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परमपूज्य गुरुदेव का मथुरा  का  ऐतिहासिक  अंतिम  उध्बोधन -पार्ट 2 

4 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद –  परमपूज्य गुरुदेव का मथुरा  का  ऐतिहासिक  अंतिम  उध्बोधन -पार्ट 2 

तीन दिन पूर्व हमने परमपूज्य गुरुदेव का तपोभूमि मथुरा वाला  अंतिम उध्बोधन आरम्भ किया था।  यह उध्बोधन उन्होंने  1971 की गायत्री जयंती वाले दिन 3 जून को दिया था  और गुरुवर  की धरोहर पार्ट 1 में 14 scanned पन्नों की में प्रकाशित हुआ था।  हमारे सहकर्मी चाहें तो इसी पुस्तक को लेकर स्वयं भी पढ़  सकते हैं, लेकिन पुस्तक में से स्वयं पढ़ना, बिना किसी चर्चा के पढ़ना ,बिना किसी analysis के पढ़ना , कितना लाभ देता है -एक  चिंतन-योग्य प्रश्न है। इसीलिए कक्षाओं में ग्रुप discussion का प्रचलन पॉपुलर होता जा रहा है। एक ही पैराग्राफ को  अलग-अलग विद्यार्थी, अलग -अलग तरीके से  analyse कर सकते हैं और कई बार परिणाम गलत भी हो सकते हैं। हम अपनी  अल्प  बुद्धि से जो लेख आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं , उनका यथाशक्ति  कई -कई दिन तक analysis होता रहता है और अपलोड के उपरांत कमैंट्स के द्वारा जो 2 -way ट्रैफिक आरम्भ होती है उससे कितना ज्ञानप्रसार -ज्ञानविस्तार होता है आप स्वयं इसके साक्षी हैं। आज के युग की सबसे बड़ी समस्या -प्रतक्ष्यवाद और इंस्टेंट परिणाम है ,बिल्कुल इंस्टेंट कॉफ़ी ( coffee ) की तरह।  गुरुदेव ने  अनवरत 24 वर्ष तक साधना की , जो गुरु ने कहा, बिना किसी प्रश्न के करते रहे ,लेकिन आज के युग में हम  24 दिन में ही चमत्कार की आशा करते हैं।  हम एक बार फिर यही कहेंगें – यह उपासना नहीं है -भटकन है। गुरुदेव द्वारा लिखित साहित्य के  एक -एक अक्षर को ,एक -एक शब्द को, एक एक वाक्य को अंतःकरण में ढालने  की आवश्यकता है। यही कारण है कि हम साधारण से  विषय की  इतनी  विस्तृत चर्चा करते हैं। आपके पास तो 400 पेज का गायत्री महाविज्ञान पढ़ने  का भी तो विकल्प है।  हम अपने किसी भी सहकर्मी की योग्यता और ज्ञान पर प्रश्न नहीं कर रहे लेकिन एक क्लास में हर प्रकार के विद्यार्थी होते हैं ,सभी का ख्याल रखना ही एक अच्छे अध्यापक की खूबी  होती है। आपके कमैंट्स साक्षी हैं कि चर्चाओं से ,सम्पर्क से ,बातचीत से ज्ञानप्रसार की  धारा का प्रवाह अविरल वेगपूर्ण चले जा रहा है 

तो चलिए करें कुछ और चर्चा : 

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परमपूज्य गुरुदेव कह रहे हैं :

गायत्री कामधेनु है ,गायत्री  पारस है ,गायत्री  कल्पवृक्ष है-  कैसे      

गायत्री कामधेनु है ,गायत्री  पारस है ,गायत्री  कल्पवृक्ष है  आदि जो भी लाभ गायत्री उपासना के बताए गए हैं, उसके लिए मुझे जिंदगी का जुआ खेलना ही पड़ेगा और खेलना ही चाहिए। कामधेनु जिसे सुरभि के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में सभी गायों की मां गौ माता के रूप में वर्णित एक दिव्य गोजातीय-देवी है। वह एक चमत्कारी (Cow of Plenty)   है जो अपने मालिक को वह सब कुछ प्रदान करती है जो वह चाहता है और अक्सर अन्य मवेशियों की मां के रूप में चित्रित किया जाता है। कल्पवृक्ष, जीवन का वृक्ष, जिसका अर्थ “विश्व वृक्ष”  भी है, का उल्लेख वैदिक शास्त्रों में मिलता है। समुद्र मंथन के दौरान  कल्पवृक्ष कामधेनु के साथ  जल से उभरा। कल्पवृक्ष  को Milky  Way  या सीरियस सितारों का जन्मस्थान भी कहा जाता है। रात को सबसे चमकदार दिखने वाले इस सितारा  समूह को रूद्र सितारा भी कहा  गया है। पारस वह अद्भुत पत्थर है जिसे छूने से कोई भी वस्तु स्वर्ण बन जाती है। तो मित्रो आपने देख ही लिया कि गायत्री उपासना की ,गायत्री मंत्र की तुलना कैसी -कैसी  आश्चर्यजनक वस्तुओं के साथ की गयी है। इन रोचक वैज्ञानिक  कथाओं पर भी कभी एक लेख लिखने की इच्छा  है।

चार-पाँच वर्ष में ही भगवान ने मेरी इच्छा  पूरी  कर दी। मेरे गुरु मेरे पास आए और उन्होंने जो बातें बताईं उससे जीवन का  मूल्य   समझ में आ गया। जीवन  का मूल्य और महत्त्व समझकर मैं चौंक पड़ा कि चौरासी लाख योनियों में घूमने के बाद मिलने वाली यह जिंदगी मखौल है क्या? इसके पीछे महान  उद्देश्य छिपे हुए हैं।भगवान ने हमारे हाथ में यह मानव जीवन” देकर हमें एक सुनहरी सौभाग्य प्रदान  किया है , पर क्या हम और आप उसका सही  इस्तेमाल कर पाते हैं ? मालवीय जी ने मुझे सबसे मूल्यवान  एक ही बात बताई थी कि अगर आप  गायत्री मंत्र का संबल पकड़ लें तो पार हो सकते हैं। मालवीय जी  मेरे दीक्षा गुरु हैं और गुरुदेव सर्वेश्वरानन्द जी जो हिमालय में रहते हैं मेरे आध्यात्मिक गुरु  हैं। उन्होंने बताया कि जिंदगी की कीमत समझ ले , जिंदगी का ठीक से  इस्तेमाल करना सीख ले । जिंदगी की कीमत मैंने पूरे तरीके से वसूल कर ली है। एक-एक साँस को इस तरीके से खर्च किया है कि कोई  मुझ पर आरोप  नहीं लगा सकता कि हमने  जिंदगी के साथ मखौल किया है, दिल्लगी की है। जीवन देवता पारस है, अमृत है और कल्पवृक्ष है। इसका ठीक से इस्तेमाल करता हुआ मैं जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण  होता चला गया और इसी प्रकार चलते -चलते अभी साठ  वर्ष  की मंजिल पूरी करने में समर्थ हो गया। क्या-क्या किया? क्या-क्या पाया? कैसे पाया? मैं चाहता हूँ कि आपको वह सब कुछ बता दूँ , अपने सारे  भेद और रहस्य बता दूँ  कि गायत्री मंत्र कितना सामर्थ्यवान है।” यह मन्त्र इतना कीमती है कि  मात्र माला घुमाने से ही  इसके लाभ नहीं प्राप्त किए जा सकते। इसके लिए कुछ ज्यादा ही कीमत चुकानी पड़ेगी। कल्प वृक्ष ,कामधेनु और पारस  ऐसे ही नहीं मिल जाते।  

गायत्री मंत्र के बारे में ऋषि  क्या कहते हैं?

शास्त्रकारों ने क्या कहा है? यह जानने के लिए मित्रो, मैंने पढ़ना शुरू किया और पढ़ते-पढ़ते सारी उम्र निकाल दी। अध्यन में  क्या-क्या पढ़ा? भारतीय धर्म और संस्कृति में जो कुछ भी है, वह सब पढ़ा। वेद पढ़े, आरण्यक पढ़ीं, उपनिषदें पढ़ीं, दर्शन पढ़े और दूसरे ग्रंथ भी पढ़ डाले, देखू तो सही गायत्री के बारे में ग्रंथ क्या कहते हैं? खोजते-खोजते सारे ग्रंथों में जो पाया, उसे नोट करता चला गया। बाद मन में यह आया कि जैसे मैंने फायदा उठाया है, दूसरे भी फायदा उठा लें, तो क्या नुकसान है। उसे छपा भी डाला। लोग उससे फायदा भी उठाते हैं। असल में मैंने ग्रंथों को, ऋषियों की मान्यताओं को जानने के लिए पढ़ा और पढ़ने के साथ-साथ में यह प्रयत्न भी किया कि जो कोई भी गायत्री के जानकार हैं, उनसे जानें कि गायत्री क्या है? और प्रयत्न करूँ कि जिस तरीके से खोज और शोध उन्होंने  की थी, उसी तरीके से मैं भी खोज और शोध करने का प्रयत्न करूँ। उसी शोध में मैंने पढ़ा है कि बहुत पहले एक आदमी हुआ था  जिसने  गायत्री में पी०एच०डी० और डी०लिट् किया था? कौन था वह  महान  आदमी ?, कौन था वह महापुरुष ?  उस महापुरुष का  नाम था- विश्वामित्र। विश्वामित्र उस व्यक्ति का नाम है, जिसको जब हम संकल्प बोलते हैं, तो हाथ में जल लेकर गायत्री मंत्र से पहले विनियोग बोलना पड़ता है। 

आपको तो हमने नहीं बताया। जब आप आगे-आगे चलेंगे, ब्रह्मवर्चस की उपासना में चलेंगे, तब हम गायत्री के रहस्यों को भी बताएँगे। अभी तो आपको सामान्य बालबोध नियम भर बताए हैं, जो गायत्री महाविज्ञान में छपे हैं। बालबोध नियम जो सर्वसाधारण के लिए हैं, उतना ही छापा है,लेकिन जो जप हम करते हैं, उसमें एक संकल्प भी बोलते हैं, जिसका नाम है-‘विनियोग’ प्रत्येक बीज मंत्र के पूर्व एक विनियोग लगा रहता है। विनियोग में हम तीन बातें बोलते हैं-“गायत्री छन्दः, सविता देवता। विश्वामित्र ऋषिः गायत्री जपे विनियोगः।” संकल्प जल छोड़ करके तब हम जप करते हैं । यह क्या हो गया? इसमें यह बात बताई गई है कि गायत्री का दक्ष, अति शिक्षित आदमी  कौन  था, गायत्री का अध्ययन किसने किया था, गायत्री की जानकारियाँ किसने प्राप्त की, गायत्री की उपासना किसने की? “गायत्री के संबंध में  जो आदमी प्रामाणिक है  उसका नाम विश्वामित्र है।” मेरे मन में आया कि क्या मेरे लिए ऐसा संभव नहीं कि मैं भी विश्वामित्र के तरीके से ही  प्रयास करूं। मित्रो! मैं उसी काम में लग गया। पंद्रह वर्ष की उम्र से उन्तालीस वर्ष की उम्र  तक, चौबीस वर्ष बराबर एक ही काम में लगा रहा, लोग पूछते रहे कि यह आप क्या किया करते हैं हमें भी कुछ बताइए। हमने कहा-प्रयोग कर रहे हैं, रिसर्च कर रहे हैं और रिसर्च करने के बाद अगर  कोई  काम  की चीज़  मिली  तो फिर आपको बताएंगे कि आप भी गायत्री की उपासना कीजिए।  अगर नहीं मिली  तो मना कर देंगे।

मित्रो,  24  साल की उपासना के बाद , संशोधन के बाद  कितने साल  और हो गए हैं, जब से गायत्री के प्रचार का कार्य हमने लिया,जबसे  हमको हमारी जीवात्मा ने यह आज्ञा दी कि यह बहुत ही  काम की चीज है, उपयोगी चीज है, लाभदायक चीज है, इसको लोगों को बताया जाना चाहिए और समझाया जाना चाहिए। जो जितना अधिकारी हो, उतनी ही खुराक दी जानी चाहिए। हम उपासना सिखाते रहे हैं, छोटी समझ  वालों को छोटी मात्रा देते रहे हैं, बड़ी समझ वालों  को बड़ी मात्रा देते हैं । हमने छोटे बच्चों को दूध में पानी मिले हुए से लेकर बड़ों को घी और शक्कर मिली हुई खुराक दी है।  इन वर्षों में हमारा विश्वास अटूट होता चला गया है, श्रद्धा मजबूत होती चली गई है। यह वह ताकत  है, वह आधार है कि अगर ठीक तरीके से कोई पकड़ सकने में समर्थ हो सकता हो, तो उसके लिए नफा ही नफा है, लाभ ही लाभ है।

ठीक तरीका क्या है ? अगले लेख में। 

सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।”  जय गुरुदेव

क्रमशः जारी -To be continued

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