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भगवान शिव के  नेत्र -राक्षसताल और मानसरोवर

22 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद : भगवान शिव के  नेत्र -राक्षसताल और मानसरोवर

आज का लेख  ” गुरुदेव की हिमालय यात्रा सीरीज ” का अंतिम लेख है। इन लेखों को लिखते-लिखते दिव्यता का आभास तो होता ही रहा लेकिन चेतना की शिखर यात्रा 2 शीर्षक पुस्तक को बार -बार पढ़ने का मन होता रहा। पेजले भी एक बार लिखा था कि अगर जानकारी बहुत अधिक हो तो उसे कम शब्दों में compile बहुत ही कठिन कार्य  होता है।  पिछले कई घंटों में हमें तो स्मरण ही नहीं है कि कितनी वीडियोस देख डालीं , कितनी वेबसाइट देख डालीं , इतना विस्तृत ज्ञान है कि हम तो यही कह कर बंद कर रहे हैं कि ज्ञान असीमित है और इसको सीमाबद्ध करना हमारे हाथ में है। 

तो आइये  एक बार फिर से चलते हैं  गुरुदेव के साथ-साथ कैलाश मानसरोवर क्षेत्र में :

राक्षसताल और मानसरोवर झील :

चेतना की शिखर यात्रा 2 में वर्णित गुरुदेव राक्षसताल के मार्ग से कैलाश मानसरोवर पहुंचे थे। कैलाश पर्वत ( ग्लेशियर ) पर विराजमान भगवान भोले नाथ जहाँ हम सबको दिव्यता प्रदान करते हैं ,वहीँ मानसरोवर झील एक दिव्य वातावरण देकर मानवता का पोषण करती है। 

ज्ञानगंज से निकल कर गुरुदेव  को करीब चालीस मील चलना पड़ा होगा। पठार पर उतरते हुए उन्हें दूर पक्षी उड़ते दिखाई दिए। पक्षी विविध प्रकार के नहीं थे। सफेद रंग के ये पक्षी पास आने पर पता चला कि हंस हैं। वहां बताने वाला कोई  था नहीं केवल  अनुमान ही लगाया जा सकता था। पठार से उतरते हुए  गुरुदेव ने मनुष्य के नेत्र के समान एक विशाल सरोवर देखा जिसका आकर ऐसा था कि  आंखों के आसपास पलकों, कोरों और कनपटियों तक जैसी रेखाएं फैली होती है।  पहाड़ी से उतरते हुए तालाब स्पष्ट रूप से आंख की तरह लगता था।

इस सरोवर का नाम राक्षसताल झील है । उसके आकार प्रकार और पहले मिले वर्णन से गुरुदेव  ने अनुमान लगाया कि इसी ताल के बारे में शास्त्रों ने “शिव का नेत्र” होने की बात कही है।पौराणिक ग्रंथों के आधार पर मानसरोवर झील का विचार सृष्टि के रचियता ब्रह्मा जी के मन में सबसे पहले आया था। मानसरोवर का शाब्दिक अर्थ मानस -सरोवर है यानि “मन का सरोवर।” मान्यता है कि यहाँ देवी सती का दायां हाथ गिरा था ,झील के बाहिर एक शिला को उसी का रूप मान कर पूजा जाता है। मानसरोवर झील  के पास ही दूसरी झील है जिसका नाम राक्षसताल है । इसे रावणताल भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है की रावण ने भगवान भोले नाथ की भक्ति करके इसी झील में अपने शीश अर्पण किये थे। पौराणिक मान्यताओं के साथ -साथ हम वैज्ञानिक तथ्यों को नज़रअंदाज तो नहीं कर सकते।Geology के वैज्ञानिकों के मुताबिक राक्षसताल और मानसरोवर दोनों एक ही झीलें थीं और धरती के हलचल से अलग हो गयीं। मानसरोवर का जल मीठा परन्तु राक्षसताल का जल खारा है।  समुद्र तल से 15000 फुट की ऊंचाई पर स्थित यह पौराणिक और आधुनिकmasterpiece साधकों और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। चार सम्प्रदाओं -हिन्दू ,जैन ,बौद्ध और बोन धर्म या बॉन धर्म ( तिब्बत का धर्म  ) में इस क्षेत्र की बहुत अधिक मान्यता है। गुरुदेव ने मानसरोवर झील के तट पर बैठ कर कुछ देर ध्यान किया और फिर परिक्रमा भी की। एक परिक्रमा में लगभग 3 घंटे लगते हैं। गुरुदेव देख रहे थे कि हंस मोती खा रहे हैं कि नहीं। हंस मोती तो खाते दिखे नहीं लेकिन चुन-चुन कर ही  खा रहे थे। भावार्थ तो फिर भी यही बनता है कि हंस इतना बुद्धिमान है कि चुन -चुन कर खा रहा है। हमारे पाठकों/ सहकर्मियों ने यह बहुचर्चित भजन तो अवश्य ही सुना  होगा : रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा,हंस चुगेगा दाना-दुनका, कौआ मोती खाएगा। हंस इतना विवेकशील है की वह ठीक और ग़लत का अंतर् करने में सक्षम है। वह जानता   है कि मानसरोवर झील में से मछली खानी है या वनस्पति। इस भजन की पंक्तियों में कलयुग की बात हो रही है जब विवेकशील ,बुद्धिमान लोग ,हंस वृति  वाले लोग दाने खांयेंगें और कौओ वाली वृति के चालक लोग मोती खायेंगें। “निर्मल चेतना शुद्ध और सत्य को ही ग्रहण करती है, शेष को नकार देती है।” कैलाश पर्वत मानसरोवर से दिखाई तो देता है लेकिन इतना पास भी नहीं है। यह हम इसलिए कह रहे हैं कि गूगल सर्च से अलग -अलग परिणाम आए तो हमने इस दूरी को अपने सूझवान पाठकों पर ही छोड़ दिया। शिवलिंग के आकार का प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण कैलाश पर्वत एक आध्यात्मिक स्रोत होने के कारण पुरातन काल से ही हमारा मार्गदर्शन कर रहा है। इस के आसपास के पर्वतों  की संख्या 16 है। 16 पंखुड़ियों वाले कमल के बीच विराट शिवलिंग एक अद्भुत दृश्य दिखते हैं। आप इस दृश्य के satellite image गूगल से देख सकते हैं। शिवलिंग आकार वाला कैलाश पर्वत सबसे ऊँचा है और काले पत्थर  का बना हुआ है और आस पास की 16 पंखुड़ियां लाल और मटमैले पत्थर  की हैं। कैलाश पर्वत की परिक्रमा करना अपने में एक महत्व लिए हुए है। धारणा है की इसकी परिक्रमा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।  गुरुदेव को परिक्रमा करते कुछ तिब्बती मिले। उनमें से कइयों की आयु 60 वर्ष के लगभग होगी, उनमें से एक ने गुरुदेव को पूछा – आप भारतीय हैं ? हमारे गुरु को आपने क्या दर्ज़ा दिया हुआ है ? उन दिनों तिब्बत से लामा लोग भारत आया करते थे। चीन ने तिब्बत की सभ्यता में घुसपैठ की और उसका परिणाम हम आज भी देख रहे हैं। उस वृद्ध ने फिर पूछा – बताओ न ,आप तो अपने आदि गुरु को प्रणाम करने जा रहे हो। हमारे लामा भी तो कैलाश के ही रूप हैं। गुरुदेव ने कहा –

” कोई भी गुरु तिब्बत या भारत का होने कारण पूजनीय नहीं होता। यह नियति का विधान भी हो सकता है। अगर हम एक ही दिशा में प्रगति करते रहें और दूसरी दिशा की उपेक्षा करें तो प्रकृति का उल्लंघन कर रहे हैं। तिब्बत के शासकों और धर्मगुरुओं ने चेतना के क्षेत्र में तो बहुत प्रगति की परन्तु लौकिक पक्ष छोड़ दिया। उसका परिणाम यह हुआ कि व्यवाहरिक जगत में वह कमज़ोर हो गया। उसकी प्रगति एकांगी हो गयी और इसी का दंड तिब्बत को भुगतना पड़ा। “

गुरुदेव का तर्क सुनकर वह वृद्ध आशान्वित हुआ। उसने फिर पूछा – क्या तिब्बत को अपना गौरव फिर से वापिस मिल सकेगा ?

गुरुदेव कहने लगे :

” कोई भी जाति हमेशा एक ही दशा में नहीं रहती , जाति ही क्यों ,व्यक्ति यां इस प्रकृति का कोई भी घटक हमेशा एक जैसा नहीं रहता। उत्थान और पतन दोनों ही स्थितियां सभी के जीवन में आती हैं। “

यह सुनकर वह वृद्ध तिब्बती गुरुदेव के समक्ष नतमस्तक हो गया। गुरुदेव उससे छोटी आयु के थे और न ही कोई योगी ,सन्यासी लग रहे थे। उसने फिर एक और जिज्ञासा व्यक्त की। कहने लगा – “भगवान शिव का दिव्यधाम कैलाश क्या यही है ?” यह कह कर वह वृद्ध करबद्ध मुद्रा में गुरुदेव के सामने खड़ा हो गया। गुरुदेव ने उस पर एक दृष्टि डाली और कहने लगे ;

” जिस लोक को भगवान शिव का दिव्यधाम कहते हैं वह तो अपार्थिव ( अलौकिक ) है। उसका कोई रूप थोड़े ही है। इसी तरह अयोध्या भगवान राम और ब्रजधाम भगवान कृष्ण के प्रतिरूप हैं। “

हम अपने पाठकों को आग्रह करेंगें कि वह इसके बारे में डिटेल से मनन करें क्योंकि त्रुटिपूर्ण या अधूरी धारणा प्रायः गलत निष्कर्ष ही निकालती है।

कैलाश पर्वत की परिक्रमा अपने सामर्थ्य के अनुसार कुछ दिनों में ही पूरी होती है। इसके शिखर पर जाने का दुःसाहस तो अभी तक किसी ने नहीं किया। लगभग 22000 फुट ऊँचे शिखर तक पहुँचने के लिए डेढ़ मील सीधी चढ़ाई है। तिब्बत में होने के कारण गुरुदेव को विचार आया कि अदिबद्री की और रुख किया जाये। बौद्ध सम्प्रदाय के धूलिंग मठ और अदिबद्री का आपस में कुछ सम्बन्ध तो है लेकिन इस पुस्तक ” चेतना की शिखर यात्रा 2 ” में बहुत ही संक्षिप्त वर्णन है। हाँ इतना वर्णन अवश्य है कि लगभग 1500 वर्ष पूर्व बद्रिकाश्रम धूलिंग मठ में ही था। 

तो मित्रो हम गुरुदेव की इस वाली हिमालय यात्रा को यहीं पर पूर्ण विराम देते हैं।

इस लेख को मिला कर हमने केवल हिमालय यात्रा पर ही कुल 15  लेख आपके समक्ष प्रस्तुत किये। लगभग 6 0 पन्नों ,25 000 शब्दों  के यह लेख हमने अपने विवेक और सहकर्मियों की सहायता से घोर चिंतन ,मनन और रिसर्च से तैयार किये, अनगनित वीडियो देखीं ,कई परिजनों से सम्पर्क करके गुरुदेव के  बारे में जानने का प्रयास किया। इन लेखों द्वारा जिन्होंने भी दादा गुरु, उदासीन बाबा , निखिल , महावीर स्वामी ,सत्यानन्द , कालीपद बौद्ध परिजन ,संदेशवाहक ,प्रतिनिधि के सानिध्य में हुए वार्तालाप का आनंद प्राप्त किया वह सब अत्यंत सौभाग्यशाली हैं। जो इस सौभाग्य से वंचित रह गए उनके लिए यह सारे लेख  हमारी  वेबसाइट   पर सुरक्षित हैं। वेबसाइट पर एडिटिंग options होने के कारण यह लेख पढ़ने में  अधिक आनंद प्राप्त हो सकता है। 

इन सीरीज को समाप्त करते हुए हमें बहुत ही प्रसन्नता और आत्मिक शांति का आभास  हो रहा  है लेकिन एक बहुत ही बहुत ही छोटा  सा टॉपिक जिससे किसी लेख में शामिल करना  संभव न हो सका हम यह एक पैराग्राफ में लिखने की अनुमति कहते हैं। यह टॉपिक हैं ब्रह्मकमल का।  हिमालय क्षेत्र में परमपूज्य ने कई छोटी बड़ी झीलें देखीं ,वैसे तो कड़ाके की सर्दी और मौसम के कारण इन पहाड़ों पर कोई भी वनस्पति होने की बहुत ही कम सम्भावना होती है लेकिन झील में ब्रह्मकमल के दर्शन करना कोई साधारण बात नहीं है।  गुरुदेव ने कई बार देखे।  गुरुदेव एक बार झील के किनारे बैठे कितनी ही देर तक खिले ब्रह्मकमल पुष्पों को देखते रहे ,निहारते रहे।  गुरुदेव ब्रह्मकमल के पास गए ,स्पर्श किया और एकदम हल्का महसूस करने लगे , उन्हें लगा जैसे शरीर स्वयं ही चल रहा हो। केवल इच्छामात्र से ही कदम चल रहे हों ,कोई भी प्रयत्न करने की आवश्यकता न थीं। उस दिन जब गुरुदेव को दादा  गुरु ने आवाज़ लगाई थी , उस समय भी गुरुदेव झील के तट पर इन पुष्पों से आत्मसात कर रहे थे। उनकी चेतना को आभास हो रहा था जैसे एक पुष्प स्वयं ही हवा में तैरता हुआ निकट आ गया हो , इतना निकट कि गुरुदेव के ह्रदय पटल पर अपनी छाप छोड़ रहा हो।  थोड़ी देर में ही उन्हें ऐसा लगा कि जैसे अपना आपा  भी ब्रह्मकमल की तरह सुगन्धित हो गया हो और आस पास कितने ही  दिव्य ब्रह्मकमल खिल गया हों। 

ब्रह्मकमल की दिव्यता :

ब्रह्मकमल यानि ब्रह्मा जी का कमल का अंग्रेजी नाम    night blooming cereus, queen of the night, lady of the night का नाम है।  यह एक दुर्लभ,दिव्य  पुष्प है और हिमालयी क्षेत्र में  देखा गया है। हरे रंग के  इस पुष्प की विशेषता है कि यह वर्ष में केवल एक ही बार सूर्यास्त के बाद खिलता है और 2 घंटे में  पूरा 8 इंच खिल जाता है। उत्तराखंड प्रशासन ने इस पुष्प को प्रदेश पुष्प का दर्ज़ा दिया है।  ऐसी मान्यता है कि अगर आप भाग्यशाली हैं तो उत्तराखण्ड की यात्रा करते समय आपको इस दिव्य, इच्छा-पूर्ती करने वाले पुष्प के दर्शन हो सकते हैं। पौरोणिक मान्यताओं के आधार पर इस पुष्प को ब्रह्मा जी के साथ भी जोड़ा गया है,जो सृष्टि के रचनाकार हैं।  हम सबने ब्रह्मा जी को एक कमल में विराजित हुए  देखा होगा जो विष्णु जी की नाभि से पैदा होता है। जब हम यह सारी  रिसर्च कर रहे थे तो हमें 16 जून 2020 की एक वीडियो मिली जिसमें दिखाया गया है कि Mysore   के किसी घर में  दुर्लभ ब्रह्मकमल के सैंकड़ों फूल देखे गए है।  ऐसा माना गया है कि कोविड के कारण अधिकतर लोग  घरों के अंदर रहे , पर्यावरण में शुद्धि आयी और इसी कारण यह सब कुछ हुआ है।  जय गुरुदेव

हम कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें और आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें 

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