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गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 3 

23 दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 3 

आज का ज्ञानप्रसाद परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती श्रृंखला का तृतीय पार्ट है। पूर्व प्रकाशित दोनों लेखों और आने वाले लेखों की तरह आज का लेख भी एक अद्भुत ज्ञान का भंडार है। दुर्भाग्यवश जो सहकर्मी परमपूज्य गुरुदेव के दर्शन से वंचित रह गए हैं उनके लिए हम इन लेखों को इस भांति प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं उन्हें आभास हो कि गुरुदेव साक्षात् उनके समक्ष बैठे उनसे बाते कर रहे हैं। गूगल का सहारा लेते हुए हम प्रयास कर रहे हैं कि कोई भी कठिन शब्द देखकर हमारे सहकर्मियों को कठिनता न हो। अंग्रेजी के शब्द इस तथ्य के साक्षी हैं, फिर भी अगर कोई त्रुटि हो गयी हो तो हम क्षमा प्रार्थी हैं -आखिर इंसान ही तो हैं हम। 

तो आइये करते हैं आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान। 

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सूक्ष्मीकरण साधना में गुरुदेव के अंग-अवयव:

इतनी कठिन साधना के दिनों में भी परमपूज्य गुरुदेव ने प्रज्ञा परिजनों को नज़रअंदाज़ नहीं किया है। न उनकी ओर से मुंह मोड़ा है, न उदासीनता दिखाई है। प्रज्ञा परिजनों की ओर गुरुदेव का उतना ही ध्यान था जितना आकाश में उड़ती चिड़िया का अपने घोंसले के अण्डे, बच्चों के प्रति होता है क्योंकि वे उन्हें अपने अंग-अवयवों का समुदाय मानते थे । शरीर केवल ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेंद्रियों का समुदाय ही नहीं बल्कि मस्तिष्क, पेट आदि अदृश्य अवयवों का भी एक बड़ा समूह होता है। हमारा शरीर जीवकोषों ( cells ), ऊतकों( tissues) और तन्तुओं( filaments ) के समुदाय से विनिर्मित होता है। इन सब घटकों की गणना की जाय तो वह लाखों करोड़ों में जा पहुँचती है। उन सबके बीच घनिष्ठ सहयोग और अनुशासन होता है। यदि वह न रहे तो शरीर का सीरा बिखरने में ज़रा भी देर न लगे। काया अपने घटकों का पोषण करती है और घटक मिल जुलकर काया का। यदि वे सब ऐसा सहयोग न करें तो जीवन का अन्त हुआ ही समझा जा सकता है। अस्तु यह भी तथ्य है कि गुरुदेव जिस समर्थता के आधार पर बलि के तीन लोकों का राज्य मापने जैसे वामन के कदम उठा रहे हैं उसका सुदृढ़ बनाये रहना भी आवश्यक है। इस आवश्यकता को यथावत् जुटाये रहने से उनका ध्यान रत्ती भर भी विरत नहीं होता है।

यह ठीक है कि गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना के कारण हर किसी का मिलना-जुलना-भेंट परामर्श करना सम्भव नहीं रहा पर इससे किसी की कुछ हानि नहीं हुई, न आगे होनी है। निकटवर्ती-साथी संगी लाभदायक होते हों, दूर रहने वाले व्यर्थ सिद्ध होते हों, ऐसी भी कोई बात नहीं है। जुएं, खटमल, वस्त्र और बिस्तरों में चिपके रहते हैं। चूहे, दीमक, मच्छर, मक्खी, घर में ही घुसे रहते हैं। सर्प, बिच्छू, छिपकली भी घर आकर ही दर्शन देते रहते हैं पर उनसे किसी का कुछ बनता नहीं। सूर्य, चंद्र दूर हैं, पवन अदृश्य है, तो भी उनकी उपयोगिता कम नहीं। गुरुदेव के प्रत्यक्ष सान्निध्य संपर्क में कटौती हो जाने से किसी को भी न नज़रअंदाज़ी का अनुभव करना चाहिए न घाटे का।

माता अपने पेट में रहने वाले बच्चे को जब अपना रक्त माँस देकर पोषण करती रह सकती है तो अपने-अपने स्थानों पर रहते हुए परिजनों को भी ऐसा अनुभव नहीं होना चाहिए कि अकेलापन उपस्थित हो गया। सच तो यह है कि

“सूक्ष्म क्षमता ही अदृश्य होते हुए भी दृश्य पदार्थों की तुलना में कहीं अधिक समर्थ और सहयोगी हो सकती है।” 

गुरुदेव कहते हैं :इन दिनों अपना घनिष्ठ माने वालों में से प्रत्येक को यह अनुभूति होनी चाहिए कि वे हमारे बहिरंग से दूर दिखते हुए भी अन्तरंग के साथ अत्यधिक घनिष्ठता के साथ लिपट गये हैं। न केवल लिपट गये हैं वरन् कुछ कहते भी हैं। यह कथन झकझोरने और कचोटने जैसे स्तर का भी हो सकता है।

मार्गदर्शक सत्ता सूक्ष्म रूप से ही जुड़ी है:

हिमालय अवस्थित मार्गदर्शक सत्ता गुरुदेव के साथ सूक्ष्म शरीर से ही अपने अनुग्रह, आलोक, साहस और साधनों की कमी न पड़ने देने का पूरा-पूरा ध्यान रखती रही है। समीपता और नेत्र-सम्पर्क का अभाव दिखने पर भी उन्हें इस कारण किसी प्रकार का घाटा नहीं रहता। इसके विपरीत कितने ही कर्मचारियों और तथाकथित मित्र भक्तों से उन्हें समय-समय पर भारी आघात लगते रहे हैं। इस सब पर दृष्टिपात करने पर किसी को यह अनुभव नहीं करना चाहिए कि उनकी अनदेखी हुई या कथन-उपकथन से प्राप्त हो सकने वाले लाभों में कटौती हो गई। गुरुदेव ने इस स्थिति को समझाते हुए लिखा है कि जैसे घर में रहने वाला आलसी व्यक्ति जितना उपयोगी हो सकता है उसकी तुलना में दूर-देश जाकर कुछ उपार्जन करने वाला और परिवार पोषण के लिए भेजते रहने वाला अधिक उपयोगी एवं सम्मानास्पद सिद्ध होता है। 

गुरुदेव ने संपर्क के लिए जो माध्यम अपनाया है, वह समय की आवश्यकता के कारण ही हो सकता है, हो सकता है अगले दिनों उसकी भी आवश्यकता न रहे। गुरुदेव की वर्तमान साधना के सम्बन्ध में प्रत्येक विचारशील परिजन को दृष्टि से सोचना चाहिए कि दर्शन करने या कराने में अनुग्रह होने के अतिरिक्त वस्तुतः और कुछ है नहीं। 

“गुरुदेव को देखने के स्थान पर उनकी कही पर चलना कहीं अधिक महत्वपूर्ण एवं चमत्कारी है, इसे परिजन इन दिनों अनुभव करते रह सकते हैं।”

इस हीरक जयन्ती वर्ष में- गुरुदेव की तत्परता, तन्मयता, व्यवस्था एवं तपश्चर्या का स्तर बहुत अधिक बढ़ गया है इसलिए हर परिजन से उनकी घनिष्ठता और भी अधिक सघन हो गयी है। दर्शन नहीं हो रहे हैं इसका तात्पर्य यह नहीं हैं कि परिजन अपने को कटा हुआ समझें या अपने कर्त्तव्य उत्तरदायित्वों की इसलिए नज़रअंदाज़ी करें कि कोई कहने वाला तो है नहीं, उनके कान में अलग से कुछ कहा नहीं गया, उन्हें कुछ अतिरिक्त काम नहीं सौंपा गया। निवेदन एवं निर्देशन को अब अन्तर में टटोल कर खोजना चाहिए और उसे आत्मा की पुकार में घुला हुआ अनुभव करना चाहिए। 

आदान प्रदान का सिद्धांत गांठ बांध लेना चाहिए :

स्मरण रहे कि जैसे पौधों को जड़ों का रस ही नहीं ऊपर में हवा और धूप भी चाहिए। फल फूल प्राप्त करने के लिए पौधे में खाद-पानी की व्यवस्था भी तो करनी होगी। एक हाथ से ताली नहीं बजती, एक पहिये की गाड़ी नहीं चलती। आदान-प्रदान के सिद्धान्त को हमें कसकर गाँठ बाँध लेना चाहिए। गुरुदेव और उनका विश्व्यापी विशाल परिवार मिलकर एक इकाई बनते हैं। इस संयोग सुयोग से ही उनकी “समग्र क्षमता” बनती है, अन्यथा वे एकाकी रह जाते हैं। जिस प्रकार बैलगाड़ी के दो बैलों में से एक बैल के बैठ जाने पर पूरी गाड़ी का वजन एक बैल को ही खींचना पड़ता है वैसा ही उनके सम्बन्ध में घटित होता । हिमालय क्षेत्र की बरसने वाली अनुकम्पा उस कल्प-वृक्ष के लिए ऊपर से बरसने वाली पवन और धूप के समान है। पर जिस पात्रता के आधार पर वे यह अनुग्रह प्राप्त करते हैं वह उनकी नन्हीं-नन्हीं और सुदूर क्षेत्र तक जमीन के भीतर फैली हुई जड़ों से ही उत्पन्न होती है। यदि जड़ें जमीन में रहने और विज्ञापित ने होने के कारण अपने कार्य को महत्वहीन समझें तो अनर्थ हो जायेगा। पेड़ का तना सूख जायेगा और पत्ते झड़ जायेंगे। इस स्थिति में 

“एक हाथ से चप्पू थामकर नाव खींचने वाले मल्लाह पर जितना दबाव पड़ता है उतना ही हमारे गुरुदेव पर भी पड़ेगा ।”

काम तो एक हाथ का, एक पैर का आदमी भी किसी प्रकार करता है, पर उसका कार्य कितना कठिन और कितना धीमा होता है इसे सभी जानते हैं। हम सब गुरुदेव की उठाई ज़िम्मेदारी में ग्वाल-बालों की तरह, रीछवानरों की तरह साझीदार रहें तो ही शान और शोभा है। हाथ सिकोड़ लेने पर भी नाव तो किनारे लगेगी लेकिन उसे श्रेय से वंचित रहना पड़ेगा जो अर्जुन और हनुमान को सहज ही उपलब्ध हो गया था।

लाभ और हानि का गणित हमें नये आध्यात्मिक सिद्धान्तों के आधार पर सीखना होगा। भौतिक जगत में किसी भी प्रकार उपलब्धियां हस्तगत कर लेने का चातुर्य भी सफल होता है, पर अध्यात्म जगत में “बोने और काटने” के अतिरिक्त और कोई विद्या काम नहीं करती। इस क्षेत्र में गहरे तालाब ही बादलों की अनुकम्पा का लाभ लेते हैं। तालाब यदि अपनी मिट्टी बाहर फेंकने की उदारता न अपनायें तो उन्हें भी समतल भूमि की तरह प्रचण्ड वर्षा होने पर नाम मात्र नमी ही हाथ लगेगी। 

गुरुदेव का जीवन 75 पन्नों की पुस्तक :

गुरुदेव के 75 वर्ष को 75 पन्नों की पुस्तक समझा जा सकता है। इसे यदि ध्यानपूर्वक पढ़ा जाय तो उनकी विभूतियों को “बोयाकाटा” के आधार पर खरीदा गया ही समझा जा सकता है। हम सभी खरीदने का सिद्धांत अपनायें। खजाना खोदने, लाटरी भुनाने या याचना से दौलत बटोरने की बात न सोंचे। वह भ्रम मात्र है। सच्चा स्वार्थ परमार्थ ही है। इस तथ्य को गुरुदेव के जीवन संदर्भ के 75 पृष्ठो में से कुरेद कर भली-भाँति समझा जा सकता है। उन्हें इतनी महानता की उपलब्धि परमार्थ प्रयोजनों में अपनेआप को खपा देने के कारण ही मिली हुई हैं। उनके घर-कुटुम्ब के लोग और सहपाठीगण उसी स्थान पर रहे जहाँ उनके पूर्वज किसी प्रकार निर्वाह करते चले आ रहे थे। पर गुरुदेव जमीन से उछलकर आसमान तक छा गये और अंतर्ग्रही यानों की तरह रहस्य भरे अन्तरिक्ष में तीव्रगति से परिभ्रमण करने लगे। यही उनकी विरासत है, यही उनकी वसीयत है। जो कोई परिजन उनके आत्मीय होने का अनुभव करते हैं उन्हें अनुकरण की बात सोचनी चाहिए। वन्दन स्तवन से कुछ बनता नहीं है। विनिर्मित राजमार्ग पर चलने का साहस जुटाया जाना चाहिए। धीमी या तीव्रगति से चलने के लिए हमारे लिए एक राजमार्ग उपलब्ध है, एक ऐसा राजमार्ग जो परमपूज्य गुरुदेव ने कथनी से नहीं, करनी के सहारे सीधा -सरल और सुनिश्चित स्तर का जीवन जीकर विनिर्मित किया है। 

पिछले लेख में हमने लिखा था कि गुरुदेव ने रजत जयन्ती, स्वर्ण जयन्ती नहीं मनाई और शताब्दी मनाये जाने की कोई सम्भावना नहीं। इसीलिए परमपूज्य गुरुदेव ने हीरक जयन्ती को अपने जीवन का अंतिम उत्सव लिखा था। गुरुदेव ने यह इसलिए लिखा था कि उनके लिए उत्सवों से अधिक बड़े काम प्रतीक्षा कर रहे थे । गुरुदेव बताते हैं:

“ट्रान्सफर होने पर भी -रिलीव- होने में कुछ समय लग जाता है। इतना ही कार्यकाल उनके स्थूल शरीर का शेष है। इसके उपरान्त वे अपने “पाँच साथियों” समेत इस विश्व-ब्रह्माण्ड की अधिक उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाने में अपनी क्रियाशीलता नियोजित करेंगें।”

वे कब तक हमारे बीच हैं इस सम्बन्ध में कछ भी निश्चित रूप से कहना कठिन है। उनकी उपस्थिति में मात्र हीरक जयन्ती ही मन रही है। इस अदृश्य समारोह में किसने कितना उत्साह प्रकट किया, कितनी आत्मीयता और भाव श्रद्धा का परिचय दिया, इसका अवसर इसी बार है। नितान्त इन्हीं दिनों दिशा मिलने और चिन्तन करने में बहुत समय चला गया। इसी धुरी पर घूमते रहने से रहा बचा समय भी चला जायेगा। 

क्रमशः जारी -To be continued

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव 

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24 आहुति संकल्प सूची :

22 दिसंबर के ज्ञानप्रसाद पर कमेंट करके निम्नलिखित 3 महान दिव्य आत्माओं ने 24 आहुति-संकल्प पूर्ण किया है :(1 ) डॉ अरुण त्रिखा-25, (2) रेनू श्रीवास्तव जी-24 ,(3 )अरुण कुमार वर्मा जी -26
तीनों सहकर्मियों को इस प्रयास के लिए आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत-बहुत साधुवाद, शुभकामनाएँ एवं हार्दिक बधाई हो। आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरुसत्ता से विनम्र प्रार्थना है कि इन पर जगत् जननी माँ गायत्री की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे। जय गुरुदेव

जो सहकर्मी 24 आहुति टारगेट पूर्ण न कर सके उन्हें भी हम नमन करते हैं।

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