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शरीर →मन →आत्मा → मस्तिष्क →विचार → अच्छे /बुरे विचार ( सुनसान के सहचर )

29 जुलाई 2021  का ज्ञानप्रसाद: शरीर →मन →आत्मा → मस्तिष्क →विचार → अच्छे /बुरे विचार  

आज का लेख आरम्भ करने से पहले हम आपने सहकर्मियों के साथ आदरणीय शुक्ल बाबा का हेल्थ अपडेट करना चाहेगें।हम आपके साथ आदरणीय मृतुन्जय तिवारी भाई साहिब का   मैसेज as it is ही शेयर कर रहे हैं। भारतीय समय  के अनुसार यह अपडेट रात 10 :30 बजे का है। हमने 7:00  बजे तिवारी जी को और शशि मिश्रा को इक्क्ठे ही मैसेज किया था।  दोनों के  रिप्लाई उसी समय आ गए थे लेकिन थोड़ी प्रतीक्षा के लिए कहा था।   

No improvement in condition…neither improved nor deteriorated. Next 48 hrs critical. Hoping for whatever is best for him

इस मैसेज  को देखते हुए हम अपने सभी सहकर्मियों को निवेदन करना चाहेगें कि बाबा के जीवनदान के लिए  अपनी समर्था अनुसार महामृतुन्जय  मन्त्र का नियमित जाप  करते रहें और इस पुनीत  कार्य में  अपना योगदान देते रहें। मृतुन्जय भाई साहिब की तरह हम भी यही कामना करते हैं की बाबा के लिए जो भी best हो परमपूज्य गुरुदेव वही करें। सविंदर भाई साहिब का व्हाट्सप्प मैसेज आपके साथ शेयर कर रहे हैं।  उन्होंने रात 11:30 बजे (भारतीय समय) हमें मैसेज करके पूछा  था। “अपनी सम्पूर्ण आयु दान करते हैं उससे परम पूज्य गुरुदेव जो उचित समझें ले लें और शुक्ला बाबा जी को अविलंब स्वस्थ कर दें यही हमारी गुरू सत्ता से विनम्र प्रार्थना व पवित्र शुभ मंगल कामना है!”

आजकल के लेखों के बारे में हम आपके बारे में तो कुछ कह नहीं सकते लेकिन हमारा तो मन भर  ही नहीं रहा कि इस टॉपिक को चेंज किया जाये।  परमपूज्य गुरुदेव की हिमालय यात्रा पर आधारित यह लेख हिमालय दर्शन ( जो अपनेआप में  ही दिव्य है) तो करवा ही रहे हैं साथ ही साथ जीवन प्रबंधन (life management) का अभूतपूर्व कार्य भी सम्पन्न कर रहे हैं। जीवन प्रबंधन एक बहुत ही आवश्यक टॉपिक  है जिसकी आज के दिनों में हम  सबके लिए  अत्यंत महत्ता है।  जिसे जीवन जीना आ  गया ,वही सिकंदर है। परमपूज्य गुरुदेव ने जो भी साहित्य लिखा उसे बार -बार पढ़ कर, समझ कर ,अपनी अल्प बुद्धि के अनुसार विश्लेषण करके,आपके कमैंट्स का सहारा लेकर अपने अन्तःकरण में ढालने  से जीवन सफलता की ओर अग्रसर करने में सहायता मिलती है। फिलोसोफिकल होने के बावजूद यह लेख  बहुत ही दिलचस्प और ज्ञानवर्धक हैं।       


अमावस्या की अन्धेरी रात थी ,आकाश  बादलों से  घिरा था, छोटी-छोटी पानी की  बूंदें भी पड़  रहीं थीं। ठण्डी वायु  कम्बल को पार कर भीतर घुसने का प्रयत्न कर रही थी । गुरुदेव छोटी सी कुटिया में, पत्ते की चटाई पर लेते हुए थे।  शरीर आज फिर असुखकर( uncomfortable ) अनुभव करने लगा। नींद आज फिर उचट गई। विचारों का प्रवाह फिर चल पड़ा। स्वजन सहचरों से भरे घर से दूर , सुख -सुविधाओं से सम्पन्न घर से दूर  गुरुदेव इस कुटीया  की तुलना करने लग पड़े और दोनों वातावरणों के गुण-दोष गिनने लग पड़े। 

शरीर असुविधा अनुभव कर रहा था। मन भी उसी का सहचर ठहरा, इस असुविधा में वह कैसे  प्रसन्न होता ? इनकी  दोनों की  मिली भगत जो है। आत्मा के विरुद्ध ये दोनों एक हो जाते हैं। मस्तिष्क तो इनका खरीदा हुआ वकील है। जिसमें इन दोनों की  अरुचि होती है, उसी का समर्थन करते रहना इसने अपना व्यवसाय बनाया हुआ है। जिस प्रकार  राजा के दरबारी हवा का रुख देखकर बात करने की कला में निपुण होते थे, राजा को प्रसन्न रखने में, उसकी हाँ में हाँ मिलाने में दक्षता प्राप्त किए रहते थे, वैसा ही यह मस्तिष्क भी है। मन की रुचि देखकर उसी के अनुकूल यह विचार प्रवाह को छोड़ देता है। और इन विचारों के समर्थन में अगणित कारण और प्रमाण उपस्थित कर देना इसके बाँये हाथ का खेल है। सुविधाजनक घर के गुण और इस कष्टकारक निर्जन के दोष बताने में वह बैरिस्टरों से कोई कम नहीं है । सनसनाती हुई हवा की तरह उसका अभिभाषण भी जोरों से चल रहा था।

शरीर →मन →आत्मा → मस्तिष्क →विचार → अच्छे /बुरे विचार  

यही हम सबकी स्थिति होती है। इस चमड़े के शरीर को जो अच्छा लगता है ,मन वही करता है और मस्तिष्क तो हमारा नौकर  जो ठहरा , वह वही करेगा जो हम उससे करवाना चाहेगें।  उस कार्य को पूर्ण करने में हमारा मस्तिष्क ऐसे-ऐसे   तर्क वितर्क प्रस्तुत  करेगा और  वकालत करके convince करवा देगा कि क्या मजाल कि हम उसके निर्णय को नकार सकें।  मनुष्य की यह अद्भुत विशेषता है कि जिन परिस्थितियों में वह रहने लगता है, उसका अभ्यस्त हो जाता है और वह हमेशा अच्छी और  बढ़िया ,सुविधाजनक परिस्थितियों  को ही अधिक महत्त्व देता है   इन स्थितियों को पाने के लिए वह अपना समस्त जीवन दाव पर लगा देता है – मनुष्य ऐसा  क्यों करता है ? क्योंकि उसका मन करता है/ कहता है और मस्तिष्क /दिमाग तो हमारा नौकर है ही।  परमूज्य गुरुदेव का विचार क्रांति सूत्र इसी दिशा में हम सबका  मार्ग दर्शन करता है। आइये हम सब संकल्प लें कि  विचार क्रांति को अपने जीवन में ढालने का प्रयास करें न कि  “कामना” की भागदौड़ में गीताउपदेश भी भूल जाएँ जिसके अनुसार   

“सामान्यं मनुष्य विषयों में आसक्त (लगा) रहता है विषय आसक्ति से कामना  उत्पन होती  है, कामना  की पूर्ति न होने से क्रोध की  उत्पति होती है, क्रोध से विषय के प्रति मोह और बढ़ जाता है, विषय के प्रति मोह होने से सोचने की शक्ति समाप्त  हो जाती है, जब सोचने की शक्ति समाप्त  हो जाती है तो बुद्धि का नाश होता है, जब बुद्धि का नाश होता है तो मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है’

पूज्यवर ने सुख सुविधाओं से परिपूर्ण घर और हिमालय के  सुनसान वातावरण की तुलना हम सबको मार्गदर्शन  एवं शिक्षित करने के उदेश्य से ही तो की है।  इसीलिए हम कुछ दिनों से  उनके साथ चल रहे हैं  ताकि  हम कुछ न कुछ तो सीखने का प्रयास करें। परमपूज्य गुरुदेव ने जब उस सुनसान  कुटिया में प्रवेश किया था तो उन्हें  सब कुछ सूना ही लगा था।  लेकिन यह सूनापन अपने अंतर्मन  का ही होता है ,जब अंतर्मन  का सुनसान बाहर निकल पड़ता तो सर्वत्र सुनसान ही दीखता था लेकिन  अब जबकि अंतर्मन का छोटापन विशाल होता  जाता है तो सूनापन गायब होता दिखता है।  चारों ओर अपने ही अपने हँसते- बोलते नजर आते हैं ,यह पर्वत ,झरने ,पक्षी ,रंग बिरंगें फूल  यहाँ तक कि झींगुर भी जो  हमारी नींद को डिस्टर्ब करने में एक पल भी नहीं लगाते।  जब ऐसी स्थिति आ जाती है तो  सूनापन कहाँ रह जाता है ? अब अन्धेरे में डर किसका? यह हमारी नज़र का ही तो खेल है -नज़रें बदली नज़ारे खुदबखुद बदल गए। 

गुरुदेव इन्ही विचारों में डूबे थे कि   सिरहाने की ओर छोटे से छेद से  झींगुर ने अपना मधुर संगीत गाना आरम्भ कर दिया। झींगुर  को अंग्रेजी में cricket कहते हैं, grasshopper से थोड़े छोटे होते हैं और पंखों की गति से आवाज़ पैदा करते हैं। एक से प्रोत्साहन पाकर दूसरा बोला, दूसरे की आवाज सुनकर तीसरा फिर उससे चौथा इस प्रकार कुटिया  में अपने- अपने छेदों में बैठे कितने ही झींगुर एक साथ गाने लगे। उनका गायन यों  तो अनेकों बार सुना थाऔर  उसे कर्कश व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण समझा था पर आज मन के लिये कुछ काम न था। गुरुदेव  ध्यानपूर्वक इस गायन के उतार-चढ़ाव को परखने लगे।  गुरुदेव लिखते हैं : इस  निर्जन वन  की निन्दा करते-करते मन भी  थक ही  गया था। इस चंचल बन्दर (मन) को हर घड़ी नये- नये प्रकार के काम जो चाहिए। झींगुर की गान- सभा का समा बँधा तो मन  उसी में रस लेने लगा। झींगुर ने बड़ा मधुर गाना गाया। उसका गीत मनुष्य की भाषा में न था, पर भाव वैसे ही मौजूद थे  जैसे मनुष्य सोचता है। उसने गाया: 

“हम असीम क्यों न बनें ?? असीमता का आनन्द क्यों न लें ? सीमा ही तो  बन्धन है, असीमता में मुक्ति का तत्व भरा है। मनुष्य का सुख  इन्द्रियों में ही सीमित है, जो कुछ चीजों और कुछ व्यक्तियों को ही अपना मानता है, उसका स्वार्थ थोड़ी-सी कामनाओं तक ही सीमित है।  यह  बेचारा  नीच, तुच्छ  प्राणी  इस असीम परमात्मा के असीम विश्व में भरे हुए असीम आनन्द का भला कैसे अनुभव कर सकेगा? हे जीव तू असीम हो, आत्मा का असीम विस्तार कर सर्वत्र आनन्द ही आनन्द बिखरा पड़ा है; उसे अनुभव कर और  अमर हो जा।

इकतारे पर जैसा बीतराग ज्ञानियों की मण्डली मिलजुल कर कोई निर्वाण का पद गा रही हो, वैसे ही यह झींगुर निर्विघ्न होकर गा रहे थे. किसी को सुनाने के लिए नहीं बल्कि अपनेआप को सुखी अनुभव कराने के लिए, only for self enjoyment  उनका यह प्रयास चल रहा था। मैं भी उसी में विभोर हो गया। वर्षा के कारण क्षतिग्रस्त कुटिया से उत्पन्न असुविधा विस्मरण हो गयी, सुनसान में शान्तिगीत गाने वाले सहचरों ने उदासीनता को हटाकर उल्लास का वातावरण उत्पन्न कर दिया। पुरानी आदतें छूटने लगीं। मनुष्यों तक सीमित आत्मीयता से बढ़कर प्राणिमात्र तक विस्तृत होने का प्रयत्न किया तो दुनियाँ बहुत चौड़ी हो गई। मनुष्य के सानिध्य में  रहने के सुख की अनुभूति से बढ़कर अन्य प्राणियों के साथ भी वैसी ही अनुभूति करने की प्रक्रिया सीख ली। अब इस निर्जन वन में भी कहीं सूनापन दिखाई नहीं देता। इन झींगरों ने हमें कम से कम यह तो सिखा  ही दिया न कि  हम अपने लिए जिएं ,अपनी ख़ुशी के लिए ही करें, न कि दिखावे के लिए।

जय गुरुदेव 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं  कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

To be continued 

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