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“आधुनिक युग का स्वर्ग”- युगतीर्थ शांतिकुंज -हमारा 400वां लेख

20 अक्टूबर 2021 का ज्ञानप्रसाद : “आधुनिक युग का स्वर्ग”- युगतीर्थ शांतिकुंज 

पिछले लेख में हमने आपको वचन दिया था कि  परमपूज्य गुरुदेव द्वारा उठाये गए  तीन कदमों के बारे में चर्चा करेंगें। वह तीन कदम थे-  आस्तिकता,ब्रह्मवर्चस और नैमिषारण्य तीर्थ जैसे  एक तीर्थ ( शांतिकुंज ) की स्थापना करना।  यह चर्चा भी गुरुदेव द्वारा 12 फरवरी 1978 वसंत पंचमी के दिन दिए गए उद्बोधन पर आधारित है जो  “गुरुवर की धरोहर 1” में प्रकाशी हुआ था। हमें यह बताते हुए बहुत ही प्रसन्नता हो रही है कि आज का लेख हमारा 400वां  लेख है। 

तो आरम्भ करते हैं आज का  ज्ञानप्रसाद  

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पहला कदम :आस्तिकता 

ऑनलाइन ज्ञानरथ के सहकर्मी इन दो शब्दों से भलीभांति परिचित हैं -एक है आस्तिकता और दूसरा नास्तिकता। आस्तिकता का अर्थ है-नैतिकता, धार्मिकता, कर्तव्य परायणता के वातावरण का विस्तार । ईश्वर की मान्यता के साथ बहुत सारी समस्याएँ जुड़ी हुई हैं। ईश्वर एक नियंत्रण  है। उस नियंत्रण  को हम स्वीकर करें, कर्मफल के सिद्धांत को स्वीकार करें और अनुभव करें कि एक ऐसी सत्ता दुनिया में काम कर रही है जो श्रेष्ठ है, सर्वोपरि( सबसे ऊपर)  है, नेक है, पवित्र है। उसी का नियंत्रण  है और उसी के साथ चलने में भलाई है। यह  है आस्तिकता का सिद्धांत। इस सिद्धांत के उल्ट चलने वालों को नास्तिक कहा जाता है।  समय समय पर सर्वे होते रहते हैं और नवीनतम सर्वे के अनुसार सम्पूर्ण विश्व की 7 प्रतिशत जनसँख्या नास्तिक है। चीन में सबसे अधिक नास्तिकता है।  

आस्तिकता के  सिद्धांत  को अग्रगामी बनाने के लिए परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री माता के मंदिर बनाए हैं। माँ गायत्री  का अर्थ है विवेकशीलता, करुणा, पवित्रता एवं श्रद्धा। गुरुदेव ने इस सभी सिद्धांतों  का विस्तार करने के लिए हम  से  कहा  है कि हम  अपने घरों में, पड़ोस के घरों में माँ गायत्री  का एक चित्र अवश्य रखें। घर-परिवार में आस्तिकता का वातावरण अवश्य बनाएँ ।

परमपूज्य गुरुदेव यज्ञ और गायत्री की परंपरा को जिंदा रखना चाहते हैं। इसके विस्तार के लिए, झोला पुस्तकालय, चल पुस्तकालय( मोबाइल लाइब्रेरी ) चलाने से लेकर धक्का लगा कर चलाने वाली (रेहड़ी ) गाड़ी जिसे उन्होंने ज्ञानरथ का नाम दिया था बहुत ही प्रचलित हुए। आज के तकनीक-प्रधान समय में यही उपकरण आधुनिक  रूप ले चुके हैं जिनमें वीडियो रथ जिसकी वीडियो हम आपके साथ कई बार शेयर कर चुके हैं और हमारा ऑनलाइन ज्ञानरथ कुछ इसी दिशा में प्रयास हैं  

गुरुदेव ने आग्रह किया है  कि  प्रत्येक परिजन को कम से कम  दो घंटे प्रतिदिन  का समय निकालना चाहिए। यही दो घंटे भगवान का भजन है। भगवान के भजन का अर्थ है, भगवान के विचारों  को व्यापक रूप में फैलाना। गुरुदेव कहते हैं कि हमने अपने गुरु से  यही सीखा है और चाहते हैं कि आप का भी कुछ समय गायत्री माता की पूजा में लगे। जिस प्रकार  हमारे गुरु ने हमसे समय माँगा था और हमें निहाल किया था, वही बात हम आज आपसे कह रहे हैं।  अपने समय का कुछ अंश आस्तिकता को फैलाने के लिए आप भी  हमें दीजिए।  इसी को गुरुदेव ने समयदान कहा है।  हमारा बहुत बड़ा सौभाग्य है कि हमने ऑनलाइन ज्ञानरथ  के किसी भी सहकर्मी से कभी भी कुछ नहीं मांगा और सब के सब इतनी आत्मीयता से अपनत्व से जुड़ते गए कि हम निशब्द हो गए। हमें इसका सबसे बड़ा कारण तो यही प्रतीत होता है कि हमारे ऊपर उस मार्गसत्ता का दिव्य हाथ जिसका सबसे मज़बूत सन्देश ही यही है -तू  मेरा काम कर में तेरा काम करूँगा। 

अवश्य ही कुछ पाने के लिए कुछ-न-कुछ  देना तो  पड़ता ही  है। अगर हम पाने की उम्मीद करते हैं तो त्याग करना भी  तो सीखना होगा।

दूसरा कदम: ब्रह्मवर्चस 

ब्रह्म का अर्थ इतना विशाल है कि इसको शब्दों में जकड़ना अन्याय होगा।  अगर हम ब्रह्म को परमात्मा कहें और वर्चस को प्रधान कहें, supreme कहें तो शायद गलत न हो।हरिद्वार में युगतीर्थ शांतिकुंज के बगल में  गुरुदेव ने ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना कर यह सिद्ध कर दिया कि आधुनिक  उपलब्धियों के बावजूद विज्ञान अभी भी incomplete  है। यह एक अलग विषय है जिस पर आज  विस्तार से बात करना उचित नहीं होगा।   

ब्रह्मवर्चस एक सिद्धांत है।  मनुष्य के भीतर अनंत शक्तियों का जखीरा सोया हुआ है, जिसे जगाने की आवश्यकता  है। किसी भी सोये इंसान को जगाने के लिए कुछ न कुछ पुरषार्थ तो करना ही  पड़ता है। अध्यात्म की भाषा में इस  जगाने को  तप कहा जा सकता  है। तप के द्वारा मनुष्य  अपने भीतर सोए हए स्रोतों को जगा सकता है , उभार सकता है । 

बहिरंग तप के अनुसार  खाने-पीने से लेकर ब्रह्मचर्य के नियम पालना  आता है  और भीतर वाले तप में हम अपनी अंतरात्मा और चेतना को तपाने का प्रयास करते  हैं। तपाने से , तप करने से शक्तियाँ आती हैं, “मनुष्य में देवत्व का उदय होता है”। मनुष्य में देवत्व का उदय करने के लिए सामान्य जीवन में आस्तिकता अपनानी और बहिरंग जीवन में तपश्चर्या करनी पड़ती है। आस्तिकता का अर्थ नेक जीवन और तपश्चर्या का अर्थ लोकहित के  सिद्धांतों के लिए मुसीबतें  सहने से है। तप करने की शिक्षा ब्रह्मवर्चस द्वारा सिखाते हैं। 

“मनुष्य के भीतर देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण, यही हमारे दो सपने हैं।” 

हमारी कुंडलिनी और शक्तिपात इन्हीं दो प्रयोजनों में काम आती है, तीसरे किसी प्रयोजन में नहीं। तप-परायण और लोकोपयोगी जीवन-यही है  मनुष्य में देवत्व का उदय ।

 तीसरा कदम :नैमिषारण्य तीर्थ जैसा युगतीर्थ शांतिकुंज 

धरती पर स्वर्ग के वातावरण का क्या मतलब है? अच्छे वातावरण को स्वर्ग कहते हैं। स्वर्ग वैकुंठ में ही नहीं होता,  धरती  पर भी हो सकता है। जहाँ अच्छे मनुष्य , शरीफ लोग , अच्छी नीयत के लोग  ठीक पंरपरा को अपनाकर भले  मनुष्यों की भांति  रहते हों , वहीं स्वर्ग पैदा हो जाता है।गुरुदेव कहते हैं : हम चाहते थे कि धरती पर स्वर्ग बनाने के लिए कोई एक ऐसा ग्राम बसा दें  जिसमें त्याग करने वाले, सेवा करने वाले लोग आएँ और वहाँ पर सिद्धांतों के आधार पर ही अपना जीवन बिताएं । हलका फुलका जीवन , सुख शांति का जीवन, प्रेम और समर्पण का जीवन  जिएँ।  यहाँ रहने वाले दूसरों के लिए एक उदाहरण  तो बनें ही ,साथ में सभी को यह भी बता सकें कि  लोकोपयोगी जीवन भी जिया जा सकता है।युगतीर्थ  शांतिकुंज परमपूज्य गुरुदेव द्वारा रचित इसी स्वर्ग का एक आधुनिक मॉडल है। जो परिजन इस पवित्र,संस्कारित  भूमि में जाने का ,रहने का सौभाग्य प्राप्त कर चुके हैं वोह हमसे शत प्रतिशत सहमत होंगें कि यह दिव्य स्थान “आधुनिक युग का स्वर्ग” ही है। 

गुरुदेव तो कहते थे कि  यदि आपको अपने  बच्चे को संस्कारवान बनाने में कोई समस्या आ रही हो तो उसे  हमारे सुपुर्द कर दीजिए।  हम वाल्मीकि ऋषि के तरीके से आपके बच्चों को लव-कुश बना सकते हैं। आपकी पत्नी  को तपस्विनी सीता बना सकते हैं। 

गुरुदेव द्वारा रचित गायत्री परिवार के अन्य संस्थान -देव संस्कृति विश्वविद्यालय गायत्रीकुंज हरिद्वार  गायत्री तपोभूमि मथुरा ,अखंड ज्योति संस्थान मथुरा,जन्मभूमि आंवलखेड़ा आगरा और देश विदेश में फैले  अनगनित शक्तिपीठ सभी इन्ही सिद्वान्तों की पलना करते हुए आगे बढ़ रहे हैं।  आस्तिकता  ज्ञान यज्ञ एवं  विचार क्रांति के लिए यह सभी संस्थान  एक मॉडल हैं ।

लोग यहाँ हमारा प्यार पाने के लिए, संस्कार पाने के लिए, आदर्श पाने के लिए, प्रेरणा पाने के लिए, प्रकाश पाने के लिए आते हैं। सीतापुर उत्तर प्रदेश स्थित नैमिषारण्य तीर्थ  में शौनक और सूत का संवाद होता था। सारे ब्राह्मण बैठते थे, ज्ञान-ध्यान की बातें करते थे और लोकोपयोगी जीवन जीते थे। हमारा  भी मन था कि  नैमिषारण्ये के तरीके से स्नेहवश लोग यहाँ आएँ और मिलजुल कर  काम करें, प्यार की बातें करें, समाज सेवा की बातें करें, दूसरों को ऊपर उठाने की बातें करें। हम एक ऐसी दुनिया बसाना चाहते है,  ऐसा नगर बसाना चाहते हैं, जिससे दुनिया को दिखा सकें कि भावी जीवन, भावी संसार, में अगर स्वर्ग की रचना हो सकी तो वह स्वर्ग कैसा होगा।  स्वर्ग में शांति का, परमार्थ का जीवन जीने के लिए क्या-क्या तकलीफें आ सकती हैं।  हमारे गुरु ने कहा कि अगर  तेरा उद्देश्य ऊँचा हो  तो तुम्हे कोई  कमी नहीं पड़ेगी। मैं भी आपको विश्वास दिलाता हूँ कि अगर आपके जीवन में उद्देश्य ऊँचे हों, तो आपको कोई  कमी नहीं रहेगी, कोई अभाव नहीं रहेगा।

मेरी एक ही इच्छा, एक ही कामना रही है कि वसंत पर्व के दिन आपको बुलाऊँ और अपने भीतरवाली  पिटारी को खोलकर दिखाऊँ कि मेरे अंदर जीवन को पवित्र बनाने के लिए  कितना दर्द  है, कितनी करुणा है, कितनी संवेदना है। अगर आपको ये सिद्धांत  पसंद हों तो मैं चाहता हूँ कि आप भी इन सिद्धांतों को अपनाएं। जिस प्रकार हमने अपने गुरु के सिद्धांत अपनाए , आप भी हमारे सिद्धांत ले जाइए  , महानता ले जाइए, श्रेष्ठता  ले जाइए।  जिस  प्रकार हमारे गुरु ने हमें यह सब अनुदान दिए हम भी आपको शक्तिपात और कुंडलिनी के रूप में देंगें।  हमारे पाठकों ने परमपूज्य गुरुदेव का वह वाला उद्बोधन अवश्य सुना होगा जिसमें गुरुदेव युगतीर्थ शांतिकुंज में आने का आमंत्रण तो दे ही रहे हैं, साथ में यह भी आग्रह कर रहे हैं कि इस पावन संस्कारित  भूमि  पर कुछ दिन व्यतीत करिये – आप देखेंगें आपका कायाकल्प हो जायेगा। यही हमारी अभिलाषा है ,यही हमारी आकांक्षा  है।  

 तो मित्रो आज का लेख यहीं पर समाप्त करने की आज्ञा लेते हैं और कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें। 

जय गुरुदेव

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