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आदरणीय संध्या कुमार बहिन  जी की ऑनलाइन ज्ञानरथ के प्रति अनुभूति 

1 दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – आदरणीय संध्या कुमार बहिन  जी की ऑनलाइन ज्ञानरथ के प्रति अनुभूति 

आज का ज्ञानप्रसाद आदरणीय बहिन संध्या कुमार जी द्वारा  प्रस्तुत स्वाध्याय -सत्संग की कड़ी का अंतिम भाग है।  आदरणीय शरद पारधी जी, वाईस चांसलर देव संस्कृति  विश्वविद्यालय के संक्षिप्त मार्गदर्शन से आरम्भ होकर संध्या कुमार जी की ऑनलाइन ज्ञानरथ की अनुभूति से यह  ज्ञानप्रसाद समाप्त होता है।  

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शरद पारधी जी द्वारा प्रज्ञा  मंडल का मार्गदर्शन   

युगतीर्थ शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता  एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के वाईस चांसलर आदरणीय श्री शरद पारधी  जी  भी स्वाध्याय और सत्संग का सरलतम उपाय बताते हुए कहते हैं:

“हम सत्संग हेतु किसी दिव्यजन के प्रत्यक्ष दर्शन के लिए कहीं जाएँ य  किसी सदसाहित्य के अध्ययन के लिए एकांत कोना खोजें, हम दो-चार लोग मिलकर किसी  घर में भी   एकत्रित हो जायें और गुरुदेव के किसी विचार या कथन पर चर्चा करें। गुरुदेव के हर कथन में गहरा ज्ञान छिपा हुआ है। हम देखेंगे कि किसी-किसी कथन पर हमारा अन्य साथी बहुत गहरी समझ रखता है। ऐसी गहरी समझ जिसे हम तो  समझ ही नही पाये थे। ऐसी विचारधारा हमारे साथी हमारे लिए भी  महसूस कर सकते हैं। हमारी समझ अन्य से विशिष्ट भी हो सकती है। इस प्रकार हम सब एक-दूसरे की समझ का लाभ उठा सकते हैं।” 

गुरुदेव के विचारों  को भली भांति समझ कर अन्तःकरण में उतारना ही एक  सकारात्मक कदम है। जब कोई विचार अंतःकरण  में उतर जाता है तो वह  मात्र  विचार नही रह जाता है – वह आचार- व्यवहार  में भी आ जाता है। ऐसा करने से  “व्यक्ति निर्माण” के सिद्धांत को बल मिलता है। समाज व्यक्तियों से ही तो बनता है,अगर समाज के  सभी सदस्यों  का आचार -व्यवहार उच्चकोटि का होगा तभी तो  युग निर्माण सम्भव होगा। हम सभी को इस दिशा में  कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। 

गुरुदेव की  जीवन लीला  से बारम्बार ज्ञात होता है कि “स्वाध्याय और सत्संग” में कितनी शक्ति है।  जब दादा गुरु ने उन्हें निर्देश दिए  तो गुरुदेव  बोल उठे:  

“हम तो पाँचवी पास हैं, हम इतने बड़े कार्य कैसे  कर पायेंगें”

सब जानते हैं कि परम पूज्य गुरुदेव ने ऐसे-ऐसे कार्य  कर दिखाये जो कई शिक्षितों की समझ से भी  परे  हैं। वैसे तो परमपूज्य गुरुदेव एक दिव्य सत्ता है लेकिन उन्होंने  जो कुछ कर दिखाया  उसमें “स्वध्याय और सत्संग” की बहुत बड़ी शक्ति है -एक ऐसी शक्ति जो  शिक्षा से  नहीं स्वाध्याय और सत्संग से ही प्राप्त होती है।  

परमपूज्य गुरुदेव की दिव्य शक्ति एवं अथक साधना,दादा गुरु का निर्देश, एवं स्वाध्याय की शक्ति का  ही परिणाम है कि युगतीर्थ शांतिकुंज के लिए भूमि चयन के समय बहुतों ने कहा था- यह भूमि उपयुक्त नहीं है, यहाँ तो दलदल ही दलदल है। गुरुदेव अपने निर्णय पर अडिग रहे और परिणाम हम सबके समक्ष है। इस विषय का निर्णय हम अपने अति विवेकशील  पाठकों पर छोड़ना चाहेंगें कि  भूमि चयन स्वाध्याय-सत्संग य गुरु-निर्देश पर आधारित था।  हमारे विचार में यह दादा गुरु जैसी दिव्य सत्ता का ही निर्देश था ,उन्ही का चयन था। हम यह भी कह सकते हैं कि स्वाध्याय और सत्संग के द्वारा परमपूज्य गुरुदेव की जागृत आत्मा का परमात्मा के साथ साक्षात्कार होना संभव हो सकता है। 

“स्वाध्याय और सत्संग” का ज्वलंत उदाहरण ऑनलाइन  ज्ञानरथ:

“स्वाध्याय और सत्संग” का ज्वलंत उदाहरण अपने ऑनलाइन  ज्ञानरथ  की कार्यशैली में  परिलक्षित होता  है। आदरणीय डॉक्टर अरुण त्रिखा जी द्वारा संचालित ऑनलाइन ज्ञानरथ स्वाध्याय और सत्संग का अतुलनीय मंच है। इस मंच के द्वारा  परमपूज्य  गुरुदेव  के साहित्य और  विचारों को अलग -अलग माध्यमों से विश्व के कोने -कोने में  पहुँचाने का महान कार्य किया जा रहा है।ऑनलाइन ज्ञानरथ के कृत्यों  को देख कर ऐसा प्रतीत  होता है   कि   परम पूज्य गुरुदेव स्वयं इसके  संचालन का निर्देश दे रहे हैं । 

प्रतिदिन सुबह सूर्य भगवान  की पहली किरण के साथ  एक ज्ञान वर्धक उच्चस्तरीय लेख अपने परिवारजनों के सुखद दिन की कामना करता   है। इस दैनिक  ज्ञानप्रसाद को ग्रहण करने से  ज्ञानप्राप्ति तो  होती  ही है, साथं ही अंतःकरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार  प्रारम्भ हो जाता है। उसी प्रकार रात्रि में  उच्च कोटी का शुभरात्रि संदेश सुखद रात्रि और निद्रा की कामना करता है। अतः ज्ञान रथ के माध्यम जागना एवं सोना अति उत्तम संदेशों के साथ होता है।

दैनिक ज्ञानप्रसाद परिवारजनों के  मन मस्तिष्क पर सारा दिन  छाया रहता है  जो कमेंट  और काउंटर कमेंट के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रकट करते रहते हैं । प्रत्येक परिवारजन का प्रयास रहता है कि अच्छे से अच्छा कमेंट किया जाए और इससे भी बढ़ कर प्रत्येक कमेंट का सम्मान करते हुए उसका रिप्लाई करना धर्म और कर्तव्य समझा जाता है।

इस प्रकार ऑनलाइन ज्ञानरथ “स्वाध्याय और सत्संग” का वास्तविक रूप ही है। कई बार किसी दिव्यजन का सन्देश इतना उच्चस्तर का होता है कि सारा दिन उस पर चिंतन-मनन-विश्लेषण करते हुए असीम ज्ञान और आनंद की प्राप्ति होती है।  

ऑनलाइन ज्ञानरथ के सम्बन्ध में मैं ( संध्या कुमार )अपना अनुभव साँझा करते हुए कहना चाहती हूँ कि बिना किसी विज्ञापन के  परिजन स्वेच्छा से इस प्लेटफॉर्म में  शामिल हुए जा रहे हैं। मुझे इस प्लेटफॉर्म का बिल्कुल ज्ञान नहीं था जब एक दिन परम पूज्य  गुरुदेव के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई  तो  यूट्यूब सर्च में अनायास ही ऑनलाइन  ज्ञानरथ के किसी  लेख के  स्वाध्याय  का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस उच्चकोटि के  लेख  ने इतना प्रभावित किया कि पोस्ट हुए कमेंट देखने शुरू कर दिए। मैंने भी कुछ कमेंटस  को रिप्लाई  कर दिया। परिजनों  से प्राप्त हुए replies में व्यक्त  अपनापन ने  एक अजीब सी छाप छोड़ दी। बस उस दिन से लेखों का स्वाध्याय, कमेंट- काउंटर कमेंट का सिलसिला अनवरत चल रहा  है अब तो स्थिति ऐसी है कि दैनिक ज्ञानप्रसाद से नींद खुलना और शुभरात्रि सन्देश से निद्रा को गोद  में जाना एक रूटीन सा बन चुका है। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ से सम्पर्क में आने से  पूर्व भी दिन के  घंटे चौबिस  ही होते थे  किन्तु अब इन घंटों का प्रयोग बिल्कुल  अलग प्रकार का  है। परम पूज्य गुरुदेव  के दिव्य विचारों का स्वाध्याय,उन विचारों का  चिंतन-मनन और कमैंट्स के रूप में प्रतिक्रिया, साझेदारी, अपनत्व और सहकारिता की भावना से समय का सदुपयोग होना एक परम सौभाग्य जैसा ही लगता है जिसे गुरुदेव का अनुदान ही समझा जा सकता है। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ में पोस्ट हुए  कमेंटस -काउंटर कमेंटस द्वारा देखा जा सकता है कि  परिजन बहुत उच्चकोटि  की सोच  रखते हैं। 

ऐसा कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ऑनलाइन  ज्ञानरथ से  हमें घर बैठे ही “सुसंगति” का माध्यम प्राप्त हो गया है। अक्सर कहा भी जाता है:

“सुसंगत से गुण आत है,कुसंगत से गुण जात” और सुसंगत तरिओ, कुसंगत डूब मरियों”

पिछले कई दिनों  से हम  मनोनिग्रह और  स्वाध्याय-सत्संग विषय पर  चर्चा कर रहे हैं। इस चर्चा से  हम जानने को समर्थ हुए हैं कि स्वाध्याय से  मन मस्तिष्क के विकारों  का नाश होता है। इसके लिए बहुत ही सटीक उदाहरण दिया जाता रहा है – गुड़ बनाने की प्रक्रिया में गन्ने के उबलते रस में  दूध की कुछ बूँदें डाल देने से  मैल साफ हो जाता है। 

परम पूज्य गुरुदेव सत संकल्प पाठ में लिखते है:

“सभी परिजन कुविचारों के दुष्प्रभाव से बचने के लिये स्वाध्याय और सत्संकल्प की व्यवस्था बनायें रखें। सत्संग  का तो अर्थ ही होता है -सत्य का संग।  सत्य से आत्मा का परिष्कार होता है,जिससे मनोनिग्रह यानि मन का कण्ट्रोल  संभव  होता है। मनोनिग्रह  होने से परमात्मा से साक्षात्कार संभव होता है जिससे  इष्ट की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।”

यह सर्व मान्य सत्य है कि मनुष्य के जीवन में  स्वाध्याय और सत्संग दोनों ही  महत्व पूर्ण स्थान रखते हैं। ऑनलाइन ज्ञानरथ ने हमारे लिए यह व्यवस्था  बना दी है, हमारा  यह परम  कर्तव्य बनता है कि हम इसकी  सफलता में अपना सम्पूर्ण योगदान तो दें है साथ में औरों को भी इस प्लेटफॉर्म के बारे में बताते हुए प्रेरित करें। 

 “गुरुसत्ता” की कृपा सदैव बरसती रहे। जय गुरुदेव

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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24  आहुति संकल्प सूची:

आनलाइन ज्ञान रथ परिवार नवरत्नों की खान है  जिसका प्रमाण 9 देवतुल्यसहकर्मी  हैं जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ के भाव रूपी महायज्ञ में अपने विचारों की हवन सामग्री से कमेन्ट्स रूपी आहुति डाल कर 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर परम पूज्य गुरुदेव के श्री चरणों में समर्पित किया जो कि बहुत ही सराहनीय व प्रशंसनीय कार्य है l यह साजकर्मी हैं: (1) प्रेरणा कुमारी बेटी – 29, (2) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 28, (3) सुमन लता बहन जी – 28, (4) डा.अरुन त्रिखा जी – 26, (5) अरूण कुमार वर्मा जी – 26, (6) रजत कुमार जी – 26, (7) संध्या बहन जी – 24, (8) उमा सिंह बहन जी – 24, (9) सरविन्द कुमार पाल – 24 

उक्त सभी नवरत्नों से ओतप्रोत सम्मानित सहकर्मियों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत-बहुत साधुवाद,  हार्दिक शुभकामना एवं  बधाई हो। जगत् जननी माँ गायत्री सदैव अपनी अनुकम्पा  बरसाती  रहे. यही गुरु सत्ता से विनम्र प्रार्थना है l धन्यवाद।   जय गुरुदेव


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