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ऋतम्भरा प्रज्ञा- Highest and purest form of Wisdom 

30 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद -ऋतम्भरा प्रज्ञा- Highest and purest form of Wisdom 

वैसे तो हम हर लेख तो अक्षर ब अक्षर पढ़ने का निवेदन करते हैं ,लेकिन आज का लेख केवल दो शब्दों “ऋतम्भरा और  प्रज्ञा” पर आधारित है।  यह दो शब्द ऐसे हैं जिन पर रिसर्च करके Ph.D की डिग्री प्राप्त की जा सकती है। आशा करते हैं कि हमारे सहकर्मी अत्यंत विवेकशीलता से पढेंगें ताकि अगले लेख की पृष्ठभूमि बन सके। 

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3 जून  1971 का दिन था , उस दिन गायत्री जयंती थी और परमपूज्य गुरुदेव  तपोभूमि मथुरा में अपना  अंतिम उद्भोदन दे रहे थे।  अंतिम इस लिए कि  20  जून 1971 को  गुरुदेव तपोभूमि छोड़ कर शांतिकुंज हरिद्वार के लिए प्रस्थान कर गए थे। गुरुदेव कह रहे थे : 

हमने   गायत्री उपासना को ऋतंभरा प्रज्ञा” के रूप में समझने और समझाने  की कोशिश की  लेकिन लोगों ने उसके बाहरी  कलेवर को, जो सुगम था, आसान था।  लोगों ने सोचा माला फेरने से चमत्कार हो जायेगा और बाकी वाले हिस्से को भूल  गए। लोगों को ऐसा मालूम पड़ता था कि उनकी  कामनाओं और इच्छाओं को पूरा करने में  यही सरल और आसान रूप सहायक है। यह तो वही बात हुई कि  जो रोगी संयम नहीं रख सकता उसके  लिए ऐसा हकीम  बहुत ही अच्छा है  जो उसे मनमरजी करने दे। मनमरजी  का भोजन करने दे, मनमरजी  से सोने दे ,मनमरजी  से जागने दे इत्यादि।  इसी प्रकार लोगों के  लिए सबसे अच्छी देवी वह है  जो “उनकी”  कामनाओं को पूरा करे। और वह देवी है-गायत्री। “अपनी इच्छा के अनुरूप” लोगों ने  गायत्री माता को ढालने की कोशिश की, इस माँ से लोगों ने अपनी सब इच्छाएं पूर्ण करवानी चाहीं और वह भी बिना कुछ किये हुए। इसीलिए  ऐसे लोग  इस गायत्री माँ की समीपता से पूर्णतया वंचित रहे और वंचित ही रहेंगे। लेकिन दूसरी तरफ ऐसे मनुष्य हैं जिन्होंने  “भगवान की इच्छा के अनुरूप” स्वयं को ढालने की कोशिश की, वे भगवान के कृपा पात्र बन गए। 

जब यह विश्व बना तब मानव भी अन्य प्राणियों की तरह का ही  था, जैसा कि सभी प्राणी अपना शरीर यापन  करने के लिए संघर्ष करते, भूख पूरी करने के लिए परिश्रम करते और प्रजनन  में लगे रहते हैं। ब्रह्मा जी विचार करने लगे, इतना परिश्रम जो मनुष्य के ऊपर किया गया, किस लिए किया गया? अगर मनुष्य को भी कीड़े-मकोड़े की तरह ही  जीना था, तो उसके लिए इतना सारा परिश्रम किस लिए?’ तो फिर हम कैसे कह सकते हैं कि  “ मनुष्य भगवान की सर्वोत्तम कलाकृति है” ब्रह्माजी ने विचार किया कि यदि यह प्राणी भी अन्य प्राणियों की तरह पेट पालता रहा, बच्चे पैदा करता रहा और अपने अहंकार की पूर्ति के लिए आपस में संघर्ष करता रहा, तब फिर इतना परिश्रम बेकार गया समझा जाना चाहिए। विचार करने के बाद ब्रह्माजी ने कहा, ‘मनुष्य जिन विशेषताओं के लिए बनाया गया है, उसे उन विशेषताओं के लिए कुछ अनुदान भी देना चाहिए’ और उस  अनुदान को  ‘ऋतंभरा प्रज्ञा’ का नाम  दिया गया।

विवेकशीलता, विचारशीलता, उच्चकोटि के आदर्शों में निष्ठा, इन सब चीजों के समन्वय का नाम है-‘ऋतंभरा प्रज्ञा।’ 

ऋतंभरा प्रज्ञा का क्या अर्थ है ?हमने जब  यह दो भारी  भरकम शब्द  देखे तो मन में उत्सुकता हुई कि देखा जाये इन शब्दों का अर्थ क्या होता है और  सरल भाषा में इसे कैसे समझा जाये। इस स्थिति में हमारा एक ही टीचर होता है -मास्टर गूगल।  तो हमने कई तरह की साइट्स  विजिट करके इसका अर्थ जाने का प्रयास किया।  इसी प्रयास में  हमें एक बहुत ही मनोरंजक कहानी हाथ लगी जो हम आपके समक्ष रख रहे हैं जिससे  ऋतंभरा प्रज्ञा  का अर्थ समझने में सहायता मिल सकती है। इस कहानी से गायत्री की परिभाषा समझ आ जाएगी और इस बात का भी पता चल  जायेगा कि गायत्री का ही दूसरा नाम ऋतंभरा प्रज्ञा है। 

यह  कहानी सावित्री और सत्यवान की है। सावित्री  बहुत ही  रूपवती,  कुलवती और  सुंदर थी।  सभी राजकुमार उसे देखकर यही कहते कि यह सुंदर राजकुमारी  यदि  हमको मिल जाती तो अच्छा होता।  सावित्री के पिता के सामने सभी राजकुमार हाथ पसारने लगे और कहने लगे कि इसे हमको दीजिए। सावित्री  ने अपने पिता से कहा कि हमको अपनी मरजी का दूल्हा चुनने दीजिए। पिता जी ने कहा – ठीक है। रथ पर सवार होकर सावित्री रवाना हो गयी । वह बहुत  सारे देशों के राजकुमारों से मिली और यह पता लगाया कि उसके लिए कोई दूल्हा है क्या? कोई भी दूल्हा उसको पसंद नहीं आया।अंत में  जंगल में से निकलकर जा रही थी तो  सावित्री ने एक लड़के को देखा। वह एक लकड़हारा था। लकड़हारा बड़ा तेजस्वी मालूम पड़ता था और उसके चेहरे पर यशस्विता भी टपक रही थी। दृढ़ निश्चय  भी टपक रहा था। सावित्री ने उसको रोका और पूछा लकड़हारे तुम कौन हो और कैसे हो? उसने कहा: इस समय तो मैं लकड़हारा हूँ ,पर पहले लकड़हारा नहीं था। मेरे  माता पिता अंधे  हो गए हैं। यहाँ जंगल में तप करते हैं, उन्हीं की रक्षा करने के लिए मैंने  यह आवश्यक समझा कि उनको भोजन कराने से लेकर सेवा करने तक के लिए मुझे  कुछ काम करना चाहिए और अपनी  जिम्मेदारी को निभाना चाहिए। इस जंगल में और  कोई पेशा तो है नही, लकड़ी काटकर ले जाते हैं  और गाँव मे बेच देते हैं , पैसे लाते हैं  और उनका सामान खरीदकर लाते हैं। माता पिता को रोटी खिलाते हैं   और  सेवा करते हैं ।सावित्री ने पूछा : आपने अपने भविष्य के बारे में क्या सोचा है? क्या शादी नहीं करना चाहते।  लकड़हारे ने कहा : अभी हमारे माता पिता का कर्ज हमारे ऊपर रखा हुआ है, अभी हम शादी कैसे कर सकते हैं? सावित्री ने कहा तुम कुछ और नहीं कर सकते क्या? पैसा नहीं कमा सकते?  लकड़हारे ने कहा :             पैसे कमा करके हम क्या करेंगे? कर्तव्यों का वजन हमारे ऊपर रखा है। पहले कर्तव्यों का वजन तो कम कर लें , तब संपत्तिवान बनने की बात सोची जाएगी या शादी करने की बात देखी जाएगी। अपनी सुविधा की बात बहत पीछे की है। पहले तो वह करेंगें  जो हमारे ऊपर कर्ज के रूप में विद्यमान है. इसलिए माता-पिता, जिन्होंने हमारे शरीर का पालन किया, पहला काम उनकी सेवा का करेंगे।  इसके बाद देखेंगे। नौकरी करनी होगी तो पीछे करेंगे या शादी करनी होगी तो पीछे करेंगे। अभी तो हमको कर्ज चुकाना है. माता-पिता की सेवा करनी है।

लकड़हारे की बात सुनकर सावित्री  रुक गई,  विचार करने लगी कि बाहर से तो  ये लकड़हारा है  लेकिन भीतर से कितना उच्च कोटि का मनुष्य  है। इसका दिल ,आत्मा कितनी उच्च कोटि की है।  इसने अपने सुख और भौतिक सुविधाओ को लात मार दी और अपने कर्तव्यों को प्राथमिकता दी।  सावित्री ने कहा कि हम दूल्हा तलाश करने निकले हैं , हम आपसे  ब्याह करेंगे ?  अब हम आपको ही माला पहनाना चाहते है। वह हँसा,  उसने कहा- हमको तो अपने पेट का  गुजारा करना मुश्किल हो रहा है फिर तुम्हारा गुजारा कैसे कर सकते है? सावित्री ने  कहा-हम पेट पालने के लिए आपकी सहायता मांगने के लिए नहीं आए हैं।  आपकी सहायता करने के लिए आए है। हम बहुत बड़े मालदार हैं । हमारे पिताजी  बहुत मालदार हैं और  हमारे पास बहुत सारा पैसा है। हम आपकी सेवा कर सकते हैं।  यह सुनकर लकड़हारा बोला  कि “एक साल बाद हमारी मृत्यु होने वाली है।” सावित्री ने कहा कि हमारे पास इतनी विशेषता है कि हम आपकी जान बचा सकते हैं। हम आपको सम्पन्न बना सकते हैं। आपको यशस्वी बना सकते है। हम आपको सब कुछ उपलब्ध करा सकते हैं। हम बड़े मालदार है-और सावित्री ने  देखते ही गले में माला पहना दी। हम सबने  सावित्री-सत्यवान की कहानी तो अवश्य पढी होगी। तो यह भी  जानते  होंगे कि फिर क्या हुआ था? राजकुमारी सावित्री  से विवाह करने के बाद सत्यवान के जीवन में एक  ऐसा समय  भी आया था जब यमराज आए थे और सत्यवान के  प्राण निकालकर ले गए थे। तब सावित्री ने कहा था- नहीं , यमराज  आप बड़े नहीं हो सकते, हम बड़े हैं। आखिर सावित्री ने यमराज से अपने पति के  प्राण छीन लिए थे।  

आपने सुना है या नहीं सुना है , हमें नहीं मालुम पर यह एक कहानी है  जो गायत्री का प्राण, गायत्री की जीवात्मा, गायत्री की वास्तविकता और गायत्री की फिलॉसफी है। आप इस फिलॉसफी की गहराई मे जाइए।  किनारे पर बैठकर गायत्री का भजन करेंगे तो उससे क्या मिलेगा? अरे डुबकी  मार के गायत्री के भजन की वास्तविक स्थिति हूँढकर के ला। जहाँ से लोग शक्तिवान बन जाते है, चमत्कारी बन जाते हैं वहाँ तक डुबकी  मार। वहाँ तक उबकी नहीं मारेगा, किनारे तक बैठा रहेगा।

सावित्री  गायत्री का ही दूसरा नाम है और सत्यवान उसे कहते हैं  जिसने अपना जीवन सिद्धांतों के लिए समर्पित किया है।   सावित्री गायत्री के लिए यह आवश्यक है कि उसका भक्त सत्यवान हो अर्थात सिद्धान्तवादी हो ,आदर्शवादी हो, उत्कृष्ट चितन में लगा हो, कर्तव्यों में लगा हुआ हो। इस तरह का अगर कोई व्यक्ति है तो उसे गायत्री का साधक कह सकते है। साधना के लिए पकड़ना पड़ेगा चेतना का स्तर, जहाँ शक्तियां  निवास करती हैं , जहाँ भगवान निवास करते हैं, जहाँ आस्थाएं निवास करती हैं । उस स्थान का नाम, उस स्तर का नाम वह भूमि है, जिसे “दिव्यलोक” कहते है। जहाँ गायत्री भी निवास करती है और  चेतना भी  निवास करती है, जिसको हमने ऋतम्भरा प्रज्ञा कहा है। ऋतम्भरा प्रज्ञा क्या है? वह प्रज्ञा, वह धारणा, वह निष्ठा जो मनुष्य को ऊँचा उठा देती है, ऊँचा उछाल देती है। जिसकी प्रेरणा से मनुष्य  ऊँची बातो पर विचार करता है और नीची बातों  से ऊंचाई की ओर  उठता चला जाता है, उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। प्रज्ञावान के सामने, आदर्श रहते हैं, ऊँचाई रहती है।

To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं  कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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