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मनोनिग्रह के अध्याय 14 और 15

2 दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद –

आदरणीय संध्या बहिन जी के तीन लेखों की कड़ी के बाद हम एक बार फिर  आदरणीय अनिल मिश्रा जी की प्रस्तुति से कनेक्ट होने का प्रयास करेंगें।  30 लेखों की “मन और उसका निग्रह”  श्रृंखला के  अध्याय 14 और  15 में दर्शाये गए अभ्यास प्रयासों का स्वाध्याय करते हुए हम देखेंगें कि “मन का स्वामी” कैसे बना जाये। हर लेख की तरह आज भी हम लिखना चाहेंगें यह अद्भुत श्रृंखला आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के स्वाध्याय पर आधारित  प्रस्तुति है।ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  रामकृष्ण मिशन मायावती,अल्मोड़ा के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी का आभारी है जिन्होंने  यह अध्भुत  ज्ञान उपलब्ध कराया। इन लेखों का  सम्पूर्ण श्रेय इन महान आत्माओं को जाता है -हम तो केवल माध्यम ही हैं।

तो प्रस्तुत हैं आज के दो लेख। 

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14. मनोनिग्रह के लिए बुनियादी योगाभ्यास

योग सम्बन्धी शास्त्र कहते हैं कि मन के निग्रह के लिए साधक को यम (सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह- संग्रह का अभाव, अस्तेय- चोरी या छिपाने के भाव का मन में न होना ) और नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय , ईश्वर प्रणिधान) का अभ्यास करना चाहिए। 

यह स्पष्ट है कि जो अभी अपने मन का स्वामी नहीं बना है, वह उपर्युक्त सभी में और नियमों का पालन नहीं कर सकता। तथापि इन साधनाओं के अभ्यास पर बल देने का भाव यह है कि साधक के समक्ष आदर्श हमेशा जगमगाता रहे, जिससे पुरुषकार के द्वारा उसका आत्म- बल बढता रहे। महान् योगाचार्य पतंजलि कहते हैं :

मन की क्षोभहीन शान्ति निम्न गुणों के अभ्यास से प्राप्त होती है: 

1.जो सुखी हैं उनके साथ मित्रता।

2.जो दुखी हैं उनके प्रति करुणा। 

3.शुभ में हर्ष, 4.अशुभ के प्रति उपेक्षा। 

यह सूत्र व्याख्या की अपेक्षा रखता है। दूसरों के सुख में स्वयं के सुख का अनुभव करने की वृत्ति एक अनुकूल मानसिक वातावरण का निर्माण करती है जिसमें ईर्ष्या आदि के समान असद्वृत्तियां नहीं रह सकतीं। हृदय की सिकुड़न एक विशेष तरह की अन्दरुनी अशान्ति को जन्म देती है जिसे हृदय के विस्तार के द्वारा ही दूर किया जा सकता है। दुःखी के प्रति करुणा का भाव हृदय के विस्तार का एक तरीका है। सक्रिय सहानुभूति का तात्पर्य होगा पीड़ितों की सेवा। समुचित दृष्टिकोण से की गई सेवा हृदय की शुद्धि करती है, हृदय का विकास करती है, पूर्ण के साथ तादात्म्य की भावना को तीव्र बनाती है। हमें अपने ही बनाये गए तंग दायरे से उत्पन्न होनेवाली कुंठा से मुक्त करती है और परिणामवश आध्यात्मिक आनन्द की अनुभूति होती है। 

यदि हम अपने को दुःखी अनुभव करें तो हमारे चारों ओर हमसे भी अधिक दुःखी लोगों का अभाव न होगा। अतएव दूसरों के लिए हम कुछ करें। यदि हम और कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम उन लोगों के प्रति मित्रता का भाव ही पोषित करें और संसार के कल्याण के लिए आकुल होकर प्रार्थना करें। यह भी हमारी मदद करेगा। 

 हमें शुभ में हर्षित होना चाहिए। जब हम शुभ में हर्ष का अनुभव करते हैं तो मनोवैज्ञानिक नियम यह है कि हम शुभत्व को अपने अन्दर ले लेते हैं तथा शुभ के अन्य गुणों को आत्मसात् करते हैं। मन की निश्चंचलता के लिए यह शुभत्व सहायक होता है।

हमसे अशुभ के प्रति उपेक्षा बरतने के लिए कहा गया। निस्सन्देह, दुष्ट जनों को भला बना देना एक बहुत अच्छा कार्य है पर यह महात्माओं और पैगंबरों का कार्य है,सामान्य व्यक्ति जो अपने ही मन के साथ संघर्ष कर रहा है यह नहीं कर सकता। जबतक हमारा अपना मन अच्छी तरह नियंत्रित नहीं है तबतक हमें प्रयत्नपूर्वक दुष्ट संगति से दूर रहना चाहिए। केवल इसी प्रकार हम मन को अशुभ की छूत से तथा अधिकाधिक संकट में पड़ने से बचा सकते हैं। यदि हम अशुभ और दुष्टों के लिए अपने भीतर अधिक करुणा का अनुभव करते हैं, तो हम उनके मंगल के लिए प्रार्थना कर सकते हैं। यह उनकी और हमारी दोनों की सहायता करेगा। 

पर ये दुष्ट जन कौन हैं? दुष्ट की जांच कौन कर सकता है? इस पर एक लम्बा विवाद हो सकता है तथापि सामान्य व्यवहार के लिए यह कहा जा सकता है कि जो लोग अनैतिक जीवन बिताते हैं, उन्हें दुष्ट माना जा सकता है। 

 एक ओर अशुभ संगति से दूर रहना मन के निग्रह के लिए जैसे निषेधात्मक ढंग से सहायक है, वैसे ही दूसरीओर सत्संग अत्यन्त विधेयात्मक ढंग से हमारी मदद करता है। सत्संग पतित-व्यक्ति की भी मानसिक अपवित्रता को दूर कर देता है। सन्त- महात्मा और शास्त्र यही कहते हैं। श्रीकृष्ण श्रीमद्भागवत में उपदेश प्रदान करते हुए कहते हैं : 

सज्जनों का साथ समस्त आसक्ति को जड़ से काट देता है। मनोनिग्रह में हमारी आसक्तियां ही हमारी ज़बरदस्त बाधक हैं। जब आसक्तियां दूर होती हैं, तब द्वेष और भ्रम भी हमें सहज में छोड़कर चले जाते हैं। हम विवेक को प्राप्त करते हैं और हमारी सोचने समझने की बुद्धि स्पष्ट हो जाती है। सत्संग के फलस्वरूप हमारे भीतर अनजाने में ही यह परिवर्तन होते रहते हैं जिससे मनोनिग्रह सम्भव हो जाता है। 

15. विवेक का अभ्यास सहायक होता है

कुछ अवस्थाओं में हम कुछ बातें जानबूझकर करते हैं 

यह जानते हुए कि यही करना ठीक है , पर कुछ दूसरी अवस्थाएँ भी होती हैं जब हम उचित या अनुचित को बिना जाने आवेगपूर्वक कार्य करते हैं। पर इनमें से प्रत्येक दशा में हर कार्य अपना मधुर या कडवा फल प्रदान करता है। गलत कार्य का, अन्य कष्टों के अतिरिक्त, एक फल यह भी होता है कि मन अत्यन्त विक्षुब्ध हो जाता है। उचित और अनुचित सम्बंधी हमारा अज्ञान हमारी रक्षा नहीं कर सकता। 

अतएव मनोनिग्रह के लिए एक अनिवार्य बात यह जान लेनी चाहिए कि हम उचित और अनुचित में, शुभ और अशुभ में, नित्य और अनित्य में विवेक कैसे करें। जब विवेक करना हमारी आदत बन जाती है तब हम स्वयं से पूछने लगते हैं – इससे क्या अच्छा होने का है? यदि हमने इस बात की आदत बना ली कि हम वही करें जिसे हमारा विवेक अच्छा बतलाता है तो उपर्युक्त अभ्यास गलत, आवेगपूर्ण और मूर्खता से भरी क्रियाओं के फल से उपजने वाली मानसिक अशांति से हमारी रक्षा करेगा। विवेक का अभ्यास आत्मनिरीक्षण के साथ साथ ही चल सकता है। यह आत्मविकास में सहायक होता है। 

विवेक के अभ्यास का एक दूसरा भी आयाम है, जो मनोनिग्रह को मौलिक रूप में सहायता प्रदान करता है। मनोनिग्रह की समस्या का सार सनक- सनन्दन आदि प्राचीन ऋषियों के द्वारा ब्रह्मा के समक्ष एक प्रश्न के रूप में रखा गया था :

भगवन्! चित्त , गुणों अर्थात् विषयों में घुसा ही रहता है और गुण भी चित्त की एक-एक वृत्ति में प्रविष्ट रहते ही हैं। अर्थात् चित्त और गुण आपस में मिले- जुले ही रहते हैं। ऐसी स्थिति में जो पुरुष इस संसार-सागर से पार होकर मुक्तिपद प्राप्त करना चाहता है, वह इन दोनों को एक दूसरे से अलग कैसे कर सकता है ? 

मूल समस्या तो आज भी वही की वही है। जबतक विश्व का ढांचा ऐसा ही रहेगा तबतक समस्या भी वैसी ही बनी रहेगी। श्रीकृष्ण ने इस महत्वपूर्ण प्रश्न का जो प्रामाणिक उत्तर दिया है, उसका सार यों है :

यदि जो मन इन्द्रिय-विषयों के साथ कर्ता और भोक्ता के रूप में जुड़ा है और जिसे बुद्धि, अहंकार, आदि अनेक नामों से पुकारते हैं, जीव की सत्ता होती, तो जीव और इन्द्रिय-विषयों के परस्पर सम्बन्ध का भले ही नाश नहीं हो सकता था किन्तु जीव तो ब्रह्म से शाश्वत रूप से तद्रूप है और उसका इन्द्रिय-विषयों के साथ आपात्- सम्बन्ध उस पर मन के अध्यास के कारण है। अतएवज्ञ अपने को ब्रह्म से एक जानकर और इन्द्रिय – विषयों की अनित्यता का विचार करते हुए साधक को उनसे दूर हट जाना चाहिए और भगवान की उपासना करनी चाहिए जिससे वह अपने यथार्थ अनन्त आत्मस्वरूप में अवस्थित हो सके।

जय गुरुदेव 

 कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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आज इसे अवश्य पढ़ें : एक एक पग उठाते बन रही  है 24 आहुति संकल्प सेना। 

प्रतिदिन 24 आहुति संकल्प सूची शेयर करते समय हमें ऑनलाइन ज्ञानरथ के सहकर्मियों का समर्पण देखने को मिलता है। कमैंट्स की लम्बाई और उनके  पीछे छिपी भावना पर हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं।  इन कमैंट्स को केवल कमैंट्स ही न समझा जाये – व्यक्ति निर्माण हेतु यह एक बहुत ही विशाल आध्यात्मिक योजना है। ऑनलाइन ज्ञानरथ की यह महायज्ञशाला युगतीर्थ  शांतिकुंज के समाधि  स्थल के सामने वाली यज्ञशाला है।  यज्ञ करते हुए साधक सम्पूर्ण भावना से ओतप्रोत आहुतियां दिए जा रहे हैं, यज्ञ की दिव्य धूनी से प्रभावित होकर कुछ साधक रेलिंग के बाहिर ही खड़े होकर देखते रहते हैं, उनका अन्तःकरण यज्ञ के मंत्रो उच्चारण से मुग्ध होता है , आपस में विचार-विमर्श करते हैं , धीरे -धीरे अंदर आकर अपने सहकर्मियों के साथ यज्ञस्थली में बैठने का प्रयास करते हैं , आहुतियां देते हैं ,मन्त्र उच्चारण करते हैं ,फिर एक दिन ऐसा आता है जब वह यज्ञशाला में बैठी टोली के महत्वपूर्ण सदस्य बन जाते हैं और  कर्मकांड में दक्षता प्राप्त कर लेते है, यज्ञशाला के  संचालन में अपना योगदान देने में अत्यंत हर्ष और मानसिक तृप्ति अनुभव  करते हैं – बिलकुल यही है 24 आहुति संकल्प की भावना। भिन्न भिन्न  टोलियों की निस्वार्थ  भागीदारी -सहकारिता -सहभागिता सामूहिक प्रयास का एक अद्भुत मॉडल है। सभी को हमारा व्यक्तिगत नमन। तो प्रस्तुत है आज की सूची। 

(1)डॉ अरुण त्रिखा 27, (2)आद अरुण कुमार वर्मा 30 ,(3)बिटिया प्रेरणा कुमारी 24 ,(4)राधा त्रिखा बहिन जी 24,(5)आद रजत कुमार 24 ,(6)संध्या कुमार बहिन जी 27,(7) रेनू श्रीवास्तव बहिन जी 28 ,(8)आद सरविन्द कुमार 24

सभी को हमारी शुभकामना एवं धन्यवाद् 


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