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अध्याय 5-मन का स्वभाव : हिन्दू दृष्टिकोण भाग 1

20 नवंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद -मन का स्वभाव : हिन्दू दृष्टिकोण भाग 1

आज का ज्ञानप्रसाद स्वामी आत्मानंद जी द्वारा लिखित पुस्तक “मन और उसका निग्रह” के स्वाध्याय के उपरांत आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी की प्रस्तुति है। यह प्रस्तुति अध्याय 5 का प्रथम भाग है, रविवार अवकाश होने के कारण द्वितीय भाग सोमवार 22 नवंबर के ज्ञानप्रसाद में प्रस्तुत करेंगें । यूट्यूब में शब्द सीमा होने के कारण हम अध्याय पांच को दो भागों में बाँटने के लिए विवश हैं ।

लेख के अंत में 24 आहुति -संकल्प के विजेताओं की सूची देखना न भूलें। हालाँकि इस सूची की उपमा आदरणीय सरविन्द जी की है ,हमने punctuation और आवश्यक एडिटिंग करके आकर्षण प्रदान किया है। हमारे विचार में सरविन्द जी ने हमें एडिटिंग की स्थाई आज्ञा दी हुई है क्योंकि अगर बेस्ट कंटेंट प्रस्तुत करना है तो परस्पर सहयोग से एडिटिंग करना कोई त्रुटिपूर्ण नहीं है। आने वाले कुछ दिनों तक हम SCORELIST का इतिहास भी शेयर करते रहेंगें ताकि अधिक से अधिक सहकर्मी 24 आहुति- संकल्प के जानकर हो सकें।

तो चलते हैं ज्ञानप्रसाद की और।

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मन: संयम की इच्छा ही पर्याप्त नहीं है l हमें मन के स्वभाव के सम्बन्ध में भी कुछ ज्ञान रखना चाहिए l हम हिन्दू मनोविज्ञान के आलोक में इस पर संक्षेप में विचार करेंगे, क्योंकि उसमें प्राचीन काल से मनोनिग्रह के लिए पर्याप्त साधना-प्रणालियां वर्णित हैं l हिन्दू मनोविज्ञान को विज्ञान की श्रेणी में रखा जाता है, क्योंकि उसने समुचित प्रयोगों और जांच- पडताल के द्वारा मन के पूर्ण निग्रह के लिए तरीके खोज निकाले हैं, जिनका अवसान अन्त में जाकर पूर्णता या ज्ञान प्राप्ति के रूप में होता है l स्वामी विवेकानंद ने ‘ विवेकानंद साहित्य’ में हिन्दू मनोविज्ञान की जैसी व्याख्या की है, वही हमारे प्रस्तुत विचार का आधार है l

हमारे इस स्थूल शरीर के भीतर एक सूक्ष्म शरीर है l उसी को हम मन कहते हैं l यह स्थूल शरीर मानो मन की बाहरी परत है l पर मन शरीर का सूक्ष्म अंश होने के कारण दोनों का एक दूसरे पर प्रभाव पड़ता है l यही कारण है कि शरीर का रोग बहुधा मन को प्रभावित करता देता है, और मानसिक अवस्था या तनाव शरीर को रुग्ण बना देता है l l

मन के पीछे आत्मा है l यही मनुष्य का यथार्थ स्वरूप है l शरीर और मन दोनों जड़ हैं ; आत्मा शुद्ध चैतन्य स्वरूप है,मन आत्मा नहीं है, वह आत्मा से सम्पूर्णत: भिन्न है l

यदि विज्ञान की एक उपमा लें, तो कहेंगे कि जड़पदार्थ और मन में अन्तर केवल कम्पन की गति में है l मन जब धीमी गति से कम्पनशील होता है, तब उसे मन कहकर पुकारते हैं l

जड़पदार्थ और मन दोनों देश, काल और निमित्त के नियमों के द्वारा समान रूप से नियंत्रित होते हैं l जड़पदार्थ को मन में परिवर्तित किया जा सकता है, भले ही हमने इसका प्रत्यक्ष अनुभव न किया हो l उदाहरण के लिए, एक ऐसे व्यक्ति को लो जिसने एक पखवाड़े (15 दिनों) से कुछ खाया ही नहीं है l उस पर क्या प्रतिक्रिया होती है? उसका शरीर ही केवल दुर्बल नहीं पड़ता, प्रत्युत उसका मन भी रीता- सा हो जाता है l यदि वह कुछ दिन और अधिक दिन उपवास करे , तो वह सोच भी नहीं सकता l वह अपने नाम का स्मरण भी नहीं कर सकता l जब वह फिर से अन्न लेना शुरू करता है, तो धीरे- धीरे उसके शरीर में ताकत आती है, और उसकी स्मृति – शक्ति कार्य करने लगती है l अतएव यह स्पष्ट है कि वह अन्न ही, जो जड़पदार्थ है, मन बना करता है l हम ‘छान्दोग्य’ उपनिषद में उद्दालक को अपने पुत्र श्वेतकेतु को अपने प्रयोग के माध्यम से उपदेश देते हुए पाते हैं कि अन्न कैसे मन बनता है l वहाँ के दो अध्याय अन्य प्रासंगिक उपदेशों के साथ इस प्रकार हैं: ‘ हे सौम्य ! मथे जाते हुए दही का जो सूक्ष्म भाग होता है, वह ऊपर इकट्ठा हो जाता है ; वह घृत होता है l उसी प्रकार हे सौम्य ! खाये हुए अन्न का जो सूक्ष्म अंश होता है, वह सम्यक प्रकार से ऊपर आ जाता है, यह मन होता है l हे सौम्य ! पीये हुए जल का जो सूक्ष्म भाग होता है, वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है, वह प्राण हो जाता है। हे सौम्य! भक्षण किये हुए तेज का जो सूक्ष्म भाग होता है, वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है और वह वाणी होता है l इस प्रकार हे सौम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमयी है I

इस पर पुत्र श्वेतकेतु ने कहा: ‘भगवन् ! मुझे फिर समझाइये l” ठीक है , सौम्य ! सुनो, पुरुष सोलह कलाओं वाला है l तू पन्द्रह दिन भोजन मत कर , केवल अपनी इच्छानुसार जल ग्रहण कर l प्राण जलमय है , इसलिए जल पीते रहने से उसका नाश नहीं होगा l ‘

श्वेतकेतु ने पन्द्रह दिन भोजन नहीं किया l तत्पश्चात् वह अपने पिता के पास आया और बोला : ‘ भगवन ! क्या बोलूँ ? ‘ पिता बोले , ‘ हे सौम्य ! ऋग: , यजु: और साम: का पाठ करो l ‘ वह बोला: , ‘ भगवन् ! मुझे उनका स्मरण नहीं आ रहा है l ‘( उसकी स्मृति क्षीण हो गयी थी l) तब पिता उससे बोले: , ‘ हे सौम्य ! जैसे ईंधन से धधकती अग्नि का यदि जुगनू के बराबर एक छोटा सा अंगारा रह जाय , तो वह उससे अधिक दाह नहीं कर सकता , उसी प्रकार हे सौम्य ! तेरी सोलह कलाओं में से केवल एक कला रह गयी है, इसलिए उस एक कला के द्वारा तू वेदों का स्मरण नहीं कर पा रहा है l अच्छा , अब जा और भोजन कर तब तू मेरी बात समझ जाएगा l

श्वेतकेतु ने भोजन किया और पिता के पास आया l फिर पिता ने जो कुछ पूछा , वह सब उसके मन के सामने उपस्थित हो गया l तब पिता उससे बोले: ‘ हे सौम्य ! जैसे ईंधन से धधकती अग्नि का यदि जुगनू के बराबर एक छोटा सा अंगारा रह जाय और उसे तृण से सम्पन्न कर प्रज्ज्वलित कर दिया जाय , तो वह पूर्व परिमाण की अपेक्षा भी अधिक दाह कर सकता है l इसी प्रकार हे सौम्य ! तेरी सोलह कलाओं में से एक कला अवशिष्ट रह गयी थी l वह अन्न के द्वारा प्रज्वलित कर दी गयी l अब उसी से तू वेदों का स्मरण कर रहा है l अत: हे सौम्य ! मन अन्नमय है , प्राण जलमय है ,वाक् तेजोमयी है l वह पिता के कथन को समझ गया ; हाँ अच्छी तरह समझ गया l

जिन लोगों को इस उपदेश में संशय हो , वे पन्द्रह दिन तक निराहार रहें, केवल जल ग्रहण करें और देखें कि उनके मन को क्या होता है !

वस्तुतः मनुष्य मन नहीं बल्कि आत्मा है l आत्मा नित्यमुक्त , अनन्त और शाश्वत है l वह शुद्ध चैतन्य रूप है l मनुष्य में स्वतंत्र कर्ता मन नहीं , आत्मा है l मन तो मानो आत्मा के हाथों एक यंत्र है , जिसके द्वारा आत्मा बाह्य जगत् का अनुभव और ग्रहण करता है l

यह यंत्र जिसके द्वारा आत्मा बाह्य जगत् के सम्पर्क में आता है, अपनेआप में सतत् परिवर्तनशील और अस्थिर है। जब इस अस्थिर यंत्र को स्थिर और निश्चंचल बनाया जाता है, तो वह आत्मा को प्रतिबिम्बित कर सकता है l भले ही मन एक स्वतंत्र कर्ता नहीं है, तथापि उसकी शक्तियां अकल्पनीय हैं l यदि मनुष्य ने अदृश्य अणु को तोड़कर उसकी ऊर्जा को प्रकट किया है, यदि मनुष्य दुर्दर्श आत्मा का अनुभव कर ज्ञानालोक से उद्भाषित हो गया है, तो उसने मन की शक्तियों के सहारे ही यह सब किया है l उपलब्धि के इन दो ध्रुवों के बीच मानव ने विभिन्न क्षेत्रों में अन्य जो भी उपलब्धियां की हैं, वे सभी मन की शक्तियों के द्वारा ही सम्भव हुईं हैं l वास्तव में मन हर दूसरे मन के साथ सम्बन्धित है l अतएव प्रत्येक मन को, वह चाहें कहीं भी हो, सम्पूर्ण विश्व के साथ सम्बन्धित किया जा सकता है l

उपनिषद कहता है : उसके प्रकाशमान होते हुए ही सब कुछ प्रकाशित होता है l उसके प्रकाश से ही यह सब कुछ भासता है l मन- सम्बन्धी हिन्दू दृष्टिकोण को समझने के लिए इस गम्भीर उपदेश का ध्यान रखना चाहिए l वह ब्रह्म, वह शुद्ध चैतन्यस्वरूप परमात्मा ही समस्त प्रकाश का उदगम है l जिसे हम आत्मा कहते हैं, जो प्राणियों में ज्ञात के रूप में अवस्थित है , वह शुद्ध चेतना स्वरूप ब्रह्म से अभिन्न है l इस शुद्ध चेतना की आभा ही सर्वदा समस्त वस्तुओं को अभिव्यक्त करती है l क्रमशः जारी भाग 2 , जय गुरुदेव कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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आज की स्कोर लिस्ट : आज जिन नौ सहकर्मियों ने परम पूज्य गुरुदेव के श्री चरणों में 24 आहुति-संकल्प का समर्पण किया है उनके नाम रिलीज़ करते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है। यह नाम हैं : (1) अरूण कुमार वर्मा जी – 38, (2) प्रेरणा कुमारी बेटी – 33, (3) सरविन्द कुमार पाल – 33, (4) धीरप सिंह तँवर बेटा – 29, (5) संध्या बहन जी – 29, (6) रजत कुमार जी – 28, (7) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 27, (8) पिंकी पाल बेटी – 27, (9) पुष्पा पाठक बहन जी – 27 इन सभी सहकर्मियों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत-बहुत साधुवाद, शुभकामना एवं हार्दिक बधाई l स्कोर लिस्ट का इतिहास: जो सहकर्मी हमारे साथ लम्बे समय से जुड़े हुए हैं वह जानते हैं कि हमने कुछ समय पूर्व काउंटर कमेंट का सुझाव दिया था जिसका पहला उद्देश्य था कि जो कोई भी कमेंट करता है हम उसका आदर सम्मान रखने के लिए रिप्लाई करेंगें। अर्थात जो हमारे लिए अपना मूल्यवान समय निकाल रहा है हमारा कर्तव्य बनता है कि उसकी भावना की कदर की जाये। कमेंट चाहे छोटा हो य विस्तृत ,हमारे लिए अत्यंत ही सम्मानजनक है। दूसरा उद्देश्य था एक परिवार की भावना को जागृत करना। जब एक दूसरे के कमेंट देखे जायेंगें ,पढ़े जायेंगें ,काउंटर कमेंट किये जायेंगें ,ज्ञान की वृद्धि होगी ,नए सम्पर्क बनेगें , नई प्रतिभाएं उभर कर आगे आएँगी , सुप्त प्रतिभाओं को जागृत करने के अवसर प्राप्त होंगें,परिवार की वृद्धि होगी और ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार का दायरा और विस्तृत होगा उससे और अधिक युग शिल्पियों की सेना का विस्तार होगा। हमारे सहकर्मी जो हमसे कुछ समय से जुड़े हैं जानते हैं कि किन -किन सुप्त प्रतिभाओं का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ है, किन-किन महान व्यक्तियों से हमारा संपर्क संभव हो पाया है। अगर हमारे सहकर्मी चाहते हैं तो कभी किसी लेख में मस्तीचक हॉस्पिटल से- जयपुर सेंट्रल जेल-मसूरी इंटरनेशनल स्कूल तक के विवरण compile कर सकते हैं। इन्ही काउंटर कमैंट्स के चलते आज सिलसिला इतना विस्तृत हो चुका है ऑनलाइन ज्ञानरथ को एक महायज्ञशाला की परिभाषा दी गयी है। इस महायज्ञशाला में विचाररूपी हवन सामग्री से कमैंट्स की आहुतियां दी जा रही हैं। केवल कुछ दिन पूर्व ही कम से कम 24 आहुतियों (कमैंट्स ) का संकल्प प्रस्तुत किया गया। इसका विस्तार इस स्कोरबोर्ड के रूप में आपके समक्ष है। आज आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में वह अपार शक्ति है जिसमें निस्वार्थ भाव से विचारों की हवन सामग्री से कमेन्ट्स रूपी आहुति डाली जाती है यह परम पूज्य गुरुदेव की योजना है और अरुन भइया जी तो केवल माध्यम ही हैं l अगर विश्वास न हो तो निस्वार्थ भाव से परमार्थ के लिए आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में अपनत्व की भावना से ओतप्रोत होकर समयदान- श्रमदान करके देखिये, अवश्य ही आशातीत सफलता मिलेगी l आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की इस आध्यात्मिक व क्रान्तिकारी विचारों की महायज्ञशाला में प्रतिदिन भाव रूपी हवन हो रहा है जिसका लाभ हम अमृत तुल्य महाप्रसाद के रूप में अनवरत ले रहे हैं l

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