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अध्याय 11-मन की बनावट को बदलना -भाग 1 

25 नवंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद -मन की बनावट को बदलना -भाग 1 

आज का ज्ञानप्रसाद स्वामी आत्मानंद जी द्वारा  लिखित पुस्तक “मन और उसका निग्रह” के  अध्याय 11 का प्रथम भाग है।  अध्याय बड़ा होने के कारण दूसरा भाग कल वाले ज्ञानप्रसाद में शामिल किया जायेगा। मनोनिग्रह की यह अद्भुत श्रृंखला आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के स्वाध्याय पर आधारित  प्रस्तुति है।ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  रामकृष्ण मिशन के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी के आभारी हैं जिन्होंने  यह अध्भुत  ज्ञान उपलब्ध कराया। इन लेखों के सम्पूर्ण श्रेय इन महान आत्माओं को जाता है -हम तो केवल माध्यम ही हैं। 

तो प्रस्तुत है अध्याय 11 -मन की बनावट को बदलना – का प्रथम भाग   

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मन को पौष्टिक आहार देकर तथा उसकी बनावट  को ऐसा बदलकर  कि  जिससे शेष  दो गुणों पर सत्वगुण  की प्रधानता हो जाय,  मन की  अशुद्धियों को धीरे – धीरे दूर किया जा सकता है। अंत में भले यह सत्य है कि सत्वगुण को भी लांघ  जाना पड़ता है  तथापि पहले तो उसकी प्रधानता लानी पड़ती है l

हम कह चुके हैं किउपनिषद् के अनुसार  मन अन्नमय है। इस उपदेश का विस्तार करते हुए उपनिषद कहता है:  

खाया  हुआ अन्न तीन प्रकार का हो जाता है। उसका जो अत्यंत स्थूल भाग होता है, वह मल हो जाता है। जो मध्यम भाग है वह मांस हो जाता है और जो  अत्यन्त सूक्ष्म होता है वह मन हो जाता है। 

मथे जाते हुए दही का जो सूक्ष्म भाग होता है वह ऊपर इकट्ठा हो जाता है , वह घृत होता है। उसी प्रकार  हे  सौम्य ! खाये हुए अन्न का  जो  सूक्ष्म अंश होता है वह सम्यक् प्रकार से ऊपर आ जाता है, वह मन होता है। चूंकि मन अन्नमय है इसलिए स्वाभाविक ही  उपदेश आगे बढता है:

आहारशुद्धौ सत्वशुद्धि : सत्वशुद्धौ ध्रुवौ स्मृति:आहार की शुद्धि होने पर अन्त: करण की शुद्धि होती है। अन्त:करण की शुद्धि होने पर निश्चल स्मृति होती है (ऐसी निश्चल ) स्मृति के प्राप्त होने पर सम्पूर्ण ग्रन्थियों की निवृत्ति हो जाती है।

शंकराचार्य के भाष्य के अनुसार यहाँ पर “आहार” शब्द  का  तात्पर्य वह सब है जिसे इन्द्रियाँ ग्रहण करतीं हैं। उदाहरणार्थ, शब्द, रूप, गन्ध, आदि तथा “अन्त:करण की शुद्धि”  का अर्थ है कि वह उन राग- द्वेष और मोह आदि से मुक्त हो जाता है जो मन में क्षोभ उत्पन्न कर उसे दुर्निग्रह  बना देते हैं। अत: मनोनिग्रह के मूलभूत उपायों में से एक यह है कि ऐसे “आहार” से दूर रहा जाय जो आसक्ति , द्वेष और मोह उत्पन्न करता हो। 

पर प्रश्न यह है कि कौन सा आहार आसक्ति द्वेष और मोह उत्पन्न करता है इसे कैसे जानें ? मोटे तौर पर गीता के अनुसार राजसिक  और  तामसिक आहार आसक्ति, द्वेष , और मोह  को जन्म देता है।  सात्विक आहार मनुष्य की आसक्ति, द्वेष और मोह को  कम को कम करने में सहायक होता है। पोषण के लिए साधारणतया जो कुछ मुंह से ग्रहण किया जाता है केवल उसका ही मन पर प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि अन्य पेयों का भी  मन पर विशेष असर पड़ता है। शराब और नशीली दवाइयाँ भी तो मुंह से ही ली जाती हैं और उनका मन पर प्रभाव प्रत्यक्ष है।  मिसरी का शरबत  और मदिरा पीने से मन पर कैसा अलग-अलग असर पड़ता है  यह तो सहज ही देखा जा सकता है।  मन पर नशीली दवाइयों का प्रभाव भी अच्छी तरह विदित ही है।  फिर यह भी देखा गया है कि हम आंखों से जो कुछ देखते हैं, कानों से जो कुछ सुनते हैं और  जो कुछ स्पर्श करते हैं , उस सबका मन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। कोई सिनेमा या कोई भाषण हमारे मन में कई प्रकार की विचार-लहरियों को उठा दे सकता है, जिससे मन का निग्रह या तो सरल हो जाता है या फिर कठिन।    

अतएव, मनोनिग्रह के अनुकूल वातावरण तैयार करने में भोजन-पान का विचारपूर्वक ग्रहण कुछ दूर तक सहायक होता है। इसी, प्रकार अन्य इन्द्रियों के माध्यम से हम जो कुछ ग्रहण करते हैं यह भी समानरूप से महत्वपूर्ण है। जो लोग मन को वश में करना चाहते है , उनके लिए राजसिक और तामसिक आहार के बदले सात्विक आहार का चयन लाभदायक होगा।  जहाँ तक मुंह से ग्रहण किये जानेवाले आहार का प्रश्न है, गीता इस सम्बन्ध में सर्वोत्तम प्रकाश डालती है :

आयु , सत्व , बल  आरोग्य , सुख  और रुचि  को बढाने वाले, रसयुक्त,चिकने, पौष्टिक  और  स्वभाव से ही  मन  को  प्रिय  लगने वाले खाद्यपदार्थ सात्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।  

कड़वा, खट्टे  लवणयुक्त , अतिगरम  और  तीखे ,  रुखे और दाहकारक , तथा  दु: ख , चिन्ता और रोगों को उत्पन्न करने वाले भोज्यपदार्थ  राजसिक मनुष्य  को प्रिय होते हैं। 

जो भोजन रस रहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी, उच्चिष्ट और  अपवित्र है, वह तामसिक पुरुष को प्रिय होता है। सात्विक, राजसिक और तामसिक मनुष्यों  को  जो पदार्थ प्रिय होते हैं, वे ही क्रमशः  मन की सात्विक, राजसिक और तामसिक  वृत्तियों  के लिए भी  उत्तरदायी  होते हैं।     

मानवी स्वभाव सत्व, रजत और तम  इन तीनों गुणों के विभिन्न मात्राओं के  मेल से  बनता है।  अत:  इनमें से किसी  एक गुण  का शेष दो गुणों पर  वर्चस्व मनुष्य के स्वभाव का  निर्णय करता है। जिस मनुष्य के स्वभाव में रज या तम का आधिक्य है वह चाहते हुए भी उस व्यक्ति के समान वर्तन नहीं कर सकता जिसके स्वभाव में सत्व की प्रधानता है।  तभी तो मानो भगवान कृष्ण नैराश्य के स्वर में गीता में बोल उठते हैं: एक ज्ञानवान व्यक्ति भी अपने स्वभाव के अनुसार ही चेष्टा करता है ; सभी प्राणी अपने -अपने स्वभाव के वश  में  हो कर्म  करते हैं,  इसमें किसी  का निग्रह भला क्या  करेगा?

अगर  यही  सत्य हो कि निग्रह से कुछ नहीं  हो  सकता, अगर  मनुष्य का  स्वभाव पहले से ही  निश्चित  हो  और उसे यदि बदला न  जा  सके, तो फिर मनोनिग्रह पर विचार करने  का कोई अर्थ  नहीं। अतएव, श्री भगवान के कथन का तात्पर्य  ऐसा लगता है: मन को नियंत्रण में लाने के लिए  मनुष्य  को  अपना  शारीरिक और  मानसिक  स्वभाव बदलना ही पड़ेगा। जबतक हमारे मन  की बनावट  में  रज और तम  की  प्रधानता है, तबतक हम चाहे  जितनी कोशिश कर लें,  मन को वश  में नहीं ला  सकते। इसका  कारण समझ लेना चाहिए। वेदान्त  के  अनुसार:  

रजोगुण में विक्षेपशक्ति होती है जो क्रियात्मिका है. इसी से संसार की आदिम प्रवृत्ति निकली है. मन के जो राग आदि विकार हैं, वे तथा दु:ख आदि इसी से उत्पन्न होते रहते हैं। 

काम, क्रोध, लोभ , दम्भ, द्वेष, अहंकार, ईर्ष्या और मात्सर्य आदि ये सब रजोगुण के धर्म हैं , इन्हीं से मनुष्य की  सांसारिक प्रवृत्ति उत्पन्न हुई है। अतएव  रजोगुण बन्थन का कारण है।  

तमोगुण में  आवरणशक्ति होती है जिसके कारण  वस्तुएँ अपने स्वरूप से अन्यथा दिखायी देती हैं। यही  मनुष्य के  बारम्बार आवागमन का कारण है और विक्षेपशक्ति को यही  क्रियमाण करती है। 

जिस मनुष्य का आवरणशक्ति के साथ  तनिक सा भी सम्बन्ध है, सम्यक विचार का अभाव या उल्टा विचार सुनिश्चित विश्वास का अभाव और संशय उसका साथ कभी नहीं छोड़ते और तब विक्षेपशक्ति  अनवरत कष्ट देती है। 

रजोगुण की विक्षेपशक्ति  और तमोगुण की आवरणशक्ति  मन में ही  निहित है। उनकी प्रधानता होने से मनोनिग्रह कठिन हो जाता है। तथापि मन का एक घटक और है जिसके कारण हताशा पर रोक लगती है।  यह घटक है सत्वगुण, जो मिश्रित या शुद्ध अवस्था में मिलता है।  इस संदर्भ में वेदान्त की शिक्षा है:

शुद्ध सत्व  निर्मल जल के समान है परन्तु रज और तम से उनका संयोग होने पर वह संसार का कारण बनता है। आत्मतत्व सत्व में प्रतिबिम्बित होता है और सूर्य के समान  समग्र जड संसार को प्रकाशित कर देता है , मिश्रित सत्व के धर्म ये हैं— अभिमान का नितान्त अभाव आदि, तथा यम और नियम आदि, एवं श्रद्धा, भक्ति, मुमुक्षा, दैवी-सम्पत्ति और असत् से निवृत्ति।       

मन: प्रसाद, स्वात्मानुभूति, परमशान्ति, तृप्त, आनन्द और परमात्मनिष्ठा- ये विशुद्ध सत्व के धर्म हैं जिनके द्वारा साधक  सदानन्द -रस  का अधिकारी होता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारे  अपने ही स्वभाव में मनोनिग्रह की जबरदस्त  बाधाएँ और सबल  सहायक शक्ति दोनों विद्यमान हैं। इस तथ्य को जान लेना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। 

अतएव आवश्यकता है एक समग्र युद्धनीति की जिससे विपरीत शक्तियां पराजित हो जांय एवं  सहायक शक्तियों को कार्य करने की पूरी छूट मिले। यह आंखों को बंद  करके घूंसे उछालने से नहीं सधेगा बल्कि भीतरी शक्तियों के कुशलता पूर्वक नियमन से  सम्भव होगा।

मन:संयम के संदर्भ में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हम  गुणों के तोल  को अपने स्वभाव में इस प्रकार परिवर्तित कर सकते हैं जिससे सत्व की प्रधानता हो जाय ?  स्वाभाविक ही इस समस्या पर दिए गये उपदेश हमारे लिए बड़े सहायक होंगे।

24 आहुति संकल्प सूची : 

24  नवम्बर के ज्ञानप्रसाद का स्वाध्याय करने के उपरांत  24 आहुति  संकल्प के विजेता निम्नलिखित 10 समर्पित सहकर्मी हैं :1.अरुण त्रिखा जी  (29), 2.अरुण कुमार वर्मा जी (30), 3.रजत कुमार सारंगी जी (27),4.राधा त्रिखा बहिन  जी (25),5.संध्या कुमार बहिन जी (35 ),6.बिटिया प्रेरणा कुमारी (35 ),7.सरविन्द कुमार जी (47 ),8.पिंकी पाल बिटिया (28),9.रेनू श्रीवास्त्व बहिन जी (25 ),10.साधना सिंह बहिन जी (26) उक्त सभी सूझवान व समर्पित सहकर्मियों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से  साधुवाद व हार्दिक बधाई हो। जगत् जननी माँ  गायत्री माता दी की असीम अनुकम्पा इन सभी पर सदैव बरसती रहे यही आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरु सत्ता से विनम्र प्रार्थना व  कामना है।  धन्यवाद।  

स्कोर सूची का इतिहास :

जो सहकर्मी हमारे साथ लम्बे समय से जुड़े हुए हैं वह जानते हैं कि हमने कुछ समय पूर्व काउंटर कमेंट का  सुझाव दिया था जिसका पहला उद्देश्य  था कि जो कोई भी कमेंट करता है हम उसके  आदर-सम्मान हेतु  रिप्लाई अवश्य  करेंगें। अर्थात जो हमारे लिए अपना   मूल्यवान समय निकाल रहा है हमारा कर्तव्य बनता है कि उसकी भावना का सम्मान किया जाये।  कमेंट चाहे छोटा हो य विस्तृत ,हमारे लिए अत्यंत ही सम्मानजनक है। दूसरा उद्देश्य था एक परिवार की भावना को जागृत करना।  जब एक दूसरे के कमेंट देखे जायेंगें ,पढ़े जायेंगें ,काउंटर कमेंट किये जायेंगें ,ज्ञान की वृद्धि होगी ,नए सम्पर्क बनेगें , नई प्रतिभाएं उभर कर आगे आएँगी , सुप्त प्रतिभाओं को जागृत करने  के अवसर प्राप्त होंगें,परिवार की वृद्धि होगी और ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार का दायरा और भी  विस्तृत होगा। ऐसा करने से और  अधिक युग शिल्पियों की सेना का विस्तार होगा। हमारे सहकर्मी  जानते हैं कि हमें  किन -किन सुप्त प्रतिभाओं का सौभाग्य  प्राप्त हुआ है, किन-किन महान व्यक्तियों से हमारा संपर्क  संभव हो पाया है।  अगर हमारे सहकर्मी चाहते हैं तो कभी किसी लेख में मस्तीचक हॉस्पिटल से- जयपुर सेंट्रल जेल-मसूरी इंटरनेशनल स्कूल तक के विवरण  compile कर सकते हैं। 

इन्ही काउंटर कमैंट्स के चलते आज सिलसिला इतना विस्तृत हो चुका  है कि  ऑनलाइन ज्ञानरथ को एक महायज्ञशाला की परिभाषा दी गयी है। इस महायज्ञशाला में  विचाररूपी हवन सामग्री से कमैंट्स की आहुतियां दी जा रही हैं।  केवल कुछ दिन पूर्व ही कम से कम 24 आहुतियों  (कमैंट्स ) का संकल्प प्रस्तुत किया गया।  इसका विस्तार स्कोरसूची के रूप में आपके समक्ष होता  है। जय गुरुदेव   

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