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विवेकपूर्ण संकल्पशक्ति से मन को नियंत्रित करें

22 अक्टूबर 2021 का ज्ञानप्रसाद-  विवेकपूर्ण संकल्पशक्ति से मन को  नियंत्रित करें 

 “हमको मन की शक्ति देना मन विजय करे” शीर्षक से प्रकाशित कल वाले लेख पर हमारे बहुत ही समर्पित और रेगुलर सहकर्मी  आदरणीय JB Paul जी ने कमेंट  करते लिखा है कि -मन को कैसे नियंत्रित करें इस पर भी एक लेख की आपसे प्रार्थना करता हूँ – भाई साहिब ऑनलाइन ज्ञानरथ हम सबका सामूहिक प्लेटफॉर्म है जिसमें सभी सहकर्मियों के सुझावों का ह्रदय से सम्मान करना हम सबका उत्तरदाईत्व है। प्रार्थना शब्द लिख कर हमें सम्मान देने के लिए धन्यवाद् लेकिन यह शब्द  हम जैसे तुच्छ मानव के लिए बहुत बड़ी बात है। भाई साहिब के कमेंट के अनुसार हमने  अपनी रिसर्च आरम्भ कर दी और साथ -साथ में कमैंट्स भी पढ़ते  रहे।  इसी दौरान हमें देखा कि जिसका उत्तर देने का हम प्रयास कर रहे हैं वह तो हमारे सहकर्मियों ने अपने कमैंट्स में ही दिया हुआ है।  तीन बहिनों -सुधा जी  ,रेनू जी और साधना जी के कमेंट हमने इस ज्ञानप्रसाद में शामिल किये हैं।  समय की कमी तो  अवश्य ही  होती हैं लेकिन जैसा हम कहते आ रहे हैं   अगर एक -दूसरे के कमेंटस  पढ़  लें तो पारिवारिक भावना तो आएगी ही ,ज्ञान का प्रसार भी होगा। 

कमैंट्स के कार्य के लिए और भी सहकर्मी अपना योगदान देना चाहें तो उनका ह्रदय से स्वागत है।  सविंदर भाई साहिब लेखन -कड़ी  में व्यस्त होने के बावजूद समय निकाल रहे हैं। तीनो बच्चे भी अत्यंत व्यस्तता में कार्य कर रहे  हैं। कुछ सहकर्मी तो हमारे निवेदन  से पहले ही रिप्लाई कर रहे हैं ,उनका ह्रदय से धन्यवाद्।

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कल वाले लेख में लिखा था कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति मन को वश में करे। यदि हम  मानसिक शांति को प्राप्त करना चाहते है तो यह आवश्यक है कि हम मन को वश में करे। हमारे सारे दुख तथा कष्टों का कारण ही  है मन पर उचित नियंत्रण न होना। मन हमारा मालिक बन बैठा है तथा हमें यह नचा रहा है जबकि वास्तव में हम मन के मालिक हैं । अक्सर कहा जाता है कि मन तो चंचल है ,यह एक  स्थान पर टिक ही नहीं पाता है तो क्या करें।  इस स्थिति की तुलना हमने  नवजात शिशु  के साथ करके  समझने का प्रयास किया था। 

हमारी आदरणीय  बहिन सुधा जी ने बहुत ही सूंदर विश्लेषण करते लिखा है कि   हमारा पूरा मानव जीवन आरंभ से अंत तक इस मन के द्वारा ही संचालित हो रहा है।जिसने इसे जीत लिया वो एक अश्वारोही की भांति इसका नियंता होता है ,गुलाम नहीं।साधारण मानव पर तो यह मन ही शासन करता है और पूरा जीवन मृगतृष्णा में भटकाता रहता है।इसीलिए मनीषियों ने कहा है कि अपने मन को वश में करो ,तभी आगे बढ़ पाओगे।आदरणीय रेनू श्रीवास्तव बहिन जी ने लिखा है मन को वश में करने के लिये साधना और ग्यान की आवश्यकता होती है।ग्यान की प्राप्ति के लिये सत्संग और स्वाध्याय  आवश्यक है।इन सब  के लिये आत्म शक्ति ,मन की शक्ति की जरूरत होती 

यह  सर्व विदित तथ्य है कि  मन चंचल है लेकिन इस चंचल मन की लगाम भी तो हमारे  हाथ में ही है।  स्पीड ब्रेकर दिखाई दे रहा है , आहिस्ता का  साइन भी कह  रहा है- अरे भैया आहिस्ता हो जा ,आगे बच्चे सड़क पार कर रहे हैं ,यह स्कूल ज़ोन है , लेकिन हमारे चंचल मन पर इस सभी warnings का कोई भी असर नहीं होता।  परिणाम  हम सबको पता ही है। केवल एक ब्रेक न लगाने की लापरवाही ने हमें जेल  में पहुंचा दिया।  यही ब्रेक हमें अपने मन के अश्व को ,घोड़े को लगानी  है।     मन को कैसे वश में किया जाये। क्या करें  कि हमारा  मन हमारे काबू में रहे । 

तो आइये जानते है कि मन को अपने काबू में कैसे रखा जा सकता है –

सबसे पहला काम, जो हम सबको  करना है वो है “अपने मन को समझना और समझाना  ।” अपनेआप को ,स्वयं को मन से अलग करना । जब तक हम  आत्मा और मन, भावना और इच्छा में भेद नहीं कर लेते, हम  अपने मन को काबू में नहीं कर सकते । वास्तव में मन का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व है ही नहीं । हमारी  ही कुछ आदतों , इच्छाओ और संस्कारों के समूह  को मन कहते है  जिसका संचालन भी स्वयं हम ,हमारी आत्मा ही कर रही है। दो अक्षर के इस  छोटे  से  शब्द “मन” का अगर संधिविच्छेद करें तो “म” और “न” दो अक्षर मिलते हैं जिनमें म का अर्थ  “मैं” और न का अर्थ “नहीं” माना  गया है। “मैं” का  अगर और विस्तृत  विश्लेषण करें  तो इसे आत्मा भी कह सकते हैं। हमारी आत्मा की आवाज़ , हमारी अंतरात्मा की आवाज़। जिस समय हमारा मन अंतरात्मा की आवाज़ नहीं सुनता , मन की आवाज़ अंतरात्मा की आवाज़ पर हावी हो जाती  है तब हम मन के नौकर बन जाते हैं।  आत्मा एक स्पीड ब्रेकर की तरह हमें अवगत कर रही है,  सावधान कर रही है लेकिन मन ( आदतें , संस्कार , इच्छाएं ,इन्द्रियां ) इस warning को अनसुना करने के लिए विवश कर रहा है। यह हम पर, हमारी इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है कि हमने अपने मन की वाणी  सुननी है य आत्मा की।  हम सब  सुबह से रात  तक जो भी कर्म  करते हैं वह अपनी  इच्छाओं  और आवश्यकताओं से प्रेरित होकर करते हैं  ।यह दोनों शब्द बहुत ही आवश्यक  हैं-  इच्छा और आवश्यकता । दोनों में बहुत बड़ा अंतर है । 

हर आवश्यकता (need ) एक इच्छा(desire ) होती है, लेकिन हर इच्छा एक आवश्यकता हो, यह जरुरी नहीं । 

सारा खेल इन्हीं दो शब्दों  को समझने में है। तो आइये अब हम कुछ व्यवहारिक उदाहरणो से समझने की कोशिश करते है। मान लीजिये आप पानी पी रहे है । कोई  आपसे प्रश्न करता हूँ कि पानी  क्यों पी रहे हैं  ? स्वाभाविक है  य तो आपका  मन हुआ,  इच्छा हुई  य फिर  दूसरा उत्तर -आपको  प्यास लगी, आवश्यकता हुई । इच्छा  और  आवश्यकता का यह खेल हमारे हर कार्य में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान लिए हुए है । अगर हम दोनों का अंतर्  समझ  लेते हैं तो फिर  ज़िद की बात ही आती है।  इसी ज़िद को अध्यात्म की भाषा में साधना का नाम दिया गया है। हमने तो अपने लिए  साधना का अर्थ  “सीधा करना”  मान रखा है। साधना की बात चल रही है तो क्यों न हम अपनी  साधना सिंह बहिन जी के  कमेंट पर चर्चा करें।  बहिन लिखती  हैं – गुरुदेव बोलते हैं -ध्यान करते समय मन को शांत करो, मन को भागने मत दो, मन को  दबोच लो।  सच्चा साधक वह है जिसने  मन को साध लिया, मन ही है जो हर एक चीज़  की कामना करता है, तमन्ना करता है और  मांगता है लेकिन जब हम अपने मन को मित्र बना लेते हैं तो वह मन अपने आप सधता चला जाता है। जब मन चंचल होता है नहीं मानता है तो मैं गुरुदेव को प्रार्थना करती हूं प्लीज गुरुदेव मेरे मन को शांत कर दीजिए

अगर हम आवश्यकता और इच्छा का और विश्लेषण करें तो हमें लगेगा कि हमारी संकल्पशक्ति कितनी कमज़ोर है जो इच्छाशक्ति के आगे हार मान लेती है।  

हमें  भूख नहीं है लेकिन भांति भांति-भांति के व्यंजन देखकर मुंह में पानी आ रहा है, अथक प्रयत्न  करने के बावजूद  हम  अपनेआप  को रोक नहीं पाते और उन्हे खा लेते हैं जो हमारे लिए वर्जित हैं । ऐसा केवल संकल्पशक्ति की कमी के कारण ही होता है।  इस ज्ञान को आपके समक्ष रखते हुए हम अपनी संकल्पशक्ति का मूल्यांकन भी कर रहे हैं। इन लेखों के  लिखने का उदेश्य तो तभी सफल होगा जब हम सब इस ज्ञान को अपनी अंतरात्मा में उतार पायेंगें, नहीं तो  लाखों करोड़ों अन्य लेखों की तरह यह भी इंटरनेट का अंश बन कर ही रह जायेंगें। 

हमारा मन एक अड़ियल ,बिगड़ा हुआ ,ज़िद्दी घोडा है  यदि इस पर काबू न पाया  गया तो  समय, स्वास्थ्य और जीवन को रौंदता हुआ तबाह करता चला जायेगा। यदि हम  इसे  काबू करने  में सफलता  कर लें  तो हम  महानता और  सफलता के चरमोत्कर्ष तकपहुँच सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न  यह उठता है कि इस बेलगाम घोड़े पर लगाम कैसे लगाये, इसकी ज़िद  को कैसे तोड़ें। प्रश्न का उत्तर क्या दें जब प्रश्न ही गलत है।घोड़ा ज़िद्दी अवश्य है लेकिन बेलगाम नहीं है।  लगाम तो हमारे  हाथ में है। जब तक हमें  लगाम को कण्ट्रोल करने को पूरी ट्रेनिंग नहीं है हमें घुड़सवारी का कोई हक नहीं है। हम खुद भी मरेंगें ,आसपास वालों  को भी मारेंगें। इस स्थिति में सबसे बड़ा कार्य है घोड़े की लगाम को कण्ट्रोल करने की ट्रेनिंग प्राप्त करना , confidence पाना  यानि मन को समझाने की ट्रेनिंग। मन जिस भी कार्य के लिए ज़िद  करता है, आवश्यकता का वास्ता देता है  उसे ठीक उसी तरह समझाना पड़ेगा जैसे छोटे बच्चे को गोदी में बिठा कर समझाते  हैं। आखिर दिल  बच्चा ही तो है जी। उसे तरह -तरह के उदाहरणदेने पड़ेंगें , विशेषकर  अतीत का दृश्य दिखाना पड़ सकता  है। अपने मन के साथ वार्तालाप करते हुए  कह सकते हैं, ” देख ! तूने अतीत में  यही घटिया काम किया था, तो परिणाम क्या हुआ ?, दुःख, संताप, पश्चाताप , दर्द । तो इसे दुबारा करने के लिए ज़िद क्यों कर रहा है ?” उसे भविष्य का दृश्य दिखाना पड़ेगा  कि “ अगर तू वही गलती फिर से करेगा तो  क्षणिक स्वाद, आनंद और मनोरंजन के लिए अपने भविष्य को क्यों अंधकारमय  बनाता है। 

मन को चुनौती देकर ठीक करना

मन  को कण्ट्रोल करते समय  लाभ और हानि की बराबर समीक्षा करना आवश्यक होता है। किसी भी कार्य के करने से होने वाले फायदे और नुकसान के बारे मे मन को  यथार्थ रूप से अवगत कराना भी आवश्यक होता है  ।यदि विवेक और सही तर्क साथ -साथ चलें ,एक दूसरे  के सहायक बनें तो मन शीघ्र ही वास्तविकता को समझ जायेगा और ज़िद करना छोड़ देगा , घोड़े की लगाम काबू में आ जाएगी और बड़ी गलती से बचा जा सकता है। कई बार ऐसा करने पर भी मन नियंत्रित नहीं  होता , भटकता रहता है ,शैतान बच्चे की तरह।  

फिर तो एक ही इलाज है। कड़वी दवाई। इसको कहते  हैं विवेकपूर्ण संकल्पशक्ति। 

इस स्थिति में  मन को कण्ट्रोल करना, किसी  बुरी आदत को छोड़ना अपनी prestige बना लेने जैसा  होता है।  उस बुरी आदत को हम एक शत्रु का भांति देखते हैं और उसे परास्त करना अपना prestige issue  बन जाता है।  इस सन्दर्भ में हमें स्वामी रामतीर्थ जी की  प्रसिद्ध कहानी स्मरण आती है। स्वामी रामतीर्थ जी पर हमने एक पूरा लेख लिखा है।  यह बात उस समय की है जब स्वामी रामतीर्थ कॉलेज जाते थे। जिस रास्ते से वह कॉलेज जाते थे, उसी मार्ग में एक व्यक्ति प्रतिदिन रेहड़ी  लगाता था ।उस रेहड़ी पर  पर गरमा-गर्म  जलेबी बन रही होती थी।  जलेबी देख कर  छात्र तीर्थराम ( पूर्व नाम ) का मन  ललचाता था  । गरीब होने से के कारण वह जलेबी खा नहीं सकते,  लेकिन रामतीर्थ  मन के बड़े संयमी थे। वह मन की कमजोरी को समझ चुके थे और  इससे छुटकारा पाना चाहते थे। आखिर एक दिन उन्होंने जलेबी के लिए पैसे जुटा लिए और जलेबी खरीदी । जलेबी लेकर वह घर गये और एक धागे में पिरोकर उसे छत से लटका दिया  लेकिन खाया  नहीं।  स्वामी रामतीर्थ ने कठोर संकल्प शक्ति से  अपने मन की साधना की , यानि मन को सीधा किया । जब वह खाने लायक नहीं रही तो उन्होने उसे  कीड़े – मकोड़ो को डाल दी । इसे कहते है “मन को चुनौती देकर ठीक करना”

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें। 

जय गुरुदेव

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