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अध्याय 19. सन्तुलित मानव-सम्बन्धों का महत्व और अध्याय 20.मन को स्वस्थ रूप से कार्यों में रत रखना आवश्यक

4  दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – अध्याय 19. सन्तुलित मानव-सम्बन्धों का महत्व और अध्याय 20.मन को स्वस्थ रूप से कार्यों में रत रखना आवश्यक

मनोनिग्रह विषय की 30 लेखों की इस अद्भुत  श्रृंखला में आज प्रस्तुत हैं  अध्याय 19 और 20  अध्याय। दोनों लेख बहुत ही छोटे हैं -केवल 3 पन्नों के।  हर लेख की तरह आज भी हम लिखना चाहेंगें यह अद्भुत श्रृंखला आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के स्वाध्याय पर आधारित  प्रस्तुति है।ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  रामकृष्ण मिशन मायावती,अल्मोड़ा के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी का आभारी है जिन्होंने  यह अध्भुत  ज्ञान उपलब्ध कराया। इन लेखों का  सम्पूर्ण श्रेय इन महान आत्माओं को जाता है -हम तो केवल माध्यम ही हैं।

तो आइए चलें लेखों की ओर :

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19 .सन्तुलित मानव-सम्बन्धों का महत्व 

बाइबिल में ईसा मसीह ‘सर्मन् आन दि माउन्ट’ प्रकरण में कहते हैं:

“यदि तू पूजा की वेदी पर अपना चढावा लाता है और वहाँ पर तुझे अपने भाई से विरोध का स्मरण आता है, तो तू वहीं वेदी के सामने अपना चढावा छोड़ दे और घर लौट जा ; पहले अपने भाई से विरोध दूर कर ले और तब आ और अपनी भेंट चढ़ा।”

यह ईसा मसीह की एक महत्वपूर्ण शिक्षा है। मन की जिन अवस्थाओं पर आध्यात्मिक जीवन टिका करता है उनके साथ मानवीय सम्बन्ध घनिष्ठ रूप से जुड़े रहते हैं। 

जो अपने मन को वश में करना चाहते हैं उन्हें चाहिए कि वे मन में दुर्भावनाओं, शिकायतों या गलत आवेगों का संचय न करें। मन का उपयोग उच्चतर उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किया जाना चाहिए। दूसरों के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए तथा अनासक्ति, क्षमा और विनय के अभ्यास के द्वारा हमें अपने मानवीय सम्बन्धों को सहज सरल बनाये रखना चाहिए। श्रीमां सारदा देवी का कथन है: 

“’क्षमा ही तपस्या है।” 

अस्वस्थ या टूटे हुए मन की अपेक्षा एक स्वस्थ मन को वश में करना कहीं अधिक सरल है। हम नीचे एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं जो दर्शाता है कि मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त करने में क्षमा कैसे सहायक होती है। बरसों पहले डाक्टर युंग ने एक सुझाव दिया था कि पादरियों और मनोवैज्ञानिकों को मानवीय दुःख कम करने के लिए एक साथ काम करना चाहिए। ‘अमेरिकन मैगज़ीन’ के अक्टूबर 1947 के अंक में एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें इस प्रकार के एक उल्लेखनीय क्लीनिक की बात छपी थी, जहाँ हताश और टूटे दिल वालों के उपचार की व्यवस्था थी :

इस क्लीनिक में एक चौंतीस वर्षीय महिला आयी। उसकी उम्र पचास की दिख रही थी और वह महीनों से अनिद्रा, घबराहट और दीर्घकालिक थकान की शिकार थी। वह बहुत से चिकित्सकों के पास गयी पर कोई लाभ न हुआ। धार्मिक प्रवृत्ति की होने के कारण उसने प्रार्थना करने की भी कोशिश की पर सफलता न मिली। अन्त में वह इतनी हताश हो गई कि उसने आत्म हत्या कर लेनी चाही। क्लीनिक के मनोचिकित्सक ने अनुसन्धान करके उसके रोग का यथार्थ कारण यह पाया कि वह अपनी बहन के प्रति प्रबल क्रोध का भाव पोषित करती थी, क्योंकि उसने उस व्यक्ति से शादी कर ली थी जिससे कि वह स्वयं ही विवाह करना चाहती थी। ऊपर से वह अपनी बहन के प्रति सहृदय मालूम पड़ती थी किंतु उसके अवचेतन मन की गहराईयों में अपनी बहन के प्रति प्रबल घृणा का भाव भरा था जिसके कारण उसका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य बुरी तरह नष्ट हो गया। एक पादरी उसकी सहायता के लिए आये। “तुम जानती हो कि घृणा करना बुरा है, तुम्हे भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि प्रभो, तुम मुझे शक्ति दो जिससे मैं अपनी बहन को हृदय से क्षमा कर सकूँ। भगवान तुम्हें शान्ति प्रदान करेंगे। ” उसने इस सलाह का पालन किया। 

‘अपने से एक वृहत्तर शक्ति में विश्वास करके, उससे प्रार्थना करते हुए वह अपनी बहन को क्षमा करने में समर्थ हुई। उसकी घबराहट और अनिद्रा दूर हो गयी और उसे अब एक नया जीवन प्राप्त हो गया है, जिसमें वह पहले की अपेक्षा बहुत सुखी है।’

20 . मन को स्वस्थ रूप से कार्यों में रत रखना आवश्यक

खाली दिमाग शैतान का घर ‘ यह कहावत अत्यन्त सत्य है। अत: मन को स्वस्थ और सृजनात्मक कार्यों में लगाकर रखना चाहिए। उसे उच्च विचारों और उदात्त अन्त: करण की खुराक देनी चाहिए। अन्यथा वह निम्न विषयों की ओर बहेगा और बिखर जायगा। बिखरे हुए मन को नियंत्रण में नहीं लाया जा सकता।

यदि हम मन की अस्थिरता की गहराई में घुसेंगे तो देखेंगे कि उस अस्थिरता का कारण एक गलत विचार है या परस्पर प्रतिक्रिया कराने वाले बहुत से गलत विचार हैं। अतएव मन को स्थिर करने के लिए हमें पूरी सतर्कता के साथ अपने विचारों की चौकसी करनी चाहिए। बौद्ध-धर्म के ये उपदेश हैं:

“जैसे इषुकार( बाण बनाने वाला ) अपने बाण को सीधा करता है, वैसे ही बुद्धिमान पुरुष अपने नित्य विचलनशील और चंचल मन को सीधा करता है, जिसकी रक्षा करना कठिन है तथा जिसका निवारण अत्यन्त कठिनाई से होता है।”

बुद्धिमान पुरुष अपने चित्त की रक्षा करे, जो बहुत चतुर है, जिसे देखना कठिन है तथा जो यथेच्छ भागने वाला है। रक्षित किया हुआ चित्त सुखवर्धक होता है। जिसका चित्त बिखरा हुआ नहीं है, जिसका मन विक्षोभ से रहित है , जिसका अन्त:करण पुण्य और पाप दोनों का चिन्तन नहीं करता, ऐसे जागरुक व्यक्ति को भय नहीं होता।

यदि हम ठीक ढंग से आत्मनिरीक्षण करें तो पता चलेगा कि असावधानी ही हमारे स्वभाव में घुस गयी है क्योंकि हमने अपने मन को उच्चतर आभ्यन्तरिक कार्यों में लगने के लिए प्रशिक्षित नहीं किया है। श्री शंकराचार्य उपदेश प्रदान करते हैं:

“ब्रह्मनिष्ठा में हमें कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए। ब्रह्मा जी के पुत्र भगवान सनत्कुमार ने प्रमाद को मृत्यु ही कहा है।” 

ज्ञानी के लिए अपने आत्मस्वरूप की उपलब्धि में प्रमाद से बढ़कर और कोई अनर्थ नहीं है। प्रमाद से भ्रम उत्पन्न होता है, उससे अहंकार जन्म लेता है, अहंकार से बन्धन और बन्धन से दु:ख उपजता है। विद्वान व्यक्ति भी विषयों की चपेट में आने के कारण, बुद्धि के दोष से उसी प्रकार विस्मृति से पीड़ित होता है, जैसे एक यार अपनी प्रिया के ( चिन्तन ) से। जैसे काई हटा देने पर भी क्षणभर के लिए भी दूर नहीं रहती, बल्कि फिर से जल में छा जाती है, उसी प्रकार माया आत्मा से परा़ंगमुख (दूरी रखनेवाले) बुद्धिमान पुरुष को भी ढक लेती है। यदि चित्त तनिक भी लक्ष्य से विच्युत होकर बहिर्मुखी हो जाय, तो वह वैसे ही नीचे- नीचे गिरता रहता है, जैसे एक गेंद असावधानी से सीढ़ी पर गिर जाने से टप्पे पर टप्पे खाती हुई नीचे गिरती जाती है।

जीवन के उच्चतम लक्ष्य, उस परमात्मा के प्रति सतत् सजगता का अभ्यास करना मन को स्थिर करने का एक बली साधन है। वास्तव में जब हम इस साधना का अभ्यास करते हैं, तो अन्यान्य साधनाओं से भी हमें अधिकाधिक लाभ मिलता है। 

मन को स्वस्थ कार्यरत रहने का यह मतलब नहीं कि वह नीरस हो जाय। यदि वह नीरस हो जाता है तो उसके अस्वस्थ और निम्नगामी होने की संभावना रहती है। मन को स्वस्थ रुप से कार्यरत रखने के लिए हम साधना में उत्साहप्रद विविधता ला सकते हैं। श्रीकृष्ण उपदेश देते हैं :

“दान, स्वधर्म- पालन, यम, नियम, वेदाध्ययन, सत्कर्म और ब्रह्मचर्य आदि श्रेष्ठ व्रत —- इन सबका अन्तिम फल यही है कि मन का निग्रह हो जाय। मन का समाहित हो जाना ही परमयोग है।”

जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

अगला लेख  सोमवार को : अध्याय 21. कल्पनाशक्ति के सम्यक् उपयोग का महत्व  

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आज की 24 आहुति संकल्प सूची : 

ऑनलाइन ज्ञानरथ के  12 सूझवान व समर्पित सहकर्मियों ने आज के लेख रूपी महायज्ञशाला  में अपने विचारों की हवन सामग्री से कमेन्ट्स रूपी आहुति डालते हुए  24 आहुतियों के संकल्प को पूरा कर किया है।  इन सभी सहकर्मियों ने   महाकाल के 12 ज्योतिर्लिंग के पावन पवित्र भावनात्मक दर्शन करते हुए  अत्यंत  परमार्थ परायण कार्य  किया है जो बहुत ही  सराहनीय व  प्रशंसनीय है। वह 24 आहुति संकल्प विजेता हैं : (1) सरविन्द कुमार पाल – 52, (2) प्रेरणा कुमारी बेटी – 26, (3) पिंकी बेटी – 26, (4) रजत कुमार जी – 26, (5) नीरा बहन जी – 25, (6) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 25, (7) अरूण कुमार वर्मा जी – 25, (8) उमा सिंह बहन जी – 25, (9) निशा भारद्वाज बहन जी – 25, (10) डा.अरुन त्रिखा जी – 24, (11) संध्या बहन जी – 24, (12) अनिल कुमार मिश्रा जी – 24    सभी विजेताओं को ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार की ओर  से  साधुवाद,हार्दिक शुभकामनाएँ व  बधाई हो।  आशा करते हैं बाकि सहकर्मियों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी ।

जय गुरुदेव

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