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अपने सहकर्मियों के संग विचार विमर्श

30 अक्टूबर 2021 के ज्ञानप्रसाद में अपने सहकर्मियों के संग विचार विमर्श “

धीरे -धीरे रे मना धीरे सब कुछ होये माली सींचत सौ घड़ा ऋतू आये फल होये” -हिंदी भाषा के महान कवि संत कबीर जी कह रहे हैं कि हमें हर काम एक नियमित गति से ही करना चाहिए। यह ज़रूरी नहीं है कि जल्दबाज़ी करने से कोई काम जल्दी हो ही जाए। कबीरदास जी उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार माली भले ही पेड़ में हर दिन सौ घड़े पानी डाले, लेकिन पेड़ पर फल तो फलों की सही ऋतु आने पर ही लगते हैं। ठीक उसी प्रकार, हम चाहे कितनी भी जल्दबाज़ी कर लें। सही काम उचित समय आने पर ही सफल या पूरे होते हैं। अतः हमें धैर्यपूर्वक अपने काम करते रहने चाहिए और फलों की चिंता नहीं करनी चाहिए। जब सही समय आएगा, तो आपको आपके अच्छे कामों का फल ज़रूर मिल जाएगा।

आज कल तो ग्रीनहाउस टेक्नोलॉजी से जब चाहें ,जो चाहें पैदा कर लें – NO COMMENTS.

इस सुप्रसिद्ध, ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक दोहे से अपनी बात आरम्भ करने का एक नियत उदेश्य है। बहुत से सहकर्मियों से अक्सर बात होती रहती है कि हम तो अपना प्रयास पूरे जी-जान से करते है लेकिन कोई सुनता ही नहीं है। हम तो व्यक्तिगत मैसेज भी भेज कर कहते हैं। पर्सनली मिलने पर भी कहते हैं लेकिन कोई सुनता ही नहीं है। हमारा हर बार एक ही उत्तर होता रहा है ,धीरे -धीरे सब कुछ होता है। परमपूज्य गुरुदेव के साथ जुड़ना, इस विशाल विश्व्यापी मिशन के कार्य में अपनेआप को समर्पित करना,कोई ऐसा वैसा ,छोटा कार्य नहीं है। यह एक परम सौभाग्य है जो किसी विरले को ही प्राप्त होता है। हम सब उन विरलों में से ही हैं जिन्हे परमपूज्य गुरुदेव ने बहुत सोच समझ कर, परखकर चुना है। इस चुनाव के सन्दर्भ में गुरुदेव अक्सर कहा करते थे – “जब मथुरा की गलियों में बाढ़ आती है तो सफाई कर्मचारी नालियों में से कुछ ढूंढते रहते है और उनके हाथों कई बार सोने, और हीरे लग जाते थे ,ठीक उसी प्रकार हमने आपको ढूँढा है।” जो हमारी बात नहीं सुनते यह उनका दुर्भाग्य है। गुरुदेव ने तो बार -बार कहा है “ तू मेरा काम कर मैं तेरा काम करूँगा।” हम तो यही कहेंगें कि इस रथ के सारथि स्वयं हमारे गुरुदेव ही हैं – हाँ एक बात अवश्य है – यह तभी संभव है अगर हमारी intentions clear हैं और हम निस्वार्थ गुरुकार्य कर रहे हैं।

हम सब देख ही रहे हैं कि ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में कहाँ-कहाँ से, कितने-कितने समर्पित परिजन जुड़ रहे हैं। और इस पुनीत कार्य में हर वर्ग के सहकर्मी जी -जान से अपना सहयोग दे रहे हैं। इतना ही नहीं सभी परिजन , मानवीय मूल्यों का ( शिष्टाचार,स्नेह,समर्पण,आदर,श्रद्धा ,निष्ठा,विश्वास ,आस्था,सहानुभति , सहभागिता,सद्भावना एवं अनुशासन) जो ऑनलाइन ज्ञानरथ के स्तम्भ हैं ,इतनी श्रद्धा से पालन कर रहे हैं कि हम निशब्द हो जाते हैं। आपका तो पता नहीं, हमने तो कई बार स्कूल में क्लासें मिस की होंगी ,लेकिन ऑनलाइन ज्ञानरथ पाठशाला की एक भी क्लास न तो कभी मिस की और न ही कभी लेट हुए। हमसे अधिक अनुशासन प्रिय हमारे परिजन हैं जी बिना किसी भी स्वार्थ के अपना कार्य पूरी श्रद्धा और समर्पण से संपन्न किये जा रहे हैं।

हमने अपडेट में अक्सर प्रेरणाप्रद शब्दों का प्रयोग करते हुए और अधिक परिजन जोड़ने के लिए कहा होगा ,कमैंट्स के लिए भी कहा होगा , काउंटर कमैंट्स के लिए भी प्रेरित किया होगा , अपने परिजनों के कमैंट्स पढ़कर प्रेरणा लेकर उन्हें रिप्लाई करने के लिए भी कहा होगा -लेकिन यह प्रयास केवल गुरु की शिक्षा के प्रचार -प्रसार के लिए ही था और है। परमपूज्य गुरुदेव की शिक्षा से इस भटकी हुई मानवता को सही मार्गदर्शन मिल जाये ,हर परिवार में, हर घर में अगर गायत्री का वास् हो जाये तो इससे बड़ा सुख क्या होगा। इसमें प्रयास में हमारा व्यक्तिगत कोई भी स्वार्थ नहीं था /नहीं है। हमारा यह सौभाग्य है कि हमारे गुरु ने हमें इतने समर्पित परिजनों के साथ जोड़ दिया जिनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है।

हर वर्ग के ,हर आयु के परिजन हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं – एक -और -एक ग्यारह का सिद्धांत हूबहू कार्यरत होता दिखा रहा है। हमारा भी सदैव प्रयास रहता है कि सब किसी को सम्मान की दृष्टि से देखें, हर किसी के सुझाव का सम्मान करें , चाहे वह हमसे कितना ही छोटा क्यों न हो। हमारे एक परिजन ने “ चरित्र और आचरण “ पर लेख लिखने का सुझाव दिया। हमने उसी समय रिसर्च करके स्वध्याय करना आरम्भ कर दिया और उन्हें कमेंट करके सूचित भी किया कि शीघ्र ही आपके समक्ष इस विषय पर लेख लेकर आयेंगें। आदरणीय सरविन्द भाई साहिब के लेखों की कड़ी को बीच छोड़ कर अपना लेख लिखना उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने से कम न होगा और यह हम कभी भी न करेंगें। सभी परिजन ऑनलाइन ज्ञानरथ में अपना कार्य एक कुशल कार्यकर्ता की भांति निभा रहे हैं जिसके लिए वह बधाई के पात्र हैं। जो वरिष्ठ हैं वह अपने जीवन भर के अनुभव से हमारे बच्चों को मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं। रेनू श्रीवास्तव जी ,संध्या जी ,साधना जी , निशा जी ,राधा जी ,अरुण वेर्मा जी, सरविन्द पाल जी JB Paul ji ,रेनू गंजीर जी ,सुमन लता जी ,सुधा जी ,मृदुला श्रीवास्त्व जी, ,कुसुम त्रिपाठी जी ,पुष्पा पाठक जी, राजकुमारी जी -यह कुछ ऐसे नाम हैं जो सम्पूर्ण नियमितता से अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रहे हैं। सभी नामों का विवरण देना शायद हमारे लिए कठिन होगा इसलिए अगर कोई मिस हो गया हो तो क्षमा प्रार्थी हैं। रेनू श्रीवास्तव बहिन जी की तरह कइयों को तो यह भी मालूम है कि जब हम शुभरात्रि सन्देश भेजते हैं तो हमारे यहाँ दिन होता है और वह शुभदिन भेजते हैं। शुभरात्रि सन्देश भेजते हुए प्रयास किया जाता है कि यह सन्देश आपकी नींद को सुखमय बनाने में सहायक हो। जो हमारा युवा वर्ग है वह एकदम आकर login करके सारा कार्य इतनी efficiency से करके चला जाता है जिसको मेरे जैसे अल्पज्ञान और अल्पबुद्धि वाले परिजन अभी सोच ही रहे होते हैं। प्रेरणा बिटिया, प्रीती बिटिया,पिंकी बेटी ,धीरप बेटा इसी category में आते हैं जो जॉब भी कर रहे रहे हैं ,पढ़ भी रहे हैं और इस महायज्ञशाली में आहुतियां भी डाल रहे हैं। कोई ऐसे भी परिजन भी हैं जो सात -आठ घंटे रेगुलर जॉब करने के बाबजूद एक नियमित सा नियम बना चुके हैं कि चाहे जो कुछ भी हो ऑनलाइन ज्ञानरथ के भावरूपी महायज्ञ में विचारों की हवन सामग्री से कमैंट्स रुपी आहुति तो डालनी ही है। उन सहकर्मियों की भी कोई कमी नहीं है जो परिवार की सारी ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए भी ,बच्चों का पालन पोषण करते हुए भी ,खाना पकाना ,झाड़ू पोछा करके थकान के बावजूद इस भावरूपी यज्ञशाला में अपनी उपस्थिति अवश्य ही दर्ज़ करवाते हैं। इस नियमितता में कहीं कोई अड़चन आती दिखती है तो परिजन तुरंत मैसेज भेजकर सूचित करना अपना उत्तरदायित्व समझते हैं। यह अनुशासन का अद्भुत उदाहरण है। हमारा भी यही प्रयास रहता है कि अगर किसी परिजन का एक -दो दिन किसी कारणवश सन्देश नहीं आता तो सम्पर्क करने का प्रयास करते हैं। कुछ एक परिजन ऐसे भी हैं जो कभी -कभार कमेंट करते हैं ,छोटे कमेंट करते हैं , वह भी हमारे दिल के बहुत ही करीब हैं। अपने गुरु से जो सीखा है ,उसी को अन्तःकरण में ढालने का प्रयास कर रहे हैं ,कितना सफल हो पाए हैं आप ही बता सकते हैं। पत्र -पाथेय नामक पुस्तक जो परमपूज्य गुरुदेव और पंडित लीलापत शर्मा जी के पत्र -व्यव्हार की एक अद्भुत पुस्तक है , अमूल्य आत्मीयता दर्शाती है।

सम्मान की दृष्टि से देखा जाये तो हमारे सभी परिजन एक -दूसरे के विचारों का जी -जान से सम्मान कर रहे हैं। अभी कुछ दिन पूर्व ही आदरणीय सरविन्द जी ने 24 आहुतियों का प्रस्ताव रखते हुए निवेदन किया जिसे सभी ने बहुत बड़ा समर्थन दिया। अरुण वर्मा भाई साहिब के कमेंट में तो हमने एक दिन 25 आहुतियां देखीं। सभी को धन्यवाद् तो है ही ,बधाई भी है। हमारा सपना कि हमारे परिजन भी कुछ लिखें -साकार होकर ही रहा। सरविन्द भाई साहिब ने 12 लेख लिख दिए हैं और अनिल मिश्रा जी के 30 लेख पहले ही हमारे पास हैं। और जो परिजन इतने विस्तृत कमेंट लिख रहे हैं वह कमेंट किसी लेख से कम नहीं हैं। अगर हम इन कमैंट्स को एडिट करके लिखना आरम्भ कर दें तो शायद कितने ही full -length लेख बन जाएँ। एक दूसरे के लेख पढ़कर ,कमेंट करके ,सहकारिता ,सहभागिता का एक बहुत ही उज्वल वातावरण प्रकट हो रहा है। ऐसे पारिवारिक वातावरण को हमारा नमन और आदरणीय सरविन्द भाई साहिब के आदर्श परिवार वाले लेखों के outcome को नतमस्तक हैं।

इन सभी नई developments को देखते हुए हमें तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कहीं हम लेखक की , researcher की अल्पप्रतिभा को भूल न जाएँ और भविष्य में एक बार फिर लेखक orientation करनी पड़े। आज कल तो editor का कार्य कर रहे हैं जो भी कोई आसान नहीं है। आपके समक्ष THE BEST प्रस्तुत करना हमारा धर्म एवं कर्तव्य है। धन्यवाद् जय गुरुदेव, आज के लिए केवल इतना ही। रविवार को अवकाश होगा और सोमवार को सरविन्द जी का अगला लेख प्रस्तुत करेंगें। कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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