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गुरुदेव की हिमालय यात्रा से दो शिक्षाप्रद कथाएं 

21 जुलाई 2021 का ज्ञानप्रसाद – गुरुदेव की हिमालय यात्रा से दो शिक्षाप्रद कथाएं 

आज के ज्ञानप्रसाद में हम सब परमपूज्य गुरुदेव के सानिध्य में, हिमालय में  दो कहानियों को पढेंगें  और इन कहानियों से  मिल रही शिक्षा को अपने अन्तःकरण में धारण करने का प्रयास करेंगें। आप सभी ने अवश्य ही यह दोनों कहानिया पढ़ी होंगीं लेकिन हमारे साथ पढ़ने  की बात ही और है,  क्योंकि हम आपसे संकल्प लेते हैं कि इन्हें  इस श्रद्धा से पढ़ें  कि  हमने अपने परिवार में चल  रही  समस्याओं का समाधान  ढूंढना है।  हमने  इन कहानियों के  main  कंटेंट को छेड़े बगैर reformat  किया है और analysis का सेक्शन aad किया है। 

ज्ञानप्रसाद आरम्भ करने से पहले एक अपडेट : 24 जुलाई को गुरुपर्णिमा है और हम अपने गुरुदेव के आदर-सम्मान में एक वीडियो बनाने का प्रयास करेंगें जिसमें आंवलखेड़ा ,मथुरा तपोभूमि ,युगतीर्थ शांतिकुंज को शामिल करने का विचार है।  आने वाले दिनों में अगर regular लेख न लिखा जा सके तो हम क्षमा प्रार्थी होंगें।  हम पूरा प्रयास करेंगें कि अपने ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार के साथ सम्पर्क स्थापित रहे।   


चांदी के पहाड़ 

 हिमालय यात्रा के दौरान एक दिन परमपूज्य गुरुदेव धर्मशाला की ऊपरी  मंजिल की कोठरी में ठहरे थे, सामने ही बर्फ से ढकी पर्वत की चोटी दिखाई दे  रही थी। बर्फ  पिघल कर धीरे-धीरे पानी का रूप धारण कर रही थीऔर पानी  एक झरने के रूप में नीचे की तरफ बह रहा था। कुछ बर्फ पूरी तरह गलने से पहले ही पानी के साथ मिलकर बहने लगती थी इसलिए दूर से झरना ऐसा लगता था मानो झागदार  दूध  ही ऊपर बहता चला आ रहा हो।अभी दो दिन पहले ही हमने आपको दूध की नदी के दर्शन  करवाए- चौंक गए न – संजना बेटी की प्रकृति वाली वीडियो में अगर  भागरथी नदी का क्लिप देखा होगा तो आप अवश्य ही हमारे साथ सहमत होंगें। दृश्य बहुत ही शोभायमान था, उसे देख-देखकर  आंखें ठण्डी हो रही थी। जिस कोठरी में अपना ठहरना था उससे तीसरी कोठरी में अन्य यात्री ठहरे हुए थे। उनमें दो बच्चे भी थे एक लड़की दूसरा लड़का। दोनों की उम्र 11-12 वर्ष के लगभग रही होगी, उनके माता-पिता यात्रा पर थे। इन बच्चों को कुलियों के पीठ पर इस प्रान्त में चलने वाली ‘कण्डी’ सवारी में बिठाकर लाये थे। बच्चे बहुत हंसमुख और बातूनी  थे। दोनों में बहस हो रही थी कि 

“यह सफेद चमकता हुआ पहाड़ किस चीज का है।”

उन्होंने  कहीं सुन रखा था कि धातुओं की खानें पहाड़ों में होती हैं। लड़के  ने अपने ज्ञान से कहा   कि यह  पहाड़ चांदी का है। लड़की को इसमें सन्देह हुआ, वह यह तो नहीं सोच सकी किअगर  चांदी का न होगा तो और किस चीज का होगा पर यह जरूर सोचा कि इतनी अधिक  चांदी इस प्रकार खुली पड़ी होती तो कोई न कोई उसे उठा ले जाने की कोशिश जरूर करता। वह लड़के की बात से सहमत नहीं हुई। बहस और जिद्दा-जिद्दी चल पड़ी। परमपूज्य गुरुदेव को  विवाद मनोरंजक  लगा क्योंकि बच्चे तो वैसे ही बहुत  प्यारे होते हैं।  दोनों को बुलाया और समझाया कि यह पहाड़ तो पत्थर का है पर ऊंचा होने के कारण बर्फ जम गई है। गर्मी पड़ने पर यह बर्फ पिघल जाती है और सर्दी पड़ने पर जमने लगती हैं। वह बर्फ ही चमकने पर चांदी जैसी लगती है। बच्चों का एक समाधान तो हो गया पर वे उसी सिलसिले में और ढेरों प्रश्न पूछते गये , गुरुदेव  भी उनके ज्ञान-वृद्धि की दृष्टि से पर्वतीय जानकारी से सम्बन्धित बहुत सी बातें उन्हें बताते  रहे। 

विश्लेषण ( Analysis ) :

सोचता हूं बचपन में मनुष्य की बुद्धि कितनी अविकसित होती है कि वह बर्फ जैसी मामूली चीज को चांदी जैसी मूल्यवान समझता है। बड़े आदमी की सूझबूझ ऐसी नहीं होती वह वस्तु स्थिति को गहराई से सोच और समझ सकता है। यदि छोटेपन में ही इतनी समझ आ जाय तो बच्चों की भी यथार्थता ( रियलिटी ) को  पहचानने में कितनी सुविधा हो। पर मेरा यह सोचना भी गलत ही है। क्योंकि बड़े होने पर भी मनुष्य समझदार कहां हो पाता है। जैसे यह  दोनों बच्चे बर्फ को चांदी समझ रहे थे उसी प्रकार चांदी-तांबे के टुकड़ों को  बड़ी आयु का मनुष्य भी न जाने कितना अधिक महत्व दें डालता है और उनकी ओर इतना आकर्षित होता है कि जीवन लक्ष को भुलाकर भविष्य को अन्धकारमय बना लेने की परवा तक  नहीं करता। सांसारिक क्षणिक और सारहीन ( immaterial ) आकर्षणों में हमारा मन बच्चों से  भी अधिक तल्लीन हो जाता है।  छोटे बच्चों का मन  मिट्टी के खिलौनों  के साथ खेलने में, कागज की नाव बहाने में लगता है और  पढ़ना-लिखना, खाना-पीना छोड़कर पतंग उड़ाने में निमग्न बालक को अभिभावक उसकी अदूरदर्शिता पर धमकाते  हैं , डाँटते  हैं  लेकिन  हम बड़ी आयु वालों को कौन धमकाये? जो आत्म स्वार्थ को भुलाकर विषय विकारों के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली बने हुए हैं।   हम सबने बचपन में उस मृग की कहानी अवश्य ही पढ़ी  होगी जो रेगिस्तान में  रेत को जल समझते हुए भागते-भागते मृत्यु को गले लगा लेता है लेकिन जल हाथ नहीं लगता।  यही है मृगतृष्णा – मृग की प्यास। All that glitters is not gold था उस कहानी का शीर्षक।  

 परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं हमने इन  अबोध बच्चों का का समाधान तो करवा दिया कि  यह बर्फ है चांदी  नहीं ,लेकिन हम बड़ों को कौन समझाए जो  भृमित हैं कि  हमें सब कुछ मालुम है। अगर मालुम  है तो अपनेआप से ही पूछिए कि क्या तृष्णा और वासना  ही जीवन का लक्ष  है। यही है हर मानव की समस्या – पदार्थवाद – पदार्थवाद और केवल पदार्थवाद:  हमारी इस  भ्रान्ति का कौन समाधान करेगा –  हम केवल हम ,कोई और नहीं।  

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पीली मक्खियां 

आज हम लोग घने  वन में होकर चुपचाप चले आ रहे थे तो सेवार के पेड़ों पर भिन-भिनाती पीली मक्खियां हम लोगों पर टूट पड़ीं। बुरी तरह चिपट गई, छुड़ाये से भी न छूटतीं थीं। हाथों से, कपड़ों से उन्हें हटाया भी, भागे भी, पर उन्होंने बहुत देर तक पीछा किया। किसी प्रकार गिरते- उठते  लगभग आधा मील आगे निकल गये,  तब कहीं  उनसे पीछा छूटा। उनके जहरीले डंक जहां भी  लगे  वहां सूजन आ गई। दर्द भी होता रहा। मन में आता  है कि   इन मक्खियों को इस प्रकार हमारे ऊपर  आक्रमण करने की क्या  सूझी? इनको इसमें क्या  कुछ मिल गया ?  हमें सताकर इन्होने  क्या पाया? लगता है यह मक्खियां सोचती होंगी कि यह वन प्रदेश हमारा है, हमें यहां रहना चाहिये, हमारे लिए ही यह प्रदेश सुरक्षित  रहे, कोई दूसरा इधर पांव भी  न रखे । जब इन मक्खिओं ने   हमें उधर से गुजरते देखा तो समझा होगा कि यह हमारे प्रदेश से हस्तक्षेप करने आए  हैं, हमारे अधिकार क्षेत्र में अपना अधिकार चलाने आए  हैं। हमारे उधर से गुजरने को सम्भव है उनने ढीठता समझा हो और अपने बल का प्रदर्शन करने एवं हस्तक्षेप का मजा चखाने के लिए आक्रमण किया होगा। यदि ऐसी ही बात है तो इन मक्खियों की मूर्खता थी । वह वन तो ईश्वर का बनाया हुआ था, कोई  उन्होंने  स्वयं थोड़े ही बनाया था। उन्हें तो पेड़ों पर रहकर अपनी गुजर बसर करनी चाहिए थी। सारे प्रदेश पर कब्जा करने की उनकी लालसा व्यर्थ थी।  वे इतने बड़े प्रदेश का आखिर क्या करती ? फिर उन्हें सोचना चाहिए था कि यह साझे की दुनिया है, सभी लोग इसका मिल-जुलकर उपयोग करें तो ही ठीक है। यदि हम लोग उधर से निकल रहे थे, उस वनश्री की छाया, शोभा और सुगन्ध का लाभ उठा रहे थे तो थोड़ा हमें भी उठा लेने देने की सहिष्णुता ही रख लेतीं । उन्होंने  अनुदारता करके हमें काटा, सताया, अपने डंक खोये कोई-कोई तो इस झंझट में कुचल भी गईं, घायल हुईं और मर भी गईं। वे क्रोध और गर्व न दिखाती तो क्यों उन्हें व्यर्थ यह हानि उठानी पड़ती और क्यों हम सब की दृष्टि में मूर्ख और स्वार्थी सिद्ध होतीं। हर दृष्टि से इस आक्रमण और अधिकार में  हमें  कोई बुद्धिमानी दिखाई न दी।

विश्लेषण (Analysis) :

परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं : बेचारी मक्खियों को ही क्यों कोसा जाय? उन्हीं को मूर्ख क्यों कहा जाय? जबकि आज हम मनुष्य भी इसी रास्ते पर चल रहे हैं। इस सृष्टि में जो विशाल  उपभोग सामग्री परमात्मा ने पैदा की है वह उसके सभी पुत्रों के लिए, मिल बांटकर खाने और लाभ उठाने के लिये है। पर हममें से कई  जितना हड़प सकें  कब्जा जमाने के लिए उतावले हो रहे हैं । यह भी नहीं सोचा जाता कि “शरीर के  कुटुम्ब की आवश्यकता”  थोड़ी  ही है, उतने तक ही सीमित रहें।  यहाँ पर शरीर के कुटुंब का अर्थ हमारे बॉडी पार्ट्स हैं।  आवश्यकता से अधिक वस्तुओं पर कब्जा करके  , जमा करके ,  दूसरों को क्यों कठिनाई में डालें और क्यों मालिकी का व्यर्थ बोझ सिर पर लादें। यही तो है पदार्थवाद और भंडारण।  जब हम भंडारण करते ही रहते हैं बिना सोचे समझे कि  यह  मालिकी  देर तक अपने कब्जे में नहीं रह सकती।  इसीलिए हम अक्सर कहते रहते हैं – जो प्राप्त है वही पर्याप्त है –

पीली मक्खियों की तरह ही मनुष्य भी अधिकार लिप्सा में, स्वार्थ और संग्रह में अंधा हो रहा है। मिल बांटकर खाने की नीति उसकी समझ में ही नहीं आती। जो कोई उसे अपने स्वार्थ में बाधक होते दीखता है उसी पर आंखें  दिखाता है ,अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है और पीली मक्खियों की तरह टूट पड़ता है।  उसके इस व्यवहार से कितना कष्ट होता है इसकी चिन्ता किसे है? पीली मक्खियां नन्हे-नन्हे डंक मारकर, आधा मील पीछा करके वापिस लौट गईं। पर मनुष्य की अधिकार सीमा को , स्वार्थपरता को  अहंकार को और इनसे  उद्धत होकर किये जाने वाले आक्रमणों की भयंकरता को जब सोचता हूं तो बेचारी पीली मक्खियों को ही बुरा-भला कहने में जीभ सकुचाने लगती हैं और अपने ऊपर घृणा आने लगती है। 

यह बातें लगती तो बिलकुल फिलोसोफिकल लेकिन हैं सत्य और भावनाप्रद। हम सब अपने ह्रदय में झांक कर देख सकते हैं कि कितने प्रतिशत लोग परमपूज्य गुरुदेव के बताये मार्ग पर चल रहे हैं।  शुक्ला भाई साहिब के वृक्षारोपण अभियान को हम नतमस्तक हैं लेकिन आज से कुछ वर्ष पूर्व जब वनों के वन  अंधाधुंध  काटे  जा रहे थे / अभी भी काट रहे हैं , तो उस समय हम सब कहाँ थे। चिपको आंदोलन ने हम सबको जागृत करने का प्रयास अवश्य किया लेकिन—–  हम शांतिकुंज से देवप्रयाग ड्राइव कर रहे थे, हाईवे की construction चल रही थी।  हमारा ड्राइवर हमें बता रहा था  इस आधुनिकरण में  कितने ही बहुमूल्य medicinal  plants और वृक्षों की हत्या  कर दी गयी, दाएं -बाएं दिखाए दे रहे पर्वत  कुछ और ही  व्यथा वर्णन कर रहे थे।  

हमारी बेटी द्वारा रचित कविता “प्रकृति “ अभी हमारे ह्रदय में ताज़ी है। 

जय गुरुदेव 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं  कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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