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गुरुभाई बाबा कालीनाथ से गुरुदेव की संक्षिप्त सी भेंट

30 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद -गुरुभाई बाबा कालीनाथ से गुरुदेव की संक्षिप्त सी  भेंट ( Chetna ki shikhar yatra 2 -chapter 7)

आज का ज्ञानप्रसाद “जीवनदानियों की खोज” के अंतर्गत अंतिम लेख है।  हम सबने  प्रोफेसर त्रिलोकनाथ जी -सुशीला देवी दम्पति  और तुलाधार -दमयंती दम्पति के समर्पण के अत्यंत प्रेरणादायक  विवरणों का अमृतपान किया। परमपूज्य गुरुदेव की दिव्यशक्ति को देख कर ,अनुभव कर अपने गुरु के प्रति श्रद्धा और भी प्रगाढ़ हुई, ऐसा हम सबका विचार है।  तुलाधार और दमयंती के  मार्मिक निधन के उपरांत शांति यज्ञ सम्पन्न करके परमपूज्य गुरुदेव त्रिवेणी संगम के किनारे अपने गुरुभाई बाबा कालीनाथ जी से मिले। इस लेख में किसी  जीवनदानी की बात तो नहीं है लेकिन दो गुरुभाइयों की संक्षिप्त वार्ता बहुत ही रोचक और शिक्षाप्रद है।  बाबा कालीनाथ की special quality के बारे में जानते हुए  हमें इन योगी गुरुओं की दिव्य शक्ति का तो आभास तो होगा ही, साथ में एक और बहुत ही उच्कोटि के तथ्य के ऊपर stamp लगाने का सौभाग्य भी मिलेगा और वह तथ्य है -अपनी शक्ति का समस्त श्रेय अपने गुरु को देना (  जो उत्तर मैं दे रहा था, वे भी गुरु  से ही आ रहे थे।’)  

कालीनाथ जी का विवरण केवल 766 शब्दों का है तो हमने सोचा कि क्यों न अपने सहकर्मियों से कुछ बातचीत की जाये।  तो कालीनाथ जी के विवरण के बाद हम अपनों से अपनी बात करेंगें।   

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 गुरुभाई बाबा कालीनाथ जी से भेंट :

तुलाधार और दमयंती की स्मृति में शांति यज्ञ सम्पन्न करने के बाद गुरुदेव त्रिवेणी संगम के किनारे पहुंचे। वहां गंगा की ठंडी रेत पर बीसियों झोपड़ियां बनी हुई थीं। इन झोंपड़ियों में  लोग कल्पवास अर्थात माघ के पूरे महीने में व्रत नियमों का पालन करते हुए गंगा किनारे ही रहने की मर्यादा का पालन करते  हुए दिखे  । ऐसी ही एक झोपड़ी में कालीनाथ नामक एक संन्यासी मिले जो  काशी, प्रयाग, अयोध्या, चित्रकूट आदि तीर्थों में रहने का व्रत लिये हुए थे। कालीनाथ जी  के बारे में दो बातें  विख्यात थीं। एक  कि उनकी कही हुई कोई भी बात गलत नहीं होतीऔर  दूसरी कि वे मन की बात अनायास ही जान जाते हैं।  कालीनाथ जी आगुन्तकों के आने वाले   से पहले  ही उस बात को  लिखकर रख देते थे और जब वह आते तो उन्हें बता देते ।इन्हीं झोंपड़ियों  में से एक में कालीनाथ जी कल्पवास कर रहे थे। वह केवल  गोदुग्ध पर ही तप कर रहे थे और  चारों तीर्थों में निवास करते हुए गुरुवर की भांति जौ की रोटी, छाछ और दूध पर ही निर्भर रहते थे। 

इन व्रतों के बारे में सुनकर गुरुदेव कालीनाथ बाबा को मिलने के लिए  उत्सुक हुए । सुबह आठ बजे के करीब  वे बाबा की कुटिया पर पहुंचे। बाहर कोई नहीं था, दरवाजे के पास एक गाय बंधी हुई थी। बाबा ने उसे टाट और कंबल ओढ़ा रखा था। दरवाज़ा  खुला हुआ था। गुरुदेव अकेले ही थे। उन्होंने खुले दरवाज़े  पर हलकी सी दस्तक दी और भीतर झांका। झोंपड़ी में  संन्यासी आसन पर पालथी मारे बैठे हुए थे। वस्त्र के नाम पर उन्होंने सिर्फ एक लंगोटी  पहनी हुई थी । अच्छी कद काठी के यह संन्यासी  ही बाबा कालीनाथ थे। गुरुदेव की आहट पाते ही उन्होंने संकेत से अंदर आ जाने के लिए कहा। गुरुदेव  पास जाकर बैठ गये। बाबा के पास बांई ओर कमंडल रखा था। उन्होंने दायें हाथ की अंगुलियां कमंडल में डाली, उसमें रखे पानी में भिगोई और पानी अपने सिर पर छिड़क लिया। आंखे खोली और गुरुदेव की ओर देखकर बोले, ‘आप कुछ देखने नहीं पास बैठने आये है न,लेकिन  फिर भी कुछ देख ही लीजिये।’ । गुरुदेव ने कहा , “नहीं महाराज मैं आपके दर्शन के लिए आया हूँ ,आपकी विभूति के लिए नहीं।” बाबा  माने नहीं और कहने लगे,   “कुछ तो  देख ही लें ।” कहते कहते उन्होंने पास रखे कागज के टुकड़ों पर पेंसिल से कुछ लिखा। उन्हें मोड़ा और तकिये के नीचे रख दिया। इसके बाद वे बोले, “आप जो पत्रिका निकालते हैं उसमें चित्र के नीचे कुछ पंक्तियां लिखी होती हैं। क्या हैं वे पंक्तियाँ ?’गुरुदेव ने उन पंक्तियों को पढ़ कर सुनाया। बाबा ने तकिये के नीचे रखा कागज का एक टुकड़ा निकाला और गुरुदेव की ओर बढ़ाया। उस टुकड़े पर वही पंक्तियाँ लिखी हुई थीं। फिर बाबा ने कहा उपनिषद का कोई मंत्र बताइये जो आपको बहुत प्रिय हो। गुरुदेव ने वृहद आरण्यक का मंत्र सुनाया-‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्य श्रोतव्य, ध्यातव्य निदिध्यासतव्य।’ उनका कहना था कि बाबा ने तकिये के नीचे रखा एक ओर कागज का टुकड़ा निकाला। उस पर वही मंत्र वाक्य लिखा हुआ था। दो तीन बातें और हुई। फिर बाबा ने कहा ‘गंधी बाबा  ने भारत माता की जो मूर्ति दी थी वह कहाँ है? पूजा स्थल में रखी हुई है न ?’ कालीनाथ बाबा स्वामी विशुद्धानंद की दी हुई प्रतिमा का उल्लेख कर रहे थे।गुरुदेव  इस बात से चौंके बिना कहने लगे, “मैं उसे विसर्जित करना चाहता हूँ।” बाबा ने कहा -‘इस बारे में मैं कुछ नहीं कहूँगा,’ बाबा ने कहा, ‘डेढ़ दो साल बाद तुम लोगों की बलि चढ़ाना चाहते हो। उस अवसर पर होने वाले महायज्ञ में तुम्हारे महापुरश्चरणों की पूर्णाहुति होगी लेकिन वह बलिदान का आरंभ होगा। आगे सैकड़ों हजारों लोग अपनी बलि देने के लिए आएंगे। उनके आवेग को संभालना।’ उस समय तक गुरुदेव ने नरमेध यज्ञ की विधिवत घोषणा नहीं की थी। निजी चर्चाओं में  उल्लेख ज़रूर करते थे। इस बार वसंत पंचमी पर घोषणा करने का मन बना लिया था। कालीनाथ बाबा ने उस बारे में बता दिया तो गुरुदेव को थोड़ा भी आश्चर्य नहीं हुआ। 

बाबा अपनी बात कह चुके और सामान्य विषयों पर चर्चा होने लगी। परिचय के उसी दौर में गुरुदेव ने पूछा, ‘आपके गुरु कहां निवास करते हैं? उनका नाम क्या है?’ कालीनाथ बाबा सुनकर मुसकराये, उनकी मुस्कराहट अर्थपूर्ण थी। चमकते हुए ललाट पर कुछ रेखाएं उभरी और खिले होंठों से ही उनकी वाणी निकलकर आई, ‘जो तुम्हारा गुरु है, वही हमारी भी मार्गदर्शक सत्ता है। उससे संकेत पाकर बहुत से साधक गिरि कंदराओं से निकल कर आये हैं, आगे भी आयेंगे। वे अपने गुरु के महत्कार्य को आगे बढ़ायेंगे। जो उत्तर मैं दे रहा था, वे भी वहीं से ही  आ रहे थे।’

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अपनों से अपनी बात :

1.अपनों से अपनी बात के अंतर्गत  सबसे पहले हम यह कहना चाहेंगें कि  कल का ज्ञानप्रसाद आदरणीय सरविन्द कुमार जी के विचारों पर आधारित होगा। यह विचार उन्होंने 22 सितंबर को  भेजे थे।  लगभग 1600 शब्दों के यह अतिउत्तम विचार एक पूरे लेख में ही फिट किये जा सकते थे, इसलिए हम प्रतीक्षा करते रहे। इन विचारों को आपके समक्ष प्रस्तुत करने में एक ही उदेश्य है कि और भी दिव्य आत्माएं आगे आएं और ज्ञानरथ के पुण्य कार्य में हमारा हाथ बटाएं। साधना सिंह जी ने कमेंट करके लिखा है “हमारे लायक कोई कार्य हो तो अवश्य बताएं।  हमें उन्हें रिप्लाई करते हुए धन्यवाद् किया है। 

 एडिटिंग करते समय हम उनकी आज्ञा को ध्यान में रखते हुए प्रयास करेंगें कि हमारे बारे में जो भी व्यक्तिगत बातें लिखी हैं उनको न प्रकाशित  करें। हमें पूर्ण विश्वास है कि  सरविन्द भाई साहिब सभी के लिए इतने आदर भरे शब्द प्रयोग करते हैं और यह सब उनके अन्तःकरण में से ही निकलते हैं, लेकिन हमारे लिए प्रयोग किये गए  ऐसे शब्द सार्वजनिक करना अपनी बड़ाई और वाह -वाह  कमाने की वृति हो सकती है। हम सब एक ही लेवल पर रह कर गुरुकार्य कर रहे हैं , कोई छोटा -बड़ा नहीं हैं ,सब एक ही गुरु के शिष्य हैं ,उस गुरु के शिष्य जो सादगी की मूर्त हैं ,जिन्होंने पंडित लीलापत शर्मा जी को उनके लिए  फर्स्ट क्लास की टिकट बुक कराने  पर  फटकार लगाई थी, जिन्होंने  अफ्रीका की यात्रा समुंद्री जहाज़ में की , जिन्होंने गलती से संतरे के  जूस का एक पिया  घूँट उगल दिया था – क्या क्या लिखें अपने उस महान  गुरु के बारे में जो हम सबके मार्गदर्शक हैं। 

2.अरुणा जोबनपुत्र बहिन जी के घर नाती आगमन के लिए हम सब सामूहिक तौर से अपनी शुभकामना और बधाई भेजते हैं। परमपूज्य गुरुदेव से प्रार्थना करते हैं कि अपना आशीर्वाद इस बच्ची पर सदैव बरसाते रहें। 

3.हमारी रेगुलर और आदरणीय रेनू श्रीवास्त्व बहिन जी ने हमारी सबकी प्रिय बिटिया प्रेरणा को child is the father of man कहते हुए प्रेरणा नाम के अनुरूप कहा है। दोनों को हमारा ह्रदय से धन्यवाद्। 

4.बहिन सुमन लता जी ने Flash update में कमेंट  करके हम सबका उत्साहवर्धन तो किया ही है लेकिन हमारे लेखों द्वारा अगले पायदान पर चलने की बात बहुत ही अच्छी लगी। 

5.आदरणीय रजतकुमार सारंगी जी ने JB Paul भाई साहिब की बात  पर स्टैम्प  लगाई  है जिन्होंने हमारे लेखों को TV सीरियल के एपिसोड की संज्ञा दी थी। 

6.हमारे वरिष्ठों ने 50 -60 के दशक में ब्रॉडकास्ट होने वाले विविधभारती के प्रोग्राम अवश्य सुने होंगें और उन्ही प्रोग्रामों में “आपके पत्रों के उत्तर” शीर्षक से एपिसोड भी सुने होंगें जिनमें रेडियो host पत्रों के उत्तर देते थे।  हम भी नीले रंग के  अंतर्देशीय पत्र पर य पांच पैसे के पीले कार्ड पर अपने प्रश्न भेजते रहे हैं।  और फिर प्रतीक्षा  करते थे रेडिओ में  अपने नाम बोले जाने की – झुमरीतलेयां से राजू ,बिट्टू ,नीना ,सोनू आदि हमने भी आपके कमैंट्स के उत्तर दिए। यह कमेंट केवल यूट्यूब के हैं ,दूसरे सोशल मीडिया साइटस वाले कमेंट हमने include नहीं किये हैं। 

7.अंत में बात कर रहे हैं अपने बहुत ही लाडले धीरप बेटे की और रेगुलर सहकर्मी आदरणीय प्रीती भरद्वाज  जी की। शनिवार इन दोनों के साथ 64 मिंट और 31 मिंट बात हुई , कई व्यक्तिगत विषयों पर और ज्ञानरथ के प्रचार-प्रसार पर चर्चा होती रही। धीरप बेटे की वेदना – कोई सुनता नहीं है ,हर कोई यही कहता है समय नहीं है – अवश्य ही चिंताजनक है। लेकिन इसका विकल्प क्या है , क्या हम कहना छोड़ दें -कदापि नहीं।  भारत एक युवा देश है जिसमें 80 करोड़ से लगभग युवा हैं , इन सब पर भारत को ,हम सबको  बड़ी आशाएं हैं। मस्तीचक की बेटियां, गायत्री परिवार का Divine India Youth Association (DIYA) जैसे कितने  ही उदाहरण हमरी आंखों के आगे चलचित्र की भांति  घूम जाते हैं। हम तो यही कहेंगें -Try Try Again and stop not until the goal is achieved .  

 तो मित्रो आज का लेख यहीं पर समाप्त करने की आज्ञा लेते हैं और कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें। 

जय गुरुदेव

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