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अध्याय 9-भीतरी अनुशासन की दो  श्रेणियाँ, अध्याय -10 मन जितना शुद्ध होगा, उसका निग्रह उतना ही सरल होगा   

24 नवम्वर 2021 का ज्ञानप्रसाद – भीतरी अनुशासन की दो  श्रेणियाँ 

आज का ज्ञानप्रसाद स्वामी आत्मानंद जी द्वारा  लिखित पुस्तक “मन और उसका निग्रह” के  स्वाध्याय के उपरांत आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा  जी की  प्रस्तुति है। आज की  प्रस्तुति में अध्याय 9 और 10 शामिल हैं जो केवल 750 शब्दों के हैं । लेख छोटा होने के कारण हमने निष्काम कर्म दर्शाती  नोबेल पुरस्कार विजेता फ्लेमिंग की कहानी शामिल  की है। हमारे बहुत ही समर्पित सहकर्मी  साधना सिंह जी ने ज़ूम मीटिंग का सुझाव दिया है, सहकर्मियों से निवेदन है कि इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करने की कृपया करें। 

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अध्याय 9 – भीतरी अनुशासन की दो  श्रेणियाँ 

मन को वश में करने के लिए हमें अपने तईं भीतरी अनुशासन की दो श्रेणियाँ तैयार करनी पड़ती हैं :

( अ ) एक श्रेणी स्थायी मूलत: उपचार के लिए है l ( ब ) दूसरी श्रेणी उच्च शक्तिसंपन्न आपातकालीन ब्रेक प्रदान करने के लिए है l   

पहली श्रेणी मन को सामान्य रूप से एक स्वस्थ दिशा प्रदान करेगीl यदि पहली श्रेणी का अभ्यास न किया जाय , तो हम दूसरी श्रेणी का तनिक भी उपयोग करने में समर्थ नहीं होंगे l इसका सरल सा कारण यह है कि दूसरी श्रेणी को जो शक्ति मिलती है, वह प्रथम श्रेणी के अनुशासन

के सम्यक् अभ्यास से प्राप्त होती है l पहली श्रेणी के अन्तर्गत कई मूलभूत अनुशासन आते हैं:

1.जीवन को रचनात्मक विचार के समुचित ढांचे में डालना चाहिएl दैनिक जीवन में एक निश्चित क्रम होना चाहिए और कुछ मूलभूत सिद्धांतों का पालन होना चाहिए, जिससे हमारा आचरण दिशाहीन होने से बचे l जिनके जीवन में नैतिक सिद्धांतों के लिए स्थान नहीं है, जिनके जीवन में क्रम का अभाव है , वे मनोनिग्रह को लगभग असम्भव ही पाएंगे l मन को वश में करने के लिए हमें अपने जीवन में एक लय लानी चाहिए l    

2.मन: संयम के लिए हमें उसकी स्वाभाविक चंचलता पर रोक लगानी चाहिएl “राजयोग” में स्वामी विवेकानन्द मन की चंचलता का वर्णन करते हुए कहते है कि: मन को संयत करना कितना कठिन है ! इसकी एक सुसंगत उपमा पागल वानर से दी गयी हैl कहीं एक वानर था ,वह स्वभावतः चंचल था, जैसे कि वानर होते हैं l लेकिन उतने से संतुष्ट न हो, एक आदमी ने उसे काफी शराब पिला दी; इससे वह और भी चंचल हो गया l इसके बाद उसे एक बिच्छू ने डंक मार दिया l तुम जानते हो किसी को बिच्छू डंक मार दे तो वह दिन भर इधर- उधर कितना तड़पता रहता है। सो उस प्रदत्त अवस्था के ऊपर बिच्छू का डंक ! इससे वह बन्दर बहुत अस्थिर हो गया l तत्पश्चात मानो उसकी दुःख  की मात्रा को पूरी करने के लिए एक दानव उस पर सवार हो गया l यह सब मिलाकर, सोचो, बन्दर कितना चंचल हो गया होगा l यह भाषा द्वारा व्यक्त करना असम्भव है l बस, मनुष्य का मन उस वानर के सदृश है l ये मन तो स्वभावत: ही सतत् चंचल है, फिर वह वासना-रूप मदिरा से मत्त है, इससे उसकी अस्थिरता बढ़ गयी है l जब वासना आकर मन पर अधिकार कर लेती है, तब सुखी लोगों को देखने पर ईर्षयारूप बिच्छू उसे डंक मारता रहता है l उसके भी ऊपर जब अहंकार रूप दानव उसके भीतर प्रवेश करता है , तब तो वह अपने आगे किसी को नहीं गिनता l ऐसी तो है हमारे मन की अवस्था ! सोचो तो इसका संयम करना कितना कठिन है।

मन की चंचलता पर रोक लगाने के लिए हमें उसके कारणों को जान लेना चाहिए l ये कारण कौन से हैं ? मन की अपवित्रतांए ही इस चंचलता के कारण हैं l    

अध्याय -10 मन जितना शुद्ध होगा, उसका निग्रह उतना ही सरल होगा   

स्वामी विवेकानन्द कहते हैं : मन जितना ही निर्मल होगा, उसे वश में करना उतना ही सरल होगा l यदि तुम उसे वश में रखना चाहो , तो मन की निर्मलता पर जोर देना होगा। मन को पूर्णतया वश में करने के लिए पूर्ण नैतिकता ही सब कुछ हैl जो पूर्ण नैतिक है, उसे कुछ करना शेष नहीं रहता, वह मुक्त है l मन का संयम उसकी पवित्रता पर निर्भर करता है, हम मन को इसलिए वश में नहीं कर पाते कि वह आज अशुद्ध है l यदि हम जीवन इस प्रकार बितायें जिससे मन और भी अशुद्ध हो जाये तथा साथ ही मनोनिग्रह के लिए भरपूर प्रयत्न भी करें, तो इससे कोई लाभ न होगा l फिर, यदि मन की शुद्धि की ओर ध्यान दिये बिना ही हम मन:संयम के लिए प्रयत्नशील हों, तो ऐसी दशा में भी हमें सफलता न मिल पायेगी l हो सकता है कि जहाँ पर प्रारम्भ से ही मन पर्याप्त शुद्ध हो, वहाँ बात दूसरी हो l हम मन को वश में लाने के लिए ऐसी साधना-प्रणाली चाहते हैं, जो उसकी अशुद्धि को भी दूर करती चले l  

मन की ये अशुद्धियाँ क्या हैं ? वे हैं :मन की वासनाएं और वृत्तियाँ जो घृणा, क्रोध, भय, ईर्ष्या, काम, लोभ , दम्भ और मोह आदि के रूप में प्रकट

होती हैं l ये रजोगुण और तमोगुण से जन्म लेती हैंl ये अशुद्धियाँ राग और द्वेष को उत्पन्न कर मन में थरथराहट पैदा करती हैं और इस प्रकार उसकी शान्ति को हर लेती हैं l इन अशुद्धियों को  दूर कैसे किया जाय ?

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नोबेल पुरस्कार विजेता एलेग्जेंडर फ्लेमिंग की प्रेरणापद कहानी 

एक दिन एक गरीब स्कॉटलैंड निवासी  किसान ने निकट के दलदल से किसी की  आवाज सुनी जो सहायता के लिए चिल्ला रहा था। उसने अपने औज़ार रखे और वह दलदल की  तरफ भागा। वहां एक लड़का दलदल मे डूब रहा  था, उसकी कमर दलदल मे घुस चुकी थी।  वह मदद के लिए चिल्ला रहा था,  किसान फ्लेमिंग  ने उसे दलदल मे डूबने से बचा लिया। अगले दिन एक सुंदर कार किसान के  घर के आगे आकर  रुकी।  सुंदर कपड़े पहने एक रईस उस गाड़ी से बाहर निकले और किसान फ्लेमिंग  को अपने से परिचित कराया कि वह उस बच्चे के पिता हैं  जिसे आपने कल दलदल मे डूबने से बचाया था।  रईस व्यक्ति किसान  से कहते हैं  कि आपने मेरे बच्चे की  जान बचाई है इसलिए मै आपको धन्यवाद कहता हूँ  और आपको कुछ देना चाहता हूँ । किसान फ्लेमिंग  ने अपने इस कार्य के लिए कुछ भी लेने से मना कर दिया  और रईस के  प्रस्ताव को ठुकरा दिया । उसी समय किसान फ्लेमिंग का बच्चा भी वहा आ जाता है। रईस व्यक्ति किसान से पूछते हैं  कि क्या ये तुम्हारा  बच्चा है।  किसान हां कहता है।  रईस व्यक्ति किसान के साथ एक डील  करते हैं  कि मै इस बच्चे को वही शिक्षा प्रदान करवाऊँगा जो मेरे बच्चे को मिलती है।  अगर इस बच्चे मे अपने पिता की  तरह कुछ भी होगा तो इसमे कोई शक नहीं कि यह एक ऐसा व्यक्ति बनेगा जिस पर हम दोनों को गर्व होगा। किसान ने यह  बात स्वीकार कर ली और उस रईस पुरुष ने ऐसा ही किया।  किसान के पुत्र ने अच्छे स्कूलों  से शिक्षा ग्रहण की  और लंदन के ST. MARY’S HOSPITAL MEDICAL SCHOOL से ग्रेजुएट हुआ। आगे चलकर इसी युवक ने  PENICILLIN का आविष्कार किया जो  पूरी दुनिया मे SIR ALEXANDER FLEMING के नाम से प्रसिद्ध हुए।  कुछ साल बाद उसी रईस व्यक्ति का बेटा,जिसकी किसान फ्लेमिंग  ने दलदल मे डूबने से जान बचाई थी, को निमोनिया  हो गया। इस बार उसकी जान Alexander Fleming द्वारा खोजे गए penicillin ने बचाई।

मित्रो, उस रईस व्यक्ति का नाम था LORD RANDOLPH CHURCHILL और उनके बेटे का नाम था प्रसिद्ध WINSTON CHURCHILL(विन्सटन चर्चिल) जो बाद मे जाकर इंग्लैंड के प्रधानमंत्री बने। 

इस कहानी से हमे यह सीख मिलती है कि जैसा  भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है: निष्काम कर्म  वह कार्य है  जिसके करने के उद्देश्य में फल की लालसा नहीं होती  लेकिन फल अवश्य ही  मिलता है। हमें हर कार्य का  फल मिलता ही है। इसलिए किसी भी काम को करते समय यह सोचना व्यर्थ है कि मुझे इससे क्या लाभ है। 

किसान फ्लेमिंग ने निस्वार्थ भाव से  बच्चे की जान बच्चाई और अपने इस कार्य के लिए उसने कुछ भी लेने से मना कर दिया।  हम जब किसी की सहायता करते हैं तो बदले मे हमारी इच्छाओं  के पूरा होने के रास्ते भी स्वयं ही बन जाते हैं।  किसान फ्लेमिंग के द्वारा किए कार्य ने उसके बच्चे की अच्छी शिक्षा के रास्ते खोल दिये जिससे वह penicillin का आविष्कार कर विश्व प्रसिद्ध हुआ।

आज की स्कोर सूची :

23  नवम्बर के ज्ञानप्रसाद का स्वाध्याय करने के उपरांत  24 आहुति  संकल्प के विजेता निम्नलिखित  9 समर्पित सहकर्मी हैं : (1) सरविन्द कुमार पाल – 52, (2) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 38, (3) पिंकी पाल बेटी – 30, (4) डा. अरुन त्रिखा जी – 29, (5) अरुण कुमार वर्मा जी – 28, (6) सुमन लता बहन जी – 27, (7) प्रेरणा कुमारी बेटी – 26, (8) संध्या बहन जी – 25, (9) रजत कुमार जी – 25 ;  उक्त सभी सूझवान व समर्पित सहकर्मियों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से  साधुवाद व हार्दिक बधाई हो। जगत् जननी माँ  गायत्री माता दी की असीम अनुकम्पा इन सभी पर सदैव बरसती रहे यही आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरु सत्ता से विनम्र प्रार्थना व  कामना है।  धन्यवाद।  आदरणीय सरविन्द जी ने आदर सम्मान देते हुए इन सहकर्मियों को नवरत्न की उपमा से सुशोभित किया है। 

स्कोर सूची का इतिहास :

जो सहकर्मी हमारे साथ लम्बे समय से जुड़े हुए हैं वह जानते हैं कि हमने कुछ समय पूर्व काउंटर कमेंट का  सुझाव दिया था जिसका पहला उद्देश्य  था कि जो कोई भी कमेंट करता है हम उसके  आदर-सम्मान हेतु  रिप्लाई अवश्य  करेंगें। अर्थात जो हमारे लिए अपना   मूल्यवान समय निकाल रहा है हमारा कर्तव्य बनता है कि उसकी भावना का सम्मान किया जाये।  कमेंट चाहे छोटा हो य विस्तृत ,हमारे लिए अत्यंत ही सम्मानजनक है। दूसरा उद्देश्य था एक परिवार की भावना को जागृत करना।  जब एक दूसरे के कमेंट देखे जायेंगें ,पढ़े जायेंगें ,काउंटर कमेंट किये जायेंगें ,ज्ञान की वृद्धि होगी ,नए सम्पर्क बनेगें , नई प्रतिभाएं उभर कर आगे आएँगी , सुप्त प्रतिभाओं को जागृत करने  के अवसर प्राप्त होंगें,परिवार की वृद्धि होगी और ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार का दायरा और भी  विस्तृत होगा। ऐसा करने से और  अधिक युग शिल्पियों की सेना का विस्तार होगा। हमारे सहकर्मी  जानते हैं कि हमें  किन -किन सुप्त प्रतिभाओं का सौभाग्य  प्राप्त हुआ है, किन-किन महान व्यक्तियों से हमारा संपर्क  संभव हो पाया है।  अगर हमारे सहकर्मी चाहते हैं तो कभी किसी लेख में मस्तीचक हॉस्पिटल से- जयपुर सेंट्रल जेल-मसूरी इंटरनेशनल स्कूल तक के विवरण  compile कर सकते हैं। 

इन्ही काउंटर कमैंट्स के चलते आज सिलसिला इतना विस्तृत हो चुका  है कि  ऑनलाइन ज्ञानरथ को एक महायज्ञशाला की परिभाषा दी गयी है। इस महायज्ञशाला में  विचाररूपी हवन सामग्री से कमैंट्स की आहुतियां दी जा रही हैं।  केवल कुछ दिन पूर्व ही कम से कम 24 आहुतियों  (कमैंट्स ) का संकल्प प्रस्तुत किया गया।  इसका विस्तार स्कोरसूची के रूप में आपके समक्ष होता  है।  आप सब बधाई के पात्र है और इस सहकारिता ,अपनत्व के लिए हमारा धन्यवाद्।  प्रतिदिन स्कोरसूची  को compile करने के लिए आदरणीय सरविन्द भाई साहिब का धन्यवाद् तो है ही ,उसके साथ जो उपमा आप पढ़ते हैं बहुत ही सराहनीय है। सहकर्मीओं से निवेदन है कि स्कोरसूची  की  अगली पायदान पर ज्ञानप्रसाद के संदर्भ में कमेंट करने का प्रयास करें -बहुत ही धन्यवाद् होगा

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