कठपुतली तो बेजान उपकरण है, खेल तो बाजीगर की उँगलियाँ करती हैं। 

10 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद – कठपुतली तो बेजान उपकरण है, खेल तो बाजीगर की उँगलियाँ करती हैं। 

आज के ज्ञानप्रसाद का शीर्षक बहुत ही Philosophical है। मदारी के तमाशे में दर्शक तो कठपुतली  के अभिनय को   देख कर प्रसन्न होते रहते  हैं लेकिन उसे नचाने वाला तो वह Expert  बाज़ीगर है जिसके हाथों की उँगलियाँ यह सब कुछ कर पाने में समर्थ हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने भी दादागुरु को एक बाज़ीगर और अपनेआप को बार-बार कठपुतली का संज्ञा दी है।        

आज से आरम्भ हो रही ज्ञानप्रसाद-शृंखला में हम परमपूज्य गुरुदेव की मथुरा से हरिद्वार की विदाई की पूर्ववेला  में उन्ही के द्वारा व्यक्त किये गए विचारों का अमृतपान करेंगें । गुरुदेव ने 20 जून 1971 को मथुरा से विदाई ली और युगतीर्थ शांतिकुंज में 10 दिन रहकर सुबह चार बजे कंधे  पर  एक थैला और  कंबल रखकर  हिमालय के लिए प्रस्थान कर गए थे।इन लेखों की शृंखला में हमारे परिजन परमपूज्य गुरुदेव की दूरदर्शिता और भावी योजनाओं का अनुभव करते हुए देखेंगें कि लगभग दो वर्ष पूर्व ही उन्होंने हम जैसे अनगनित बच्चों के समक्ष अपना करुणा से भरा ह्रदय खोल कर रख दिया था। आने वाले लेख परमपूज्य गुरुदेव की दिव्य लेखनी से 1969 की अखंड ज्योति में प्रकाशित हुए। इसी सन्दर्भ में 3 मई 2019 को अत्यंत दुर्लभ कंटेंट सहित हमने 25 मिंट की वीडियो भी बनाई थी। इस लेख के साथ हमारे  सहकर्मी अगर इस वीडियो को भी देख लें तो उस महान  व्यक्तित्व को समझने में और भी  सहायता मिलेगी। Please go to our YouTube channel to watch this video.

हमारा एकमात्र उदेश्य “परमपूज्य गुरुदेव को प्रत्येक हृदय में स्थापित करना”      

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आयु की दृष्टि मे लगभग 60 वर्ष पूरे करने जा रहे है। हमारे सांसारिक जीवन में एक बड़ा विराम यही लग जाना है। एक छोटे नाटक का यही पटाक्षेप है। दो वर्ष मे कुछ ही अधिक दिन शेष है कि हमे अपनी वे सभी हलचले बन्द कर देनी पड़ेगी जिनकी सर्वसाधारण को जानकारी बनी  रहती है। इसके उपरान्त क्या करना होगा, इसकी सही रूपरेखा तो हमें  भी मालूम नहीं है पर इतना सुनिश्चित  है कि यदि आगे भी जीना पड़ा तो उससे सर्वसाधारण का कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध न होगा। कहना चाहिए जो ऐसा प्रकाश पाकर भी अन्धकार में भटके। यदि हमारी कोई विशेषता और बहादुरी  है तो वह इतनी भर कि प्रलोभनों  और आकर्षणों  को चीरते हुए दैवी निर्देशों का पालन करने मे हमने अपना सारा साहस और मनोबल  झोंक  दिया। जो सुझाया गया वही सोचा और जो कहा गया वही करने लगे। इसी प्रक्रिया मे एक नगण्य सी जिन्दगी का एक छोटा-सा नाटक समाप्त हो चला, यही हमारी नन्ही-सी आत्म-कथा है। अब जीवन के अन्तिम चरण मे जो निर्देश मिला है उससे ऐसा विचित्र और कष्टकर  निर्णय हमें  स्वेच्छा से नहीं करना पड़ा है वरना इसके पीछे एक विवशता है। अब तक का सारा जीवन हमने एक ऐसी सत्ता के इशारे पर गुजारा है जो हर घड़ी  हमारे साथ है। हमारी हर विचारणा और गति विधि पर उसका नियन्त्रण है। बाजीगर की उंगलियों से बंधी हुए धागों के साथ जुड़ी हुई कठपुतली तरह-तरह के अभिनय करती हैं। देखने वाले इसे कठपुतली की करतूत मानते है पर असल में वह बेजान लकड़ी का एक तुच्छ-सा उपकरण मात्र है। खेल तो बाजीगर की उँगलियाँ करती हैं। हमें पता नहीं कभी कोई इच्छा निज के मन की  प्रेरणा से उठी है क्या? कोई क्रिया अपने मन से की  है क्या? जहाँ तक स्मृति साथ देती है एक ही अपना क्रम-एक ही ढर्रे पर लटकता चला आ रहा है कि हमारी मार्ग-दर्शक शक्ति जिसे हम गुरुदेव के नाम से स्मरण करते है,जब भी जो निर्देश देती रही है बिना अनुनय किये कठपुतली की तरह सोचने और करने की हलचलें  करते रहे हैं।

सौभाग्य ही कहना चाहिए कि आरम्भिक जीवन से ही हमें ऐसा मार्ग-दर्शन मिल गया। उसे अभागा ही इनकार कौन करे? कैसे करे? अपने बस  की यह बात ही नहीं। जब सारी जिन्दगी के हँसते मुस्कराते दिन एक इशारे पर गुजार दिए  तो अब इस जरा जीर्ण काया की  सुविधा-असुविधा का, परिजनों की मोह ममता का विचार कौन  करे? दो ढाई वर्ष हमें  अपना वर्तमान क्रिया कलाप समाप्त करना ही है और एक ऐसी तपक्षर्या में संलग्न होना ही है जिसमें जन संपर्क की न तो छूट है और न सुविधा।

गुरुदेव का करुणाभरा ह्रदय:

पिछले और अगले दिनों  की कभी तुलना करने लगते हैं  तो लगता है छाती फट जाएगी और एक हूक  पसलियों को चीर कर बाहर  निकल पड़ेगी। कोई अपनी चमड़ी उखाड़कर भीतर का अन्तरंग परखने लगे तो उसे माँस और हड्डियों  में एक तत्व उफनता दृष्टिगोचर होगा वह है असीम प्रेम। हमने जीवन में एक ही कमाई  की  है-प्रेम, एक ही सम्पदा कमाई है-प्रेम, एक ही रस हमने चखा है और वह है प्रेम का। यों  सभी में हमें अपनापन और आत्मभाव प्रतिबिंबित दिखाई पड़ता है पर उनके प्रति तो असीम ममता है जो एक लम्बी अवधि में भावनात्मक दृष्टि से हमारे अति समीप रहते रहे हैं । इनसे विलग होते हुए  हमे कम व्यथा नहीं है।

हर  किसी को विश्वास रखना चाहिए कि और कुछ हमारे पास हो चाहे न हो, असीम प्यार भरी ममता से हमारा अन्तःकरण भरा पूरा अवश्य है। जिसने हमें  तिल-भर प्यार किया है उसके लिये अपने मन में से ताड़ बराबर ममता उमड़ी  है। लम्बी अवधि से जिनके साथ हँसते-खेलते और प्यार करते चले आ रहे हैं  उनसे विलग होने की बात सोचकर हमारा मन भी गाय बछड़े के वियोग की तरह कातर हो उठता है। कई बार लगता है कोई छाती मे कुछ हूक  रहा है। यह वियोग कैसे सहा जाएगा। जिसकी कल्पना मात्र से दिल बैठ जाता है, उसी वियोग  को सहन करने में कितना बोझ पड़ेगा ? कहीं उस बोझ से यह शरीर  बैठ तो नहीं जायेगा ऐसी आशंका होती है।

ज्ञान और वैराग्य की पुस्तकें  हमने बहुत पढ़ी हैं । मोहमाया  की  निरर्थकता पर बहुत प्रवचन सुने हैं । संसार मिथ्या है, कोई किसी का नहीं- सब स्वार्थ के हैं  आदि आदि । यदा कदा उन शब्दो को दूसरों के सामने दुहराया भी है। पर अपनी दुर्बलता को प्रकट कर देना ही भला है कि हमारी मनोभूमि में अभी तक भी वह तत्व ज्ञान प्रवेश नहीं करता है। न कोई पराया दिखता है और न कहीं माया का आभास होता है जिससे विलग विरत हुआ जाय। जब अपनी ही आत्मा दूसरों  मे जगमगा रही है तो किससे मुंह  मोडा जाय? किससे नाता तोड़ा जाय? जो हमें  नहीं भुला पा रहे हैं, उन्हें हम कैसे भूल जायेगे? जो साथ घुले और जुड़े हैं उनसे नाता कैसे तोड़ लें, कुछ भी सूझ नहीं पड़ता। पढ़ा हुआ ब्रह्मज्ञान रत्ती भर भी सहायता नहीं करता। इन दिनों , बहुत  करके रात मे जब आँख खुल जाती है तब यही प्रसंग मस्तिष्क में  घूम जाता है। स्मृति पटल कर स्वजनों की हँसती बोलती मोह  ममता से भरी एक कतार बढ़ती उमड़ती  चली आती है। सभी एक से एक बड़कर प्रेमी, सभी एक से एक बढकर आत्मीय, सभी की एक से एक बढ़कर ममता। इस स्वर्ग में से घसीट कर हमें  कोई कहाँ लिये जो रहा है? क्यों  लिये जा रहा है। इन्हें छोड़कर हम कहाँ रहेंगे? कैसे रहेंगे? कुछ भी तो सूझ नहीं पड़ता। आँखें बरसती रहती है और सिरहाने रखे वस्त्र  गीले होते रहते हैं।

यह सोचने की गुंजाइश नहीं कि जिस कठोर कर्तव्य मे हमें  नियोजित किया जा रहा है वह अनुपयुक्त है। हमे कोई सता रहा है या विवश कर रहा है। हमे दूसरों  से जितना प्यार है, हमारे मार्ग दर्शक को हमारे प्रति उसकी  अपेक्षा कहीं अधिक प्यार है। स्वजनों  की व्यथा हमें  जैसे विचलित कर देती है, हमारी व्यथा उन्हें कुछ भी प्रभावित न करती हो सो बात नहीं। पर वे दूरदर्शी हैं, हम अज्ञानी। वह  हमारे शरीर, मन और आत्मा का श्रम एवं सदुपयोग अधिक अच्छी तरह समझते हैं।  इससे उनके निर्णय और निर्देश अनुपयुक्त नहीं हो सकते। उसके पीछे हमारी आत्मा का और विश्व मानव का अविछिन्न हित साधन जुड़ा हुआ  है, यह सुनिक्षित है। यदि ऐसा न होता तो वे न तो हमारे परिवार को रुलाते और न हमें  इधर उधर मुंह छिपाकर चुप-चुप सिसकते रहने की व्यथा वेदना  सहने का भार डालते।


गुरुदेव की विवशता है। आज की उबलती हुई दुनिया  को शीतलता प्रदान कर सकने वाली परिस्थितियों की आवश्यकता है। वे परिस्थितियाँ समुद्र मंथन  जैसे एक महान संघर्ष से उत्पन्न होगी। उस संघर्ष अभियान का सूत्र संचालन करने के लिये तेजस्वी आत्माओं  का आगे आना आवश्यक है। ऐसी आत्मायें  है तो आवश्य पर उनकी नसों  का ओज जम गया है। वे अकड़े और जकड़े बैठे हैं । ज़रूरत  उस गर्मी की है जो इस अकड़न और जकड़न की स्थिति को बदले और जो जम गया है उसे पिघलाकर  गतिशील बना दे। ऐसी गर्मी किसी प्रचण्ड तपस्या से ही उत्पत्र हो सकती है। पिछले स्वतन्त्रता संग्राम में  ऐसी गर्मी श्री रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण और योगी अरविन्द जैसे तपस्वी उत्पन  करते रहे हैं।  अब उससे भी बड़ा, मनुष्य के भावनात्मक नवनिर्माण का सच सामने है। इसके लिये प्रबुद्ध आत्माओं  का अवतरण और जागरण एक अनिवार्य आवश्यकता है। इसकी पूर्ति अनादि की उस सूक्ष्म ऊष्मा से भर देने पर ही सम्भव है जो समर्थ और सजग आत्माओं  को तुच्छता के बन्धनों से मुक्त करके महानता की भूमिका मे जागृत कर सके। ऐसी आत्मायें आज भी विद्यमान है परा उनकी अज्ञात मूर्छा  उठने ही नहीं देती। इनको जगाने के लिये जिस प्रखर ऊष्मा  और प्रबल कोलाहत की जरूरत है वही किसी बड़े प्रयत्न  से ही संभव है। लगता है ऐसा प्रयत्न  उन्हें यह सूझा है जिसके आधार पर हमें  कुछ ही दिन बाद एक अदभुत तपश्चर्या  में संलग्न होना है।

इतने महान् प्रयोजन की पूर्ति के लिये यदि अपने को पात्र समझ गया है तो यह बड़ी बात है। ऐसे सौभाग्य के लिये कुछ भी निछावर किया जा सकता है। भगवान् साहस दे तो जीवित दधीचि की तरह अपना माँस पशुओं  को खिलाकर  अस्थियो को उपहार देव प्रयोजन के लिये समर्पित कर देना एक अनुपम सौभाग्य ही माना जाएगा। छुट पुट त्याग, बलिदान तो इन साठ वर्षों में आये दिन करते रहने पड़े हैं पर अब अन्तिम पटाक्षेप के समय इतनी बड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होने का श्रेय मिलता है तो इससे कोई आत्मवेत्ता, सुखी, सन्तुष्ट प्रसन्न  और प्रमुदित ही हो सकता है। इसमें हमारे लिये रोने कलपने  की  आवश्यकता क्यों  पड़े?

क्रमशः जारी -To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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24 आहुति संकल्प सूची :

8  जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान  करने के उपरांत आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 13  समर्पित साधकों ने  24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के  लिए सभी युगसैनिक   बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं  और कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह  देवतुल्य युगसैनिक  निम्नलिखित हैं :

 (1) छोटी बिटिया  पिंकी पाल  – 63, (2) सरविन्द कुमार पाल – 57, (3) प्रेरणा बिटिया  – 38, (4) रेनू श्रीवास्तव जी – 35, 32, (5) अरूण कुमार वर्मा जी – 34, (6) संध्या कुमार  जी – 33, (7) डा.अरुन त्रिखा जी – 30, (8) संजना कुमारी बिटिया-30, (9) निशा भारद्वाज जी – 28, (10) रेणुका गंजीर  जी – 26, 25, (11) नीरा त्रिखा  जी – 25, (12) कुसुम त्रिपाठी  जी – 25, (13) रजत कुमार जी – 24

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युग सैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है  पिंकी पाल बिटिया रानी   24 आहुति संकल्प सूची में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुई हैं और  नैतिकता के आधार पर आदरणीय रेनू श्रीवास्तव बहन जी व रेणुका श्रीवास्तव  बहन जी ने दुगुने उत्साह व मनोयोग से दो-दो ग्रुप में 24 आहुति संकल्प सूची में अपना योगदान देकर कीर्तिमान स्थापित किया है जो कि बहुत ही सराहनीय व प्रशंसनीय कार्य है 

जय गुरुदेव

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