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कहंI से आ गया यह ऑनलाइन ज्ञानरथ by आद. सविंदर पल जी -भाग 1

14 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद – कहंI से आ गया यह ऑनलाइन ज्ञानरथ by आद. सविंदर पल जी -भाग 1 

आज का ज्ञानप्रसाद एक प्रकार से अपडेट  और अपनों से अपनी बात ही है। इतने अधिक लेख lineup होने के कारण अपडेट लिखना तो टाईमटेबल में नहीं था परन्तु हमारे (कनाडा के) समयानुसार आज सुबह पिता-पुत्री जोड़ी के messages ने हमें इसी दिशा में कार्यरत होने की प्रेरणा दी। इस समर्पण और सहकारिता के लिए हमारी छोटी बेटी पिंकी  और उनके  पापा सविंदर जी को हमारा ह्रदय से स्नेहिल धन्यवाद्।

आज का लेख इसी समर्पण जैसे और भी मानवीय मूल्यों पर आधारित है जिसे आदरणीय सविंदर भाई साहिब ने कुछ दिन पूर्व हमें लिख कर भेजा था।  उन्हें तो हमने उसी दिन रिप्लाई करके कह  दिया था कि इस अमूल्य लेख को ऑनलाइन ज्ञानरथ में समय आने पर शामिल करेंगें। सविंदर जी द्वारा लिखे गए लगभग 2300 शब्दों का एक लेख तो यूट्यूब भी आज्ञा नहीं देता, इसलिए हम इनको दो भागों में बाँट रहे हैं।  आज पहला भाग और कल इसका दूसरा भाग प्रस्तुत करेंगें। ऑनलाइन ज्ञानरथ की उत्पति और इसके उदेश्यों पर आधारित यह लेख अखंड ज्योति के लेखों से किसी भी प्रकार कम नहीं हैं।  इसलिए हम आपके समर्पण और श्रद्धा की आशा कर रहे हैं। 

अब आती है बात पिता -पुत्री जोड़ी की।  सुबह पांच बजे पिंकी बेटी का और साढ़े छै बजे सविंदर भाई साहिब का  मैसेज आया  कि यूट्यूब पर अरुण वर्मा जी की उपस्थिति नहीं दिख रही ,क्या वह ठीक तो हैं न ,हमें चिंता हो रही है।  हमारे पास उनका कोई फ़ोन नंबर भी नहीं है ,आप कृपया सम्पर्क करके हमें बताएं। हमने रिप्लाई कर दिया कि कल वाली वीडियो अपलोड करने के बाद  उनका हमें मैसेज आया था लेकिन यूट्यूब पर हमने  उन्हें नहीं देखा।  फिर सविंदर जी ने यूट्यूब पर अरुण वर्मा  जी को  कमेंट किया  और पूछा।  अरुण जी ने तुरंत रिप्लाई करते अपनी सारी स्थिति शेयर की। यह रिप्लाई आप यूट्यूब पर देख सकते हैं ,अगर पूरा विस्तार से लिखें तो लेख की लंबाई कम रह जाएगी।  प्रीती भारद्वाज जी भी बड़े दिनों से  यूट्यूब  में  दिख नहीं रही  थीं , उनको भी मैसेज किया तो उनके बेटे अभिषेक ने बताया कि मम्मी मामु के घर गयी हैं और हमारे exam चल रहे थे, इसलिए पोस्ट पढ़ने य कमेंट करने का समय नहीं मिला।  इन सभी messages को आपके  साथ शेयर करने का उदेश्य केवल  मानवीय मूल्यों का आदर करते हुए अपने साथियों को  हर पल अपने अन्तःकरण में स्थापित किए  रखना है।  हाँ इस क्रिया में समय तो लगता ही है लेकिन कुछ  पाने के लिए बलिदान तो करना ही पड़ता है। आज हमें अक्सर लोग बोलते हुए मिल जायेंगें – समय किस के पास है ? हम तो बहुत ही busy हैं – इत्यादि।  लेकिन अंदाज़ा लगाए आज से पांच- छे  पुराने समय की स्थिति को जब परमपूज्य गुरुदेव वंदनीय माताजी के साथ मथुरा के घर-घर में जाकर अखंड ज्योति पत्रिका वितरित करते थे ,  पहले सप्ताह पत्रिका छोड़ आते थे ,दुसरे सप्ताह जब लेने जाते तो यह सुनिश्चित करते कि पत्रिका पढ़ी भी है कि नहीं , दोनों बार परिवार के साथ संपर्क बनाने का प्रयास करते ,बच्चों का ,परिवार का पूछते।  यही एक अपनत्व की प्रक्रिया है जिससे परमपूज्य गुरुदेव ने इतना विशाल परिवार खड़ा कर दिया है।  इसी roadmap पर हम सब , ऑनलाइन ज्ञानरथ के सहकर्मी चलने का प्रयास कर रहे हैं।  जो मानवीय मूल्य लुप्त होते दिख रहे हैं, हर कोई अनजान सी भेड़ -चाल  में ,मृगतृष्णा के भेड़- चाल में भाग  रहा है, उसे स्वयं ही नहीं मालूम की वह चाहता क्या है – यही है भटके  हुए  देवता  की परिभाषा। ऑनलाइन ज्ञानरथ में बहुत ही उच्स्तरीय देवात्माओं का  वास् है।  उन्ही की अंतर्वाणी ,अंतरात्मा को टटोल कर , छिपी प्रतिभा को उजागर करना हमारा सबका परम् उदेश्य है। 

तो आइये परमपूज्य गुरुदेव के इस संकल्प को और परिपक्व करते हुए देखें हमारे सविंदर भाई साहिब की लेखनी से  क्या अमृतवर्षा हो रही है।  एक बार फिर कहेंगें – यह अखंड ज्योति के किसी लेख से कम नहीं है।  

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ॐ श्री गुरु सत्ताय नमः!! अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक व संचालक युगद्रष्टा,युगऋषि,वेदमूर्ति,तपोनिष्ठ परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी,परम पूज्य वन्दनीया माता जी भगवती देवी शर्मा व आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ भगवती गायत्री माता जी  की असीम अनुकम्पा से हम सब पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन आपस में मिलकर एक परिवार, “आनलाइन ज्ञान रथ परिवार” में जुड़कर गुरु कार्य कर रहे हैं। इस ज्ञानरथ के  सूत्राधार व संचालक आदरणीय अरुन भइया जी हैं  जो हम सबका निरंतर उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर प्रेरणा व प्रोत्साहन देते हुए गुरु कार्य हेतु मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य करके पुरुषार्थ कमाने का सराहनीय व प्रशंसनीय कार्य कर रहे हैं। अरुण जी की  प्रेरणा व आशीर्वाद द्वारा  हम सब पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन का अनवरत आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हो रहा है और लाभ भी मिल रहा है। यह लाभ  आजीवन मिलता रहेगा,  कभी कम नहीं होगा।  इसका मुख्य कारण यह है कि  आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में अपनत्व की भावना से ओतप्रोत, परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक व क्रान्तिकारी विचारों का आदान-प्रदान किया जाता है। हम सब पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन परम पूज्य गुरुदेव का अमृत तुल्य ज्ञान प्रसाद आत्मसात कर अपने जीवन का कायाकल्प कर अपनेआप को कृतार्थ कर रहे हैं। सभी सहकर्मी इस अमृत तुल्य ज्ञान प्रसाद को घर -घर में, जन-जन तक पहुँचाने का सराहनीय व प्रशंसनीय कार्य कर रहे हैं जिससे समस्त विश्व वसुधा का कल्याण हो और परम पूज्य गुरुदेव का “मनुष्य में देवत्व का उदय व धरती पर  स्वर्ग का अवतरण” का सपना साकार हो।

 “आनलाइन ज्ञान रथ परिवार” क्या है और यह कहाँ से आ गया।” 

अब बात आती है कि यह “आनलाइन ज्ञान रथ परिवार” क्या है और यह कहाँ से आ गया।  यह हमारी “अपनों से अपनी बात” हो रही है और हम बताना चाहते हैं कि अखिल विश्व गायत्री परिवार को आप सब भली-भाँति जानते व पहचनते हैं जिसकी उत्पत्ति परम पूज्य गुरुदेव ने की है, इसी का एक छोटा सा अंश आनलाइन ज्ञान रथ परिवार है जिसकी उत्पत्ति परम पूज्य गुरुदेव के परम शिष्य आदरणीय अरुन भइया जी ने परम पूज्य गुरुदेव की असीम अनुकम्पा से की है , इन्हें  हम सब पाठकगण व सहकर्मी भाई-बहन डा.अरुन त्रिखा जी के नाम से जानते व पहचानते हैं।  यह एक  छोटा सा परिवार,आनलाइन ज्ञान रथ परिवार बड़ी श्रद्धा,निष्ठा व समर्पण भाव से परम पूज्य गुरुदेव का कार्य निस्वार्थ भावना से निरंतर-अनवरत  कर रहा है।  यह वर्षो के सतत संरक्षण,दिव्यसत्ता के मार्गदर्शन, पाठकगणों के श्रद्धा-समर्पण का  ही परिणाम है कि आज आनलाइन ज्ञान रथ परिवार एक विश्वव्यापी प्रभावशाली संगठन के रूप मे  दिखाई पड़ता है।  दिखने में अपना यह भवन आलीशान दिखाई जरूर पड़ता है,परंतु इसके निर्माण में आदरणीय अरुन भइया जी व हम सब पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन का श्रम,समर्पण व रक्त लगा है।  यदि इसकी रूपरेखा त्याग और बलिदान की न रही होती तो इसे नींव  डालते ही उजड़ जाना चाहिए था।  यदि अपना आनलाइन ज्ञान रथ परिवार सतत प्रगति की राह पर अग्रसर दिखाई पड़ता है तो  इसका एकमात्र  कारण यही है कि इसे बनाने में, इस उद्यान को सींचनें  में आत्मीयता व अपनत्व  का पोषण अनवरत मिल रहा है। यही  कारण है कि  अपनी इस बगिया का प्रत्येक पुष्प ऐसा प्रतीत होता है मानो विधाता ने इसे  अपने ही हाथों से बनाया है और बड़ी कोशिशों  के बाद जागृत आत्माओं का एक समूह, एक स्थान पर एकत्रित हो पाया है। ऑनलाइन ज्ञानरथ में  हम सबके कुछ समर्पित सहकर्मी हैं जो निस्वार्थ भाव से अपना अमूल्य समय निकालकर बड़ी श्रद्धा,निष्ठा व समर्पण की भावना से ओतप्रोत होकर अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर सहकारिता,सहानुभूति व सद्भावना का परिचय दे रहे हैं और  अपने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार का नाम रोशन कर रहे हैं। ऐसे सहकर्मी दो चार य दस नही हैं , सूची बहुत ही लम्बी है लेकिन हमारी समर्था केवल कुछ एक  नाम लेने की  आज्ञा दे रही है। 

हमारे  समर्पित ,श्रद्धावान सहकर्मी : 

प्रेरणा कुमारी,पिंकी पाल,संजना कुमारी,धीरप सिंह तँवर,अरूण कुमार वर्मा,रेनू श्रीवास्तव,रेणुका जंजीर,रेनू राज,सुमन लता, राजकुमारी,संध्या कुमारी,सुधा सिंह,प्रीती भारद्वाज,विनीता पाल,सुमन सिंह,सुमन देपुरा,साधना सिंह,प्रज्ञा सिंह, पुष्पा पाठक,पुष्पा सिंह,विदुषी बन्टा,शशी पांडेय,नीलू सारना,मनीषा सिंह,कीर्ति बहन जी,अंजू गुप्ता,प्रगणा बहन जी,प्रेमिला बहन जी,प्रेमशीला मिश्रा,हेमलता बहन जी,कैलाश दुबे, प्रमोद कुमार, अरुण कुमार मिश्ना,सत्यभामा शुकला,अनुपम सिंह,सत्यम भूषण आदि-आदि। 

यह नाम केवल उन समर्पित  सहकर्मियों में से कुछ एक  हैं जो यूट्यूब /व्हाट्सप्प पर जुड़े हैं। दूसरे  सोशल मीडिया चैनल वालों का वर्णन करना इससे कहीं  कठिन  है।  ऑनलाइन ज्ञानरथ के  इस विस्तार की सार्थकता इसके श्रेष्ठतम उपयोग, भाव भरे स्नेह एवं  प्यार में है,अन्यथा “बड़े परिवार” को “दुखी परिवार” बनते देर नहीं लगती है। 

आज इस परिवार के अतिरिक्त कही भी दृष्टि दौड़ाई जाए तो 12 स्तम्भों व मानवीय मूल्यों का पतन व्यापक स्तर पर होता दिखाई पड़ता है और बड़ा व्यक्ति   बनने की हवस हर किसी के  मन में गहरी  बैठ गई है।  जब प्रश्न बड़प्पन का होता है  तो ऐसा करने में भला किसे आपत्ति होती,पर जब बड़प्पन की परिभाषा-वासना और तृष्णा की अंधी दौड़ बन गई हो,किसी भी कीमत पर किसी भी माध्यम से धन का उपार्जन, समाज में नीति के रूप में स्वीकार्य हो,धन,पद,इन्द्रिय सुख के लिए तड़प भरी महात्वाकान्क्षा को महानता माना जाने लगे तो ऐसे में सत्कर्म,धर्म न्याय की ज्योति जलाए रखने का कार्य कौन करेगा? आज जहाँ भी  देखें, स्वार्थ और संकीर्णता की सोच प्रगतिशीलता के झूठे  नाम से मानवता का नुकसान करने में लगी हुई है।  ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि अपने इस छोटे से  परिवार के सभी आत्मीय पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन पेट व प्रजनन की दौड़ से बाहर निकलकर लोक मंगल की दिशा में सोचें। 

जय गुरुदेव – भाग 2  कल प्रस्तुत किया जायेगा – वह भाग इससे कहीं अधिक रोचक और ज्ञानवर्धक होने वाला है – आप प्रतीक्षा कीजिये कल वाले लेख की और हम कामना करते हैं कि आपकी सुबह को सविता देवता ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। 

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