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आज के हनुमान – शिवदास साधु  और  शुक्ला  बाबा 

 31  जुलाई 2021  का ज्ञानप्रसाद -आज के हनुमान – शिवदास साधु  और  शुक्ला  बाबा 

आज के ज्ञानप्रसाद में समर्पण ,श्रद्धा और भक्ति के दो उदाहरण आपके समक्ष प्रस्तुत हैं। पिछले पांच -छै  दिन हमने  हिमालय में प्रकृति के सानिध्य में  कुछ समय व्यतीत किया।  आज हम आपको भारत से 14000 किलोमीटर दूर लेकर जा रहे हैं और साथ में ही शुक्ला बाबा के कुछ संक्षिप्त पलों का वर्णन कर रहे हैं। यह वर्णन आज ही कुछ समय पूर्व आदरणीय मृतुन्जय भाई साहिब ने शुक्ला बाबा के स्वास्थ्य में सुधार समाचार  के उपरांत भेजा है।  हम इस वर्णन को बिना किसी बदल के ऐसे  ही शेयर कर  रहे हैं।

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गूगल सर्च में “Temple  in the  sea  ”  और इसकी  सारी कथा  पढ़ कर हर भारतीय को अवश्य  गर्व होगा । भारत से लगभग 14000  किलोमीटर दूर  Trinidad  and  Tobago   में शिवदास साधु  नाम के एक   प्रवासी   sugar labrour ( गन्ना  मज़दूर)  ने सागर के अंदर शिव मंदिर बना कर विश्व भर में भारत का नाम रोशन किया और वहां के लोगो में ” आज का हनुमान ”  नाम प्रचलित किया । जिस प्रकार हनुमान  जी ने सेतुबंध की रचना की थी शिवदास  का कार्य भी ऐसा  ही था । 

1903 में भारत  में जन्मे शिवदास 1907  में   अपने माता पिता ( अनुबंधित कर्मचारी ) और 2  छोटे भाइयों के साथ  समुद्री जहाज़ से Caribbean के इस देश में आए  –  इस देश का नाम है Trinidad and Tobago -।  अनुबंधित  कर्मचारी एक  प्रकार के बंधवा मज़दूर होते  हैं  और उनका मालिक उनसे जो चाहे काम ले सकता है । चाहे contract में वह काम लिखा है या  नहीं । यही कारण है कि माता पिता की मृत्यु के बाद  automatically यह contract बच्चों को करना होता है । इनके लिए एक अक्षर “unfree” प्रायः प्रयोग में आता है । लेकिन यह डेढ़ शताब्दी  पूर्व की स्तिथि थी I आज के युग में ऐसा शायद ही होता हो । शिवदास को भी अपने माता पिता वाला काम करना पड़ा । परिश्रम और बहुत ही कड़ी परिस्थिति में शिवदास  को जो भी काम दिया जाता, करता रहा, पता नहीं कितने ही वर्ष बीत गए । 1926 में , 19 वर्ष बा ,  शिवदास पहली बार भारत आए और गंगा मैया को नमस्कार किया । आर्थिक तंगी के कारण समुंद्री जहाज़ का ही सहारा लेना पड़ा –  हमारे गुरुदेव की भांति – ( आप हमारे गुरुदेव की अफ्रीका यात्रा (1972) भूल तो नहीं गए ) । धार्मिक प्रवृति और भारत से प्रेम होने के कारण उनका मन विदेश में नहीं लगता था । भारत में  उन्हें  120 वर्षीय सिद्ध पुरष   मिले और  शिवदास ने उनसे आश्रीवाद  लिया और यह संकल्प लिया कि आर्थिक स्तिथि के कारण  भारत तो बार- बार  नहीं  आया  जाता तो विदेश में ही एक मंदिर की स्थापना की जाए और  सागर को ही गंगा मैया समझा जाए। । यहाँ एक बार फिर गुरुदेव की शिक्षा स्मरण करवाती है – भावना और समर्पण –  1970 में देहांत से पहले शिवदास केवल 5 बार ही भारत आ सके ।

इतनी  सरलता और धार्मिक प्रवृति के कारण  वहां के लोगों ने शिवदास  को साधु के नाम से जानना शुरू कर दिया । ह्रदय में मंदिर बनाने की अग्नि उन्हें चैन से सोने नहीं देती थी । आखिर  अक्टूबर 1947  में उन्होंने समुद्र के तट पर Caroni  कंपनी से धरती का एक टुकड़ा ख़रीदा ।  इस  धरती के टुकड़े पर मंदिर बनाना आरम्भ किया ।  धरती साफ़ की ,  मूर्तियां स्थापित कीं और 4 वर्ष  तक Waterloo bay  के निवासी एवं आस पास के गावों से श्रद्धालु आते रहे और अपने श्रद्धा सुमन प्रदान करते रहे । लेकिन 1952  में Caroni कंपनी ने इस मंदिर  को हटाने का निर्देश  दिया  क्योंकि यह मंदिर  किसी  निजी कंपनी की  भूमि ( Private  land ) पर बनाया गया था । उन पर यह इलज़ाम लगाया गया कि यह निजी  भूमि है और इस पर आप मंदिर नहीं बना सकते ।  आपको इसे गिरना होगा । बड़े ही दुखी हृदय से उन्होंने इस ईश्वर के घर को गिराने से इंकार कर दिया ।  इस हुक्म की अवज्ञा करने के कारण उन्हें 14 दिन की जेल हो गयी और 400 डॉलर जुर्माना भी हुआ । 400 डॉलर उस समय उनका  2 वर्ष का वेतन था , यानि 20 डॉलर  प्रति  माह से भी कम। उनके जेल कारावास के दौरान उस मंदिर को गिरा दिया गया और वहां पर कोई नाम निशान ही न रहा । जेल से बाहर आते ही उन्होंने  अपने संकल्प पर पुनः काम करना आरम्भ कर दिया । उन्होंने समुन्द्र के बीच 500  फुट की दूरी पर मंदिर बनाना आरम्भ कर दिया । यह तो किसी  की भूमि नहीं है न  । लगभग   20 वर्ष  के  अथक परिश्रम उपरांत  यह मंदिर बन कर तैयार हो गया । इन बीस वर्षों में उनका एकमात्र साधन एक बाइसिकल था । साइकिल के हैंडल  पर दोनों तरफ बाल्टियां  लटका कर, उनमें पत्थर , रेत  , सीमेंट  इत्यादि   समुन्दर में गिराने का कार्य  अकेले या कभी कभार परिवार के साथ होता रहा । उनको ऐसा करते लोगों ने उपहास भी किये। लोग अक्सर कहते थे साधु पागल हो गया है । परन्तु  वह अनवरत भगवान के इस  कार्य में लगे रहे । इस तरह उन्होंने समुन्दर में जाने के लिए रास्ता बनाया । उसके बाद पास वाले गांव से एक ट्रक लिया और ऊपर वाला कार्य उस ट्रक से सम्पन्न किया । एक बार उनका  ट्रक  समुन्द्र में फस गया  और निकालने का  प्रयत्न करते- करते रात हो गयी । सारी रात पानी में ही काटनी पड़ी । ऐसी थी उनकी भक्ति, ऐसी थी उनकी श्रद्धा, विश्वास  और उस परम् परमात्मा के साथ स्नेह। सच ही वहां के लोगों ने उन्हें आज के हनुमान की उपाधि दी ।  1970 में मंदिर पूर्ण होने पर शिवदास  अंतिम बार भारत गए और वहीँ हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गयी ।   

मंदिर की  संभाल करने वाला कोई नहीं रहा और वह खराब होना शुरू हो गया  । परन्तु जब उस परमपिता की इच्छा हो तो सब कार्य अपने  आप होते चले जाते हैं । 1994 में भारतीयों के Trinidad  और Tobago में आने के 150 वर्ष मनाने ( Indians  Arrival  Day )  के उपलक्ष्य में कई कार्यक्रम आयोजित हुए ।  इस मंदिर को बनाने का लक्ष्य इन कार्यक्रमों का ही एक ध्येय था । यहाँ की सरकार ने उस महान आत्मा को श्रद्धांजलि के रूप में इस को खुद पूरा किया । 10 दिसंबर 1995 को यहाँ की सरकार ने इस मंदिर को राष्ट्र को समर्पित किया ।  प्रवेश द्वार प्रांगण पे उनकी  बहुत ही खूबसूरत मूर्ति स्थापित की गयी । वर्तमान सरकार में डॉ रामबचन ने इस मंदिर को  National  treasure  का  दर्ज़ा दिलाने में बड़ा योगदान दिया है । Indians Arrival Day का प्रचलन भी उन्ही की देन  है । जनवरी 2002  से जनवरी 2003 पूरे एक वर्ष के लिए शिवदास  साधु  का जन्म शताब्दी वर्ष मनाया गया ।  डॉक्टर रामबचन ने इन पुर्षार्थों को यजुर्वेद के अनुसार पितृ ऋण चुकाने का अभूतपूर्व एवं स्वर्ण अवसर कहा।  हम सभी इस ज्ञान रथ के माध्यम से इस महान आत्मा को नतमस्तक होते हैं ।

https://en.wikipedia.org/wiki/Temple_in_the_Sea

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बाबा के जीवन के कुछ पल:  ( मृतुन्जय जी की प्रस्तुति )

१९५६ में उन्होंने अपना मस्तिचक ही स्थित पुश्तैनी घर त्याग, ब्रह्मचर्य में रहने का संकल्प लेकर अपने पहले गुरु नागा बाबा हरिदास के सानिध्य में मस्तिचक , बिहार में उनके आश्रम में रहने लगे। बाबा हरिदास देह त्याग करने से ठीक पूर्व अपने शिष्य शुक्ला बाबा को बताते हैं कि अब से उनको मथुरा में रहने वाले एक संत पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी को अपना गुरु के रूप में स्वीकार करना है। यह भी बताए कि यदि श्रीराम शर्मा जी मस्तिचक आश्रम में आके संध्या पूजन किए तो ही उनको (बाबा हरिदास) मुक्ति प्राप्त होगी। पर श्रीराम शर्मा जी तब ही मस्तिचक आएँगे जब तुम (शुक्ला बाबा) २४ लाख का गायत्री महा अनुशठान (तथा ऊँचे स्वर में एक माला नित्य हवन) लगातार पाँच साल सम्पन्न करें । बाबा हरिदास तत्पश्चात देह त्याग करते हैं। शुक्ला बाबा अनुशठान शुरू करते हैं; तीन साल २४ लाख अनुशठान करने के बाद वो गुरुदेव श्रीराम शर्मा जी को मथुरा पत्र लिखते हैं और मस्तिचक आने के लिए आमंत्रण देते हैं। वहाँ से गुरुदेव का जवाब आता है कि अभी दो साल और बाक़ी है। शुक्ला बाबा तभी समझ जाते हैं कि गुरुदेव साक्षात ईश्वर हैं। वो बाक़ी दो साल अनुशठान पूर्ण करते हैं और फिर गुरुदेव का मस्तिचक आगमन होता है। गुरुदेव वहाँ संध्या पूजन करते हैं एवं शुक्ला बाबा को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करते हैं। यह सारा वाक़या मस्तिचक में आज स्थित गायत्री शक्तिपीठ में घटित हुआ था। उसके पश्चात शुक्ला बाबा गुरुदेव के निर्देशानुसर अपने जीवनकाल में सारे भारत में लगभग २५०० गायत्री शक्तिपीठ का प्रारम्भ करवाते हैं। इस दौरान वो अनगिनत महायज्ञ पूरे देश में करवाते हुए जनमानस को मिशन से जोरते हैं। शुक्ला बाबा मानते हैं कि गुरुदेव के प्रति उनका सम्पूर्ण समर्पण एवं आपर भक्ति के वजह से गुरुदेव उनको यह सब करने का शक्ति देते रहे।

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 इन्ही शब्दों के साथ अपनी लेखनी को विराम देते हैं।  कल रविवार को अवकाश रहेगा और सोमवार को आपके समक्ष होगी एक और अद्भुत प्रस्तुति। 

जय  गुरुदेव

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं  कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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