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परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 2

22  दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 2

आज का ज्ञानप्रसाद परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती श्रृंखला का द्वितीय पार्ट है। इस पार्ट में आप पढेंगें कि गुरुदेव ने वरिष्ठ प्रज्ञापुत्रों का विशेषण किन बच्चों के लिए प्रयोग किया, उनके लिए 75वां वर्ष परीक्षा का वर्ष क्यों था और आत्म- निरीक्षण और आत्म-निर्माण के प्रयास कौन-कौन से थे। ज्ञानप्रसाद के साथ ही आप  एक चित्र देख रहे हैं जिसमें एक तो आदरणीय डॉ चिन्मय पंडया जी की ईमेल है जो हमारी  प्रेरणा बिटिया की ऑडियो बुक्स तो सराहते हुए है और दो चित्र दर्शा रहे हैं कि बिटिया Deaf and Dumb के साथ अपना जन्म दिवस  मना रही है। चिन्मय भाई साहिब की सराहना का सम्मान करते हुए हम सबका कर्तव्य बनता है इन ऑडियो बुक्स को अधिक से अधिक व्यूज दिए जाएँ ताकि आने वाले प्रयासों को बल मिल सके। सभी सहकर्मियों से निवेदन करते हैं कि व्यूज को track  करते रहें।  इस भूमिका के साथ आज के  ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करते हैं। 

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कौन है गुरुदेव का वरिष्ठ प्रज्ञापुत्र ?

रोज़ कुआं खोदने और रोज पानी पीने वाले को भी आठ घंटा कमाने के लिए, सात घंटा सोने के लिए और पाँच घण्टा नित्य कामों  तथा अन्य  कामों के लिए छोड़ कर विशुद्ध रूप से चार घंटे बचते हैं। इसी में से संकल्पपूर्व दो से लेकर चार घंटे तक युग-धर्म के निर्वाह में लगाते रहा जाय तो स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही साथ-साथ सधते रह सकते हैं। जो इतना समयदान-अनुदान प्रस्तुत कर सकें उन्हें “जीवन्त प्रज्ञापीठ या वरिष्ठ प्रज्ञापुत्र” कहा जा सकेगा। ऐसे लोग केवल  अपने प्रयास से ही इतना काम कर  सकते हैं जितने कि भव्य इमारतों वाली प्रज्ञापीठों कर सकते हैं।

अर्थोपार्जन और परिवार निर्वाह के अतिरिक्त दो-चार घंटे का समय भगवान के लिए, देश, धर्म, समाज संस्कृति के लिए, गुरुदेव के लिए, युग-परिवर्तन के लिए लगाकर कोई व्यक्ति घाटे में नहीं रहेगा वरन् अपने त्याग की तुलना में अनेक गुना भण्डार भरेगा। अखण्ड-ज्योति के अप्रैल 1985 अंक में छपे गुरुदेव के “बोया काटा” लेख को पढ़कर सत्परिणाम के सम्बन्ध में सुनिश्चित विश्वास किया जा सकता है।

इन चार घंटों में क्या किया जाना चाहिए ?

जो चार घंटे परमपूज्य गुरुदेव ने गुरुकार्य के लिए चुने हैं उनके  सही प्रयोग का मार्गदर्शन  भी दिया हैं।  यह मार्गदर्शन 1985 का है ,आज बदले समय और टेक्नोलॉजी के आधार पर कुछ -कुछ फेर बदल किया जा सकता है।  हमने ब्रैकेट के अंदर ऑनलाइन गयारथ की गतिविधियां अंकित की हैं जिनको पूरा करने का प्रयास  हम सब  सामूहिक और व्यक्तिगत तौर पर कर रहे हैं। 

परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं -इन घंटों में क्या किया जाना चाहिए। यह अनेकों बार बताया जा चुका है। झोला पुस्तकालय, चल पुस्तकालय, कार्यकर्ताओं के जन्म दिन (अभी दो दिन पूर्व ही प्रेरणा बिटिया का जन्म दिवस  सभी ने मनाया), दीवारों पर आदर्श वाक्य ( शुभरात्रि संदेश), मुहल्लों में स्लाइड प्रोजेक्ट प्रदर्शन(हमारी विडियोज) टेप  रिकार्डर से गुरुदेव के नवीनतम प्रवचनों को सुनाया जाना ( ऑडियो बुक्स ) l

गुरुदेव की  जीवन गाथाएं, युग-गीतों के टेप  प्रातः काल सुनाने के लिए किसी ऊँचे स्थान पर लाउडस्पीकर फिट करना और टेप  से युग कीर्तन बिस्तर पर पड़े हुओं को भी सुनाना l  यह वे कार्यक्रम हैं जिन्हें वर्णमाला अभ्यास (विद्यालय की प्रथम कक्षा)   के समतुल्य समझा जा सकता है। भारी भरकम, बोझिल और विशालकाय कार्य इतना कर चुकने के पश्चात् ही किसी को सौंपे जा सकते हैं। समर्थता की प्रारम्भिक सीढ़ी पार कर लेने पर ही विशालकाय क्रिया-कलापों का बोझ उठाया जा  सकता है। 

उपरोक्त समूची योजना के लिए आवश्यक उपकरण खरीदने के लिए प्रायः पाँच हजार रुपए की राशि चाहिए। कुछ उपकरण पहले से  ही हों तो उतनी राशि से कम से भी काम चल सकता है। -झोला पुस्तकालय, चल पुस्तकालय, ज्ञानरथ, लाउडस्पीकर, स्लाइड प्रोजेक्टर, समग्र यज्ञशाला, वीडियो टेप  सुगम संगीत के वाद्ययन्त्र आदि ऐसी वस्तुएँ हैं जिनकी प्रचार कार्य में आये दिन आवश्यकता रहती है। वे न हों तो साधनहीन व्यक्ति का प्रचार कार्य आधा अधूरा बनकर रह जाता है।

इनके निमित्त राशि जुटाई ही जानी चाहिए। अपने पास से, मित्रों पर दबाव देकर, बर्तन बेचकर या कर्ज लेकर किसी न किसी प्रकार इतने साधनों की व्यवस्था करनी ही चाहिए। इसके लिए  मन को समझाने के लिए इस प्रकार  सोचा जाना चाहिए कि कोई आकस्मिक आपत्ति आ गई थी और उसमें इतना पैसा लग गया। इन सभी के लिए मेण्टेनेन्स का खर्च बीस पैसा प्रतिदिन के अंशदान की राशि से निकल सकता है। 

“ईंट चूने की शक्ति पीठों में लाखों रुपए की राशि जुट जाय और हाड़मांस की बोलती चलती जीवन्त शक्ति पीठ के लिए आवश्यक उपकरणों के निमित्त उतनी छोटी राशि भी न जुट सके, ऐसा हो ही नहीं सकता।”

स्थिर विनिर्मित प्रज्ञापीठों में निर्माण कर्ताओं ने स्वयं समय नहीं दिया। नौकरों से, बूढ़े बीमारों से, अनपढ़ अनगढ़ों से काम करवाया फलतः उसका कुछ निष्कर्ष न निकला। व्यक्ति की अपनी निज की प्रतिभा का अतिरिक्त मूल्य होता है। अनुपयुक्त व्यक्ति छोटे-मोटे काम भी नहीं कर पाता जबकि सुयोग्य व्यक्ति रास्ता चलते अनेकों काम बना कर रख देता है। अस्तु यह आवश्यक है कि नवसृजन का वातावरण बनाने के लिए कार्यक्रम चलाने के लिए “वरिष्ठ कार्यकर्ता स्वयं आगे बढ़ें” और देखें कि उन्हें कितने नये सहयोगी धड़ाधड़ मिलते चले जाते हैं और युगचेतना का प्रकाश उस समूचे क्षेत्र को किस प्रकार ज्योतिर्मय बनाता है। यही बात हमारे ऑनलाइन ज्ञानरथ पर भी apply होती है। 

अखंड ज्योति में वर्णन है कि-प्रज्ञा परिवार के जो भी सदस्य इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं ,यह युग निमन्त्रण सीधा उन्हीं के नाम भेजा गया है। गुरुदेव की हीरक जयन्ती इन्हीं दिनों दस हजार प्रज्ञापुत्रों को जीवन्त प्रज्ञा संस्थान के रूप में खड़े होते देखना चाहती है। गुरुदेव दस हजार मनकों का हार अपने गले में पहनना चाहते हैं। अपना नाम अगली पंक्ति में लिखा कर औरों को भी अनुकरण की प्रेरणा दी जानी चाहिए।

आत्म-निरीक्षण और आत्म-निर्माण:

गुरुदेव ने हर्षोत्सव पर अपनी प्रतिक्रिया जताते हुए लिखा था कि अपनी दिशा धारा ऐसी है जिसमें उत्साह उत्पादन करने वाले उन कार्यक्रमों की आवश्यकता है, जिससे लोकरंजन होता है और जन साधारण को तदनुरूप  जानकारी मिलती है। उथले स्तर पर यह भी कुछ  न कुछ  उपयोगी ही पड़ता है पर जिस लक्ष्य की ओर अपनी यात्रा चल रही है उसमें व्यक्तिगत साहस, पौरुष और पराक्रम की आवश्यकता रहेगी। यदि हीरक जयन्ती वस्तुतः मनानी हो तो हम सबको “आत्म-निरीक्षण और आत्म-निर्माण”  के प्रयत्न करने होंगे साथ ही लक्ष्य की दिशा में तीर की तरह सनसनाते हुए बढ़ना होगा। यह कार्य सुस्ती  अपनाने और मज़बूरी  की दशा में  चिन्ह पूजा करने से बन पड़ना  सम्भव नहीं है ।

गुरुदेव लिखते हैं कि हमारे  स्थूल शरीर की शताब्दी नहीं मनाई जा  सकती। यह हीरक जयन्ती हमारे  संदर्भ में अन्तिम उत्सव है। उन्होंने स्वयं को बड़ी समस्या सुलझाने के लिए नियोजित कर दिया है। 

वायु प्रदुषण, वातावरण और सर्वभक्षी महायुद्ध की विभीषिकाएं सामने हैं। व्यक्ति का चिन्तन और चरित्र नीचे ही गिरा जा  रहा है। इन सबके फलस्वरूप भविष्य के भयंकर और अन्धकारमय हो जाने में कोई सन्देह नहीं रह जाता। ऐसे प्रवाह को उलटना और उलटकर उलटे को सीधा करनाअसामान्य संकल्प है। 500( 1985 की विश्व जनसंख्या ) करोड़ मनुष्यों की नियति को आडंबर और दिखावे  से आलोक की ओर घसीट ले जाना सामान्य कार्य नहीं है। असामान्य प्रयास असामान्य व्यक्तियों से ही बन पड़ते हैं। व्यापक अन्धकार से निपटने की प्रतिज्ञा कोई सविता का अंशधर ही कर सकता है। ऐसी प्रतिज्ञा जिसे पूरी करने के लिए हमने अपना महान आधार का आस्तित्व बाजी पर लगा दिया गया है।

विनाश की सम्भावनाओं को हर धर्म के शास्त्रों और आप्त पुरुषों ने व्यक्त किया है। भविष्यदर्शी-सूक्ष्मचेता भी एक स्वर से यही कहते सुने जा रहे हैं। परिस्थितियों की प्रतिक्रिया का मूल्यांकन करने वाले महा-मनीषियों ने भी अगले दिनों विषम सम्भावनाओं की अभिव्यक्ति की है। यह सब निराधार नहीं है। इनके पीछे तथ्य है और वे तथ्य ऐसे हैं जिन्होंने  समस्त संसार को आशंकित और आतंकित कर रखा है। कोई भी इन्हें निरर्थक कल्पना नहीं मानता वरन् उन्हें प्रत्यक्ष देखता है।

इन सम्भावनाओं को इच्छा  करने  की बात  सहज हो सकती है पर उसे कर दिखाना ऐसा कठिन कार्य है जिसकी तुलना में गोवर्धन उठाने, समुद्र लाँघने जैसी उपासनाऐं भी छोटी पड़ती हैं। अशुभ का रोकना  एकाँगी बात हुई। दूसरा कार्य इसका पूरक “नव सृजन” रह जाता है। मात्र अशुभ का निराकरण हो और शुभ का संस्थापन न हो सके तो बात सर्वथा अधूरी रह जाती है। आसुरी उपद्रवों के निराकरण के साथ रामराज्य की स्थापना मिला देने से ही एक पूरी बात बनी थी। 

गुरुदेव लिखते हैं: अपने  लक्ष्य के भी यह दोनों ही पहलू हैं। सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि जो इस प्रक्रिया को पूरा करने का मात्र साहस ही नहीं दिखाता वरन् उसे पूरा कर दिखाने का संकल्पपूर्वक आश्वासन भी देता है, उसे कितनी दूर दृष्टि अपनानी होगी और प्रतिज्ञा पूर्ति के लिए कितनी कठोर तपस्या करनी होगी। इसकी झाँकी भागीरथ और दधीचि जैसों के प्रयासों का स्वरूप दृष्टि के सामने रखकर ही अनुमान लगा सकना सम्भव हो सकता है।

गुरुदेव का 75वाँ वर्ष उनकी अग्नि परीक्षा का वर्ष है :

हीरक जयंती 1985 के  वर्ष  में गुरुदेव कितनी अधिक तत्परता और निष्ठा के साथ अपनेआप को तपा रहे हैं, इसकी झाँकी उन्हें ही मिल सकती  है जो उनके अत्यधिक संपर्क में हैं। गुरुदेव का 75वाँ वर्ष उनकी अग्नि परीक्षा का वर्ष है, हर्षोत्सव में सम्मिलित होने या स्वागत सत्कार कराने का नहीं। 

क्रमशः जारी -To be continued  

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि  प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव 

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24 आहुति संकल्प सूची :

21 दिसंबर के ज्ञानप्रसाद पर कमेंट करके  निम्नलिखित 11  महान दिव्य आत्माओं  ने 24 आहुति-संकल्प पूर्ण किया है : (1 )प्रज्ञा सिंह जी -25 ,(2 )डॉ अरुण त्रिखा-29, (3 ) रेनू  श्रीवास्तव जी-26,(4 )संध्या कुमार जी -26 ,(5 )अरुण कुमार वर्मा जी -26 ,(6 )निशा भरद्वाज जी -24 ,(7 )नीरा त्रिखा जी -24 ,(8 )प्रेरणा बिटिया -29 ,(9 )सुमन लता जी -25 ,(10 )धीरप सिंह बेटा -26 ,(11 )सरविन्द कुमार जी -26 

सभी सहकर्मियों को इस प्रयास  के लिए आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत-बहुत साधुवाद, शुभकामनाएँ एवं  हार्दिक बधाई हो। आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरुसत्ता से विनम्र प्रार्थना है कि इन पर जगत् जननी  माँ गायत्री   की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे। जय गुरुदेव

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