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13. हमारा घर ही है योग साधना की प्रयोगशाला(ख)  – सरविन्द कुमार पाल

10 नवंबर  2021 का ज्ञानप्रसाद , 13. हमारा घर ही है योग साधना की प्रयोगशाला(ख)  – सरविन्द कुमार पाल

परमपूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक  लघु  पुस्तक का स्वाध्याय करने उपरांत 13वां लेख। 

परिवार निर्माण पर आधारित लेखों की कड़ी में आज प्रस्तुत है अंतिम एवं  13वां  लेख। Opening remarks में सबसे महत्वपूर्ण और प्रथम कार्य है ऐसे सहकर्मियों को सम्मानित करने का जिन्होंने 24 आहुतियों के टारगेट को पूरा किया है। भाइयों ,बहिनों और हमारी प्रेरणा बिटिया के समेत इस बार ऐसे 6  नाम हैं – रेनू श्रीवास्तव -33 ,सुमन लता-25 ,संध्या कुमार -24 ,सरविन्द पाल-26 ,अरुण वर्मा -25 ,प्रेरणा कुमारी -24 आइये सब सामूहिक तौर से इन 6 ग्रुपों को तो सम्मानित करें हीं लेकिन उनको भी जिन्होंने यह टारगेट प्राप्त करने में योगदान दिया। Three cheers for all of them. आज  का लेख कल वाले लेख का ही दूसरा भाग है। परमपूज्य गुरुदेव आज फिर कुछ ऐसे सूत्र बताएंगें जिनका पालन करने पर अवश्य ही हमारा परिवार एक आदर्श परिवार की उपाधि प्राप्त करने का हक़दार हो जायेगा। हथेली पर सरसों जमाने की कहावत से हम सब भली-भांति परिचित हैं ,परमपूज्य गुरुदेव ने गृहस्थ साधना में धीरे -धीरे ही उपलब्धियों की प्राप्ति का मार्गदर्शन दिया है। एकदम कुछ भी नहीं होने वाला -धीरे -धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होये माली सींचित सौ घड़ा ऋतू आये फल होये। आदरणीय सरविन्द पाल जी के अथक परिश्रम को हम नमन करते हैं ,हमारा सहयोग तो है ही। 

तो चलते हैं लेख की ओर 

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सहजीवन की सर्वोपरि आवश्यकता: 

सहजीवन का अर्थ Joint Family System से है।  हम सब जानते हैं कि ऐसी पारिवारिक संस्था में रहना कितना कठिन है -इसलिए तो गृहस्थाश्रम  को एक तपोवन की संज्ञा दी गयी है।  परमपूज्य गुरुदेव ने योग साधना की प्रयोगशाला अपना घर को संबोधित कर बताया है कि गृहस्थ धर्म अन्य सभी धर्मो से अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।  महर्षि व्यास के शब्दों में गृहस्थाश्रम ही सभी धर्मो का मूल आधार है और चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम धन्य है। जिस प्रकार  समस्त प्राणी माता का आश्रय पाकर जीवित रहते हैं, उसी प्रकार  सभी आश्रम गृहस्थाश्रम पर आधारित हैं। अतः परिवार संस्था सहजीवन के व्यवहारिक शिक्षण की प्रयोगशाला है।  तभी तो परिवार संस्था को  समाज संस्था की इकाई माना जाता है।  परिवार का प्रत्येक सदस्य अपनी-अपनी मर्यादाओं का पालन करने में अपनी प्रतिष्ठा, कल्याण व गौरव की भावना रखकर खुशी-खुशी उन्हें निबाहने का प्रयत्न करता है।  जब हम परिवार के साथ सहजीवन व्यतीत कर रहे होते हैं तो आवश्यकता पड़ने पर प्रत्येक सदस्य अपने व्यक्तिगत सुख-स्वार्थो का त्याग करने में भी प्रसन्नता अनुभव करता है।  सहजीवन की यही  सर्वोपरि आवश्यकता होती है। हम सब परिवार में रहकर पारिवारिक सदस्यों की जरूरतों को पूरा करते हैं और इसे अपना परम कर्त्तव्य समझते हैं, तो हम किसी योगी से कम नहीं हैं।  अतः हमें प्रतिदिन प्रातःकाल मन ही मन भावना करनी  चाहिए कि 

“मैं एक गृहस्थ योगी हूँ।”  मेरा जीवन साधनामय है, दूसरे कैसे हैं,क्या करते हैं, क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं इसकी  मैं तनिक भी परवाह नहीं करता।  मैं अपनेआप में संतुष्ट रहता हूँ, मेरी कर्त्तव्य पालन की सच्ची साधना इतनी महान, इतनी शांतिदायिनी और इतनी तृप्तिकारक है कि उसमें मेरी आत्मा आनंद में सराबोर हो जाती है।  मैं अपनी आनंदमयी साधना को निरंतर जारी रखूंगा, गृह क्षेत्र में परमार्थ भावनाओं के साथ ही काम करूंगा।”  

परिवार के सभी सदस्यों को सोने से पहले दिन भर के कार्यो पर विचार करना चाहिए कि

(1) आज परिवार से संबंध रखने वाले क्या-क्या कार्य किए 

(2) परिवार से संबंध रखने वाले कार्यो में क्या भूल की   

(3) परिवार में स्वार्थ से प्रेरित होकर क्या अनुचित कार्य किया 

(4) परिवार में भूल के कारण क्या अनुचित काम किया  

(5) परिवार में कौन -कौन से  कार्य अच्छे, उचित और गृहस्थ योग की मान्यता के अनुरूप किये 

इस तरह से पारिवारिक उन्नति हेतु इन पाँच प्रश्नों के अनुसार दिन भर के पारिवारिक कार्यो का विभाजन करते हुए भविष्य में  गलतियों के सुधार का मूलभूत उपाय सोचना चाहिए जो निम्लिखित हो सकते हैं :

(1) भूल की तलाश करना 

(2) भूल को स्वीकार करना 

(3) भूल के लिए लज्जित होना/ पश्चाताप करना 

(4) भूल को सुधारने का सच्चे मन से प्रयत्न करना  

जो कोई व्यक्ति इन चार सूत्रों को अपने जीवन में लाने का प्रयास करता है,उसकी गलतियां दिन-ब-दिन कम होती जाती हैं।  ऐसा करने से शीघ्र ही  इन दोषों से छुटकारा पाकर सुखमय व शांतिमय जीवन जिया जा सकता है। यह चार सूत्र केवल परिवार के लिए ही नहीं बल्कि किसी भी परिवेश में  अभ्यास किये जाएँ तो लाभ ही लाभ मिलने की आशा है। 

गृहस्थाश्रम एक तपोवन है :

गृहस्थ योग की साधना के मार्ग पर चलते हुए साधक के मार्ग में नित्यप्रति नई कठिनाइयाँ आती रहती हैं।  

-साधक सोचता है कि इतने दिनों से प्रयत्न कर रहा हूँ लेकिन स्वभाव पर विजय नहीं हासिल हो रही  और प्रतिदिन नई-नई गलतियां होती ही रहती हैं।  

-साधक सोचता है कि ऐसी दशा में यह साधना हमसे चल नहीं पाएगी। 

-साधक सोचता है कि हमारे घर वाले उजड्ड, मूर्ख और कृतघ्न हैं, यह लोग मुझे परेशान और उत्तेजित करते हैं। 

-साधक सोचता है कि परिजन  मेरी  साधना को सही दिशा में नहीं चलने दे रहे , इसलिए  साधना करना व्यर्थ है। 

इस तरह के नकारात्मक व निराशाजनक विचारों से प्रेरित होकर साधक अपने व्रत को छोड़कर भटक जाता है और अपनी पुरानी आदत को सर्वोपरि मानकर पुनः गलत मार्ग का अनुसरण करने लगता है।  परमपूज्य गुरुदेव  समझाते हैं कि उपर्युक्त कठिनाई से प्रत्येक साधक को आगाह हो जाना चाहिए क्योंकि मनुष्य स्वभाव में त्रुटियाँ व कमजोरियाँ रहना निश्चित है। जिस दिन मनुष्य पूरी तरह से इन त्रुटियों और कमजोरियों से मुक्त  हो जाएगा, उसी दिन वह परम पद को प्राप्त कर लेगा और जीवन मुक्त हो जाएगा। जब तक  मनुष्य  उस मुक्ति की  मंजिल तक नहीं पहुँच जाता है, तब तक वह “मनुष्य योनि” में ही है और “देवयोनि” से बहुत ही  पीछे है। इसलिए कहावत है -इंसान गलती का पुतला है। 

साधना का मूल-मंत्र  है – “त्रुटियों के सुधार का अभ्यास। ”

परिवार ऐसे लोगों का समूह है जिसमें कोई तो आत्मिक भूमिका में बहुत आगे और कोई बहुत पीछे, इस तरह के setup  में सबके समक्ष  नित्यप्रति नई-नई त्रुटियों का, कमजोरियों का व कठिनाइयों का प्रकट होना स्वाभाविक है , प्राकृतिक है। यह त्रुटियां, कमज़ोरियाँ। कठिनाइयां  कुछ अपनी गलतियों के कारण उत्पन्न हुई होंगी और  कुछ दूसरों की गलतियों के कारण। लगातार सहजीवन व्यतीत करते ,इक्क्ठे रहते हुए  यह कठिनाइयां  धीरे-धीरे दूर तो जाती हैं  लेकिन परिवार का  पूरी तरह से देव परिवार बनना फिर भी कठिन ही है। ऐसी  कठिनाईयां तो आये दिन आती रहेगीं। इनसे डरने,घबराने य विचलित होने की कोई  आवश्यकता नहीं है। क्योंकि  साधना का मूल-मंत्र  है – “त्रुटियों के सुधार का अभ्यास। ” इसलिए हर साधक को अपनी साधना के अभ्यास को अनवरत जारी रखना चाहिए। यही कारण है कि  योगीजन नियमित प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा व ध्यान आदि की साधना करते हैं  क्योंकि उनकी मनोभूमि अभी दोषपूर्ण है।  जिस दिन उनके दोष हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाएंगे उसी क्षण,उसी दिन वह “ ब्रह्म निर्वाण” को प्राप्त कर लेंगे। दोषों का पूर्णतया अभाव हो जाना ही सिद्ध अवस्था की अंतिम सीढ़ी के ल क्षण हैं ।  जो मनुष्य इस अंतिम सीढ़ी  तक पहुँच जाता है फिर उसके लिए करने को कुछ  शेष नहीं रह जाता है। 

परम पूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि साधकों को यह आशा कभी नहीं करनी चाहिए कि अल्प साधना से ही बहुत कम समय में बहुत बड़ी उपलब्धि मिल जायेगी, ऐसा कदापि नहीं हो सकता है।  यह तो एक कल्पना मात्र है।  विचार तो क्षण भर में बन जाते हैं, परंतु उसे संस्कार का रूप धारण करने में बहुत समय लगता है ,कहने का तात्पर्य यह हुआ कि हथेली पर सरसों नहीं जमती।  पत्थर पर निशान करने के लिए रस्सी की रगड़  बहुत लम्बे समय तक जारी रखनी पड़ती है। हर साधक या योगीजन, चाहे वह गृहस्थ योगी क्यों न हो, को सदैव याद रखना चाहिए कि दोषों से सर्वथा मुक्ति-लक्ष्य है, ध्येय है व सिद्ध अवस्था है और साधक का शुरूवाती लक्षण यह नहीं है।  आम का पौधा उगते ही यदि मीठे आम तोड़ने के लिए उसके पत्तों को टटोलेंगे, तो मनोकामना पूर्ण नहीं होगी और इस तरह के  साधक की आशा निराशा में बदल जाएगी। अतः हम सबको अपनी साधना सफल बनाने के लिए उचित मार्ग पर चलते हुए कठिन तपस्या और योग साधना का सहारा लेना चाहिए तभी इच्छित फल मिल सकता है। हम सबको गृहस्थ योग की साधना आरम्भ करते हुए इस बात के लिए कमर कसकर तैयार हो जाना चाहिए ( बिल्कुल एक सैनिक की तरह ,एक विद्यार्थी की तरह ) कि परिवार में रहकर भूलों, त्रुटियों, कठिनाइयों, कमजोरियों और असफलताओं का  नित्य सामना करना पड़ेगा,  उनसे लड़ना पड़ेगा ,नित्य उनका संशोधन और परिमार्जन करना होगा और   इस तरह से अंत में  एक न एक  दिन परिवार की सारी कठिनाइयों को परास्त कर देना होगा। तब हम अपने परिवार को देव परिवार बना सकते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि व सुख-शांति बिना बुलाए ही  आ जाएगी।  हमारे सभी  ऋषि-मुनियों का ऐसा मत है। गृहस्थाश्रम समाज को अच्छे नागरिक देने की खान है। भक्त, ज्ञानी, संत, महात्मा, महापुरुष, विद्वान  पंडित गृहस्थाश्रम से ही निकलकर आते हैं और उनके जन्म से लेकर शिक्षा, दीक्षा, पालन, पोषण व ज्ञानवर्धन गृहस्थाश्रम के बीच ही होता है।  परिवार के बीच ही मनुष्य की सर्वोपरि देखरेख व शिक्षा होती है, इसलिए परिवार में रहकर उपासना साधना व आराधना करना किसी बहुत बड़ी तपस्या से कम नहीं हैं।  तभी तो परमपूज्य गुरुदेव ने कहा है – गृहस्थाश्रम एक तपोवन है।

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कल का ज्ञानप्रसाद हमारे सहकर्मियों  की ओर  से होगा :

आदर्श परिवार की 13 लेखों की इस लम्बी कड़ी को समाप्त करते हुए हमें बहुत ही प्रसन्नता हो रही है।  सरविन्द जी का ह्रदय से आभार व्यक्त करते है, सभी सहकर्मियों को नमन जिन्होंने 24 आहुतियों के संकल्प को सहर्ष पूर्ण करने में अपना योगदान दिया। अगले लेखों की शृंखला  में हम मन को शांत करने, कण्ट्रोल करने, मन निग्रह पर कुछ लेख लेकर आयेंगें। लेकिन उनको आरम्भ करने से पहले हम आप सबकी आदर्श परिवार लेखों पर प्रतिक्रिया जानने का निवेदन कर रहे हैं।  आपको पूर्ण स्वतंत्रता है, आप जो चाहें अपने विचारों  के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया लिख  सकते हैं। हम आपके विचारों को कमैंट्स के माध्यम से तो  प्रतिदिन देख ही  रहे हैं लेकिन  आज कुछ और अधिक लिखने के लिए  निवेदन कर रहे  हैं जी हम गुरुवार के ज्ञानप्रसाद में शामिल करेंगें।   इस मार्गदर्शन से हमें हमारी कार्यशैली में सुधार लाने का अवसर मिलेगा। तो गुरुवार  वाले लेख पर विचार रुपी कमैंट्स की आहुतियां आपकी प्रतिक्रियों पर आधारित होंगीं।  तो अभी से मन बना लीजिये की आपने क्या लिखना है। 

मननिग्रह लेखों की श्रृंखला आरम्भ करने से पूर्व आपको पूरी बैकग्राउंड देते हुए भी ज्ञानप्रसाद लिखने की योजना है। 

तो आज के लिए इतना ही। जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।       

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