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जब पूज्यवर ने गाड़ी की छत पर बैठकर उद्बोधन दिया 

7 अगस्त   2021 का ज्ञानप्रसाद –  जब पूज्यवर ने गाड़ी की छत पर बैठकर उद्बोधन दिया 

हमारे सहकर्मियों ने कुछ दिन पूर्व कमेंट करके  परमपूज्य गुरुदेव की अफ्रीका यात्रा  के बारे में जानने की बहुत उत्सुकता व्यक्त की थी । हमने तो उसी  दिन उनके सुझाव की पालना  करनी आरम्भ कर दी थी लेकिन आप सब जानते हैं कि  बीच में क्या -क्या कुछ घटित हुआ जिसके कारण इस लेख तो प्रस्तुत करने में देरी हो गयी।  हम क्षमा प्रार्थी हैं।  

इस समय  (2021 ) विश्व भर में हज़ारों की संख्या में गायत्री शक्तिपीठ कार्यरत हैं सबके प्रति हमारा बहुत ही आदर है I इधर हमारे  कनाडा में , पडोसी देश अमरीका में, ब्रिटैन में और विश्व भर में गायत्री परिवार बहुत ही सक्रिय हैं  उन सब को हमारा नमन, परन्तु मोम्बासा में भारत से बाहर प्रथम शक्तिपीठ स्थापित करना अपने में एक महत्व पूर्ण बात  है” और लगभग पांच दशक पूर्व क्या सुविधायें थी उनकी  चर्चा अपनेआप में ही एक अविस्मरणीय और अविश्वसनीय  तो हैं ही  लेकिन पूर्णतया सत्य” भी हैं।  हाँ यह बिल्कुल  सत्य हैं , हम सत्य पर क्यों इतना ज़ोर दे रहे हैं ? यह इसलिए कि हमने गुरुदेव के सम्बन्ध में जब भी कोई लेख अपने परिजनों के समक्ष प्रस्तुत किया तो लेख के  तथ्यों  की प्रमाणिकता का पूरा ध्यान रखा। पुस्तकों का अध्यन करना ,वीडियो को देखना ,उनको verify करना और फिर सम्बंधित लोगों के साथ वीडियो calls  के द्वारा double check करना। सम्पर्क स्थापित करना अपनेआप में एक बहुत ही जटिल कार्य है लेकिन हम ईस्ट अफ्रीका वाले सहकर्मियों के बहुत ही आभारी हैं जिन्होंने हमें परमपूज्य गुरुदेव के बारे में  ऐसी-ऐसी अमूल्य घटनाएं बताईं  जिनका विवरण दुर्भाग्यवश प्रकाशित होने से वंचित रह गया।  हमारे आप सबके इस ऑनलाइन ज्ञानरथ का उदेश्य   ऐसे ही hidden तथ्यों को विश्व के सामने प्रस्तुत करना है। इसीलिए हम आपसे “सम्पर्क साधना” के लिए निवेदन करते रहते हैं।  परमपूज्य गुरुदेव द्वारा परिष्कृत   अनमोल हीरे विश्व भर में अपने प्रयासों में कार्यरत हैं  कोई पता नहीं किस समय कौन हमारा मार्गदर्शन कर दे।  आप अधिक से अधिक सक्रीय होने का प्रयास करें और गुरुदेव की  योजना का हिस्सा बनें। 1972 -73 के 40 दिन के ईस्ट अफ्रीका प्रवास में गुरुदेव से सम्बंधित अनगनित संस्मरण हैं। उन्ही में से एक आपके समक्ष प्रस्तुत है।    

गुरुदेव के समक्ष खूंखार आदिवासियों का समर्पण :

 यह घटना  गुरुदेव के  1972 के  East  Africa  प्रवास के दौरान हुई थी । दार-एस-सलाम ( तंज़ानिया का एक नगर ) से कार्यक्रम समाप्त करके गुरुदेव मोम्बासा के लिए रवाना हुए । केन्या की राजधानी नैरोबी के बाद मोम्बासा इस देश का दूसरा बड़ा नगर है। केन्या और तंज़ानिया पड़ोसी  देश हैं ।  गुरुदेव के साथ वहां के  गायत्री परिवार के पांच परिजन और भारत से आए आत्मयोगी थे ।  कुल सात लोगों का काफिला तीन गाड़ियों में था । गुरुदेव बीच वाली गाड़ी में थे । तीन  चार किलोमीटर पर ही घना जंगल शुरू हो जाता था ।यात्रा आठ- दस किलोमीटर ही गई होगी कि पत्तों के बीच सरसराहट हुई और लगा जैसे पचास साठ कदम एक साथ कदमताल करते हुए चल रहे हों । सभी के चेहरों पर चिंता की  लकीरें उभरीं। उन्हें लगा जंगली जानवरों का कोई छोटा मोटा झुंड होगा । पता नहीं लग रहा था कि यह जंगली जानवर नीलगाय हैं या फिर हिंसक प्रवृति के आदिवासी । सभी असमंजस में थे । लेकिन तीनो गाड़ियों के ड्राइवर चौकन्ने हो गए । आवाज़ जैसे ही पास आई उनमें से एक चिल्लाया , ” भागो जान बचाओ “ कहते हुए वह जिधर से आए थे उधर ही चले गए । कुछ ही  देर में परिजनों ने देखा पचीस तीस आदिवासियों का समूह आकर प्रकट हो गया । उन लोगों ने कमर से नीचे रंग बिरंगे कपडे पहने हुए थे ।ऊपर कुछ नहीं पहना  था । गले में कौड़ियों की माला और हाथ में नुकीले सिरे वाले लम्बे सरिए। देखते ही देखते इन सब ने तीनो गाड़ियों को घेर लिया और अजीब -अजीब सी आवाज़ें निकालने लगे । इन्होने गाड़ियों में बैठे लोगों की तरफ अपने तेज शस्त्र तान दिए । सभी लोग डर गए ।साथ बैठी महिलायें तो थर थर कांप रही थीं ।आदिवासियों  ने तीन -चार बार शस्त्र दिखाए और चिल्लाये,  फिर अगले ही पल शांत भी हो गए। ऐसा लग रहा था वह अपना अगला कदम सोच रहे होंगें । इसी बीच गुरुदेव ने अपना दांये हाथ से इशारा किया और बाएं हाथ से गाड़ी का द्वार खोल कर बाहर आ गए । गुरुदेव का उठा हुआ हाथ देख कर आदिवासी  कुछ पीछे हट  गए । आदिवासियों के पीछे हटते ही गुरुदेव ने हाथ नीचे कर लिया और कुछ कहा । ” क्या कहा , कोई नहीं जानता  । किसी को कुछ समझ नहीं आया “ गुरुदेव के हाथ नीचे करते ही आदिवासियों ने मशीनी तत्परता से हथियार नीचे रख दिए । जिस तेजी से हथियार नीचे रखे उतनी ही तेजी से वह नीचे झुके और गुरुदेव को साष्टांग प्रणाम करने के लिए नीचे भूमि पर लेट ही गए ।अपनी जीभ बाहर निकाली और हाथ ऊपर कर दिए । इतना करने पर गुरुदेव ने एक बार  फिर कुछ कहा आदिवासियों ने उत्तर भी दिया और उठ कर खड़े हो गए । किसी को नहीं मालूम हुआ क्या वार्तालाप हो  रहा है। गुरुदेव ने गाड़ियों में बैठे परिजनों को देखा और कहा आप अब निश्चिंत रहें डरने की  कोई बात नहीं   यह सब अपने ही लोग हैं ।”  अखंड ज्योति संस्थान मथुरा ( भूतों वाली बिल्डिंग) में भी गुरुदेव का ऐसा ही प्रतिकर्म था।  यह निलोत ( Nilotes)   जाति के लोग थे । जिस भाषा में गुरुदेव ने उनके साथ बात की उस के केवल पांच सात सौ शब्द हैं । इस भाषा को बांटू  कहते हैं आज भी यह भाषा विश्व के 27 अफ्रीकी देशों में बोली जाती हैं । बांटू  के अंतर्गत  कोई 600  के लगभग भिन्न भिन्न प्रकार की भाषाएँ आती हैं।   

भारत से गुरुदेव के साथ आए आत्मयोगी को बड़ी हैरानगी हुई गुरुदेव ने यह भाषा इन आदिवासियों के साथ कैसे बोल ली । आत्मयोगी के बारे में जब हमने विद्या परिहार जी से पूछा तो उन्होंने कहा गुरुदेव के साथ भारत से एक दाढ़ी वाले पुरष आये थे। लेख के साथ पिक्चर में आप जो दाढ़ी वाले देख रहे हैं यह वही हो सकते हैं।  यह पिक्चर भी विद्या जी ने ही हमें उपलब्ध कराई थी।  नैरोबी में गुरुदेव विद्या परिहार के घर में ठहरे  थे। विद्या परिहार जी के बारे में अगर अधिक लिखेंगें तो लेख की दिशा कहीं और ही चली जाएगी लेकिन नीचे दिए गए वीडियो लिंक को अवश्य देख लें। https://youtu.be/o_793AOO680

थोड़ी ही देर में वर्षा जैसा वातावरण बन गया और यह सब आदिवासी नाचने लगे । उनकी उमंग जब स्थिर हुई तो गुरुदेव ने कहा आप सब भूल गए हो पर हमको याद है ।हज़ारों वर्ष पूर्व हमने आपके साथ इस धरती पर काम किया है”  गुरुदेव ने अभी कहना शुरू ही किया था तो एक आदिवासी आगे आकर कहने लगा :

 “आप ऊंचाई पर बैठ जाइये आप हमारे देवता हैं । हमारे बराबर न खड़े हों आपकी मेहरबानी होगी। “ उनकी बात सुनकर गुरुदेव ने इधर उधर देखा और फिर इनकी ही भाषा में बोले ,” इधर तो कोई जगह नहीं है आप नीचे बैठ जाइये मैं खड़े होकर ही बात कर लूँगा।”  उनको यह बात भी रास न आई कि गुरुदेव खड़े रहें और हम बैठे रहें । वह गुरुदेव में अपने कबीले के आराध्य को देख  रहे थे । तब एक आदिवासी जो शायद कबीले का मुखिया था आगे आया  और उसने आगे आ कर कहा:” मैं आपसे विनती करता हूँ आप किसी तरह हम से ऊपर खड़े हों । उसने सूर्य की तरफ संकेत कर के कहा उधर भी तो आप ही  खड़े हैं ।” आदिवासीयों की बातों से लग रहा था शायद सूर्य उस कबीले का लोक देवता हो । गुरुदेव ने उस मुखिया की बात रखते हुए पास खड़ी गाड़ियों की छत पर बैठ कर उन कबीलाई लोगों को सम्बोधित किया । उस सम्बोधन में गुरुदेव ने उनके आराध्य सूर्य के और उसकी आराधना के रहस्य समझाये । सम्बोधन का समापन गायत्री मन्त्र के उच्चारण से हुआ । सबसे हैरान करने वाली बात थी कि गायत्री मन्त्र का उच्चारण बिल्कुल  स्पष्ट था और करीब 40 मिनट के बाद ऐसा लगता था कि सारा वातावरण गायत्रीमय हो गया और ऐसा प्रतीत हो रहा था कि हर वृक्ष ,वृक्ष का हर पत्ता गायत्री का गान कर रहा हो । 

गुरुदेव इन देशों में 40 दिन रहे और 14  स्थानों पर गए । परिजन इन यात्राओं को याद करते हुए इस कबालियों का उद्बोधन और उनमे सोए हुए संस्कार का जागरण सबसे महत्वपूर्ण- दिखाई देने वाली – घटना  समझते हैं । दिखाई देने वाली इस लिए कि अदृश्य जगत में तो कई घटनाएं हुई जिनका दृश्य संसार में कोई रिकार्ड नहीं रखा गया ।

तीन भागों  वाली पुस्तक “चेतना की शिखर यात्रा” डॉ प्रणव पंड्या  जी और ज्योतिर्मय जी द्वारा लिखित पुस्तक है  इसमें ऐसा वर्णन भी मिलता है कि गुरुदेव ने 14 स्थानों में से अमृतमंथन कर 14 रत्न निकाले जिन्होंने गायत्री परिवार को न सिर्फ अफ्रीका बल्कि UK,USA ,CANADA  आदि देशों में ले जाने का काम किया । राम टाक जी के छोटे भाई पूर्ण टाक जी ने  28  अप्रैल 2020 को  whatsapp  मैसेज में बताया था :  ” मुझे आज भी याद है – गुरुदेव का अफ्रीका  प्रवास public speeches देने का नहीं था  बल्कि कुछ ऐसी आत्माओं  के साथ सम्पर्क स्थापित करना था जो अफ्रीका में ही नहीं Canada , USA , UK  और दूसरे  देशों में भी गायत्री परिवार को लेकर जाएँ “ विद्या परिहार जी का धन्यवाद् जिन्होंने हमें  पूर्ण टाक  और  दूसरे  परिजनों से संपर्क करवाया । 

हमारे सहकर्मी इस बात से सहमत होंगें कि इतनी विस्तृत जानकरी वाले अति complex लेखों को compile करना कोई सरल कार्य नहीं है और त्रुटि होना स्वाभाविक है , इसलिए  क्षमाप्रार्थी हैं । रविवार को अवकाश के उपरांत सोमवार की सुबह को आपके समक्ष उपस्थित होंगें। 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं  कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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