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अध्याय 23. हताशा से बचो और अध्याय 24.आपातकालीन नियन्त्रण व्यवस्थाएँ

8 दिसंबर 2021  का ज्ञानप्रसाद – अध्याय 23. हताशा से बचो और अध्याय 24.आपातकालीन नियन्त्रण व्यवस्थाएँ

हमने कल आपके समक्ष अपना रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत किया, भावी  योजनाएं आपके समक्ष रखीं , आपने हमें बहुत ही प्रोत्साहित किया उसके लिए हम आपके ह्रदय से आभारी हैं। हमारे नियमित सहकर्मी आदरणीय JB Paul जी ने इसे पेरेंट्स -टीचर्स मीटिंग का Nomenclature देकर “पारिवारिक चर्चा” य “अपनों  से अपनी बात” को एक नवीनता प्रदान की है। परमपूज्य गुरुदेव अगस्त 1953 की  अखंड ज्योति में “गायत्री चर्चा”  स्तम्भ के अंतर्गत  लिखते हैं कि सामूहिक साधना का पुण्यफल एकांत साधना से कहीं अधिक है।  उन दिनों “अपनों से अपनी बात” स्तम्भ आरंभ नहीं हुआ था, इसलिए ” गायत्री चर्चा” स्तम्भ के अंतर्गत ही वे अपनी बात कह लिया करते थे। अगर पुण्यफल का सरल  गणित देखा जाये तो   रिपोर्ट कार्ड वाले ज्ञानप्रसाद पर   374 कमैंट्स  प्राप्त हुए हैं।  इनमें से किसी कमेंट  को लिखने में 10 मिंट लगे होंगें तो किसी को 30 सेकंड (आधा मिंट) l चलिए एक मिंट प्रति कमेंट औसत के हिसाब से चलें तो 6 घण्टे से अधिक की activity दिखाई दे रही है। अगर इस सामूहिक पुण्यफल का दसवां भाग ही मान कर चलें तो प्रत्येक सहकर्मी को आधे घंटे से अधिक पुण्य प्राप्त हो रहा है – इससे अधिक ही होता है कम नहीं। इसी अखंड ज्योति  में परमपूज्य गुरुदेव ने श्रमदान,अंशदान ,सामूहिक यज्ञों की, सामूहिक चर्चाओं की महत्ता पर बल दिया था। 

मनोनिग्रह विषय की 30 लेखों की इस अद्भुत  श्रृंखला में आज प्रस्तुत हैं  अध्याय 23   और 24  । दोनों लेख बहुत ही छोटे हैं -केवल दो ही   पन्नों के।  हर लेख की तरह आज भी हम लिखना चाहेंगें यह अद्भुत श्रृंखला आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के स्वाध्याय पर आधारित  प्रस्तुति है।ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  रामकृष्ण मिशन मायावती,अल्मोड़ा के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी का आभारी है जिन्होंने  यह अध्भुत  ज्ञान उपलब्ध कराया। इन लेखों का  सम्पूर्ण श्रेय इन महान आत्माओं को जाता है -हम तो केवल माध्यम ही हैं। 

तो आइए चलें लेखों की ओर : 

  23 . हताशा से बचो

ये ही बुनियादी साधन हैं। जो अपने मन को वश में करना चाहते हैंं उन्हें इनका नियमित अभ्यास करना चाहिए। अध्यवसायपूर्वक इन साधनाओं का अभ्यास करते हुए साधक का आदर्शवाक्य रहे: ‘जूझते रहो, जूझते रहो , जूझते रहो, कभी हिम्मत न हारो।’ 

हमें हताशा को नहीं पनपने देना चाहिए क्योंकि वह उत्साह और शक्ति का नाश करती है। वह अध्यात्म- जीवन की सबसे बड़ी शत्रु है। अत: जहाँ भी वह दिखायी दे उसका समूल नाश कर दो। 

जब हम अत्यंत खराब मानसिक अवस्था में रहें और ऐसा सोचें कि अब आभ्यन्तरिक संघर्ष के लिए हमें शक्ति नहीं मिल रही है, ऐसे समय हम मन के पीछे खड़े हो जायें और ऐसा देखने का प्रयास करें कि हम अपनी मानसिक अवस्था से सम्पूर्णता: विलग हैं। हम कभी भी अपने को भली या बुरी किसी भी प्रकार की मानसिक अवस्था के साथ तद्रूप न समझें , क्योंकि हमारा यथार्थ स्वरूप आत्मा तो मन नहीं है। 

जब हमारा मन निम्न अवस्था में रहे, तो समस्त निषेधात्मक विचारों को बलपूर्वक यह कहते हुए निकाल देना चाहिए: ‘मैं देवता हूँ, अन्य कुछ नहीं, मैं साक्षात् ब्रह्मस्वरुप हूँ, शोक मुझे स्पर्श भी नहीं कर सकता, मैं सच्चिदानन्द स्वरूप नित्यमुक्त स्वभाव हूँ।’ अथवा हम दृढतापूर्वक बारम्बार दुहरा सकते हैं: यदि ईश्वर हमारे साथ है, तो कौन हमारा विरोध कर सकता है? इस प्रकार मन की निम्न अवस्था दूर हो जायेगी। 

24 . आपातकालीन नियन्त्रण व्यवस्थाएँ

यह हममें से प्रत्येक ने अनुभव किया होगा कि निष्ठापूर्वक इन मूलभूत साधनाओं का अभ्यास करते हुए भी प्रबल विपरीत शक्तियों, विचारों, संवेगों, प्रवृतियों और भावनाओं से मुठभेड़ कर बैठते हैं। ये प्रवृतियाँ और भावनाएँ हमारे मन के समस्त शुभ कार्यों को नष्ट करने पर तुले जाती हैं। ऐसी संकटपूर्ण अवस्थाओं में हमें कुछ उच्च शक्तिसंपन्न आपातकालीन नियन्त्रण-तन्त्रों का विकास करना पड़ता है। दमकल के समान दिन और रात को किसी भी समय हमारे उपाय तैयार रहने चाहिए। 

राजयोग के उपदेष्टा पतंजलि इस उपाय को ‘प्रतिपक्ष- भावनम्’ ( विपरीत विचार उठाना) कहते हैं। संदर्भित सूत्र में वे कहते हैं: “जब मनोजय में बाधक विचार उठने लगते हैं तो विपरीत विचारों का सहारा लेना चाहिए।

उदाहरणार्थ तुम देख रहे हो कि मन में क्रोध की एक बड़ी लहर उठ रही है जो न केवल तुम्हारी शक्ति को नष्ट करेगी बल्कि तुम्हें बडा़ नुकसान भी पहुँचायेगी। इस लहर को नष्ट करने के लिए तुम्हें क्या करना पड़ेगा ? तुम्हें एक विपरीत लहर प्रेम की उठानी पड़ेगी . यदि तुम्हारे मन में काम की वृत्ति प्रबल हुई तो तुम्हें पवित्रता की एक विपरीत लहर उठानी पड़ेगी। यह बात किसी सन्त- महात्मा के शुद्ध हृदय का तीव्र रूप से चिन्तन करने से सध सकती है। 

किन्तु विपरीत विचारों को विरोधी विचारों के ठीक प्रारंभ में ही उठा देना चाहिए। एक ऐसी अवस्था होती है जब तुम्हारा क्रोध तुम्हारे मन में एक बुलबुले के आकार का होता है; और एक अवस्था वह भी है जब तुम साक्षात् क्रोध ही बन जाते हो। जब सर्वप्रथम बुलबुला उठना शुरू हो, तभी विपरीत विचारों को उठाना चाहिए ; अन्यथा यह तरीका काम नहीं देने का। यदि हानिकारक विचारों को पनपने का मौका मिल गया तो विपरीत विचार शक्तिहीन हो जायेंगे। इससे हम समझ सकते हैं कि हमें अपने विचारों और संवेगों पर कितनी सूक्ष्म नजर रखनी पड़ती है। 

यह सम्भव है कि हम प्रथम कुछ बुलबुलों को न देख पायें और उधर हमारा ध्यान तभी जाये जब लहरें काफी ऊपर उठ चुकीं हों। ऐसी दशा में हमें क्या करना चाहिए ? हमें अपनेआप को बलपूर्वक ऐसी दशा से विलग कर लेना चाहिए और एकांत में जा मन का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। वहाँ पर मन को मानो गर्दन से पकड़कर हम यह कहें : ‘अरे मन! यह तेरा सत्यानाश कर देगा। क्या तू इतना भी नहीं देख पाता ? ‘ यदि हम इस भाव को बलपूर्वक मन पर अंकित कर दें तो वह उचित वर्तन करने लगेगा, क्योंकि वह नाश को प्राप्त नहीं होना चाहता।

जब एक शिष्य ने स्वामी ब्रह्मानन्द से पूछा: “यदि मन में विक्षेप लाने वाला कोई विचार बार-बार उठता रहे तो मुझे क्या करना चाहिए ? ‘ तो उन्होंने उत्तर दिया था ,अपने मन पर इस भाव को बारम्बार यह अंकित करते रहो कि:

“यह विचार मेरे लिए अत्यन्त हानिकारक है। यह मेरा सर्वनाश कर देगा। ऐसा करने से मन विक्षेपकर विचार से मुक्त हो जायगा मन सुझावों को ग्रहण कर लेता है। तुम उसे जो कुछ सिखाते हो वह सीख लेता है। यदि तुम विवेक के द्वारा आत्मिक जीवन के आनन्द और पूर्णत्व की छाप उस पर डाल दो तथा सांसारिक आसक्तियों की असारता उसे समझा दो, तो वह अपने को अधिकाधिक ईश्वर से लगा लेगा। 

मन के साथ लड़ने से बढ़कर क्लान्तिप्रद और कुछ नहीं। हम ज्यों ज्यों क्लान्त होते हैं, हमारा मन उतना ही चंचल हो जाता है और अन्त में हम उसके द्वारा बहा लिये जाते हैं। ऐसी दशा में मन पर सामने से आक्रमण करना अधिक सहायक नहीं होता। तब हम क्या करें? हम अपने को मन से एकरूप समझना बन्द कर दें। यदि हम यह करते हैं तो एक बहुत बड़ा कार्य सम्पन्न हो जाता है। 

जबतक हम अपने को मन से एकरूप समझते हैं, तब तक हम मन का नियन्त्रण नहीं कर सकते। ज्यों ही दार्शनिक चिंतन के द्वारा हम अपने को मन से अलग करने में सफल होते हैं, त्यों ही मन अपना आधार खो बैठता है और उसे ऐसी कोई जगह नहीं मिलती, जहाँ पर खड़ा हो वह उलझनें पैदा कर सके। 

किन्तु इस सन्दर्भ में हम कार्य को तभी पूर्ण और स्थायी भित्ति पर आधारित मानेंगे जब अहंकार का अज्ञान नष्ट हो जायेगा। पतंजलि अहंकार की परिभाषा करते हुए कहते हैं कि द्रष्टा आत्मा का दर्शन के उपकरण-रूप इन्द्रिय, बुद्धि और मन के साथ तादात्म्य को प्राप्त हो जाना ही अहंकार है। हमारे समस्त पापों और कठिनाइयों की जड़ इसी अहंकार में है। अत: मन की विक्षिप्त और विद्रोही अवस्था को नियन्त्रण में लाने का एक प्रभावी उपाय यह है कि हम मन से अपने आपको अलग कर लें।

जय गुरुदेव धन्यवाद् 

 कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

अगला लेख : अध्याय  25. दिशा- केन्द्रित विचार 

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24 आहुति संकल्प सूची :

(1 ) निशा भरद्वाज जी-24, (2 ) सरविन्द कुमार जी -46, (3 ) रेनू श्रीवास्तव जी-29, (4 ) संध्या कुमार जी -32, (5 ) रजत कुमार जी -24, (6 ) प्रेरणा बिटिया -24, (7 ) उमा सिंह जी-24, (8 ) अरुण कुमार वर्मा जी -27  सभी विजेताओं को ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार की ओर  से  साधुवाद,हार्दिक शुभकामनाएँ व  बधाई हो।  आशा करते हैं बाकि सहकर्मियों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी । अगर सहकर्मी लाइक बटन को भी प्रेस कर दें तो और अधिक बल मिलेगा। 

जय गुरुदेव

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