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अखंड दीप ,अखंड अग्नि ,ज्ञान- प्रसार और यज्ञों का आपसी सम्बन्ध 

16  सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद – अखंड दीप ,अखंड अग्नि ,ज्ञान- प्रसार और यज्ञों का आपसी सम्बन्ध 

अखंड ज्योति अगस्त 1969 के अंक में परमपूज्य गुरुदेव ने अपनों से अपनी बात करते लिखा था कि हमारे जीवन में यज्ञों की ,अनुष्ठानों की , ज्ञानप्रचार की  बहुत ही भागीदारी  रही  है। लेकिन लोगों को इस बात का भी ज्ञान होना बहुत ही आवश्य है कि जब परमपूज्य  गुरुदेव यज्ञ करवाते थे तो उसके पीछे केवल उपासना का ही अंश होता था य कोई और भी उदेश्य था। कहीं हम यह तो नहीं सोच रहे कि वह  लाखों लोगों की भीड़ इकठ्ठा करके वाह -वाही लूटना चाहते थे।  हालाँकि हम सब भली भांति जानते हैं कि गुरुदेव जैसे महापुरष संत के लिए  इस  तरह के विचार रखना संभव नहीं है लेकिन इस संसार में भांति -भांति की धारणा  के मनुष्यों का वास् है।  अभी ही हमने आदरणीय महेंद्र  भाई साहिब की वीडियो देखि जिस में  वह बता रहे थे कि परमपूज्य गुरुदेव के मुंह पर आकर लोग  कह देते थे कि किसी और का साहित्य अपने नाम से प्रकाशित करके वाह-वाही लूट रहे हैं।  क्या हमें इस बात का अनुमान भी है गुरुदेव को इस धारणा  से  कितनी ठेस पहुंची होगी।  हमारा ऑनलाइन ज्ञानरथ ऐसे ही परिजनों की भावनाओं को बदलने का प्रयास कर रहा है।  हम सब सामूहिक और व्यक्तिगत यह प्रण तो ले ही सकते हैं कि गुरुदेव की शक्ति विश्व के हर घर में पहुंचा कर ही दम लेंगें। आज का  लेख सरलीकरण और अपने विचारों को add करने के  बाद  गुरुदेव के शब्दों  में ही  प्रस्तुत है। हाँ एक बात और : पहले भी कई बार कह चुके हैं ,आज फिर दोहराना चाहते हैं – कॉपीराइट न होने कारण तिथियों और वर्षों के बारे में कहना बहुत ही कठिन है।  इन दोनों यज्ञों के वर्ष अखंड ज्योति में कुछ और हैं और दूसरे  स्थानों पर कुछ और । हमारी गहन रिसर्च इस विषय पर बहुत ही  कम काम करती है , इसलिए क्षमा प्रार्थी हैं।  हमारे पाठक 1956 /1958 को ignore तो नहीं आकर सकते लेकिन भावना और परिणामों पर अधिक ध्यान  दें  तो ठीक रहेगा। 

तो आइये सुने परमपूज्य गुरुदेव के दिव्य वचन :     


गुरुदेव कहते हैं :

अपने परिवार  द्वारा दो बड़े यज्ञ शान और सफलतापूर्वक सम्पन्न हो चुके। एक यज्ञ 1956   का शतकुण्डी ( 100 कुंड )नरमेध यज्ञ  जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता और दूसरा 1958 का  सहस्त्र कुण्डीय (1008  कुंड )  गायत्री महायज्ञ था।    

1956 वाले  यज्ञ में  24 व्यक्तियों ने अपना जीवन नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए अर्पित किया था । यह  यज्ञ केवल  शतकुण्डी होते हुए भी अनुपम था। हवाई जहाजों से विदेशों में बसने वाले भारतीय धर्मानुयायी भी उसमें सम्मिलित होने आये थे। “नरमेध की प्रक्रिया” देखने के लिए जनसमूह समुद्र की तरह उमड़ पड़ा था।  क्रोध और आवेश आकर कितने ही व्यक्ति हत्या और आत्म-हत्या करने पर उतारू हो जाते हैं, पर धैर्य, प्रेम, त्याग और करुणा से परिपूर्ण अन्तःकरण लेकर युग संस्कृति के पुनरुत्थान में जीवन की बलि देना उस पतंगे का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो प्रकाश में लय हो जाने के आनन्द का मूल्यांकन करता हुआ, शरीर सुख को तिनके की तरह तोड़कर फेंक देता है। उन 24 बलिदानियों का ऐसा “प्रभाव” पड़ा कि उनसे  प्रभावित होकर और भी सहस्त्रों व्यक्ति पूरा तथा आँशिक जीवन लोक-मंगल में लगाने के लिए प्रस्तुत हो गये और अपनी युग निर्माण योजना तेजी से आगे बढ़ चली। 

नरमेध  यज्ञ के प्रभाव :

इस यज्ञ की सफलता और प्रतिक्रिया भी बहुत ही आशाजनक हुई। धार्मिक जगत् में एक ऐसी हलचल उत्पन्न हुई  जिसके पीछे प्राचीनकाल की तरह सतयुग वापिस लाने की उमंग हिलोरें मार रही थी। यह  उत्साह पानी के बुलबुले  की तरह समाप्त नहीं हो गया वरन् जंगल की आग   की तरह व्यापक होता चला गया। 

अपनी यज्ञीय प्रक्रिया बहुत ही सरल है  उसमें रूढ़िवादिता, जाति -वर्ग और पैसे  के लालच के लिए कोई स्थान नहीं। हमारे देशों में तिल, घी चावल नहीं केवल सुगन्धित जड़ी बूटियाँ और औषधियों द्वारा हवन होते हैं। खाद्य पदार्थ न जलाने की सामयिक आवश्यकता को हम समझते हैं। घी की भी उतनी ही नपी-तुली मात्रा व्यय करते हैं, जो आज की विपन्न परिस्थितियों और धार्मिक कर्मकाण्ड की आवश्यकता को देखते हुए न्यूनतम हो सकती है। यही कारण है कि राष्ट्रीय खाद्य समस्या के प्रति सजग लोगों में से कभी किसी को हमारे कार्यक्रमों पर उँगली उठाने का साहस नहीं हुआ।” हमारे यज्ञ विवेक का अवतरण करने के लिए हैं। इन यज्ञों में  ब्राह्मण वर्ग को आर्थिक लाभ पहुँचाने  की भी कोई व्यवस्था नहीं रहती। यह जनजीवन में प्रकाश एवं जनमानस में उल्लास भरने वाला आयोजन हैं। इसलिये इन यज्ञों में शामिल होने वाले सभी परिजन धर्म प्रेमी होते हैं। हम व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में यज्ञीय वृत्तियाँ जागृत करने के महान् आदर्श और उद्देश्य को लेकर चले हैं। 

1958  में सहस्त्र कुण्डीय (1008  कुंड )  गायत्री महायज्ञ के रूप में प्रस्तुत हुआ दूसरा यज्ञ था । इसी यज्ञ को ब्रह्मस्त्र यज्ञ भी कहा जाता है।  इस यज्ञ की तुलना  चक्रवर्ती केन्द्रीकरण की भावना से किये जाने वाले अश्वमेध यज्ञ से की जा सकती है।  जब राज सत्तायें विश्रृंखलित हो जाती थीं, तब उनका केन्द्रीकरण तथा पुनः निर्माण करने के लिए प्राचीनकाल में अश्वमेध यज्ञ किये जाते थे। इन दिनों सारा तंत्र ही अस्त-व्यस्त हो रहा है तो उसको centralise करने , केन्द्रीकरण करने और एक क्रमबद्धता उत्पन्न करने के लिए यह सहस्त्र  कुण्डीय यज्ञ था। उसमें भारत के हर प्रान्त से और विदेशों में फैले लगभग चार लाख प्रबद्ध परिजन आहुतियां  देने आये थे। आयोजन बहुत ही  बडा था। कहते हैं कि  इतना विश्वास, इतनी  व्यवस्था  और इतना उद्देश्यपूर्ण आयोजन महाभारत के राजसूय यज्ञ  के बाद पिछले पाँच हजार वर्षों में कोई और  नहीं हुआ। सात नगरों में बसे हुए-सात मील की परिधि में फैले हुए चार लाख साधकों  और  दस गुने दर्शकों के उस विशाल आयोजन को देख कर  यदि इस युग का अद्भुत और अनुपम धार्मिक उत्सव कहा  जाता है तो इसमें कोई शेखी मारने  वाली बात नहीं है। इस यज्ञ की  सभी बातें अनोखी थीं। धन के लिए किसी भी  मनुष्य के सामने हाथ न पसारने की कठोर प्रतिभा थी।  40 लाख लोगों का इतना बड़ा आयोजन, आप अनुमान लगा सकते हैं कि कितना बड़ा खर्चा हुआ होगा। ऐसे बड़े आयोजन को  सम्पन्न कर लेना कोई साधारण बात न थी। इतने विशाल जनसमुदाय में  सभी के लिए  निवास और अन्य  व्यवस्था जुटा सकना हमारे जैसे अकेले  और साधन रहित व्यक्ति के लिए एक प्रकार से असम्भव ही समझा जाता था, पर यह आश्चर्य ही माना जाएगा कि वह धर्मानुष्ठान सानन्द सम्पन्न हुआ। देखने वालों में से कितनों ने ही उस अवसर पर  एक से एक अद्भुत चमत्कार देखे।

सहस्त्र कुण्डीय यज्ञ के प्रभाव :

उस धर्म-तन्त्र द्वारा आयोजित अश्वमेध के समकक्षी सहस्र कुण्डीय गायत्री महायज्ञ का धार्मिक जागरण की दृष्टि से चमत्कारी प्रभाव हुआ। धार्मिक जगत में  नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान की एक ऐसी  उल्लास भरी लहर पैदा हुई जिसने  रचनात्मक दृष्टि से अविश्वसनीय कार्य किया।  

ऐसे दिव्य प्रयासों  पर विश्वास हो भी कैसे ? प्रतक्ष्यवाद का युग जो है , हम सब परिणाम अपने चरम चक्षुओं से देखना चाहते  हैं क्योंकि हमारी मन की ऑंखें तो बंद हैं ,अन्तःकरण का तो पता तक नहीं किस चिड़िया  का नाम है। यही कारण है कि आज 2021  में वैज्ञानिक अध्यात्मवाद ( Scientific spirituality ) का इतना बोलबाला है।  परिजनों को अगर यज्ञ के लिए प्रेरित करना है तो उन्हें scientific logic  देना पड़ेगा , तर्क देना पड़ेगा कि हम यह क्यों कर रहे हैं और यह  कैसे प्रभावित करेगा। वैसे तो  Scientific Spirituality का विषय इतना नया  भी नहीं है लेकिन उसे समझने के लिए शिक्षित भी तो होना आवश्यक है। आज शिक्षा और टेक्नोलॉजी  के प्रसार ने  इस विषय को समझना कुछ सरल बना दिया  है।आँखों के सामने प्रस्तुत घटनायें दीखती हैं-पर विस्तृत विश्व में जन-जन के अन्तःकरण में  होने वाली हलचलों और उनके द्वारा विनिर्मित प्रक्रियाओं का ब्यौरा नहीं रखा जा सकता और न उन्हें देखा जा सकता है। इसलिये लोग भले ही उस प्रतिक्रिया का अनुमान न लगा सकें पर इतना निश्चित है कि “जो महान् कार्य उस सहस्त्र  कुण्डीय गायत्री महायज्ञ के फलस्वरूप सम्पन्न हुआ, वह निस्सन्देह अनुपम था।”

गायत्री यज्ञ और युग-निर्माण एक ही पक्ष के दो पहलू बन गये। इस आधार पर देश के कोने-कोने में सहस्त्रों आयोजन सम्पन्न हुए हैं और विदेशों में भी उसका बहुत ही स्वागत सहयोग हुआ है। 

उन आयोजनों के पीछे सूक्ष्म देव-शक्तियों का जगना और जनमानस की दिशा मोड़ना तथा भारतीय तत्त्व-ज्ञान के वर्चस्व के अनुरूप परिस्थितियाँ उत्पन्न करना इन यज्ञों का ऐसा रहस्यमय पहलू है जिसे समझ सकना और उस पर विश्वास कर सकना हर किसी के बस की बात नहीं। फिर भी वे एक रहस्यमय सच्चाइयाँ है जो समयानुसार अपनी वास्तविकता प्रकट कर रही हैं 

इन्ही  यज्ञों  के स्तर का ही हम दूसरा धर्मानुष्ठान ज्ञान-यज्ञ चलाते रहे हैं। हमारा जीवन क्रम इन दो पहियों पर ही लुढ़कता आ रहा है। उपासना और साधना यही तो दो आत्मिक प्रगति के आधार हैं। उपासना पक्ष, गायत्री जप एवं यज्ञ से पूरा होता रहा है। साधना का प्रकरण ज्ञान-यज्ञ से सम्बन्धित है। यह स्वाध्याय से आरम्भ होकर सद्ज्ञान प्रसार के लिए किये जाने वाले प्रबल प्रयत्न तक फैलता है। जो इस दिशा में भी हम चुप  नहीं बैठे रहे हैं। रथ के दोनों पहियों की तरह, नाव के दोनों डंडों की तरह ध्यान उस दूसरे पक्ष का भी रखा है और ज्ञान-यज्ञ के लिए भी यथासम्भव प्रयत्न करते रहे हैं। क्योंकि वह पक्ष भी उपासना पक्ष से कम महत्व का नहीं वरन् सच पूछा जाय तो और भी अधिक समर्थ एवं शक्तिशाली है। 

“ज्ञान ही है, जो पशु को मनुष्य-मनुष्य को देवता और देवता को भगवान् बनाने में समर्थ होता है। ज्ञान से ही प्रसुप्त मनुष्यता जागती है और वही आत्मा को अज्ञान के अन्धकार में भटकने से उतार कर कल्याणकारी प्रकाश की ओर उन्मुख करता है। उपासना में दीपक, अगरबत्ती का, अग्नि की स्थापना-ज्ञान रूपी प्रकाश का प्रतिनिधित्व करने के लिए करते हैं, बिना ज्ञान का, बिना भावना का कर्मकाण्ड तो केवल शारीरिक श्रम भाव रह जाता है और उसका प्रतिफल नगण्य ही होता है।”

हमारा 43 वर्ष से प्रज्वलित अखण्ड घृत दीप जीवन में सदज्ञान का प्रकाश ज्वलित किये रहने का प्रतीक है। अपनी यज्ञशाला में अखण्ड अग्नि की स्थापना इसी तथ्य का प्रतीक मानी जा सकती हैं कि हवन कुण्ड की तरह हमारे अन्तःकरण में भी “सद्ज्ञान की ऊष्मा” अनवरत  रूप से बनी रहे। उपासना के घण्टों के अतिरिक्त अपने पास जितना भी समय बच जाता है, उसमें से  स्नान, भोजन, शयन आदि को छोड़ कर शेष सारा ही समय ज्ञानयज्ञ के लिए लगाते हैं। छ: घण्टे उपासनात्मक कृत्य में लगे तो ज्ञानयज्ञ  के लिए उससे दूने बारह घन्टे लगते हैं। ज्ञानयज्ञ के  महत्व को देखते हुए इस तरह की Time-management  तो  उचित ही था। विगत 43 वर्षों  से  हम अपनी जीवन नौका को  इसी क्रम से-इन्हीं दो डंडों ( 1. उपासना 2. साधना -स्वाध्याय  ) के सहारे  चलाते  आ रहे हैं। 24 लक्ष के 24 गायत्री महापुरश्चरण और यज्ञ, संगठन एवं प्रचार कार्यों को तो असंख्य लोग जानते ही हैं  क्योंकि वह प्रतक्ष्य हैं ,लोगों की आँखों  के सामने हैं लेकिन  हमारी ज्ञान साधना, जिसमें हम  दुगना  श्रम कर रहे हैं , कम ही लोगों की जानकारी में है।

अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाएँ अपने लम्बे जीवनकाल में लाखों व्यक्तियों को प्रेरक प्रकाश देने और उनके जीवनों में आशाजनक कायाकल्प प्रस्तुत करने में समर्थ हुई है। संसार भर का शायद ही ऐसा कोई कालेज, विश्वविद्यालय हो जहाँ  हमारे अनुवादित भारतीय धर्म-ग्रन्थ न हों। चारों वेद, 108 उपनिषद, छहों दर्शन, बीस स्मृतियाँ, 18 पुराण छप चुके। ब्राह्मण ग्रन्थ और आराध्य हमारे जाने से पूर्व प्रकाशित हो जायेंगे। भारत में ही नहीं संसार भर में भारतीय समस्त धर्म-ग्रन्थों का समग्र परिचय प्रस्तुत करने का यह ऐतिहासिक प्रयत्न है। अब तक एक व्यक्ति द्वारा ऐसा दुःसाहस कभी भी नहीं किया गया है। थोड़े ही समय में देश और विदेश में भारतीय तत्त्व-ज्ञान की साँगोपाँग जानकारी कराने की अपने ज्ञान-यज्ञ की एक महत्त्वपूर्ण धारा है, जिससे बहुतों ने बहुत कुछ पाया है।

क्या हमारा ऑनलाइन ज्ञानरथ इस ज्ञानयज्ञ की मशाल अपने असंख्य हाथों में लेकर विश्व में अलख जगाने में समर्थ है ? कृपया कमेंट करके बताने का कष्ट करें। 

जय गुरुदेव 

आप प्रतीक्षा कीजिये आने  वाले एक और नवीन  लेख की और हम कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें।

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