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16 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद -सलाखों के अंदर गायत्री साधना 2

16 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद – सलाखों के अंदर गायत्री साधना 2
इतना प्रेरणादायक एवं भावनात्मक लेख पढ़ने के बाद आप सभी तो उत्सुक होंगें कि जल्दी से “सलाखों के अंदर गायत्री साधना पार्ट 2” पढ़ा जाये लेकिन ऑनलाइन ज्ञानरथ की सामूहिक भावनाएं आदरणीय शशि जी को पहुँचाना हमारा कर्तव्य एवं धर्म बनता है। सभी सोशल मीडिया साइट्स पर आने वाले कमेंट एक -एक करके शेयर करना तो असंभव है लेकिन हम केवल चार शब्द ही प्रयोग कर सकते हैं – “अद्भुत ,आश्चर्यजनक किन्तु सत्य”। इन चार शब्दों में सारी भावनाएं छिपी हुई हैं। हम लेख पढ़ने के लिए आप सबका धन्यवाद तो करते ही हैं लेकिन बहुतों ने तो उनके ब्लॉग को भी विजिट किया ,न केवल विजिट किया इस लेख के सम्बंधित पोस्ट भी पढ़ीं और कवितायेँ भी सराहीं। इसके लिए भी धन्यवाद्। अवश्य ही इतना महान कार्य गुरुसत्ता के आशीर्वाद से आदरणीय शशि जी और संजय जी से ही करवाना निश्चित हुआ होगा।
इस लेख में भी हमारा केवल इतना ही योगदान है कि हम आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं ,शशि जी की लेखनी है ,उन्होंने ने ही चित्र दिए हैं । आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के हम बहुत ही आभारी हैं जिन्होंने शशि जी के साथ हमारा सम्पर्क स्थापित करवाया ।

शशि जी का संक्षिप्त परिचय :
परमपूज्य गरूदेव की कृपा से हम सभी के अपने ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में कुछ उच्स्तरीय आत्माएं विद्यमान हैं , इन्हीं में से एक बहन जयपुर (राजस्थान) से शशि शर्मा ( ऑफिसियल नाम शशि संजय ) हैं, जिनका अनुभव टेलीविजन पर कार्यक्रम प्रस्तुति रहा है।तत्पश्चात राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा संचालित स्कूल में 40 वर्षों तक प्रिंसिपल के तौर पर रही और अब सेवानिवृत्त हो चुकी हैं। शशि जी गायत्री परिवार मिशन से 1992 से जुडी हैं और 1994 से जेल में बंदी भाइयों के बीच गुरुदेव का संदेश पहुंचाने का कार्य कर रही हैं। यह शशि जी का परिश्रम और समर्पण ही है कि 24 नवम्बर 2002 को राजस्थान सेंट्रल जेल में गायत्री मंदिर की स्थापना की गयी , तबसे गायत्री उपासना अनवरत चल रही है।


ध्यान मूलं गरोर्मूति, पूजा मूलं गुरोर्पदम् ।
मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं,मोक्ष मूलं गुरोर्कृपा ।।मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं

Continued from पार्ट 1
अब बारी थी मूर्ति लाने की, हम मूर्ति बाजार में गए और 3:30 फीट की मूर्ति पसंद कर ली, कुछ एडवांस दे दिया तैयार करने के लिए। अब पैसे कहां से आएं बस यही चिंता सता रही थी। एक दिन एक भाई अचानक से घर आए और आकर अपना स्वप्न बताने लगे बोले भाई साहब आज तो सपने में गुरु जी ने आकर बहुत डांटा और कहा बेटा अगर तेरा एक्सीडेंट में सिर फट जाए तो कितना रुपया लग जाएगा, मैंने गुरु जी से कहा-गुरु जी कम से कम 50000 तो लग ही जाएगा, वे कहने लगे कहां से लाएगा इतना रुपया ? मैंने गिड़गिड़ाते हुए कहा-गुरुजी ब्याज पर लेकर आऊंगा लेकिन इलाज तो कराऊंगा ना। गुरुदेव ने डांटते हुए कहा कि इलाज के लिए पैसे ला सकता है ब्याज पर ? तो जेल में मंदिर के लिए मूर्ति के लिए पैसे नहीं ला सकता। इतना बड़ा काम चल रहा है वहां पर और तू है कि घर में बैठकर कुछ नहीं कर रहा। वे भाई बताने लगे कि मैंने रो-रोकर गुरुदेव को प्रार्थना की कि गुरुदेव मूर्ति के पैसे मैं ब्याज पर लाकर मूर्ति रखवा दूंगा आप मेरी रक्षा करें। इस तरह मंदिर में मूर्ति रख दी गई। अब बारी थी प्राण प्रतिष्ठा की। अब प्राण प्रतिष्ठा कौन कराएं, हम दोनों ने यह संकल्प लिया था कि गायत्री माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कोई भी व्यक्ति शांतिकुंज से आकर कराएगा तभी अन्न ग्रहण करेंगे, 6 माह बीत गए लेकिन कोई व्यवस्था नहीं थी।अचानक गुरुदेव माता जी को शायद हम पर तरस आ गया और शांतिकुंज से डॉ प्रणव पंड्या जी के माता-पिता श्री सत्यनारायण जी पंड्या एवं श्रीमती सरस्वती पंड्या जी (जिन्हें हम सभी पापा और बाई के नाम से पुकारते थे) गायत्री माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करने 24 नवंबर 2002 को जयपुर आ गए। दोनों ने प्राण प्रतिष्ठा कराई बंदी भाइयों को आशीर्वाद दिया,जेल में उत्सव जैसा माहौल था। आदरणीय पापा जी बहुत भावुक हो गए और कहने लगे मेरे प्यारे बच्चों मुझे नहीं मालूम था कि तुम लोग इतना बड़ा काम कर रहे हो और गुरुदेव माता जी की शरण में हो, तुम सब जुड़े रहना,तुम्हें कृपा बराबर मिलेगी। आदरणीय बाई को जब माइक पकड़ाया तो वे बहुत भावुक होकर बोली मेरे बच्चों मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं अपने छोटे छोटे बालकों के बीच आ गई हूं मेरा खूब आशीर्वाद। इसके बाद जेल में बंदी भाइयों ने बैंड बाजे के साथ पापा और बाई का स्वागत किया और हर बंदी ने दोनों को कतार बद्ध होकर माला पहनाकर प्रणाम किया। तमाम बंदियों के प्रणाम करने में काफी समय लगा लेकिन आज पापा और बाई बहुत खुश थे, थकान का पूछने पर कहने लगे बेटा हम बिल्कुल ठीक हैं बच्चों से मिलने में थकान कैसी?
जब बंदी भाइयों ने उन्हें दोबारा आने के लिए कहा तो पापा कहने लगे बेटा मैं विश्वास तो नहीं दिला सकता अगर गुरुदेव की मर्जी हुई तो मैं अवश्य आऊंगा अन्यथा आप लोग जब भी बरी हों या पैरोल पर जाएं तो शांतिकुंज हमसे मिलने अवश्य आना और पापा बाई ने अपने इस वादे को अंत तक निभाया, जब भी कोई बंदी शांतिकुंज जाता तो सबसे पहले उनसे मिलकर आता।इस तरह प्राण प्रतिष्ठा के बाद सचमुच गायत्री माता की अनुभूतियों के वरदान सभी को मिलने लगे बहुत बार ऐसा होता कि सभी को एक साथ ध्यान में गुरुदेव और माता जी की प्रत्यक्ष खड़े होने की और कभी सिर पर हाथ रखने की अनुभूतियां होती।
5 साल तक बराबर यज्ञ जप ध्यान साधना का क्रम चलता रहा। मंदिर में गायत्री माता की मूर्ति के दोनों तरफ गुरुदेव और माता जी की तस्वीरें रखी रहती थी,अचानक से बंदी भाइयों ने जिद पकड़ ली कि इनकी जगह मूर्तियां बनवा दीजिए। अब समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। लेकिन बंदी भाई भी किसी साधक से कम नहीं थे उनका कहा पूरा हुआ और अप्रैल 2006 में गुरुदेव और माता जी की मूर्तियां भी वहां स्थापित हो गई। इस तरह वहां पर गुरुदेव ने जो स्वप्न दिया था, इस तरह से पूरा करा लिया। सपना तब याद आया, जब गुरुदेव और माता जी की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा करने दतिया शक्तिपीठ के संत आए और उन्होंने कहा कि तुम्हारे गुरु ने तुम लोगों को चुना है इस काम के लिए। कभी यह मत सोचना कि यह काम तुम अपनी मर्जी से कर रहे हो यह तो आचार्य जी चला रहे हैं और तुम सब चल रहे हो।
मंदिर प्रांगण में एक हवन कुंड भी बंदी भाइयों ने तैयार कर लिया ताकि लोहे का हवन कुंड बार-बार ना लाना पड़े और तो और.. उन्होंने रुपयों के बैंक की जगह “जप बैंक” खोल लिया। हर एक बंदी भाई को रोज की माला उस जब बैंक के खाते में लिखनी होती थी। कम से कम 108 माला रोज सबको मिलकर करनी होती थी किसी पर कोई दबाव नहीं था, लेकिन कम से कम तीन और अधिक से अधिक जितनी चाहे उतनी माला रोज करनी थी, जेल के बाहर या भीतर प्रशासनिक स्टाफ या अन्य कोई भी परेशान होता तो उस “जपबैंक” में से उधार लेकर सभी बंदी भाई उसकी समस्या का समाधान करने के लिए गुरुदेव को प्रार्थना करते और सचमुच गुरुदेव उनकी प्रार्थना को सुनते और जिसके लिए प्रार्थना की गई है उस व्यक्ति को अवश्य लाभ होता, चाहे वह स्वास्थ्य संबंधी हो, बच्ची की शादी से संबंधित हो, किसी का प्रमोशन हो, ऐसी बहुत सारी समस्याएं लेकर लोग बताने लगे, और समाधान मिलने पर बंदी भाइयों का उत्साह बढ़ने लगा उन्हें लगने लगा कि गुरुदेव हमारी प्रार्थना सुनते हैं तो क्यों ना हम दूसरों के लिए प्रार्थना करें। इसी क्रम में मंत्र लेखन का कार्य भी शुरू हो गया हर माह 1000 कॉपियां भरी जाने लगीं। तब से आज तक बराबर गुरुदेव का अनन्य प्यार उत्साह बंदी भाइयों को मिल रहा है। उनके साथ साथ हमारी सजा भी जो शायद पिछले जन्मों में अपराध किए जाने के कारण रही होगी गुरुदेव ने धीरे-धीरे सम्मान सहित जेल प्रांगण में भेज कर पूरी कर दी।अभी वर्तमान में बन्दी भाई स्वयं ही सारी व्यवस्था को संभाले हुए हैं।
इति जय गुरुदेव
कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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