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15 वर्ष के बालक सरविंदर  पाल के ऊपर परमपूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद , भाग 1 

30 अगस्त 2021 का ज्ञानप्रसाद -15 वर्ष के बालक सरविंदर  पाल के ऊपर परमपूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद , भाग 1 

मित्रो लेख आरम्भ करने से पूर्व हम सबको बधाई देना चाहते हैं जिन्होंने महेंद्र शर्मा जी की वीडियो जिसका शीर्षक था “ कौन बताएगा गुरुदेव के तप का प्रमाण” को अविश्वसनीय रिस्पांस दिलवाया। इस  वीडियो को   3200  के करीब व्यूज और 300 से ऊपर कमैंट्स मिले हैं और अभी भी परिजन देख रहे हैं और respond कर रहे हैं। इन सारे नंबरों का श्रेय आप सबको ,हमारे समर्पित साधकों को ,सहकर्मियों को जाता है। धन्यवाद् -धन्यवाद् एवं धन्यवाद्। 

अब आती है शीर्षक की – कौन बताएगा गुरुदेव के तप का प्रमाण – आदरणीय सरविंदर पाल भाई साहिब  जैसे समर्पित सहकर्मी बताएंगें , जिन्हे हम अब तो अच्छी प्रकार जानते हैं।  30 मार्च का दो पार्ट का यह लेख आप सबके लिए  केवल इसी  धारणा  के साथ रिपीट  रहे हैं  कि जिस बालक को परमपूज्य गुरुदेव ने केवल 15 वर्ष की आयु में अपनी उपस्थिति और शक्ति का  आभास दिलवा दिया वह पुरुष भला कैसे गुरुदेव को भूल पायेगा  और भाग -भाग कर सभी को बताएगा -मेरा गुरु ऐसा है। हमें अपने गुरु को आश्वासन देने की कोई आवश्यकता नहीं  क्योंकि हमारा सबका समर्पण – सरविंदर पाल जी  जैसा ही है। महेंद्र भाई  साहिब बता  रहे थे: “गुरुदेव कहते थे मुझे तुम लोगों  पर  विश्वास नहीं है, आप बताओगे नहीं कि  मेरा गुरु कैसा है” तो मित्रो गुरुदेव का साहित्य ,गुरुदेव के विचार गुरुदेव के अंगसंग रहे सहकर्मी ,महान  विभूतिआँ जिन्हे हम विश्व के कोने -कोने से ढूंढ कर आपके समक्ष ला रहे हैं , गुरुदेव के बारे में बताने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं – यही अपने गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा है।       

यह अविस्मरणीय संस्मरण सरविंदर पाल जी के जीवन के वर्ष  1995 का है  जब वह केवल 15 वर्ष के थे और हाई  स्कूल के विद्यार्थी  थे। आज का  लेख दो भागों का प्रथम भाग  है, कल इसका दूसराऔर अंतिम भाग प्रस्तुत करेंगें। आशा  करते हैं कि इन दोनों लेखों को अत्यंत श्रद्धा से पढ़ा जायेगा और चिंतन तो किया ही जायेगा कि ऐसी कौन सी दिव्य शक्ति  थी जिसने प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद तीन पीढ़ियों के साधकों को एक ही स्थान पर, एक ही दिन  इकठा किया और सरविंदर जी ने  26 वर्ष तक यह विवरण कैसे लिख कर रखा ,संभाल  कर रखा।  हमें तो यह भी याद नहीं रहता सुबह नाश्ते में क्या खाया था।  – नतमस्तक है हम।  

करचुलीपुर ( उत्तर प्रदेश ) नामक  जिस ग्राम की यह घटना है आज भी बहुत ही  छोटी जगह है।  हमने जिज्ञासावश गूगल में देखना चाहा तो पता चला कि 2011 की जनसंख्या केआधार पर केवल 228  घर हैं और  1230  के करीब लोग रहते हैं।   सरविंदर  जी ने  हमें सभी घटना कर्मों को पूर्ण विस्तार से लिख कर भेजा था, हमने कई बार पढ़ा था  और और आज फिर पढ़कर एडिट करने के उपरांत ही आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। अपने विवेक के अनुसार कुछ एडिटिंग की है, कुछ औरअधिक पंक्तियाँ भी जोड़ी हैं।  आज वाला लेख 30 अगस्त वाले लेख का ही edited version है।  यह हम इसलिए करह रहे हैं कि अगर आपने वोह वाला लेख पहले पढ़ा भी है तो भी इसको अवश्य पड़ें और कमेंट करें। एडिटिंग में अगर कोई त्रुटि हो गयी हो तो क्षमा प्रार्थी  हैं। 

हम आशा करते हैं कि इस लेख को पढ़ने के उपरांत ऑनलाइन ज्ञानरथ के और भी सहकर्मी आगे आयेंगें और अपने संस्मरण ,कथाएं आदि लिखने में प्रोत्साहित होंगें। 

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सरविंदर पाल  भाई साहिब  के शब्दों में :

प्रातःकाल ब्रम्ह्मुहुर्त में उठ जाने की प्रक्रिया हमारी आज भी अनवरत चल रही है इसमें किसी भी तरह की कोई लापरवाही नहीं है उसी क्रम में आदरणीय डाक्टर गुप्ता  साहब  जी हमारा मार्गदर्शन करते रहते थे I हमारा सपना साकार दिखता नजर आ रहा था पूज्य गुरूदेव के प्रति हमारी निष्ठा व श्रद्धा-विश्वास निरंतर बढ़ रही थी धीरे-धीरे परम पूज्य गुरूदेव के प्रति समर्पित होते जा रहे थे।  

हम अपने घर का विरोध  भी झेल रहे थे।   हमारे सामने घोर संकट था।   बहुत ज्यादा उम्र भी नहीं थी कि हम अपने घर वालों का सामना कर सकें।  विरोध के बावजूद भी हमने अपना पथ नहीं छोड़ा,  हम लुक-छिपकर परम पूज्य गुरूदेव का काम पूरा करते रहे।  हम अपने गाँव में अकेले ही गायत्री परिवार में थे उस समय हमारे सिवा दूसरा कोई व्यक्ति नहीं था जो हमारा समर्थन कर सहयोग कर सके। 

अचानक हमारे अंतःकरण में कुछ ऐसे भाव जागृत हुए कि परम पूज्य गुरूदेव के काम को आगे बढ़ाने में पूर्णतया सहयोग गाँव का लिया जाए तो हमने अपने गाँव में परम पूज्य गुरूदेव का एक कार्यक्रम कराने की योजना बनाई  और इस योजना के बारे में आदरणीय डाक्टर गुप्ता  साहब   के समक्ष अपनी जिज्ञासा रखी। उन्होंने हमारे परम आदरणीय श्री रामबहादुर कुदैशिया जी पूर्व व प्रथम प्रधानाचार्य  जी ,आदर्श इन्टर कालेज कोड़ा जहानाबाद को अवगत कराया। कुदेशिया जी ने  नवलकिशोर मिश्रा जी से बात कर हमें तीन दिवसीय पंच कुंडीय गायत्री महायज्ञ का कार्यक्रम दिलवा दिया जिसकी  तिथि दिनांक 13,14 व 15 जनवरी 1995 के लिए निर्धारित हो गई।  हमारे लिए यह काम बहुत बड़ा  था क्योंकि उस समय हम मिशन में अकेले ही थे।  कार्यक्रम के लिए गाँव में किसी से पहले सलाह मशविरा भी नहीं लिया था केवल  परम पूज्य गुरुदेव का कार्य करने की अभिलाषा थी और उन्हीं का मार्गदर्शन था।  यही मार्गदर्शन और आशीर्वाद था जिसने हमसे इतना बड़ा कार्यक्रम करवा  लिया और उन्हीं की कृपा से सफलता पूर्वक सम्पन्न भी हो गया।  हम स्वयं नहीं समझ पाए कि यह सब कैसे हो गया I 

“ उस समय हम बेरोजगार थे, विद्यार्थी जीवन था।   हमारे घर से किसी भी तरह का कोई सहयोग नहीं था , न आर्थिक न शारीरिक  बल्कि विरोध भयंकर था। ” 

आप सभी मित्र ,भाई , बहिनें , माताएं – पाठकगण एवं ज्ञानरथ  सहकर्मी   खुद समझदार हैं कि हाई स्कूल में पढ़ने वाला  विद्यार्थी  क्या कर सकता है यह सब परम पूज्य गुरूदेव का ही आशीर्वाद था। हमें  गाँव व पास-पड़ोस का भरपूर सहयोग मिला।  तीन दिन तक लगातार भंडारा चलता रहा , कार्यक्रम में किसी प्रकार की कमी नहीं हुई, काफी धन व अनाज बच गया जिसे शान्तिकुन्ज हरिद्वार के तत्वावधान में आयोजित नेत्र शिविरों में भेज दिया गया। 

उस समय को कभी नहीं भूलते और न ही कभी भूलेगे।  वह दिन हमारी इस छोटी सी उम्र की प्रेरणादायी घटना है।

कार्यक्रम उसी विद्यालय के प्रांगण में सम्पन्न हुआ था जहाँ उस समय हम पढ़ रहे  थे जिसके प्रधानाचार्य आदरणीय श्री जयनारायण पाल जी थे उनका  कार्यक्रम में अच्छा सहयोग था , जिनके माध्यम से कार्यक्रम मिला था आदरणीय  श्री रामबहादुर कुदैशिया जी भी कार्यक्रम में शामिल हुए और कार्यक्रम का उद्घाटन माननीय राकेश सचान जी विधायक घाटमपुर के कर-कमलों द्वारा सम्पन्न

होना निश्चित हुआ था। वह भी कार्यक्रम में आये, अब तीन महान हस्तियाँ एक साथ एक मंच में विराजमान थी, कार्यक्रम के संचालक चौथे हम थे। 

“उस समय का द्रष्य हमारी जिन्दगी की पहली खुशी थी जो परम पूज्य गुरूदेव के आशीर्वाद से मिली हम आनंद से ओतप्रोत हो गए, कृतार्थ हो गए।”

अब अपनी इस अपार खुशी का कारण बता रहे हैं :

यह घटना कार्यक्रम में प्रथम दिन की है।  कार्यक्रम के संचालक हम सरविन्द कुमार पाल कक्षा 10 के विद्यार्थी, अपने प्रधानाचार्य श्री जयनारायण पाल जी, हमारे प्रधानाचार्य जी के शिक्षण काल के प्रधानाचार्य  श्री रामबहादुर कुदैशिया जी अपने शिष्य के विद्यालय में आए थे  जो कार्यक्रम की व्यवस्था देख रहे थे तथा माननीय श्री राकेश सचान जी  विधायक घाटमपुर जिनके कर-कमलों से कार्यक्रम का उद्घाटन सम्पन्न होना था और  उनके भी शिक्षण काल के प्रधानाचार्य कुदैशिया जी ही थे, इन सभी के सहयोग से हमारे विद्यालय में  यह तीन दिवसीय समारोह सम्पन्न करवाया गया।  यह सब परम पूज्य गुरूदेव का आशीर्वाद ही  था जो इस तरह का संयोग  मिला कि तीन पीढ़ियां एक ही मंच पर एक साथ अपने गुरु का कार्य करने के लिए बैठीं थीं। हमें खुशी है कि हमारे प्रधानाचार्य जी ने हमारा भरपूर सहयोग दिया और उन्हें खुशी है  कि हमारे शिष्य ने इतनी छोटी सी उम्र में इतना बड़ा कार्यक्रम तो  सम्पन्न करवाया और  वह भी हमारे विद्यालय में  और हमारे प्रधानाचार्य जी को ख़ुशी कि उनके शिक्षण काल के प्रधानाचार्य और इसी विद्यालय के विद्यार्थी विधायक राकेश सचान जी सब एक साथ कैसे इक्क्ठे हो गए।  अवश्य ही परमपूज्य गुरुदेव की कृपा ही होगी जिन्होंने तीन पीढ़ीओं  को एक साथ एक ही मंच पर ,एक ही समय पर, एक ही पुनीत कार्य को सम्पन्न करने को प्रोत्साहित किया। केवल इतना ही नहीं ,हम तो बेझिझक यह भी कह सकते हैं कि गुरुदेव ने यह भी सुनिश्चित किया कि  एक छोटे से बच्चे द्वारा इतने विशाल कार्य को बिना किसी अड़चन के सम्पन्न करवाया जाये। अवश्य ही परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म सत्ता इस महान आयोजन में कार्यरत होगी।  

हमारा यह कहना अत्यंत तर्कसंगत है – क्योंकि गुरुदेव का महाप्रयाण  1990 में हो गया था और यह घटना 1995 की है। गुरुदेव ने कहा था कि इस हाड़ -मास  के चोगे को त्यागने के उपरांत और भी सक्रीय हो कर अपने बच्चों के कार्य करूँगा, और  गुरुदेव ने अपने साहित्य में कितनी ही बार दोहराया है “ तू  मेरा काम कर  मैं तेरा कार्य करूँगा” हमें  बार -बार कमेंट करके ,फ़ोन करके निवेदन किया जाता है कि मैं शांतिकुंज में  जीवनदान देकर गुरुदेव का कार्य करना चाहता हूँ। हम तो यही कहते  हैं कि उस महान गुरु का कार्य करने के लिए शांतिकुंज जाने की तो तभी आवश्यकता पड़ेगी अगर वह विश्व्यापी न हों , आप कहीं भी रहकर , अपने घर में ही , उस महान गुरु के विचारों का प्रचार -प्रसार कर सकते हैं।  हमने आपको कितना सरल मार्ग “ऑनलाइन ज्ञानरथ” उपलब्ध करवाया है।   

इन्ही शब्दों के साथ इस  लेख के प्रथम भाग को विराम देने की आज्ञा लेते हैं और आपको सूर्य भगवान की प्रथम किरण में सुप्रभात कहते हैं। जय गुरुदेव।  परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित 

क्रमश जारी : दूसरा और अंतिम भाग   कल प्रस्तुत करेंगें।

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