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कहां से आ गया यह ऑनलाइन  ज्ञानरथ by आद. सविंदर पल जी -भाग 2

15 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद : कहां से आ गया यह ऑनलाइन  ज्ञानरथ by आद. सविंदर पल जी -भाग 2

“कहाँ से आ गया यह ऑनलाइन ज्ञानरथ” शीर्षक वाले लेख का प्रथम भाग हमने कल प्रस्तुत किया था।  बहुत ही अच्छा रिस्पांस मिला, बहुत ही उच्च कोटि के कमेंट , ज्ञान से भरपूर कमेंट, आप सभी ने पोस्ट किये , बहुत ही प्रेरणा मिली , बहुत ही मार्गदर्शन मिला ,इसके लिए हम आप सबका ह्रदय से नमन वंदन,धन्यवाद करते हैं। प्रसन्नता के साथ- साथ  हमें इस बात का खेद भी है कल बहुत देर रात तक हम आप सबके कमैंट्स का चिंतन ,मनन और विश्लेषण करते रहे और रिप्लाई करने का समय ही नहीं मिला।  कुछ भाई -बहनों के कमेंट तो ऐसे भावनात्मक थे कि एक -एक का रिप्लाई करने के लिए कुछ एक पंक्तियाँ नहीं ,पूरा लेख भी कम पढ़  सकता था। 

संध्या कुमार  जी ने हमारी कार्य शैली का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि :महाकाल गुरुदेव के साहित्य को प्रस्तुत करने के लिए उसे गहराई से अध्ययन करना होता होगा और यह कार्य एक बार पढ़ने से नही होता है,उसे लिखने हेतु कई बार पढ़ना होता है,इससे आसानी से समझा जा सकता है कि आप एवं आपके सहयोगी कई कई घंटे लगाकर ज्ञान रथ के माध्यम ज्ञान रस का पान् जन जन तक पहुंचाकर पवित्र कार्य कर रहे हैँ। 

आपने बिल्कुल  ही सत्य लिखा  है बहिन जी , यह तो नए सिरे से लिखने वाले लेखों  की बात है।  सविंदर भाई  साहिब जी द्वारा लिखा लेख आपके समक्ष लाने से पूर्व याद  नहीं कितनी बार पढ़ा होगा और जब निश्चय कर  लिया कि इसे ज्ञानप्रसाद के रूप में परोसा जाये,  तो कम से कम 5 घंटे एडिटिंग में तो  लगे ही होंगें। इसे यह कतई न समझा जाये कि  भाई साहिब के लिखने में कोई समस्या थी, उनके द्वारा व्यक्त की गयी भावनाओं को अपने अन्तःकरण में ढालना,समझना भी अत्यंत आवश्यक था। हमारे पाठक इतने सूझवान और ज्ञानवान हैं कि उन्हें  कोई भी ढील सहन नहीं होती। 

रेनू श्रीवास्त्व जी ने कमैंट्स के प्रति हमारी भावनाओं और प्रयासों की सराहना करते लिखा  है:  सभी सहकर्मियों के कमेंट पढ़ना और सबको अलग-अलग उत्तर देना।सबके वश का बात नहीं है।उन्हें जितना भी धन्यवाद दें कम ही है।बच्चों का सहयेाग को कम नहीं आका जा सकता।इस छोटी उम्र में गुरु जी के प्रति समर्पण और बड़ेां के प्रति आदर की भावना परिवार का संस्कार का भी असर है।गुरुदेव से करवद्ध प्रार्थना है कि सभी पर कृपा दृष्टि बनाये रखें। 

एक -एक कमेंट को पढ़ना ,  रिप्लाई करना , निसंदेह ही कठिन है लेकिंन रिप्लाई किये बिना  हमारा अंतःकरण बैचैन रहता है। अगर परमपूज्य गुरुदेव की प्रेरणा हुई तो एक लेख केवल कमेंन्ट्स और उनके रिप्लाईज़ पर ही लिखेंगें ,देखेंगें आपका क्या रिस्पांस है। आखिर संपर्क साधना के बिना यह दिव्य ज्ञानरथ कैसे चल सकेगा।   

अपनी तरफ से यही प्रयास रहता है आपके समक्ष जो भी कंटेंट प्रस्तुत किया जाये उसमें “किन्तु -परन्तु” की सम्भावना बिल्कुल ही  न हो ,क्योंकि मीन-मेख निकालने वालों की तो भीड़ लगी हुई है। 

तो मित्रो आपकी प्रतीक्षा का अंत करते हुए हम आपको लिए चलते हैं  सविंदर भाई साहिब की क्लास में जहाँ ऑनलाइन ज्ञानरथ के उदेश्यों को क्रियान्वन्त किया जा रहा है ।     

Over to Savinder Bhai sahib :

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ऑनलाइन ज्ञानरथ  परिवार अनेक दिव्य व जागृत आत्माओं का जमावड़ा है: कैसे ?

जिस प्रकार परम पूज्य गुरुदेव व परम पूज्य वन्दनीया माता जी ने कभी भी अपने परिवार को , गायत्री परिवार को बड़ा परिवार बनाने की बात नहीं सोची, उसी प्रकार आदरणीय अरुन भइया जी ने भी आनलाइन ज्ञान रथ परिवार को बड़ा परिवार बनाने की बात कभी नहीं सोची, वरन  सदैव यह सोचा कि यह परिवार महामानवों का एक दिव्य  समूह बने। जिस प्रकार परम पूज्य गुरुदेव को महापुरुषों के एक दिव्य समाज को  देखने की अभिलाषा हमेशा से ही थी,उसी तरह की अभिलाषा आदरणीय अरुन भइया जी की भी है ताकि  परम पूज्य गुरुदेव का सपना सार्थक हो। 

सही अर्थो में मनुष्य जीवन की सार्थकता महामानव बनने में ही है 

आज समाज में ऐसे ही व्यक्तियों के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई  नजर आती  है। धरती से आकाश  तक उन्ही देवमानवों के लिए पुकार है। महाकाल से लेकर महामाया तक हर शक्ति उन्ही महामानवों का आवाहन करती नजर आती है। हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि हमारे  सभी आत्मीय पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन महाकाल की यह पुकार अनसूनी नहीं करेंगे।  आनलाइन ज्ञान रथ परिवार का जन्म  इन्ही घड़ियों के लिए  हुआ है।  जिस प्रकार  युद्ध का  ढ़ोल  बजते देख सैनिकों के शस्त्र स्वयं ही  निकल आते हैं, बदलते वातावरण को अनुभव करते हुए हम जैसे युग सैनिकों को स्वतः ही परिवर्तन के लिए कमर कस कर तैयार हो जाना चाहिए।  आज महामानवों की कमी के कारण ही सामाजिक असंतुलन दिखाई पड़ता है।  पैसे और पद के भूखे लोग मक्खी-मच्छर की तरह बढ़ते दिखाई पड़ते हैं। कुरीतियों व कुसंस्कारों में वृद्धि हो रही है और इनको समूल उखाड़ने वाले परशुराम कहीं भी  दिखाई नहीं दे रहे । महामानवों की भूमि रहा हमारा भारत देश , क्या सो गया है? भेड़ियों,गिद्धो व सियारों के झुण्ड दिखाई पड़ते हैं तो सिंहो की गुफाएँ खाली क्यों हैं? अनीति,आत्याचार व अपराध संगठित दिखते हैं तो महामानवों का जमावड़ा दिखाई क्यों नहीं पड़ता? इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता “महामानवों के एकत्रीकरण” की है।  

वे उठेंगें ,आगे बढ़ेंगें  तो सारी वैश्विक समस्याओं व उलझनों का समूल नाश होगा। 

युग परिवर्तन जैसा महान अभियान तुच्छ व बुरी सोच वाले व्यक्तियों से नहीं,बस महापुरुषों जैसा चिन्तन व जीवन रखने वाले पुरुषों से ही संभव है। इस संसार में कोई भी वस्तु बिना मोल नहीं मिलती  और दैवी अनुदान भी पात्रता की कीमत पर ही  मिलते हैं इसलिए हम सबको आगे बढ़कर महामानवों की तरह प्रयत्न करना होगा।  हमें पूर्ण आशा व विश्वास है कि ऐसी ताकत आनलाइन ज्ञान रथ परिवार का प्रत्येक पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन रखता है। आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के हर सूझवान व समर्पित सहकर्मी को इन दिनों ऐसे आत्मबल संपन्न प्रयोगों को करने की आवश्यकता है जो सृष्टि में झंझावात ला दें।ऐसे प्रचण्ड तपस्वियों की आवश्यकता है जिनके अंतःकरण से निकली अग्नि भूमण्डल को जलाकर रख दे।  ऐसे भागीरथों  की आवश्यकता है जिनके तप से गंगा को भूमण्डल पर उतारने को  विवश कर दें। इससे कम में महामानव होने की पात्रता विकसित कर पाना सम्भव नहीं है।  महामानव बनने के लिए त्याग-बलिदान का मूल्य चुकाना पड़ता है,आत्मपरिष्कार का प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। आनलाइन ज्ञान रथ परिवार का प्रत्येक पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन यह योग्यता  रखता है। इस  परिवार का उद्देश्य अपने मानवीय मूल्यों का पालन करते हुए श्रद्धा व समर्पण भाव से, आदरपूर्वक परम पूज्य गुरुदेव के विचारों को आत्मसात् कर जन-जन तक पहुँचाकर सार्थक परिवर्तन दृष्टिगोचर करना है। आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में भौतिक लाभ व मौज मस्ती कर वाहवाही लूटने वालों  का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।  जो स्वयं को सच्चे हृदय से परम पूज्य गुरुदेव का अंग मानते हों, बड़प्पन की अभिलाषा छोड़,महानता की उपासना साधना व आराधना प्रारंभ कर दें।

“हम बदलेंगे-युग बदलेगा” व “हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा जैसे नारे लगाने का नहीं”

यह  समय “हम बदलेंगे-युग बदलेगा” व “हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा” जैसे नारे लगाने का नहीं वरन इस चिन्तन को अपनी जीवनशैली में समाविष्ट करने का है। निसन्देह अपने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में सार्थक रूप से वे बदलाव आ जाएं तो फिर इस ब्रह्माण्ड की कोई भी शक्ति युग परिवर्तन को सच में बदलने से अब नहीं रोक सकती है। इसके लिए हम सबको दो संकल्प अवश्य ही लेने चाहिए।  

1 . यदि हम सबके परिवार का गुजारा एक निश्चित संपदा से चल सकता है तो सात पीढ़ियों के लिए सोचते हुए नाहक धन-संग्रह करने का क्या औचित्य  ? हम सबको  उस बचाए हुए  धन को लोक-मंगल के लिए लगाने का प्रण लेना चाहिए।  बिना परिश्रम के यदि नाती-पोतों को संपदा मिल भी जाए तो वह उनके व्यक्तित्व को कुन्द ही बनाएगी और हम सबके, स्वयं के लिए पाप-पतन का द्वार खोलेगी, सो अलग।  वैसे तो अपने अधिकतर पाठकगण व सहकर्मी  भाई बहन पहले से ही “सादा जीवन-उच्च विचार” और “जो प्राप्त है वही पर्याप्त है “ के भावों को लेकर आगे चलते आये  हैं, उन्हें यह प्रयत्न-पुरुषार्थ करने में कोई समस्या तो  आने वाली है नहीं , परंतु यदि कोई सहकर्मी कदाचित भूले-भटके इस सोच से अछूता रह भी  गया हो तो उसे आज ही इस संकल्प को मूर्तरूप देने की आवश्यकता है। 

 2 . दूसरा प्रयास गायत्री परिजनों व आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के सभी आत्मीय पाठकगण व सहकर्मी भाइयों व बहनों को मूढ़मान्यताओं से बाहर आकर सत्पुरुषार्थ करने का है।  ईश्वर हर प्राणी में विराजमान है  और उच्च  आदर्शो के समुच्चय के रूप में विश्व- ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।  पूजा-उपासना साधना व आराधना का मूल उद्देश्य अंतःकरण पर चढ़े हुए कर्म-विक्षेपों को धोकर, उतार फेंक देने का  है, न कि काल्पनिक ईश्वर की खुशामद में समय गँवा देने का। जो सारी सृष्टि का स्वामी है,उसका कार्य क्या हमारे धूपबत्ती दिखाने से ही चल सकेगा? परम पूज्य गुरुदेव का उद्देश्य यज्ञ,संस्कार व कर्मकांड द्वारा आंतरिक सत्प्रवृतियों का जागरण है, न कि मात्र कर्मकांड के जाल में लोगों को भटका देना है। जब तक हम एक अच्छा इंसान बनने का प्रयत्न नहीं करते, तब तक भगवान हम सबकी आँखों के सामने भी बैठा हो, दिखने  वाला नहीं  है।  

आज की सर्वोपरि आवश्यकता “भावनात्मक नवनिर्माण” ही  है और उसे ही युगधर्म मानकर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के प्रत्येक पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन को अहर्निश चलने की आवश्यकता है। हमें वाहवाही लूटने के बजाए आगे बढ़कर ये कार्य हाथ में लेने चाहिए क्योंकि मानव जाति का भाग्य व भविष्य इन्ही सत्प्रयासों पर निर्भर है।  जिन परिजनों के हृदय में अपार साहस है और जो लोग मोह के बंधनों👫को त्यागकर इस पथ पर चलने का पराक्रम दिखा सकते हैं उनके लिए इस आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में  ह्रदय से स्वागत है। ऐसे ही परिजनों के लिए यह पंक्तियां आवाहन हैं ,वे ही सच्चे महामानव बनने की पात्रता रखते हैं और आने वाले वर्षो में युग परिवर्तन के माध्यम बनेगे। 

इन पंक्तियों के लिखे जाने के पीछे हमारा मनोभाव यही है कि युग परिवर्तन के महामानवों की टुकड़ी, अपने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के सूझवान व समर्पित सहकर्मी, देवतुल्य भाइयों व देवीतुल्य बहनों से सजी हो क्योंकि आनलाइन ज्ञान रथ परिवार उत्पत्ति का मूल प्रयोजन यही है। इस छोटे से  परिवार के सभी आत्मीय पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन अपने 12 स्तम्भों व मानवीय मूल्यों का पूर्णतया पालन करते हुए परम पूज्य गुरुदेव के युग परिवर्तन के महासंग्राम में एक सशक्त युग सैनिक बन कर अधिक न सही तो गिलहरी की भूमिका में अपना  उत्तरदायित्व समझकर योगदान देने की कृपा करें, महान दया होगी। जिन स्तम्भों की बात हम अक्सर करते आए  हैं वह 1. शिष्टाचार, 2. स्नेह,3.  समर्पण, 4. आदर, 5. श्रद्धा ,6. निष्ठा,7. विश्वास ,8. आस्था,9. सहानुभति ,10.  सहभागिता,11. सद्भावना एवं 12. अनुशासन हैं।  

इस  परिवार से जुड़ कर आदरणीय अरुन भइया जी के साथ कंधा से कंधा मिलाकर परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक व क्रान्तिकारी विचारों को घर -घर में, जन-जन तक पहुँचाने में अपना योगदान देकर अपने जीवन को कृतार्थ करें।  यही हमारा आप सबसे भाव भरा निवेदन है।  जय गुरुदेव  

आप प्रतीक्षा कीजिये आने  वाले एक और नवीन  लेख की और हम कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें।

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