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परमपूज्य गुरुदेव का मथुरा  का  ऐतिहासिक  अंतिम  उध्बोधन -पार्ट 1 

1 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद -परमपूज्य गुरुदेव का मथुरा  का  ऐतिहासिक  अंतिम  उध्बोधन -पार्ट 1 

मित्रो आज का  ज्ञानप्रसाद गुरुदेव के उस ऐतिहासिक उध्बोधन पर आधारित है जो उन्होंने 3 जून 1971 गायत्री जयंती वाले दिन मथुरा में  दिया था।  आपने देखा है – हम लिख रहे हैं “आधारित है” – इसका अर्थ यह है कि इस 14 scanned  पन्नों के उध्बोधन को जो गुरुवर की धरोहर -1  में प्रकाशित हुआ था ऐसे  ही  “as it is” आपके समक्ष प्रस्तुत नहीं कर रहे  हैं । कई – कई बार पढ़कर, समझकर , वीडियो देखकर , गूगल की सहायता लेकर सरल करके आपके लिए तैयार किया है।   इसका कारण केवल एक ही था -गायत्री मन्त्र के विषय को अगर systematically, step by step न पढ़ा जाये तो यह  चर्चा इतनी विशाल और complex होती है कि इसको -पढ़ते -पढ़ते  भटकना स्वाभाविक ही होता है। इस पुस्तक की केवल scanned कॉपी ही उपलब्ध है ,text  कॉपी को जब क्लिक करते हैं तो पुस्तक का दूसरा भाग आ जाता है।  हममें  से शायद ही कोई होगा जो गायत्री मन्त्र का जाप न करता हो , लेकिन क्या हम सभी इस महामंत्र में छिपे ज्ञान को,  ज्ञान के रहस्यों को समझते हैं यं फिर ऐसे ही माला फेरे जा रहे हैं , एक माला ,दस माला य कितनी ही माला।  क्या हमें इसके  वैज्ञानिक पक्ष का  ,scientific aspect का ज्ञान है। कैसे यह मंत्र हमें प्राणऊर्जा प्राप्त करवाते हुए सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है। कैसे हम  सूर्य भगवान के सूक्ष्म रूप से प्राणऊर्जा प्राप्त करते हैं।  गुरुदेव ने बहुत ही  सरल शब्दों में इन प्रश्नों का समाधान  किया है और उन्ही के सूक्ष्म  मार्गदर्शन ने हमें भी इस कार्य के लिए प्रेरित किया। परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि मेरे चले जाने पर अगर आप यह विचार करें कि गायत्री मन्त्र सामर्थ्यवान है और अपनी मान्यताओं में एक और अंश -अध्यात्म -जोड़ लें तो मैं समझूंगा मेरा कहना और आपका सुनना सार्थक  हो गया।  जिन महामानवों ने इस मन्त्र के ऊपर इतनी रिसर्च की , उनका उदेश्य और प्रयोजन पूरा हो गया। आप इस लेख में और आने वाले लेखों में देखेंगें कि गुरुदेव ने जितने भी तथ्य वर्णन किये हैं ,अपने ऊपर अनुसन्धान के बाद ही प्रकाशित किये हैं। 

तो चलते है आज के लेख की ओर :        

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वेदमाता देवमाता माँ गायत्री के पावन अनुग्रह से हमें वैदिक तत्वज्ञान  प्राप्त  करने का सुअवसर प्राप्त होता है और  यही हम सबके हृदय की एकमात्र कामना है।  तत्वज्ञान का अर्थ है अज्ञान से दूर जाना । जब हम अज्ञान से दूर जाते हैं तो ज्ञान अपनेआप ही पास आता है।  अथर्ववेद के अनुसार इसी से हमारी अन्य सभी इच्छाओं की परिपूर्ति हो जाती है। 

स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रोच्दयन्ताम् द्विजानाम, आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्ति द्रविणं ब्रह्मवर्चसं मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम।  यह  वरदायिनी वेदमाता की स्तुति  है।  

यह हम सब को पवित्र करने वाली है। इसका अर्थ बताना  हमारा कर्तव्य बनता है जो कि  इस प्रकार है:  हमारी प्रार्थना है कि यह हम  सबको पवित्र जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करें  जो मानवीय संस्कारों से संपन्न हैं। यह हमें लम्बी आयु, प्राणशक्ति, श्रेष्ठ संतानें, पशु समृद्धि तथा ब्रह्मतेज प्रदान करें। 

गायत्री मंत्र से हम सभी सुपरिचित हैं, जो इस प्रकार है : 

ॐ  भूर्भुवः स्वः तत्सवितु र्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात। 

मंत्र का सामान्य अर्थ इस प्रकार है : किसी भी वेद मंत्र का उच्चारण करने से पूर्व ‘ओsम’ ( ॐ )का उच्चारण करना आवकश्यक हैं। ओsम परमात्मा का श्रेष्ठ नाम हैं, इसमें तीन वर्ण हैं। ओsम’ अथवा ओंकार विश्व के प्रायः बहुत से धार्मिक मतों में किसी ना किसी प्रकार से विद्यमान हैं।  ‘भूः’ का अर्थ है पृथ्वी , ‘भुवः’ का अर्थ है अंतरिक्ष  और ‘स्वः’ का अर्थ है स्वर्ग -ये तीनो महाव्याहृतियाँ हैं।  

“हम सभी (सवितुः देवस्य) सबको प्रेरित करने वाले देदीप्यमान सविता (सूर्य) देवता  (तत)  सर्वव्यापक (वरेण्यम) वरन करने योग्य अर्थात अत्यंत श्रेष्ठ (भर्गः) भजनीय तेज़ का (धीमहि) ध्यान करते हैं,  (यो ) जो (नः) हमारी (धियः) बुद्धि  को (प्रचोदयात) सन्मार्ग की दिशा में प्रेरित करता हैं।” 

इस मंत्र को  गायत्री मंत्र इसलिए कहा जाता है कि  यह  मन्त्र जप करने से प्राणों की रक्षा होती है। ‘गायन्तं त्रायते’ यह वेद का प्रथम छंद हैं जिसमे 24  अक्षर और तीन पाद होते हैं।  इसके प्रत्येक पाद में आठ-आठ अक्षर  होते हैं। प्राण ही तो सब कुछ है।  जिस व्यक्ति में ऊर्जा है ,शक्ति है ,चेतना है उसे हम प्राणवान कहते हैं, विचारशील ,विचारवान ,बुद्धिमान ,समझदार व्यक्ति ही प्राणवान कहलाने के हक़दार होते हैं।  प्राण निकलते ही इंसान एक ज़िंदा लाश बन जाता है। प्राण ही सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है जिससे सब कुछ चल रहा है। और जब हम गायत्री मन्त्र का जाप करते हैं तो हम सविता देवता -सूर्य देवता से प्राणों की ही मांग ही तो कर रहे हैं।  सूर्य की शक्ति, सूर्य की ऊर्जा , पाने अंदर धारण करने के लिए प्रार्थना  करते हैं।  सूर्य  भगवान  का स्थूल रूप जिसे हम प्रतिदिन  देख रहे हैं ,हमें रौशनी दे रहा है , ऊष्मा दे रहा है , स्फूर्ति दे रहा है। लेकिन दूसरा रूप जिसे हम सूक्ष्म रूप कहते हैं , सविता कहते हैं , आदित्य कहते हैं ,गायत्री मन्त्र के माध्यम से  हमारे शरीर को प्राणऊर्जा प्रदान कर रहा है। कल्पना कीजिये अगर सूर्य भगवान न हों तो सृष्टि कैसी होगी।  न कोई प्राणी होगें ,न photosynthesis होगा ,न वनस्पति होंगी , सब कुछ एक दम रुक सा जायेगा। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के देशों में जहाँ  रात और दिन का बहुत बड़ा अंतर् होता है , कैसा वातावरण होता है ,कैसा जीवन है -कभी इस  विषय पर भी चर्चा करेंगें।    

गायत्री  मंत्र को देवता के आधार पर सावित्री मंत्र भी कहा जाता हैं, क्योंकि इसके देवता सविता हैं।  सामान्यरूप से सविता सूर्य का ही नामान्तर ( name -sake ) है, जो मानव  जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले देवता हैं। अधिक गहराई में जाने पर सविता को सूर्य-मण्डल के विभिन्न देवोँ में से एक माना जा सकता हैं।  गायत्री मंत्र हमारी परम्परा में सर्वाधिक पवित्र और उत्प्रेरक (catalyst ) मंत्र हैं।  इसका जप करते समय भगवान सूर्य के अरुण ( सूर्य की लाली ) का ध्यान करना चाहिए। जप करते समय मंत्र के अर्थ का भलीभांति मनन करना चाहिए। जैसा कि महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्र में कहा है –‘तज्जपस्तदर्थभावनाम!’ किसी भी मंत्र के जप का अभिप्राय है,  बार-बार उसके अर्थ की भावना करना, उसे मन और मस्तिष्क में बैठाना।  परम्परा के अनुसार इस मंत्र का साक्षात्कार  सर्वप्रथम महर्षि विश्वामित्र ने किया था।  वही इस मंत्र के द्रष्टा अथवा ऋषि हैं।  वैदिक पारम्परिक मान्यता के अनुसार वेद-मन्त्रों में कोई रचयिता नहीं हैं।  सृष्टि के प्रारम्भ , समाधि अथवा गंभीर ध्यान की अवस्था में ये ऋषियों के अंतःकरण में स्वयं प्रकट हुए थे।  जिस ऋषि ने जिस मंत्र का दर्शन किया वही उसका द्रष्टा हो गया।  इस मंत्र का जप विश्व भर में कोई भी अनुयायी कर सकता हैं, क्योंकि बुद्धि की प्रेरणा की आवकश्यकता तो सभी सामान रूप से अनुभव करते हैं। 

गुरुदेव का उध्बोधन, हमारी रिसर्च : 

देवियो! भाइयो! मेरे पिताजी गायत्री मंत्र की दीक्षा दिलाने के लिए मुझे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में महामना मालवीय जी के पास ले गए। महामना मालवीय जी और हमारे पिताजी सहपाठी थे। उनका विचार था कि लड़के का यज्ञोपवीत संस्कार और गायत्री मंत्र की दीक्षा महामना मालवीय जी से कराई जाए। पिताजी मुझे वहीं ले गए, तब मैं दस-ग्यारह वर्ष का रहा होऊँगा। मालवीय जी के मुंह से जो वाणी सुनी, वह अभी तक मेरे कानों में गूंजती है। हृदय के पटल और मस्तिष्क पर वह जैसे लोहे के अक्षरों से लिख दी गई है, जो कभी मिट नहीं सकेगी। उनके वे शब्द मुझे ज्यों के त्यों याद हैं, जिसमें उन्होंने कहा था-“भारतीय संस्कृति की जननी गायत्री है। यज्ञ भारतीय धर्म का पिता है। इन माता-पिता की हम सभी को श्रवणकुमार की तरह से कंधे पर रखकर सेवा करनी चाहिए।” __गायत्री मंत्र बीज है और इसी से वृक्ष के रूप में सारा-का-सारा भारतीय धर्म विकसित हुआ है। बीज छोटा-सा होता है बरगद का

और उसके ऊपर वृक्ष इतना बड़ा विशाल होता हुआ चला जाता है। गायत्री  मंत्र से चारों वेद बने। वेदों के व्याख्यान स्वरूप ब्रह्माजी ने, ऋषियों ने और ग्रंथ बनाए, उपनिषद् बनाए, स्मृतियाँ बनाईं,  आरण्यक बनाए। इस तरह हिंदू धर्म का विशालकाय वाङ्गमय बनता चला गया। हिंदू धर्म की जो कुछ भी विशेषता दिखाई पड़ती है साधनापरक, ज्ञानपरक अथवा विज्ञानपरक, वह सब गायत्री के बीज से ही विकसित हुई है। सारे-का-सारा विस्तार गायत्री बीज से ही हुआ है। बीज वही है, टहनियाँ बहुत सारी हैं। हिंदू धर्म में चौबीस अवतार हैं। ये चौबीस अवतार क्या हैं? एक-एक अक्षर गायत्री का एक-एक अवतार के रूप में, उनके जीवन की विशेषताओं के रूप में, उनकी शिक्षाओं के रूप में है। हर अवतार गायत्री का  एक अक्षर है , जिसमें क्रियाएँ और लीलाएँ करके दिखाई गई हैं। उनके जीवन का जो सार है वही एक-एक अक्षर गायत्री का है। हिंदू धर्म के दो अवतार मुख्य हैं-एक का नाम राम और दूसरे का कृष्ण है। रामचरित का वर्णन करने के लिए वाल्मीकि रामायण लिखी गई जिसमें 24000  श्लोक हैं और प्रति 1000  श्लोक के पीछे गायत्री मंत्र के एक अक्षर का संमुट लगा हुआ है । श्रीकृष्ण चरित भागवत में लिखा है। श्रीमद्भागवत में भी चौबीस हजार श्लोक हैं और एक हजार श्लोक के पीछे गायत्री मंत्र के एक अक्षर का संपुट लगा हुआ है अर्थात गायत्री मंत्र के एक अक्षर की व्याख्या एक हजार श्लोकों में। रामचरित हो अथवा कृष्ण चरित, दोनों का वर्णन इस रूप में मालवीय जी ने किया कि मेरे मन में बैठ गया कि यदि ऐसी विशाल गायत्री है, तो मैं उसकी  खोज करूँगा  और अनुसंधान करके लोगों को यह बताकर रहँगा कि ऋषियों की बातें, शास्त्रों की बातों में कितनी सच्चाई है , यं  फिर कोई सच्चाई है भी कि  नहीं। 

सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।”  जय गुरुदेव

क्रमशः जारी -To be continued 

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