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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा लेख 10-परमपूज्य गुरुदेव का भगवान के साथ जुआ 

12 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद – परमपूज्य गुरुदेव का भगवान के साथ जुआ 

ऐसा लग रहा था कि  आज का लेख आत्मकथा की कड़ी का अंतिम लेख होगा ,लेकिन जब पढ़ना आरम्भ किया तो इतनी महत्वपूर्ण बाते मिलीं ,इतने कनेक्शन मिले कि  कुछ भी छोड़ने को मन न किया।  आशा करते हैं कि इससे आगे वाला लेख इस कड़ी का अंतिम लेख होगा।  आत्मकथा के सभी लेखों को पढ़ते -पढ़ते कई बार तो ऐसा लगता रहा कि एक -एक शब्द नहीं तो एक -एक पैराग्राफ पर एक-एक  लेख लिखा जा सकता है।  जैसा हमने इन लेखों के इंट्रोडक्टरी लेख में लिखा था -हमारी वसीयत और विरासत – पुस्तक से पूर्व पूज्यवर ने अखंड ज्योति  में  चार लेख लिखे थे और कहा  था कि इस पुस्तक को पढ़ने  पहले यह चारों लेख पढ़  लिए जाएँ तो ठीक रहेगा।

तो रविवार की  प्रातः को हम आपके  विश्राम की कामना करेंगें और अगला लेख सोमवार की प्रातः प्रस्तुत करने की  आशा के साथ  प्रस्तुत है आज का ज्ञानप्रसाद।         


पौन शताब्दी (75 वर्ष ) से काया और चेतना के ईंट-गारे से बनी इस प्रयोगशाला में हम दत्त-चित्त होकर एक ही प्रयल करते रहे हैं कि अध्यात्म-तत्त्वज्ञान की यथार्थता और प्रतिक्रिया वस्तुतः है क्या ? विकसित बुद्धिवाद की दृष्टि में वह भावुकों का अन्धविश्वास और धूर्तों का जादुई व्यवसाय है । इसे उनका स्वर्निमित जाल-जंजाल  बता दिया जाता तो हमें इतनी पीड़ा न होती जितनी कि उन्हें ऋषि प्रणीत, शास्त्र सम्मत  द्वारा परीक्षित, अनुमोदित कहे जाने पर होती है।  साथ ही परीक्षा की कसौटी पर अप्रामाणिक भी ठहराया जाता है, तो असमंजस का ठिकाना नहीं रहता । 

एक ओर चरम सत्य, दूसरी ओर पाखण्ड कहकर उसे विलक्षण स्थिति में लटका दिया जाता है, तो मन की व्याकुलता यह कहती है कि इस सन्दर्भ में किसी निर्णायक निष्कर्ष पर पहुँचा जाना चाहिए।

आज नास्तिकवादी ही उसका मजाक नहीं उड़ाते, आस्तिकवादी भी यही कहते हैं कि बताये हुए क्रिया कृत्यों को लम्बे समय तक करते रहने पर भी उनके हाथ ऐसा कुछ नहीं लगा, जिस पर वे सन्तोष एवं प्रसन्नता व्यक्त कर सकें । ऐसी दशा में सिद्धान्तों एवं प्रयोगों में कहीं-न-कहीं त्रुटि तो अवश्य ही है । इस त्रुटि का निराकरण करने एवं अध्यात्म की यथार्थता प्रकाश में लाने के लिए कुछ कारगर प्रयत्न होने ही चाहिए । 

       “इसे कौन करे?”

 सोचा कि जब अपने को इतना लगाव है तो यह कार्य खुद अपने ही कंधों पर ले लेना चाहिए । अध्यात्म यदि विज्ञान है तो उसका सिद्धान्त यथार्थता से जुड़ा होना चाहिए और परिणाम ऐसा होना चाहिए जैसा कि वैज्ञानिक उपकरणों का तत्काल सामने आता है । प्रतिपादन और परिणाम की संगति न बैठने पर लोग आडम्बर का लांछन लगाएँ, तो उन्हें किस प्रकार रोका जाए । यदि वह सत्य है तो उसका जो बढ़ा-चढ़ा माहात्म्य बताया जाता है, उससे अन्य अनेकों को लाभ ले सकने की स्थिति तक क्यों न पहुँचाया जाए?

अब तक का प्रायः पौन शताब्दी का हमारा जीवनक्रम इसी प्रकार व्यतीत हुआ है । इसे एक जिज्ञासु साधक का प्रयोग-परीक्षण कहा जाए तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी।

परमपूज्य गुरुदेव के स्वयं के प्रयोग ( Experiments ) – एक जुआ खेला है 

घटनाक्रम पन्द्रह वर्ष की आयु से आरम्भ होता है, जिसे अब 60  वर्ष से अधिक हो चले । इससे पूर्व की अपरिपक्व बुद्धि कुछ कठोर दृढ़ता अपनाने की स्थिति में भी नहीं थी और न ही मन में उतनी तीव्र उत्कण्ठा थी । आरम्भिक दिनों में उठती जिज्ञासा ने अनेकों पुस्तकों को पढ़ने एवं इस क्षेत्र के अनेकों प्रतिष्ठित सिध्याने की लिप्सा नहीं, वरन् तथ्यों को अनुभव में उतारने के लिए कठिन से कठिन प्रक्रिया अपनाने की साहसिकता थी । पूछताछ से, अध्ययन से समाधान न हुआ तो वह उत्कण्ठा अन्तरिक्ष में भ्रमण करने लगी और एक पारंगत ( निपुण ) समाधानी  को सहायता के लिए ढूँढ़ लाई । माँ के  ब्राह्मण कुल में जन्म लेने और पौरोहित्य कर्मकाण्ड की परम्परा से सघन सम्बन्ध होने के कारण दस वर्ष की आयु में ही महामना मालवीय जी के हाथों पिताजी ने उपनयन करा दिया था और गायत्री मन्त्र की उपासना का सरल कर्मकाण्ड सिखा दिया था । इस गुह्य विद्या के अन्यान्य पक्ष तो हमें बाद के जीवन में विदित हुए , निर्धारित क्रम अपनी जगह ज्यों-त्यों करके चल रहा था और लक्ष्य तक पहुँचने का जिज्ञासा-भाव क्रमशः अधिक प्रचण्ड हो रहा था । इसी उद्वेग (परेशानी ) में कितनी ही रातें बिना सोए निकल जाती । पूजा की कोठरी अलग एकान्त में थी । उस दिन ब्रह्ममुहूर्त में अपनी कोठरी दिव्यगन्ध और दिव्यप्रकाश से भर गई । माला छूट गई और मन:स्थिति तन्द्राग्रस्त ( नींद ) जैसी हो गयी । लगा कि सामने पूर्व कल्पनाओं से मिलते-जुलते एक ऋषि खड़े हैं-प्रकाशपुंज के रूप में । इस दिव्यदर्शन ने घबराहट उत्पन्न नहीं की, वरन् तन्द्रा सघन होती चली गई और प्रकट होने वाली सत्ता ने कुछ संक्षिप्त शब्द कहे-

“तेरी पात्रता और इच्छा की  हमें जानकारी है, सो सहायता के लिए अनायास ही दौड़ आना पड़ा । अपनी पात्रता को अधिक विकसित करने के लिए महाप्रज्ञा की एक समग्र तप-साधना कर डाल ।” 

उनका तात्पर्य था, “गायत्री महामन्त्र का एक वर्ष में एक महापुरश्चरण (एक वर्ष में 24 लाख गायत्री मंत्र -एक दिन में 6000 -7000 गायत्री मन्त्र )  करते हुए चौबीस वर्षों में चौबीस महापुरश्चरण सम्पन्न करना । विधि-विधान उन्होंने संक्षेप में बता दिया । यह अवधि जौ की रोटी और छाछ पर बिताने की आज्ञा दी, ताकि इन्द्रिय-संयम से लेकर अर्थ-संयम, समय-संयम और विचार-संयम तक की समस्त मनोनिग्रह प्रक्रियाएँ सम्पन्न हो सकें और तत्त्वज्ञान धारण कर सकने की पात्रता परिपक्व हो सके । उनका संकेत था-इतना कर सका तो आगे का मार्ग बताने हम स्वयं अबकी भाँति फिर आयेंगे । इतना कहकर वे अन्तर्धान हो गये।  जिज्ञासु का मस्तिष्क भगवान ने दिया है और उसमें तर्कबुद्धि की न्यूनता नहीं रखी है । आश्चर्य है कि इस स्तर की विचारणा के साथ-साथ उतनी ही प्रचण्ड श्रद्धा और संकल्प-शक्ति का भण्डार कहाँ से और कैसे भर गया ? “दोनों दिशाएँ एक-दूसरे के विपरीत हैं,” पर अपनी मानसिक बनावट में इन दोनों का ही परस्पर विरोधी समन्वय मिल गया । दूसरे दिन से वही चौबीस वर्ष की संकल्प-साधना समग्र निष्ठा के साथ आरम्भ कर दी। कुटुम्बियों-सम्बन्धियों ने इसी प्रयोजन में 7  घण्टे नित्य बिताने की 24  वर्ष लम्बी प्रतिज्ञा की बात सुनी तो सभी खिन्न हुए । अपने-अपने ढंग से समझाते रहे । जौ पर निर्वाह इतने लम्बे समय तक शरीर को क्षति पहुँचाएगा। विद्या पढ़ना रुक गया तो भविष्य में क्या बनेगा? आदिआदि । बहुत कुछ ऐसा सुनने को मिलता रहा, जिसका अर्थ होता था कि इतना लम्बा और कठोर साधन न किया जाए । पर अपनी जिज्ञासा इतनी प्रचण्ड थी कि अध्यात्म की तात्त्विकता को समझने के लिए एक क्या ऐसे कई शरीर न्योछावर कर देने का मनोबल उमगता रहा और समझाने वालों को अपना निश्चय और अभिप्राय स्पष्ट शब्दों में कहता रहा । घर में गुजारे के लायक बहुत कुछ था, सो उसकी चिन्ता करने की बात सामने नहीं आई।

एक-एक करके वर्ष बीतते गए । पूछने वालों को एक ही उत्तर दिया-

“एक जुआ खेला है । इसको अन्त तक ही सँभाला जाएगा ।” 

चौबीस वर्ष एक-एक करके इसी प्रकार पूरे हो गए । सात घण्टे की नित्य प्रक्रिया से मन ऊबा नहीं । जौ की रोटी और छाछ का आहार स्वास्थ्य की दृष्टि से अपूर्ण और हानिकारक कहा जाता रहा, पर वैसा कुछ घटित नहीं हुआ । लम्बे समय तक लम्बी प्रक्रिया के साथ सम्पन्न करने का क्रम यथावत चलता गया । उसमें ऊब नहीं आई । रुचि यथावत बनी रही । इस अवधि में मनोबल घटा नहीं, बढ़ा ही । चौबीस वर्ष पूरे होने के दिन निकट आने लगे तो मन में आया कि एक और ऐसा ही क्रम बता दिया जाएगा तो उसे भी इतनी ही प्रसन्नतापूर्वक किया जाएगा । परिणाम की कुछ और जन्मों तक प्रतीक्षा की जा सकती है।

यह पंक्तियाँ आत्म-कथा के रूप में लिखी नहीं जा रही हैं और न उनके साथ अप्रासंगिक विषयों का समावेश किया जा रहा है । अध्यात्म भी विज्ञान है क्या ? इस प्रयोग-परीक्षण के सन्दर्भ में जो कुछ भी बन पड़ा है, उसी की चर्चा की जा रही है, ताकि अन्यान्य जिज्ञासुओं को भी कुछ प्रकाश और समाधान मिल सके ।

इन 24  वर्षों में कुछ भी शास्त्राध्ययन नहीं किया और न  समीप आने वाले विद्वान-विज्ञजनों से कोई चर्चा की। कारण कि इसमें निर्धारित दिशा और श्रद्धा में व्यतिरेक हो सकता था, जबकि अध्यात्म का मूलभूत आधार प्रचण्ड इच्छा और गहन श्रद्धा पर टिका हुआ था । दिशा-विभ्रम से अन्तराल डगमगाने न लगे, इसलिए प्रयोग का एकनिष्ठ भाव से चलना ही उपयुक्त था और वही किया भी गया । मन दिन में ही नहीं, रात की स्वप्नावस्था में भी उसी राह पर चलता रहा। नियत अवधि भारी नहीं पड़ी, वरन् क्रमशः अधिक सरस होती गई । समय पूरा हो गया । 

क्रमशः जारी : To be continued जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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