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हमने गायत्री माता को वैसे ही प्यार किया जैसे एक छोटा बच्चा अपनी माँ से करता है।

18 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद -हमने गायत्री माता को वैसे ही प्यार किया जैसे एक छोटा बच्चा अपनी माँ से करता है। 

आज का ज्ञानप्रसाद आरम्भ करने से पूर्व हम सभी देवतुल्य सहकर्मियों को एक पुनीत कार्य के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। सभी जानते हैं कि वसंत का पावन पर्व इस वर्ष 5 फरवरी को है।परमपूज्य गुरुदेव अपना आध्यात्मिक जन्म दिवस वसंत को ही मानते हैं। गायत्री परिवार की समस्त गतिविधियों  का शुभारम्भ वसंत को ही किया जाता रहा है। सविनय आमंत्रण है कि परमपूज्य गुरुदेव यां ऑनलाइन ज्ञानरथ से सम्बंधितअनुभूतिआँ भेज कर अपने गुरु के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करने का परम् सौभाग्य प्राप्त करें। आदरणीय सरविन्द कुमार और अरुण वर्मा जी इस दिशा में अग्रसर  हुए थे, आशा करते हैं अधिक से अधिक  सहकर्मी  सहकारिता और सहभागिता व्यक्त करेंगें। अभी 10-12 दिन का समय है, तो आज ही चिंतन करना आरम्भ करें तो उचित होगा। 

हर बार की भांति आज का लेख भी परमपूज्य गुरुदेव के अंतःकरण की परतों के भीतर झाँकने की दिशा में एक छोटा सा प्रयास है। हमारे देवतुल्य सहकर्मी इन लेखों को अटूट प्यार देकर हमारा उत्साहवर्धन कर रहे हैं ,हम ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं और इसी उत्साह से आरम्भ करते हैं आज का ज्ञानप्रसाद।  

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 हमने गायत्री माता को वैसे ही प्यार किया जैसे एक छोटा बच्चा अपनी माँ से करता है 

यदि हमारी गायत्री उपासना के ब्रह्म कलेवर को उखाड़ कर उसके अन्तरंग को देखा जाये, जाना जाय तो उसके गहन में प्रेम तत्त्व की साधना का विशाल विस्तार परिलक्षित होगा। मातृत्व की साकार प्रतिमूर्ति को हमने “गायत्री माता” के रूप में देखा और उसे वैसे ही प्यार किया जैसा एक छोटा बच्चा  अपनी सगी माता को कर सकता हैं लोग सिर फोड़ी करते रहते है कि गायत्री साकार नहीं निराकार है। साकार का अर्थ है जिसका आकार होता है और निरकार का अर्थ है जिसका कोई आकार नहीं।  हम इस बहस में नहीं पड़ते कि वह क्या है? वस्तुतः वह सब कुछ है। जो सब कुछ है वह क्या नहीं है? वस्तुतः वह सब कुछ है, उसे किसी आकृति में देखने से क्या गर्ज? निराकार नहीं है हम यह कब कहते  हैं, पर उसे साकार मानना भी अनुपयुक्त नहीं है। बिजली निराकार है पर वह बल्ब के भीतर साकार भी देखी जा सकती है? माता की साकार छवि को हमने अपनी प्रेम भावना के विकास में एक महत्त्वपूर्ण माध्यम माना और उसकी प्रतिक्रिया एवं प्रतिध्वनि के रूप में अविरल वात्सल्य का दैवी अनुदान निरन्तर पाया।

महामानव की प्रतिमा हमने साक्षात् मिल  गयी

परमात्मा का प्रेम अपने विकसित स्वरूप में एक कदम आगे बढ़ते हुए गुरु-भक्ति के रूप में फलित हो सका। भगवान् की साकार-निराकार प्रतिमा तो हमें कल्पना-स्तर में अपनी बनानी पड़ती है, पर सतोगुण आत्म-बल और दैवी तत्त्व से भरे-पूरे महामानव की प्रतिमा तो हमें बढ़ी हुई, हँसती-बोलती चलती-फिरती साक्षात् मिल गई। प्रेम साधना के लिये यह और भी सरल माध्यम दीखा। सो हमने अपने मार्ग-दर्शक पर उतनी ही निष्ठा आरोपित की जितनी परमेश्वर पर की जा सकती है। एक बार जाँच, परख लेना और सोच समझ लेना भी आवश्यक था, सो वैसा कर भी लिया। पूरी परख तो हो भी नहीं सकती, पूर्णता प्राप्त तो कोई शरीरधारी है भी नहीं, फिर सतर्क, चतुर और अविश्वासी भी तो आये दिन धोखा खाते रहते है।

यदि एक महान् प्रयोग में कहीं कुछ गड़बड़ी  मिली भी  तो अपना सहज विश्वास और निर्मल प्रेम अपने लिये तो उज्ज्वल परिणाम ही उत्पन्न करेगा। जिस पर प्रेम बोया गया, यदि वह गड़बड़ होगी तो उसकी गड़बड़ी उसी के साथ वापिस चली जाएगी, अपनी श्रद्धा अपने साथ सत्परिणाम लेकर ही  लौटेगी।  इसलिये यह मान लिया गया कि अपने को कोई खतरा  नहीं है। 

अध्यात्म मार्ग का अर्थ है समर्पण

घाटा- मुनाफा तो  सांसारिक परिपेक्ष्य में होता है। अध्यात्म मार्ग के  पथिक को  आरम्भ में ही शिरोधार्य करके पूर्ण समर्पण करना  पड़ता है। निश्चय ही यह मुनाफ़ा कमाने का व्यापार नहीं है ।। सांसारिक दृष्टि से हर अध्यात्मवादी को घाटे के बजट बनाने पड़ते हैं, तभी उसकी आत्मिक प्रगति के साधन सरंजाम जुड़ते है। जो सांसारिक लाभ के लिये आध्यात्म मार्ग में प्रवेश करता है, उसे निराश ही होना पड़ता है। दोनों परस्पर विरोधी दिशायें है, एक को खोकर दूसरी पाई जा सकती है। हमारे लिए कभी भी यह आशंका नहीं उठी कि हमारे मार्गदर्शक  द्वारा बताये गए निर्देशों से कोई भौतिक  हानि होगी। जहाँ विश्वास, वहाँ प्रेम और  जहां प्रेम वहाँ विश्वास। बाजीगर के हाथ में अपने तार बाँधकर कठपुतली  बहुत कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करने का आनन्द लेती रहती है। अपने बाज़ीगर के प्रति  आत्म-समर्पण करके हमने  क्या खोया ? केवल पाना ही था, सो पाया ही पाया और  पाते ही  चले आ रहे हैं  और आगे तो और भी अधिक पाना है।

अपने मार्ग-दर्शक के प्रति हमारी प्रेम साधना को  साँसारिक रिश्तों से तोला  जाय तो उसकी उपमा पतिव्रता स्त्री के अगण्य पति प्रेम से दी जा सकती है। उनकी प्रसन्नता अपनी प्रसन्नता है, उनकी इच्छा अपनी इच्छा। अपने व्यक्तित्व के लिये भी कुछ चाहने-माँगने की कल्पना तक नहीं उठी। केवल इतना ही सोचते रहे अपने पास जो कुछ भी है, अपने साथ जो भी सम्पदायें विभूतियाँ जुड़ी हुई हैं, वे सभी इस आराध्य के चरणों पर समर्पित हो जाएँ, उनके व्यक्तित्व में धुल जाएँ, उनके प्रयोजनों में खप जाएँ, ऐसे अवसर जब भी, जितने भी आये हमारे संतोष ओर उल्लास की मात्रा उतनी ही बढ़ी।  यह गुरु-भक्ति हमारे लिये कितने बड़े वरदान ओर उपहार लेकर वापिस लौटती रही है, इसकी चर्चा इस समय अप्रासंगिक ही रहेगी। दूसरे निम्न स्तर  लोगों की तरह हमनें  भी अगर  गुरु-शिष्य का ढोंग बनाकर अपनी कामना पूर्ति की माँग पर माँग रखी होती और प्रेम को  लाभदायक धन्धे के रूप में मछली पकड़ने का जाल बनाया होता तो निराश और शिकायतों भरा मस्तिष्क लेकर खाली ही लौटना पड़ता। दिव्य तत्त्व में आखिर इतनी अकल तो होती ही  है कि मनुष्य की स्वार्थपरायणता  और प्रेम भावना की वस्तुस्थिति का अन्तर समझ सके। 

दण्डवत, प्रणाम और आरती स्तवन से नहीं वहाँ तो केवल वस्तुस्थिति ही प्रभावी सिद्ध होती है।” हमारे गुरुदेव पर आरोपित हमारी प्रेम साधना प्रकारान्तर से चमत्कारी वरदान बनकर ही वापिस लौटी है और  लौटती रहेगी।

विश्व ब्रह्माण्ड भगवान का विराट रूप

हमारी प्रेम साधना की एक धारा-प्रवाह परिवार की ओर है। यों कहने सुनने में परिवार एक संकीर्णता ही लगता है। परिवार से, गायत्री परिवार या युग-निर्माण परिवार से ही मोह क्यों? सारे संसार से क्यों नहीं? इस सन्देह का समाधान जानने के लिये हमें व्यवहारिकता की भूमिका में उतरना होगा। समस्त विश्व ब्रह्माण्ड को भगवान् का विराट् रूप माना  जाता हैं। विश्व की, प्राणि-मात्र की, जड़-चेतन की सेवा ही भगवान् की सेवा है। इसे सिद्धान्त के रूप में ही सही माना जा सकता है, व्यवहार में उसकी कोई प्रतिक्रिया बनती नहीं। समस्त ब्रह्माण्ड में भगवान् व्याप्त है। पर उसके साथ संपर्क नहीं बन सकता। सम्पर्क हम केवल पृथ्वी भर तक रख सकते है। हमारी पहुँच इससे आगे नहीं है। समस्त जड़-चेतन में भगवान् हैं  पर समुद्र तल या भूगर्भ में हमारी पहुँच से बाहर पदार्थों के साथ हमारा व्यवहारिक सम्पर्क कैसे जुड़े? इसी प्रकार समस्त प्राणियों को भगवान का स्वरूप मानकर भी हम उन प्राणियों के समीप नहीं जा सकते, जो हमारी पहुँच से बहुत दूर जल थल या आकाश में विचरण करते रहते हैं । मछलियों की, मच्छर-मक्खियों की, कीट-पतंगों की सेवा करना भी सिद्धांत के तौर पर  ठीक है पर व्यवहार में मनुष्य ही उस क्षेत्र में आता है, क्योंकि उसकी स्थिति से अपनी स्थिति मिलती है। मनुष्यों में भी हम बहुत दूर के निवासी, अन्य भाषा बोलने वाले  लोगों के साथ सम्पर्क बनाने में असमर्थ हैं। समीपवर्ती, समान स्थिति के लोगों से सम्बन्ध बना  कर ही हम विश्व मानव की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को चरितार्थ कर सकते हैं।  प्राणि-मात्र की सेवा का आदर्श, मानव सेवा में ही चरितार्थ होता है। जिस प्रकार भगवत् प्रेम को इष्टदेव के एक सीमित विग्रह में सीमाबद्ध कर ध्यान करना पड़ता है, उसी प्रकार विराट ब्रह्म की सेवा साधना भी मानव समाज के उस वर्ग में करनी पड़ती है। जिस तक कि अपनी पहुँच हो।

हमारी पहुँच जितने व्यापक क्षेत्र में होती चली जा रही है, उसी अनुपात से हमारी “वसुधैव कुटुम्बकम्” की तृप्ति को चरितार्थ करने का विस्तार बढ़ता जाता है। इस सम्पर्क क्षेत्र को हम अपना परिवार कहते हैं और उन्हीं की सेवा, सहायता, ममता, आत्मीयता का ध्यान रखते हैं। जो हमें नहीं जानते, जिन्हें हम नहीं जानते, जिनकी पहुँच हम तक नहीं, जिन तक हम नहीं पहुँच सकते, उनके साथ प्रबल इच्छा होते हुये भी हम सम्पर्क नहीं साध सकते और उनकी प्रत्येक सेवा करने का मार्ग नहीं निकाल सकते, परोक्ष सेवा की बात अलग है वह तो अपनी सेवा करने से भी विश्व की सेवा हो जाती हे और भावना से सबके कल्याण का चिन्तन किया जा सकता है। सो हम भी करते हैं पर व्यवहारिक सेवा के लिए हर किसी का एक सीमित क्षेत्र ही है, सो ही हमारा भी है।

क्रमशः जारी- To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

17    जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत इस  बार  आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के   समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य युगसैनिक निम्नलिखित हैं :

(1) संध्या बहन जी – 44. (2) प्रेरणा कुमारी बिटिया रानी – 41, (3) सरविन्द कुमार पाल – 40, (4) अरूण कुमार वर्मा जी – 31, (5) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 30, (6) विदुषी बहन जी – 26, (7) डा.अरुन त्रिखा जी – 25, (8) पिंकी पाल बिटिया रानी – 24

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युग सैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है। संध्या बहिन  जी को एक  बार फिर 44  अंक  प्राप्त कर  स्वर्ण पदक जीतने  पर  हमारी  व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। जय गुरुदेव

हमारी दृष्टि में सभी सहकर्मी  विजेता ही हैं जो अपना अमूल्य योगदान  दे रहे हैं,धन्यवाद् जय गुरुदेव


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