Leave a comment

अध्याय 27. अवचेतन मन का संयम भाग  1  

 11   दिसंबर 2021  का ज्ञानप्रसाद – अध्याय  27. अवचेतन मन का संयम भाग  1  

आज का  ज्ञानप्रसाद भी कल वाले  ज्ञानप्रसाद की तरह कुछ बड़ा  (3 पन्नों का) है।  बहुत ही उत्तम जानकारी और शिक्षा से भरपूर इस लेख को भी अपने अन्तःकरण में उतारते हुए अभ्यास करने की आवश्यकता है।हमारा विश्वास है कि हमारे पाठकों को  आज के लेख में अचेतन (unconscious), चेतन(conscious), अवचेतन( subconscious) एवं अतिचेतन (superconscious) मन को समझने में सहायता मिलेगी। मनोनिग्रह विषय की  30 लेखों की इस अद्भुत  श्रृंखला में आज प्रस्तुत हैं  अध्याय 26   हर लेख की तरह आज भी हम लिखना चाहेंगें यह अद्भुत श्रृंखला आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के स्वाध्याय पर आधारित  प्रस्तुति है।ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  रामकृष्ण मिशन मायावती,अल्मोड़ा के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी का आभारी है जिन्होंने  यह अध्भुत  ज्ञान उपलब्ध कराया। इन लेखों का  सम्पूर्ण श्रेय इन महान आत्माओं को जाता है -हम तो केवल माध्यम ही हैं।  तो आइए चलें आज के लेख  की ओर : 

27. अवचेतन मन का संयम 

मन के चेतन और अवचेतन स्तरों के बीच निष्ठापूर्वक सीमारेखा खींचना कठिन है। तथापि व्यवहार में, हाथ में ली गयी समस्या का विचार करते समय इन शब्दों का उपयोग सुविधाजनक होगा। जिन अनुशासनों का पालन चेतन मन के संयम हेतु करना पड़ता है, वे अवचेतन मन को बिलकुल अछूता नहीं छोड़ सकते। इसका उल्टा भी सत्य है। फिर भी अभी तक जो हमने विचार किया, वह प्रत्यक्षतः चेतन स्तर से ही सम्बंधित है। 

अब हम अवचेतन मन के संयम पर आते हैं। वह चेतन स्तर पर किये गए कार्य का ही एक स्वाभाविक बढ़ाव है। हममें से सभी ने अपने जीवन में ऐसी घटना का अनुभव किया होगा कि हम जानते तो हैं कि ठीक क्या है, फिर भी हम उसका पालन नहीं कर पाते; इसी प्रकार हम जानते तो हैं कि गलत क्या है, फिर भी उससे विरत नहीं हो पाते। हम बहुत अच्छे-अच्छे संकल्प करते हैं, पर उनके प्रति सजग होने के पहले ही वे उसी प्रकार घुल जाते हैं, जैसे प्रचण्ड जलप्रवाह के सामने रेत का पूल। हम चकित, भ्रमित और हताश-से खड़े रह जाते हैं। 

इस अवस्था की जांच- पड़ताल हमें यह बतायेगी कि हम मन के चेतन भाग से तो संकल्प कर रहे हैं और हम ही उसके दूसरे भाग अवचेतन से उन संकल्पों को नष्ट कर दे रहे हैं। हम इस अवचेतन के सम्बन्ध में बहुत थोड़ा ही जानते हैं। वह मन का अप्रकाशित भाग है। 

जिस क्षण हम गम्भीरतापूर्वक मन के नियंत्रण में लगते हैं, हम आभ्यंतरिक कठिनाइयों से घिर जाते हैं। हम जितना ही लगे रहते हैं, कुछ समय के लिए हमारी कठिनाइयाँ उतनी ही अधिक मालूम होतीं हैं। अचरज में पड़कर हम अपने आप से पूछने लगते हैं – ‘यह क्या! मैं तो दिन पर दिन खराब होता जा रहा हूँ !’ जब से धर्म को गम्भीरतापूर्वक ग्रहण किया है, तब से तो अपने में दिन-प्रतिदिन गिरावट का ही अनुभव कर रहा हूँ। यदि अवस्था ऐसी हो भी, तो हमें चिन्तित नहीं होना चाहिए। सामान्यतः ठीक ऐसा ही होता है। इसकी भी प्रक्रिया यों है– जब हम अध्यवसायपूर्वक चेतन मन को नियंत्रित करने की चेष्टा करते हैं, तो हम अपने अवचेतन मन की विरोधी शक्तियों से मुठभेड़ ले लेते हैं। ये विरोधी शक्तियाँ और कुछ नहीं बल्कि हमारे ही अपने संचित संस्कार हैं। जो भी हम सोचते और करते हैं, वह हमारे मन पर अपनी एक सबल छाप छोड़ जाता है। ये संस्कार अवचेतन मन से ऊपर उठते हैं और फिर से अभिव्यक्त होना चाहते हैं। चेतन मन से उस समय हम जो सोच रहे होते हैंं, उसके यदि वे विरोधी हुए, तो संघर्ष ठन जाता है। 

अवचेतन मन घर के तलघर के समान है। तुम नहीं जानते कि वहाँ कितना कूड़ा-कर्कट इकट्ठा है, जबतक कि एक दिन तुम उसे साफ करने की ठान नहीं लेते। जब तुम साफ करना शुरु करते हो तो तुम्हें पता नहीं रहता कि कैसी चीजें और कौन से कीड़े तुम्हें मिलनेवाले हैं। तुम शीघ्र थक जाते हो और काम को अधूरा छोड़ देते हो। अत: तलघर, तलघर ही बना रहता है। क्वचित् ही वह रहने लायक कमरा बन पाता है। परन्तु जबतक हम अवचेतन मनरूपी इस तलघर को साफ नहीं करते, तबतक चेतन मन के इस अन्धकार पूर्ण क्षेत्र को साफ करने के रास्ते हमें खोजने ही चाहिए यह कैसे होता है? 

मानो एक दवात साफ करना चाहते हो। वह हम कैसे करेंगे? हम दवात में साफ पानी डालते हैं। इससे सूखी स्याही जल में घुल जाती है और कुछ देर रंगीन जल ही बाहर निकलता है। तदनन्तर कुछ अधिक साफ और कुछ कम स्याहीवाला पानी बाहर आता है। अन्त में हमें स्याही का लेशमात्र भी नहीं मिलता। साफ पानी दवात में डालने पर उसमें से साफ पानी ही बाहर निकलता है। इसी प्रकार अवचेतन मन को साफ करने का एक तरीका यह है कि मन में पवित्र विचार ढाले जायें और उनको हम अपने भीतर गहराई में उतरने दें। पवित्र विचार साफ पानी के समान है। स्मरण रखें, यदि एक विशेष अवस्था में हमारे भीतर से स्याह-जल बाहर निकले तो उसमें हमें भयभीत नहीं होना चाहिए। यदि हम लगातार पवित्र विचार ढालते ही रहें, तो एक समय ऐसा आयेगा, जब केवल पवित्र विचार ही हमारे भीतर से बाहर आयेंगे तब यह समझा जा सकता है कि अवचेतन मन साफ हो गया है और तब चेतन मन का संयम कठिन न होगा। 

हमें ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि अवचेतन मन केवल अशुभ का ही भंडार है। अवचेतन में हमारे अतीत के शुभ और उदात्त विचार एवं अनुभव भी बीजरूप में संचित रहते हैं। इस प्रकार अवचेतन मन में हमने मनोनिग्रह के अपने प्रयत्नों के लिए सहायता और विरोध दोनों संचित कर रक्खें हैं। हमारा प्रयत्न यह रहेगा कि विरोध को कम करें और सहायता को बढ़ायें। श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन को यह आश्वासन दिया है कि जो योगी पथभ्रष्ट हो जाता है, उसे शाश्वत दुख में नहीं रहना पड़ता है, क्योंकि उसके शुभ कर्म संचित रहते हैं और वह अगले जन्म में अपने पिछले जन्म से प्राप्त बुद्धि के साथ फिर से युक्त हो जाता है। पिछले जन्म में प्राप्त बुद्धि के साथ इस प्रकार से युक्त होना इस जन्म में की जानेवाली मनोनिग्रह की चेष्टाओं में एक सशक्त अज्ञात उत्पादन हो सकता है। यदि पूर्वजन्म में प्राप्त इस बुद्धि का कोई विशिष्ट विचरण क्षेत्र निर्दिष्ट करना चाहें, तो वह यह अवचेतन मन ही होगा। 

अतएव मन:संयम के लिए महत्वपूर्ण कार्य तो अवचेतन के स्तर पर ही करना होगा। दूसरी ओर, यदि हम जीवन के उच्चतम लक्ष्य की प्राप्ति को अर्थात् अतिचेतन अवस्था की अनुभूति को एकमात्र अपना गम्य न बनायें, तो हम न तो अपने चेतन मन का संयम कर सकते हैं और न अचेतन का। अतिचेतन अवस्था की अनुभूति ही, या यों कहें कि ईश्वर का साक्षात्कार ही हमारी आसक्ति, घृणा, और भ्रम का निवारण करता है जो मन में क्षोभ और अशान्ति की सृष्टि करते हैं। 

इस तरह मन को संयमित करने के हमारे प्रयत्न ऐसे हों कि एक ओर वे हमारे अवचेतन मन को छूएं और दूसरी ओर अतिचेतन का स्पर्श करें। दूसरे शब्दों में, मनोनिग्रह की प्रक्रिया में हमारा सारा अस्तित्व ही समाहित हो जाता है। मन:संयम के कार्य की विशालता पर बल देते हुए स्वामी विवेकानन्द बतलाते हैं कि कैसे हमारा अध्ययन और हमारे प्रयत्न केवल चेतन स्तर तक ही सीमित नहीं रह सकते:

“हमारे सामने एक बहुत बड़ा कार्य है, और इसमें सर्वप्रथम सबसे महत्व का काम है अपने सहस्त्रों गुप्त संस्कारों पर अधिकार चलाना, जो अनैच्छिक सहज क्रियाओं में परिणत हो गये हैं। यह बात सच है कि असत् कर्म-समूह मनुष्य के जाग्रत क्षेत्र में रहता है, लेकिन जिन कारणों ने इन बुरे कामों को जन्म दिया, वे इसके पीछे प्रसुप्त और अदृश्य जगत् के हैं और इसलिए अधिक प्रभावशाली हैं।”

अतएव स्वामी जी ‘अचेतन ‘ के संयम को विशेष महत्व प्रदान करते हैं। यहाँ पर अवचेतन और अचेतन में कोई अन्तर नहीं माना गया है और इसके अकाट्य तर्क भी हैं। वे कहते हैं:

“व्यवहारिक मनोविज्ञान प्रथम हमें यह सिखलाता है कि हम अपने अचेतन मन का नियंत्रण किस तरह कर सकते हैं। हम जानते हैं कि हम ऐसा कर सकते हैं। क्यो? इसलिए कि हम जानते हैं चेतन मन ही अचेतन का कारण है। हमारे जो लाखों पुराने चेतन विचार और चेतन कार्य थे, वे ही घनीभूत होकर प्रसुप्त हो जाने पर हमारे अचेतन विचार बन जाते हैं। हमारा उधर ख्याल ही नहीं जाता, हमें उनका ज्ञान नहीं होता हम उन्हें भूल जाते हैं। लेकिन देखो, यदि प्रसुप्त अज्ञात संस्कारों में बुरा करने की शक्ति है तो उनमें अच्छा करने की भी शक्ति है। हमारे भीतर नाना प्रकार के संस्कार भरे पड़े हैं, मानो एक जेब में बहुत सी चीजें बंधी हुई हैं। उन्हें हम भूल गये हैं , हम उनका विचार तक नहीं करते। उनमें से बहुत से तो वहीं पड़े सड़ते रहते हैं और सचमुच भयावह बनते जाते हैं। वे ही प्रसुप्त कारण एक दिन मन के ज्ञानयुक्त क्षेत्र पर आ उठते हैं और मानवता का नाश कर देते हैं। अतएव सच्चा मनोविज्ञान उनको चेतन मन के अधीन लाने का प्रयत्न करेगा। अतएव महत्वपूर्ण बात है पूरे मनुष्य को पुनर्जीवित-जैसे कर देना, जिससे कि वह अपना पूर्ण स्वामी बन जाये। शरीरान्तर्गत यकृत आदि इन्द्रियों की स्वत:प्रवृत्त क्रियाओं को भी हम अपनी आज्ञापालक बना सकते हैं।

धन्यवाद ,जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

अगला लेख-27. अवचेतन मन का संयम -भाग 2  

 24 आहुति  संकल्प सूची:

आज के लेख में आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के 8 सूझवान व समर्पित नवयुग शिल्पकारों ने अपने भाव भरे आध्यात्मिक व क्रान्तिकारी विचारों की हवन सामग्री से कमेन्ट्स रूपी आहुति डाल कर 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण किया है l वह नव युग शिल्पकार सजग सैनिक  हैं : (1) अरुण त्रिखा-29, (2 ) प्रेरणा बिटिया-27, (3 ) आदरणीय सरविन्द जी-24, (4 ) आदरणीय अरुण वर्मा जी-24, (5 ) संध्या कुमार बहिन जी-25, (6) सुमन लता बहिन जी-30, (7) नीरा त्रिखा जी-24, (8) रेनू श्रीवास्तव बहिन जी-26, बहिन सुमन लता जी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया हैं। उनको एवं बाकि सभी सैनिकों  को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से अनंत ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो एवं  सभी पर आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ भगवती गायत्री माता  की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे यही आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरुसत्ता से विनम्र प्रार्थना व  मंगल कामना है l धन्यवाद l जय गुरुदेव

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: