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“मन और उसका निग्रह” लेखों का सारांश  

16  दिसंबर 2021  का ज्ञानप्रसाद- “मन और उसका निग्रह” लेखों का सारांश  

 “मन और उसका  निग्रह” शीर्षक के अंतर्गत हमने 24 लेखों की श्रृंखला प्रस्तुत की, हमारे सूझवान सहकर्मियों ने हर लेख की तरह इन लेखों के लिए भी  सक्रियता दिखाते  हुए कमैंट्स की बाढ़ लगा दी, आभार व्यक्त करने के लिए हमारे लिए जैसे शब्दों का  दुर्भिक्ष ही पड़  गया हो । आज इस शृंखला का इतिश्री करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। आशा करते हैं कि संध्या कुमार जी, अनिल मिश्रा जी ,सरविन्द कुमार जी जैसे और भी समर्पित सहकर्मी इसी तरह सहकारिता, सहभागिता का प्रमाण देते रहेंगें जो ऑनलाइन ज्ञानरथ को शिखर तक ले जाने में सहायक होंगें।  इन अद्भुत लेखों की प्रस्तुत की गयी  श्रृंखला आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के स्वाध्याय पर आधारित थी । ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  रामकृष्ण मिशन मायावती,अल्मोड़ा के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी का आभारी है जिन्होंने  यह अध्भुत  ज्ञान उपलब्ध कराया। इन लेखों का  सम्पूर्ण श्रेय इन महान आत्माओं को जाता है -हम तो केवल माध्यम ही हैं।

हमारे सहकर्मियों ने पिछले कई दिनों से बहुत ही कठिन परिश्रम किया है। उन्हें राहत  देने के लिए सारांश से अगला ज्ञानप्रसाद (शुक्रवार प्रातः) केवल  साढ़े तीन मिंट की वीडियो होगी। इस वीडियो में आदरणीय चिन्मय भैया गुरुदेव के प्रथम शिष्यों में से एक, शिष्य शिरोमणि शुक्ला बाबा के समर्पण के बारे में बता रहे हैं। जब  भी हम कोई वीडियो अपलोड करते हैं तो निवेदन करते हैं कि वीडियो के साथ दी गयी Description अवश्य देखें जो आपको कमेंट करने में सहायक हो सकती है। एक और निवेदन कर रहे हैं कि जब भी कोई लेख य वीडियो देखते हैं तो like बटन के अवश्य प्रेस करें क्योंकि असाधारण सा प्रतीत होती है कि कमैंट्स तो 400 हैं और likes केवल 40 

तो चलते है आज के ज्ञानप्रसाद की ओर :   

सारांश:

मन:संयम एक वीर पुरुष के लिए भी सदैव से कठिन कार्य रहा है ; किन्तु वह असम्भव नहीं है। उसके लिए सुनिर्दिष्ट उपाय हैं। 

मन:संयम का सारा रहस्य श्रीकृष्ण ने ‘अभ्यास ‘ और ‘ वैराग्य ‘ इन दो शब्दों में व्यक्त कर दिया है। 

इन दोनों को जीवन में उतारने के लिए हमें मन:संयम हेतु दृढ़ इच्छाशक्ति का विकास करना चाहिए; हमें अपने मन का स्वभाव समझना चाहिए; हमें कुछ प्रक्रियाएँ जान लेनी चाहिए  और उनका अभ्यास करना चाहिए। 

इच्छाशक्ति को दृढ़ करने के लिए हमें अपनी सुखभोग की स्पृहा पर विजय पानी पड़ती है तथा यह भी समझ लेना पड़ता है कि मनोनिग्रह में किस बात की आवश्यकता है।

हिन्दू- दृष्टिकोण के अनुसार मन का स्वभाव  विवेकानन्द-साहित्य में समझाया गया है। 

मनोनिग्रह में समर्थ होने के लिए  हमें यह जानना आवश्यक है कि अपने कार्य को अनावश्यक रूप से कठिन होने से कैसे बचायें। मन:संयम सम्बन्धित मनुष्य का व्यक्तिगत कार्य है। मन:संयम का लक्ष्य ईश्वर के साथ  अपने पूर्ण एकत्व का अनुभव करना है। इसके लिए कोई भी कीमत कम ही है। 

मनोनिग्रह की साधनाओं का प्रभावी रूप से अभ्यास करने में  समर्थ होने के लिए हमें एक अनुकूल आभ्यन्तरिक वातावरण की आवश्यकता होती है।  जीवन की कतिपय बातों को अपरिहार्य मानकर चलने का सामर्थ्य भी इसी के अन्तर्गत आता है। 

मन:संयम के लिए हमें दो प्रकार के भीतरी अनुशासनों की आवश्यकता होती है: एक, मन को स्वस्थ सामान्य दिशा प्रदान करने के लिए और दो, आपातकालीन स्थिति में हमारी रक्षा के लिए। 

मन जितना शुद्ध होगा, उसे वश में करना उतना ही सरल होगा।  अतएव हमें मन को शुद्ध करने की  साधनाओं का अभ्यास करना होगा। अपने भीतरी स्वभाव में  सत्व की प्रधानता लाना और  तत्पश्चात प्रामाणिक साधनाओं के अनुसार सत्व को शुद्ध करके लांघ जाना -यही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। पर इसको साधने का सबसे सरल उपाय है सत्संग। 

वेदान्तिक साधनाओं को अधिक फलप्रद बनाने के लिए उनके साथ महर्षि पतंजलि द्वारा उपदिष्ट योग-साधनाएँ जोड़ी जा सकती हैं। 

योग की साधनाओं के अभ्यास के साथ ही विवेक का अभ्यास भी चलना चाहिए।  तभी हम मन को वर्तन सिखलाने में समर्थ हो सकेंगे। जब मन वर्तन करना सीख लेता है, तो इन्द्रियाँ भी यह सीख लेती हैं कि  अपने विषयों के सम्पर्क में आने से कैसे बचा जाय तथा मन की आज्ञा का पालन कैसे किया जाय। तब प्रत्याहार में हमारी स्थिति हो जाती है। 

प्रमुख साधनाओं के सफल अभ्यास में उल्लेखनीय सहायता प्रदान करने वाले और भी   कई  अनुषांगिक उपाय होते हैं, जिनकी ओर हमें ध्यान देना चाहिए। ये उपाय हैं -अपने मानवीय सम्बन्धों को ठीक रखना, मन को स्वस्थ रूप से सक्रिय बनाये रखना , कल्पना का सम्यक् उपयोग करना और हताशा से बचना। 

ध्यान के अभ्यास से मनोनिग्रह में बड़ी सहायता मिलती है और मनोनिग्रह ध्यान में सहायक होता है। 

भीतर की विस्फोटक परिस्थितियों में उच्चशक्ति सम्पन्न आपातकालीन रोक लगाने के लिए पतंजलि की शिक्षा यह है: विपरीत विचारों को उठाने का अभ्यास करो।  भगवान के नाम का अनवरत जप और कीर्तन करो और उनकी शरण में चले जाओ।

प्रणाली बद्ध रूप से विचार का संयम करना  मनोनिग्रह का एक बड़ा रहस्य है। 

अवचेतन को बिना वश में किये  मन को वश में नहीं किया जा सकता है। मन में मानो पवित्र विचारों को ढालते हुए तथा प्राणायाम एवं भक्ति आदि की साधना करते हुए अवचेतन मन को निग्रह में लाया जा सकता है।  इससे मनुष्य में निहित कुण्डलिनी रूपी आध्यात्मिक शक्ति जाग उठती है। 

हम हानिप्रद कल्पना से सावधान रहें। केवल इस क्षण के लिए पूरी तरह नैतिक होने से और फिर दूसरे क्षण  उस दूसरे क्षणभर के लिए नैतिक होने से हम हानिकारक कल्पनाओं से बच सकते हैं। मनोनिग्रह में विश्वासी व्यक्ति लाभ में रहते हैं। 

मनोनिग्रह का सबसे सरल और अचूक उपाय है ईश्वर पर अनुराग। 

जो ईश्वर में  विश्वास नहीं करते, वे पुरुषार्थ  के  द्वारा गुणों  को लांघकर मन: संयम  कर ले सकते हैं। 

मन:संयम महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि  यह उच्चतम मंगल की -आत्मा की ज्ञानमय अवस्था की प्राप्ति कराता है। 

धन्यवाद् ,जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

अगला ज्ञानप्रसाद – गुरुदेव के शिरोमणि शिष्य शुक्ला  बाबा की वीडियो  

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24 आहुति संकल्प सूची :

15  दिसंबर के  ज्ञानप्रसाद के अमृतपान उपरांत आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की 9 समर्पित दिव्य आत्माओं ने विचार परिवर्तन हेतु अपने विचारों की हवन सामग्री से कमेन्ट्स रूपी आहुति डाल कर 24 आहुतियों का संकल्प  पूर्ण किया है। वह महान वीर आत्माएं निम्नलिखित हैं:  (1) सरविन्द कुमार पाल -25, (2) रेनू श्रीवास्तव बहन जी -34, (3 ) डा.अरुन त्रिखा-30, (4 ) अरूण कुमार वर्मा जी – 26, (5 ) संध्या बहन जी-27, (6 ) प्रेरणा कुमारी बेटी-30, (7 ) कुसुम बहन जी-24, (8 ) अनिल मिश्रा  जी-26, (9 ) बेटा धीरप सिंह-24

उक्त सभी दिव्य आत्माओं को हम सब की ओर से  ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ व  बधाई हो और आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ भगवती गायत्री माता दी की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे।  आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरु सत्ता से विनम्र प्रार्थना एवं  मंगल कामना है l

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