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आत्मीयता शरीर से नहीं, आत्मा से होती है। 

13 जनवरी 2021 का ज्ञानप्रसाद – आत्मीयता शरीर से नहीं, आत्मा से होती है। 

परमपूज्य गुरुदेव जब परिजनों के पत्रों के उत्तर देते थे  तो लिखते थे “ प्रिय आत्मीय जन।” कितनी आत्मीयता और अपनत्व है इस शब्द में।  आज के लेख में हम अध्यन करते हुए यह जानने का प्रयास करेंगें कि आत्मीयता का आत्मा के साथ कैसे सम्बन्ध है और सच्चे प्यार की क्या परिभाषा है। गुरुदेव बता रहे हैं कि प्यार में किसी को कोई घाटा नहीं रहा तो हमें क्यों रहे,किसी को कोई नुक्सान नहीं हुआ तो हमें क्यों हो। आज का लेख प्रेमी-प्रेमिका जोड़ों को अवश्य पढ़ना चाहिए- ज़रा पता चले प्रेम का असली अर्थ क्या होता है। “स्वार्थ नहीं -समर्पण,समर्पण और केवल समर्पण” 

जब हम यह शब्द लिख रहे हैं तो ऐसा लग रहा है कि गुरुदेव ने हमारे लिए ही लिखे होंगें।  एक- एक शब्द हम अपने ऊपर फिट करके देख रहे हैं।  इसका टेस्ट तो हमने कई बार किया है लेकिन अभी एक दिन पहले  ही अपने आत्मीयजनों ने,सहकर्मियों ने,सहपाठियों ने जिस प्रेम और अपनत्व के भाव व्यक्त किये हैं, हम तो निशब्द हैं। केवल एक दिन की अस्वस्थता ही थी। गुरुदेव ने हमारा कार्य सरल कर दिया, धन्यवाद् गुरुवर, आपके श्रीचरणों में शीश नवाते हैं -ऐसे  ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार की संरचना और संचालन के लिए।किस किस ने, क्या-क्या मैसेज किये,फ़ोन किये,क्या-क्या अपनत्व की भावना व्यक्त की-हम तो केवल यही कहने में समर्थ हैं -धरती पर स्वर्ग का अवतरण हो चुका  है, मनुष्य में देवत्व का उदय हो चुका है -ऐसी  देवतुल्य आत्माएं ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार की शान हैं नमन नमन एवं नमन। 

इन्ही शब्दों के साथ  आरम्भ करते हैं आज का पाठ  

“प्यार के धागों को इस तरह तोड़ना पड़ेगा, इसकी कभी कल्पना भी न की थी।”

विदाई के दिन जितने समीप आते जा रहे हैं, उतनी ही गति से हमारी भावनाओ में  उफान आता जा रहा है। लोगों को मौत का डर लगता है, सो हमें  न कभी था और न अब है। व्यक्तिगत स्वामित्व और अहंकार  के कारण उत्पन्न  होने वाला मोड़ भी कब का  विदा हो गया है । अवधुत (सन्यासी) की तरह मरघट में  रहना पड़े  तो भी अपने को कष्ट होने वाला नही है। सन् 60 का अज्ञातवास “सुनसान के सहचरों” के साथ हँसते-खेलते काट लिया था। जिन्दगी के शेष  दिनों को शरीर  किन्ही भी परिस्थितियों  में  पूरा कर लेता। विदाई के बाद उत्पन होने वाली अन्य सभी विषम परिस्थितियों को सहन करने योग्य विवेक, धैर्य, साहस  ओर अभ्यास अपने को है। बार-बार जो हूक  और इठन कलेजे मे उठती है उसका कारण यदि कोई दुर्बलता हो सकती है तो एक ही हो सकती है कि  जिनको प्यार किया, उनको समीप पाने की भी अभिलाषा सदा बनी रही। एक कुटुम्ब  बनाया, घरौंदा  खड़ा  किया, उसे बड़े प्यार से सजाया, बड़ी-बड़ी आशायें  बाँधी, बड़े अरमान संजोये। अब जबकि वे सपने कुछ-कुछ सजीव होने लगे थे, तभी नींद खुलने  का समय आ गया। ऐसा मीठा सपना अधूरा ही छोड़ना पड़ेगा  यह कभी सोचा भी न था। प्यार के धागों को इस तरह तोड़ना पड़ेगा , इसकी कभी कल्पना भी न की थी। जाने की बात बहुत दिन से कही  सुनी जा रही थी। उसकी जानकारी भी थी  पर यह पता न था कि प्रियजनों के बिछुड़ने  की व्यथा  कितना अधिक कचोटने  वाली-ऐंठने  मरोड़ने वाली होती है। अब विदाई के क्षण जितने समीप आते-जाते हैं, वह व्यथा  घटती नहीं बढ़ती  ही जाती है। यों  यह एक विडम्बना ही है कि जो  मोहमाया  का खण्डन करता रहा हो, ज्ञान-वैराग्य का उपदेश देता  रहा हो, वह अवसर आने पर अपने ऊपर बीतने पर इतनी व्यथा-वेदना अनुभव करे।

“प्रेम के व्यापार में घाटा किसी को भी नहीं रहता, फिर हमें  ही नुकसान क्यों उठाना पड़ता?”

अब हम अपने अन्तर की हर घुटन, व्यथा और अनुभूति को अपनों के आगे उगलेंगे ताकि हमारे अन्तर का भार हल्का हो जाय और परिजनों को भी वास्तविकता का पता चल जाय। आत्म-कथा तो जैसे कैसे लिखी जा सकेगी पर जो आंतरिक संघर्ष घुमड़ते हैं, उन्हें तो बाहर लाया ही जा सकता है। इसे सुनने से,  सुनने वालो को मानव तत्व के एक पहलू  को समझने का अवसर ही मिलेगा।

लोग अपनी आंख से हमें  कुछ भी देखते रहे हो, अपनी समझ से कुछ भी समझते रहें  हो। किसी ने विद्वान, किसी ने तपस्वी, किसी ने तत्व-दर्शी, किसी ने लोक-सेवी, किसी ने प्रतिभा-पुजं  आदि कुछ भी समझा हो। हम अपनी आँखों  और अपनी समझ में केवल एक अति सहृदय, अति भावुक और  आतिशय स्नेही  प्रकृति के एक नगण्य से मनुष्य मात्र रहे हैं । प्यार करना “सीखने और सिखाने” में सारी जिन्दगी चली गई। यदि कोई धन्धा  किया है तो एक कि “महँगी कीमत देकर प्यार खरीदना और सस्ते दाम पर उसे बेच देना। इस व्यापार में लाभ हुआ या घाटा, इसका हिसाब कौन लगाए।  खाली हाथ नंग धडंग  आठ पौण्ड वजन लेकर आये थे, अब कपड़ों में लिपटा एक सौ सोलह पौण्ड वजन लेकर जा रहे है- खोया क्या? पाया ही तो है। तब एक माँ और एक कुटुम्ब हमें  अपना समझता था, अब कितनों  ही  की अनुकम्पायें  अपने ऊपर बरसती हैं , कितनों के ही अनुग्रह से अपने शरीर, मन और  अन्तःकरण विकसित हए, खोया  क्या? पाया ही पाया है । प्रेम के व्यापार में घाटा किसी को भी नहीं रहता, फिर हमें  ही नुकसान क्यों उठाना पड़ता? नुकसान एक ही रहा कि यह सोचने मे न आया कि स्नेह  का तन्तु जितना मधुर है, वियोग की घड़ियों में वह उतना ही तीखा बन जाता है। यदि यह मालूम होता कि आत्मीयता जितनी घनिष्ठ होती है, उसका वियोग उतना ही  असह्य  होता है तो कुछ दिन पहले से ही मन को समेटना, स्नेह  तंतुओं को शिथिल करना और उदासीन बनने का अभ्यास करते, पर प्रकृति का  क्या किया जाय। मन तो ऐसा भौंड़ा  मिला है, आदतें  तो ऐसी विचित्र हैं, जो ज्ञान विज्ञान के सारे बन्धन तोड़कर आगे निकल जाता है।

“आत्मीयता शरीर से नहीं, आत्मा से होती है”

आत्मा एक है, हम सभी एक धागे  में  माला के दानों  का तरह जुड़े हुए हैं। शरीर से दूर रहने पर आत्मा की एकता बनी रहती है। स्नेह  में दूरी बाधक नहीं होती। आत्मीयता शरीर से नहीं, आत्मा से होती है।  तत्व दर्शन हमनें  पढ़े  तो बहुत  हैं, दूसरों को सुनाये भी हैं  पर उनका प्रयोग सफलतापूर्वक  कर सकना कितनी ऊँची स्थिति पर पहुँचे व्यक्ति के लिए सम्भव है यह कभी सोचा न था। लगता है अभी अपनी आत्मिक प्रगति नगण्य ही है। यदि ऐसा न होता तो अपने स्वजन स्नेह  और उनकी असंख्य उप-कृतियाँ मस्तिष्क में  सिनेमा के चित्रपट की तरह उभर-उभर कर क्यों आती? असीम प्यार पाया पर उसका प्रतिदान  क्या दिया? अनेकों  के अनेकों  अहसान, पदार्थों के न सही भावनाओं के सही, अपने ऊपर लदे पड़े हैं। उनको कुछ प्रतिदान दिये बिना ही चलना पड़ रहा है। स्नेहीजनों के स्नेह  और अनुग्रहियों  के अनुग्रहों  का कितना ऋणभार लेकर विदा होना पड़ रहा है, यह सोच कर कभी-कभी बहुत  कष्ट होता है। अच्छा होता जन्म से ही कहीं  एकान्त मे चले गये होते। लोमड़ी खरगोशों  की तरह किसी का अहसान, उपकार, स्नेह  और सहकार लिये बिना जिन्दगी के दिन पूरे कर लेते, पर यदि लोगों के बीच रहना ही पड़ा और उनका सौजन्य लेना ही पड़ा  तो संतोष तब रहता जब उस प्रेम का प्रतिदान  भी कुछ बन पड़ा होता। सोचते तो बहुत  रहे, स्वप्न बड़े-बड़े देखते रहे, अमुक के लिए यह करेंगे, अमुक को यह देंगे, पर जो  किया  जा सका और जो  दिया जा सका, वह इतना कम है कि आत्मग्लानि होती है और लज्जा से  सिर  नीचा हो जाता है। कदाचित कुछ दिन और ठहरने का अवसर बन जाता तो और कुछ आशा शेष न थी।  

“स्वजनों के चरणो की धूलि  सिर पर रखते।”   

एक इच्छा अवश्य  थी कि असीम स्नेह  बरसाने वाले स्वजनों के लिये प्रतिदान  में जो कुछ अपने भीतर बाहर और कुछ शेष बच  रहा है, उसे राई रत्ती  देकर जाते और सबके चरणो की धूलि  सिर  पर रखकर कहते:

“इस  नगण्य से प्राणी से अभी इतना ही बन पड़ा। 84 लाख योनियों में यदि विचरण करना पड़ा तो हर शरीर को लेकर आप लोगो की सेवा में उपलब्ध प्रेम और सहकार का कुछ न कुछ ऋण भार चुकाने के लिए अति श्रद्धा के साथ उपस्थित होते रहेंगे और जिस शरीर से जितनी सेवा, सहायता बन  पड़ेगी, जितनी कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त कर सकने की क्षमता रहेगी उसका पूरा-पूरा उपयोग आपके समक्ष करते रहेंगे।”

पर अब यह सब कहने से लाभ क्या? समय आ पहुंचा। यों  मरना अभी देर से  है पर जब परस्पर मिलने जुलने और हंसने  खेलने, सुनने और समझने की सुविधा न रही, एक दूसरे से दूर-समीप के आनंद  से वंचित रह कर जीवित भी रहें  तो यह आनन्द उल्लास  जिसे पाने का यह मन बन चुका है, कहाँ मिल सकेगा? जिस शक्ति के साथ हम बंधे और जुड़े हैं, उसकी  अवज्ञा नहीं की जा सकती। इन्कार, उपेक्षा और बहाना करने की बात भी नहीं सोचते। हम अज्ञान ग्रस्त मोह बन्धन में बंधे प्राणी अपना दूरवर्ती  हित नहीं समझते-वह शक्ति समझती है और जिसमें हमारा, हमारे परिवार और हमारे समाज धर्म, एवं विभु का कल्याण है. उसी को करने जा रहे हैं।

अगला लेख -गुरुदेव की दादा गुरु के प्रति असीम श्रद्धा

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

11 जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत एक बार फिर से आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 9 समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य युगसैनिक निम्नलिखित हैं :

(1) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 56, (2) सरविन्द कुमार पाल – 47, (3) अरूण कुमार वर्मा जी – 29, (4) संजना कुमारी बिटिया रानी – 29, (5) डा.अरुन त्रिखा जी – 26,25, (6) प्रेरणा कुमारी बिटिया रानी – 25, (7) नीरा त्रिखा बहन जी – 24, (8) संध्या बहन जी – 24, (9) रेणुका गंजीर  बहन जी – 24

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युग सैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है बहिन रेनू  श्रीवास्तव जी को  हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। जय गुरुदेव

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