हमारे घर की बत्तियों का संबन्ध एक पतले तार के माध्यम से जुड़ जाता है तो बटन दबाते ही सारी बत्तियाँ जगमगाने लगती हैं। एक खाली नीचे गड्ढे को ऊँचाई पर अवस्थित भरे-पूरे तालाब के साथ पतली नाली के द्वारा सम्बन्धित करते हैं तो तालाब का पानी गड्ढे में चलने लगता है और कुछ ही समय में गड्ढा उतनी ही ऊँचाई तक पानी से भर जाता है, जितना कि तालाब था। यही उदाहरण तब चरितार्थ होता है, जब “आत्मा का सम्बन्ध परमात्मा” के साथ जुड़ जाता है। यह एक अटल सत्य है कि  इस सम्बन्ध सूत्र को प्रेम तत्त्व द्वारा ही जोड़ा जा सकता है। 

प्रेमभाव की चरम सीमा

उपासनाओं की सफलता तभी सम्भव है, जब इष्टदेव के साथ प्रेमभाव की सीमा चरम परिणित (climax) होती हो।शारीरिक क्रिया की तरह मशीन जैसे कर्मकाण्ड कुछ थोड़े बहुत फल तो  दे ही सकते हैं लेकिन चरम  सीमा पर पहुंचने के लिए, climax तक पहुँचने के लिए परमात्मा से आत्मा का सम्बन्ध बहुत ही आवश्यक है। “परमात्मा प्रेममय” है और वह प्रेम से ही प्रभावित होता है। कर्मकाण्ड तो उस प्रेम को बढ़ाने, उगाने के साधन भर का काम करते हैं। गुरुदेव कहते हैं: हमने  उपासना के नियमोपनियम ( bylaws ) और विधि-विधानों पर समुचित ध्यान दिया है, साथ ही अन्तःचेतना को भी  भाव भरी बनाये रखा है और निरन्तर यही भावना बनाए रखी  कि “प्राणप्रिय इष्टदेव” के साथ भाव भरी एकाग्रता  अनवरत रूप में बनी रहे। इस प्रक्रिया से उत्पन प्रकाश ने  अपने रोम-रोम में प्रवेश करते हुए ऐसी  प्रेरणा दी है  जिससे मानव लक्ष्य की पूर्ति सम्भव कर सकने का मार्ग सरल होता चला गया है ।

लेकिन आज के युग में प्रेम की परिभाषा कुछ और ही व्यक्त करती है ,आइये इस पर भी कुछ चर्चा कर लें। यह विचार केवल और केवल हमारे व्यक्तिगत विचार हैं, हम कभी भी इन विचारों को किसी के ऊपर थोपने का प्रयास नहीं कर रहे  हैं। 

संसार में अलग-अलग स्वभाव के अलग-अलग व्यक्ति हैं। सभी में अलग-अलग कुछ विशेष गुण होते हैं,जिसे व्यक्तित्व (personality) कहते हैं। कुछ विशेष व्यक्तित्व विशेष व्यक्ति को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। यही आकर्षण है जो एक-दूसरे के विचारों में मेल खाता है, एक दूसरे को करीब लाता है।  इसीलिए आजकल कहा जाता है उन दोनों की chemistry बहुत मेल खाती है, physics चाहे हो न हो।  यहाँ केमिस्ट्री का अर्थ वोह केमिकल्स  हैं  जो personality बनाते हैं और फिजिक्स का अर्थ  Physical body से है जो height, weight इत्यादि  बनाते हैं।  केमिस्ट्री यानि केमिकल्स से ही एक-दूसरे के प्रति  त्याग का भाव अनुभव होता  है,एक-दूसरे के लिए समर्पित हो जाने की भावना उत्पन होती  है।मनुष्य एक-दूसरे की प्रसन्नता में प्रसन्नता अनुभव करता है। एक-दूसरे का साथ पाकर सुरक्षित तथा प्रसन्न अनुभव करता है। एक-दूसरे पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देना चाहता है। जब उसका एक-दूसरे से सिर्फ शारीरिक या मानसिक सम्बन्ध न होकर “आत्मा से आत्मा” का मिलन हो जाता है,शायद वही प्रेम है। ‘प्रेम’, हृदय की वह अनुभूति है जो जन्म के साथ ही ईश्वर से उपहार स्वरूप प्राप्त होती  है, या यूँ कहें कि,माँ के गर्भ में ही प्रेम का भाव पल्लवित एवं पुष्पित हुआ होता  है। प्रेम अस्तित्व है- अवलम्ब है- समर्पण है, निःस्वार्थ भाव से चाहत है,जिसे हम केवल  अनुभव ही कर सकते हैं। प्रेम अपनेआप में ही पूर्ण है, जिसे शब्दों में अभिव्यक्त करना थोड़ा कठिन ही है। फिर भी हम अल्पबुद्धि से  प्रेम की परिभाषा  लिखने का प्रयास करते  हैं। 

प्रेम शब्द में  प्र को प्रकारात्मक और एम को पालनकर्ता भी माना जाता है। प्रेम में लेन-देन नहीं होता। प्रेम सिर्फ देकर ही  संतुष्ट होता है। शरीर,मन और आत्मा प्रेम के सतह हैं। प्रेम किसे,किस सतह पर होता है,यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है।

Philosophers  आत्मा और परमात्मा के प्रेम का वर्णन करते हैं,तो महाकवियों के संवेदनशील मन ने हृदय की सुन्दरता को महसूस कर प्रेम का चित्रण अपने अंदाज में किया है। आम तौर पर हर रिश्ते में अलग-अलग भावनाएं जुड़ी होती हैं।  उन भावनाओं की अनुभूति भी प्रेम के प्रकार हैं। उम्र के साथ-साथ प्रेम का भाव भी बदलता रहता है। जब व्यक्ति अपने बालपन की दहलीज को लांघ किशोरावस्था के लिए कदम बढ़ाता है,तब उसे शारीरिक और मानसिक स्तर पर कई प्रकार के परिवर्तनों  का सामना करना पड़ता है और वह विपरीत लिंग के प्रति आकर्षित होता है। इसी आकर्षण को जब शरीर, मन और आत्मा आत्मसात कर लेता है तो उस  प्रक्रिया को ही हम प्रेम कह सकते हैं। तब आरम्भ होती हैं लेन-देन की ,समर्पण की प्रक्रिया।  प्रेम एक-दूसरे को देकर संतुष्ट होता है।

राधा-कृष्ण का प्रेम सच्चे प्रेम का उदाहरण है। पुरातन युग में प्रेम को खुली छूट नहीं मिली थी। लैला-मजनू,हीर-रांझा के प्रेम को समाज  की मान्यता नहीं मिली, और प्रेम के लिए उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी थी। लेकिन आजकल तो  प्रेमी बहुत ही आसानी से टूट और जुड़ रहे हैं। आज लोग “दिल की अपेक्षा दिमाग” से काम ले रहे हैं। समाज भी प्रेम को स्वीकार कर रहा है,यही वजह है कि आजकल प्रेम विवाह की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

आज पश्चिमी सभ्यता के अन्धानुकरण ने प्रेम का अंदाज ही बदल दिया है।आजकल का प्रेम जीवन जीवान्तर तक का न होकर कुछ वर्षों में ही टूट और जुड़ रहा है। प्रेमी-प्रेमिका बड़ी आसानी से एक-दूसरे के प्रेम बन्धन से मुक्त होकर अन्य प्रेमी-प्रेमिका ढूंढ ले रहे हैं, और बड़ी आसानी से अपने अपने पुराने प्रेमी-प्रेमिका को कह देते हैं कि,अब हम सिर्फ दोस्त हैं। कुछ लोग विवाहेत्तर ( extramarital) सम्बन्धों को भी प्रेम की संज्ञा देते हैं। उनके अनुसार प्रेम अंधा होता है वह उचित और अनुचित नहीं देखता, सिर्फ़ प्रेम करता है -अंधा- वह अपने तरह-तरह के कुतर्कों द्वारा अपने प्रेम को सही साबित करने का प्रयास करता है।

विवाहेत्तर सम्बन्धों का दुष्परिणाम कभी-कभी बहुत ही भयावह होता है। मर्यादित प्रेम यदि जीवन में सुधा की रसधारा  है तो अमर्यादित प्रेम विष का प्याला और आग का दरिया है। इसलिए,प्रेम में मर्यादा का होना आवश्यक है। 

क्रमशः जारी- To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

18   जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत इस  बार  आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के  7  समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य युगसैनिक निम्नलिखित हैं :

(1) डा अरुण त्रिखा-33,(2)प्रेरणा बिटिया-28,(3) अरुण वर्मा जी-26,(4)रजत वर्मा जी-25,(5) संध्या कुमार बहिन जी-36,(6)रेणु श्रीवास्तव बहिन जी-40,(7)सरविन्द कुमार जी-29 

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युग सैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है। रेणू  बहिन  जी को एक  बार फिर 40  अंक  प्राप्त कर  स्वर्ण पदक जीतने  पर  हमारी  व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। जय गुरुदेव

हमारी दृष्टि में सभी सहकर्मी  विजेता ही हैं जो अपना अमूल्य योगदान  दे रहे हैं,धन्यवाद् जय गुरुदेव


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