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सर एलन आक्टेवियन ह्यूम और गुरुदेव की  वार्ता 

4 अक्टूबर 2021 का ज्ञानप्रसाद- सर एलन आक्टेवियन ह्यूम और गुरुदेव की  वार्ता 

आज का ज्ञानप्रसाद 13 अगस्त 2021 को प्रकाशित हुए  लेख का अगला  पार्ट है, शब्दों की सीमा के कारण बिना किसी भूमिका के लेख की ओर चलते हैं।

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13 अगस्त 2021 के  ज्ञानप्रसाद  में हमने आपको ब्रिटेन  में जन्मे सर एलन आक्टेवियन ह्यूम के बारे में बताया था जब वह आकाश में घूम रहे बादल के टुकड़े में से प्रकट होकर एक वायवीय शरीर की आकृति में उभरे और गुरुदेव से कितनी ही देर तक बातें करते रहे। वायवीय शरीर की परिभाषा हमने 13 अगस्त वाले लेख को लिखते समय भी समझने का प्रयास किया था लेकिन अधिक समझने के प्रयास का अर्थ कई बार और confuse होना होता है। शायद यही हमारे साथ हो रहा था।  अगर वायवीय शब्द की बनावट देखें तो वायु के साथ मिलता जुलता लगता है ,इंग्लिश में अनुवाद  करने पर pneumatic शब्द मिला जिसका सम्बन्ध  वायु  के साथ मिलता जुलता लगता है। इंजीनियरिंग के विद्यार्थी  pneumatic शब्द से भलीभांति परिचित होंगें लेकिन हम अपने लेखों को  इतना सरल बनाकर प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं कि अशिक्षित भी आसानी से समझ सके। इस प्रयास में हमारी दशा तो एक बार नीचे लिखी पंक्तियों की तरह हो गयी थी और यही बार -बार यही विचार खाये  जा रहे थे कि अपने सहकर्मियों को क्या उत्तर देंगें।   

The more I study,the more I know.

The more I know the more I forget.

 The more I forget The less I know.

 So why study ? 

जब परमपूज्य गुरुदेव मिस्टर ह्यूम से वार्तालाप कर रहे थे तो शांतिकुंज के कुछ कार्यकर्ता भी पहंचे थे , उन्हें आभास तक नहीं हुआ था कि  यहाँ कोई है और गुरुदेव से कोई संवाद कर रहा है।  कार्यकर्ता अपनी बात करके ,गुरुदेव से निर्देश लेकर चले गए लेकिन ह्यूम को  अपने संवाद जारी रखने में कोई भी कठिनाई नहीं हुई। 

सर ह्यूम के साथ क्या  बात हुई वह तो आगे चल कर बताते ही हैं लेकिन जो लोग  परमपूज्य गुरुदेव की शक्ति से परिचित नहीं हैं उनके लिए यह घटना एक EYE – OPENER का काम कर सकती है। हमारे पूर्वप्रकाशित ज्ञानप्रसाद में परमपूज्य गुरुदेव को पांच शरीरों में कार्य करते सिद्ध किया गया है।  एक ही समय पर पांच जगहों पर पांच गुरुदेव पांच अलग -अलग कार्य करते हुए दिखाई गए हैं, यहाँ तो हम केवल दो ही शरीरों का काम देख रहे हैं।  एक शरीर मिस्टर ह्यूम से बात कर रहा है और दूसरा शांतिकुंज के कार्यकर्ताओं को निर्देश दे रहा है।  यह सब  युगतीर्थ शांतिकुंज के उस संस्कारित कक्ष  में हो रहा था जहाँ परमपूज्य गुरुदेव ने घोर साधना की। यह पवन भूमि जहाँ गुरुदेव ने  शांतिकुंज की स्थापना की किसी समय मुनि विश्वामित्र की तपस्थली रही थी।

मिस्टर ह्यूम और गुरुदेव की बातें मानवीय स्तर से कहीं ऊँची है, इन बातों   को पारलौकिक (transcendental) दृष्टि से ही समझा  जा सकता है , परमपूज्य गुरुदेव और मिस्टर ह्यूम जैसी सिद्ध आत्माएं ही ऐसी बातें करने में सक्षम हैं ,हम और  आप जैसे साधारण मानव नहीं। पारलौकिक को  समझने के लिए हमारे जैसे अल्पज्ञान ,अल्पबुद्धि वाले मानव के लिए इतना ही काफी है – “ वह लोक लोक जिसमें हम रह रहे हैं उससे  ऊपर वाला लोक ।” यदि इससे अधिक समझने का प्रयास करें तो फिर इंग्लिश में ऊपर लिखी  पंक्तियों वाली स्थिति हो जाएगी।     

सर ह्यूम का देहांत 31 जुलाई 1912 को हो चुका  था जब परमपूज्य गुरुदेव की आयु केवल 10 माह  थी।  परमपूज्य गुरुदेव का जन्म आंवलखेड़ा आगरा में 20 सितम्बर 1911 को हुआ था।  अगर भौतिक calculation  से  जाएँ तो गुरुदेव का उनके साथ तो  कोई सम्बन्ध ही नहीं होना चाहिए  लेकिन जो हम आज इस लेख में लिख रहे हैं  वह केवल आध्यात्मिक ,पारलौकिक,आंतरिक,  दृष्टि ही है जिसके माध्यम से गुरुदेव सब देख रहे हैं  और देख भी कब रहे हैं 1975 में , सर ह्यूम की मृत्यु के 63 वर्ष बाद।  हमें तो यह दिव्य दृष्टि लगती है , आप भी इसका विश्लेषण कीजिये और कमैंट्स के द्वारा अपने-अपने विश्लेषण  शेयर कीजिये। हम अखंड ज्योति के आभारी हैं जिसमे यह लेख प्रकाशित हुआ और हमें इसका विश्लेषण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।     


शांतिकुंज में गुरुदेव लेखन का कार्य समाप्त करने के बाद चहलकदमी करने लगे। कुछ कदम ही चले होंगे कि उनका ध्यान आकाश में तैरते हुए एक बादल के टुकड़े की ओर गया। वह टुकड़ा जैसे गुरुदेव के पास ही उड़ा चला आ रहा था। इस तरह उड़ रहा था, जैसे पग-पग चल रहा हो। पास आते-आते वह आकार लेने लगा। बरामदे के बाहर आकर रुक गया और मानवीय आकार लेने लगा। कुछ ही क्षणों में वहाँ एक वायवीय शरीर (pneumatic body )उभरने लगा।

आकृति धीरे-धीरे स्पष्ट हुई। उन्नीसवीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों जैसी वेशभूषा में एक अधेड़ अँगरेज व्यक्तित्व सामने हवा में खड़ा था। चेहरे पर घनी-लंबी मूंछे। सिर पर थोड़े से बाल और हलकी दाढ़ी वाला यह व्यक्ति ऊँचे पूरे कद का था। गुरुदेव ने उस पुरुष छाया को पहचानते हुए अभिवादन में हाथ उठाया। उस पुरुष आकृति ने झुककर प्रणाम किया और अपना परिचय देने के लिए ओंठ खोले ही थे कि गुरुदेव ने कहा-“आइए ह्यूम   साहब। भीतर आ जाएँ। आपका स्वागत है।” वह आकृति बरामदे में उतर आई। गुरुदेव ने उन्हें अपने कक्ष में आमंत्रित किया और अपने साथ ले जाते हुए यह भी कहा कि आपके आगमन की सूचना मिल गई थी। सुबह  नौ-दस बजे तक आपके आने की संभावना थी। प्रयोजन भी स्पष्ट था। सिर्फ आपसे मिलना बाकी था। वह साध भी पूरी हो रही है।

गुरुदेव के बताए स्थान पर बैठते हुए ह्यूम ने थोड़ा संकोच जताया। कहा कि साध तो मेरी पूरी हो रही है गुरुदेव। आपकी कृपा से हम लोगों ने सौ साल पहले जो काम शुरू किया था, वह आपके मार्गदर्शन में ही पूरा हो रहा है। 1875 में रूसी -जर्मनी बैकग्राउंड वाली हेलेना ब्लावट्स्की नामक महिला ने थियोसोफिकल सोसाइटी की  स्थापना की थी और गुरुदेव से बातचीत 1975 में हो रही थी।  Theosophy का हिंदी अनुवादब्रह्मविद्या” होता है जिसे समझना फिर उतना ही कठिन है जितना वायुवीय य पारलौकिक। सर ह्यूम के वायवीय शरीर ने गुरुदेव के चरणों में प्रणाम किया और आश्वस्त-सा होते हुए कहा कि आपसे आज की मुलाकात के बाद हम लोग विश्राम से सो सकेंगे। मैडम ने हम अंतरंग पार्षदों को जो दायित्व सौंपा है, वह भी पूरा हो सकेगा।

सर एलन आक्टेवियन ह्यूम – इंडियन नेशनल कांग्रेस  के संस्थापक 

1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस  की स्थापना करने वाले सर एलन आक्टेवियन ह्यूम का जन्म ब्रिटेन में  हुआ। भारत में बंगाल सिविल सर्विस से अपना कामकाजी जीवन शुरू करके  और 1882 में रिटायर होने तक वे विभिन्न प्रशासनिक पदों पर रहे। कामकाजी जीवन के दौरान उन्होंने अनुभव किया कि सरकार के क्रियाकलापों, नीतियों और फैसलों से जनता में असंतोष फैल रहा है। इस असंतोष को संगठित करने के लिए उन्होंने समकालीन ( contemporary)  सामाजिक और राजनीतिक विभूतियों के साथ मिलकर काम शुरू किया। सन् 1884 के अंत में उन्होंने सुरेंद्रनाथ बनर्जी और व्योमेशनाथ बनर्जी के साथ मिलकर इंडियन नेशनल कांग्रेस  की स्थापना का निश्चय किया। साल भर घनघोर प्रयत्न करने के बाद उन्होंने तथा दादा भाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता और गोपाल कृष्ण गोखले आदि ने साथ मिलकर दिसंबर 1885 में कांग्रेस की स्थापना कर ली। मिस्टर  ह्यूम के बारे में प्रसिद्ध है कि वे शरीर से भले ही भारतीय न हों, लेकिन उनकी काया में भारतीय आत्मा का निवास था।” भारत और भारतीय समाज के प्रति उनके लगाव को देखकर यह स्थापित हो चुका था कि उन्होंने सरकारी सेवा में रहते हुए अँगरेज सरकार से भारतीयों को उनके अधिकार दिलाने की भरपूर चेष्टा की। उन्होंने यह बताने की चेष्टा भी की कि भारत के लोग अपने देश का प्रबंध सँभालने में सक्षम हैं। उन्हें भी सरकारी नौकरियों और प्रशासनिक सेवाओं में समानता मिलनी चाहिए।

सर ह्यूम का आध्यात्मिक और आंतरिक व्यक्तित्व :

ह्यूम के  प्रशासनिक और राजनीतिक पक्ष के इलावा एक और पक्ष था जो  आंतरिक और आध्यात्मिक है, जिसकी कम ही चर्चा होती है। इस पक्ष के संबंध में सूचना है कि जब  ह्यूम सरकारी सेवा से रिटायर हो गए तो गर्मियों  में उन्होंने  अपने शिमला स्थित निवास में गोपनीय दस्तावेजों की सात बड़ी-बड़ी पुस्तकें  पढ़ी । इन दस्तावेजों के बारे में कहा जाता है कि शासनतंत्र ने इन्हें जिलास्तर की शाखाओं में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर तैयार किया था। इन दस्तावेजों के बारे में  गिरिजा मुखर्जी, गुरुमुख निहालसिंह, लाला लाजपत राय और रजनी पामदत्त आदि विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से टिप्पणी की है। कुछ के अनुसार इनमें अँगरेजों के प्रति भारतीय समाज में बढ़ रहे रोष की सूचना थी, कुछ के अनुसार लोगों द्वारा ब्रिटिश सरकार को धोखा देने और अपना अलग स्वायत्त तंत्र विकसित कर लेने की जानकारी थी। ह्यूम  के उस अध्ययन के बारे में प्रामाणिक जानकारी उनके समय के ही  ब्रिटिश अधिकारी सर विलियम वेडरबर्न  ने दी थी  मुंबई (तब बॉम्बे) हाईकोर्ट में जज रहे और बाद में मुंबई सरकार के मुख्य सचिव बनकर रिटायर हुए वेडरबर्न  ह्यूम के अच्छे दोस्त थे। उन्होंने ह्यूम की जीवनी में लिखा है कि शिमला में बैठकर उन्होंने जो दस्तावेज देखे थे, उनमें देश भर में फैले मठों, महात्माओं और उनके शिष्यों के अलावा सिद्ध संतों के बारे में पर्याप्त सूचनाएँ थीं। उनकी गतिविधियों के अलावा भारत के भविष्य के बारे में उनकी योजनाओं और अंतर्दर्शन के बारे में भी काफी सूचनाएँ थीं।

इन सूचनाओं के आधार पर वेडरबन ने लिखा है कि ह्यूम  का ऐसे महात्माओं से संपर्क था, जो कंदराओं में रहकर रहस्यमय साधनाएँ करते रहते थे। वे कहीं भी आ-जा सकते थे, लेकिन लोगों को दिखाई नहीं देते। वे अदृश्य रहते और संसार में किसी भी व्यक्ति, जीव और यहाँ तक कि जड़ वस्तुओं से भी संवाद कर सकते थे।”

तिब्बत के पास एक रहस्य्मय क्षेत्र में विश्व को नया रूप  देने के लिए तप कर रहे महात्माओं के बारे में सर ह्यूम ने कहा है  कि वे एक बार गुरुदेव को उनके बीच देखना चाहते  हैं लेकिन इन महात्माओं की संख्या इतनी अधिक है कि अगर  यह सब या  उनके कुछ ही प्रतिनिधि यहाँ पहुंचें  तो उथल-पुथल मच जाएगी। जिस मार्ग से वे आयेंगें वहां का वातावरण उनके उपयुक्त नहीं है , उनकी उपस्थिति और प्रवास का स्पर्श उस वातावरण में परिवर्तन लाएगा और वह परिवर्तन मार्ग में रहने वालों को सहन नहीं होगा। इसलिए बेहतर तो यही होगा कि परमपूज्य गुरुदेव स्वयं उस सिद्ध क्षेत्र  में चलें  और महात्माओं से संवाद करें। ह्यूम ने बताया कि इस सिद्ध क्षेत्र में  24118 सिद्ध पार्षद तप -अनुष्ठान में निरत हैं और समय -समय पर विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में जाते रहते हैं। 

ह्यूम का वायवीय रूप  में  गुरुदेव के पास आना भी  इन सिद्ध आत्माओं का अनुग्रह ही था। उन्होंने कहा कि वह इन सिद्ध महात्माओं के प्रतिनिधि और संदेशवाहक के रूप में  कार्य करते हैं। ह्यूम ने कहा कि  इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना में उनका योगदान निमित्तमात्र था लेकिन इतिहास उन्ही को श्रेय देता है , असली श्रेय तो इन दिव्य आत्माओं का ही था – यह उन्ही की योजना थी 

ह्यूम की बातों से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय  मूल के सिद्ध संतों को भी इन महात्माओं से मार्गदर्शन मिलता रहा है।  महर्षि अरविन्द का 1908 में अचानक स्वतंत्रता आंदोलन से अलग होकर पॉण्डिचेरी चले जाना उन्ही का आदेश था। इन सिद्ध आत्माओं को आभास था कि भारत की स्वतंत्रता निश्चित है और अरविन्द जैसी आत्माओं को आध्यात्मिक शक्ति  से  वातावरण उर्वर बनाना  चाहिए। गुरुदेव के साथ इस चर्चा के दौरान ह्यूम ने कहा स्वयं आप भी तो 1940 के आसपास अपने मार्गदर्शक  के निर्देश पर  से अलग हुए थे। ह्यूम ने कहा -मैं यह केवल दुनियादारी के हिसाब से कह रहा हूँ – असल बात तो यह है कि आपमें और आपकी मार्गसत्ता में क्या अंतर् है – “कुछ भी तो नहीं” 

धन्यवाद् जय गुरुदेव

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