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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा लेख 8-आत्मवत् सर्वभूतेषु – अपने समान सबको देखना

10 जून  2021 का ज्ञान प्रसाद : “आत्मवत् सर्वभूतेषु – अपने समान सबको  देखना” 

लेख नंबर 8 आपके समक्ष प्रस्तुत करते हुए इतनी प्रसन्नता हो रही है कि जिसे शब्दों में बयान करना सम्भव नहीं हैं।  यह इसलिए  कि अगर आप जीवन की जटिल समस्यायों का समाधान  ढूंढ रहे हैं  तो पहले इस जगत के सभी जीव जंतुओं ,प्राणियों का दुःख अपना समझें ,उन्हें भी अपने समान समझें ,यहाँ तक कि वातावरण की  उसी प्रकार रक्षा करें जैसे हम अपनी चिंता करते हैं। इसी एक उदाहरण के साथ चलते  हैं  आज के लेख की ओर क्योंकि हमने परमपूज्य  गुरुदेव को सुनना है न कि  मुझे। 

हमें चैन नहीं,  करुणा चाहिए , हमें समृद्धि नहीं  शक्ति चाहिए: 

जब तक व्यथा-वेदना का अस्तित्व इस जगत में बना रहे, जब तक प्राणियों को क्लेश और कष्ट की आग में जलना पड़े, तब तक हमें भी चैन से बैठने की इच्छा न हो, जब भी प्रार्थना का समय आया, तब भगवान से निवेदन यही किया । हमें चैन नहीं, वह करुणा चाहिए जो पीड़ितों की व्यथा को अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सके, हमें समृद्धि नहीं वह शक्ति चाहिए, जो आँखों से आँसू पोंछ सकने की अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके । बस इतना ही अनुदान-वरदान भगवान से माँगा और लगा कि द्रोपदी को वस्त्र  देकर उसकी लज्जा बचाने वाले भगवान हमें करुणा की अनन्त संवेदनाओं से ओत-प्रोत करते चले जाते हैं। अपने को क्या कष्ट और अभाव है, इसे सोचने की फुरसत ही कब मिली ? अपने को क्या सुख-साधन चाहिए इसका ध्यान ही कब आया है ? केवल पीड़ित मानवता की व्यथा- वेदना ही रोम-रोम में समाई रही और यही सोचते रहे कि अपने विश्वव्यापी कलेवर परिवार को सुखी बनाने के लिए क्या किया जा सकता है । जो पाया उसका एक-एक कण हमने उसी प्रयोजन के लिए खर्च किया, जिससे शोक- सन्ताप की व्यापकता हटाने और संतोष की साँस ले सकने की स्थिति उत्पन्न करने में थोड़ा योगदान मिल सके।

हमारी कितनी रातें सिसकते बीती हैं-कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख-बिलख कर, फूट-फूट कर रोये हैं, इसे कोई कहाँ जानता है ? लोग हमें संत, सिद्ध, ज्ञानी मानते हैं, कोई लेखक, विद्वान, वक्ता, नेता समझते हैं, पर किसने हमारा अन्तःकरण खोलकर पढ़ा-समझा है । कोई उसे देख सका होता तो उसे मानवीय व्यथा-वेदना की अनुभूतियों से, करुण-कराह से हाहाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हड्डियों के ढांचे में बैठी बिलखती ही दिखाई पड़ती । 

कहाँ कथित आत्मज्ञान की निश्चिन्तता, निर्द्वन्द्वता और कहाँ हमारी करुण कराहों से भरी अन्तरात्मा । दोनों में कोई तालमेल नहीं । सो जब कभी सोचा यही सोचा कि अभी वह ज्ञान जो निश्चिन्तता, एकाग्रता और समाधि सुख दिला सके हमसे बहुत दूर है । शायद वह कभी मिले भी नहीं, क्योंकि इस दर्द में ही जब भगवान की झाँकी होती है, पीड़ितों के आँसू पोंछने में ही जब कुछ चैन अनुभव होता है तो उस निष्क्रिय मोक्ष और समाधि का प्रयास करने के लिए कभी मन चलेगा ऐसा लगता नहीं, जिसकी इच्छा ही नहीं वह मिला भी किसे है? पुण्य-परोपकार की दृष्टि से कभी कुछ करते बन पड़ा हो सो याद नहीं आता । दूसरों की व्यथा-वेदनाएँ भी अपनी बन गईं और वे इतनी अधिक चुभन, कसक पैदा करती रही कि उन पर मरहम लगाने के अतिरिक्त और कुछ सूझा नहीं । पुण्य करता कौन ? परमार्थ के लिए फुरसत किसे थी? ईश्वर को प्रसन्न करके स्वर्ग-मुक्ति का आनन्द लेना आया किसे ? विश्व-मानव की तड़पन अपनी तड़पन बन रही थी। सो पहले उसी से जूझना था, अन्य बातें तो ऐसी थीं जिनके लिए अवकाश और अवसर की प्रतीक्षा की जा सकती थी । 

“हमारे जीवन के क्रिया-कलाप के पीछे उसके प्रयोजन को कभी कोई ढूँढना चाहे तो उसे इतना ही जान लेना पर्याप्त है कि संत और सज्जनों की सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों का जितने क्षण स्मरण-दर्शन होता रहा उतने समय चैन की साँस ली और जब जन-मानस की व्यथावेदनाओं को सामने खड़ा पाया तो अपनी निज की पीड़ा से अधिक कष्ट अनुभव हुआ । लोक-मंगल, परमार्थ, सुधार, सेवा आदि के प्रयास कुछ यदि हमसे बन पड़े तो उस संदर्भ में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि यह हमारी विवशता भर थी । दर्द और जलन ने क्षण भर चैन से न बैठने दिया तो हम करते भी क्या ? जो दर्द से इठा जा रहा है वह हाथ-पैर न पटके तो क्या करे ? हमारे अब तक के समस्त प्रयत्नों को लोग कुछ भी नाम दें, किसी रंग में रंगें, असलियत यह है कि विश्व-वेदना की आन्तरिक अनुभूति ने करुणा और संवेदना का रूप धारण कर लिया और हम विश्व-वेदना को आत्म-वेदना मानकर उससे छुटकारा पाने के लिए बेचैन-घायल की तरह प्रयत्न-प्रयास करते रहे । भावनाएँ इतनी उग्र रहीं कि अपना आपा तो भूल ही गये । त्याग, संयम, सादगी, अपरिग्रह आदि की दृष्टि से कोई हमारे कार्यों पर नजर डाले तो उसे इतना भर समझ लेना चाहिए कि जिस ढाँचे में अपना अन्त:करण ढल गया, उसमें यह नितान्त स्वाभाविक था । अपनी समृद्धि, प्रगति, सुविधा, वाहवाही हमें नापसन्द हो ऐसा कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता । उन्हें हमने जान-बूझकर त्यागा सो बात नहीं है । वस्तुतः विश्व-मानव की व्यथा अपनी वेदना बनकर इस बुरी तरह अन्त:करण पर छाई रही कि अपने बारे में कुछ सोचने-करने की फुरसत ही न मिली, वह प्रसंग सर्वथा विस्मृत ही बना रहा । इस विस्मृति को कोई तपस्या, संयम कहे तो उसकी मर्जी, पर 

“जब स्वजनों को अपनी जीवन-पुस्तिका  के कुछ सभी उपयोगी पृष्ठ खोलकर पढ़ा रहे हैं तो वस्तुस्थिति बता ही देनी उचित है।”

हमारी उपासना और साधना साथ-साथ मिलकर चली हैं । परमात्मा को हमने इसलिए पुकारा कि वह “प्रकाश बनकर आत्मा में प्रवेश करे” और तुच्छता को महानता में बदल दे । उसकी शरण में इसलिए पहुंचे कि उस महत्ता में अपनी क्षुद्रता विलीन हो जाए । वरदान केवल यह माँगा कि हमें वह सहृदयता  और विशालता मिले, जिसके अनुसार अपने में सब को और सब में अपने को अनुभव किया जा सकना सम्भव हो सके ।अपनी साधनात्मक अनुभूतियों और उस मंजिल पर चलते हुए समक्ष आये उतार-चढ़ावों की चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि यदि किसी को आत्मिक प्रगति की दिशा में चलने का प्रयत्न करना हो और वर्तमान परिस्थितियों में रहने वालों के लिए यह सब कैसे सम्भव हो सकता है? 

“इसका प्रत्यक्ष उदाहरण ढूँढना हो, तो उसे हमारी जीवनयात्रा बहुत मार्ग-दर्शन कर सकती है । वस्तुतः हमने एक प्रयोगात्मक( EXPERIMANTAL) जीवन जिया है ।”

 आध्यात्मिक आदशों का व्यावहारिक जीवन में तालमेल बिठाते हुए आन्तरिक प्रगति के पथ पर कैसे चला जा सकता है और उसमें बिना भटके कैसे सफलता पाई जा सकती है? हम इसी तथ्य की खोज करते रहे हैं और उसी के प्रयोग में अपनी चिन्तन-प्रक्रिया और शारीरिक गतिविधि केन्द्रित करते रहे हैं । हमारे मार्गदर्शक का इस दिशा में पूरा-पूरा सहयोग रहा है, सो अनावश्यक जाल-जंजालों में उलझे बिना सीधे रास्ते पर सही दिशा में चलते रहने की सरलता उपलब्ध होती रही है । 

“उसी की चर्चा इन पंक्तियों में इस उद्देश्य से कर रहे हैं कि जिन्हें इस मार्ग पर चलने की और सुनिश्चित सफलता प्राप्त करने का प्रत्यक्ष उदाहरण ढूँढ़ने की आवश्यकता है, उन्हें अनुकरण के लिए एक प्रामाणिक आधार मिल सके ।”

आत्मिक प्रगति के पथ पर एक सुनिश्चित एवं क्रमबद्ध योजना के अनुसार चलते हुए हमने एक सीमा तक अपनी मंजिल पूरी कर ली है और उतना आधार प्राप्त कर लिया है जिसके बल पर यह अनुभव किया जा सके कि परिश्रम निरर्थक नहीं गया, प्रयोग असफल नहीं रहा । क्या विभूतियाँ या उपलब्धियाँ प्राप्त हुई? इसकी चर्चा हमारे मुंह शोभा नहीं देती । 

“इसको जानने, सुनने और खोजने का अवसर हमारे चले जाने के बाद ही आना चाहिए ।”

उसके इतने अधिक प्रमाण बिखरे पड़े मिलेंगे कि किसी अविश्वासी को भी यह विश्वास करने के लिए विवश किया जा सकेगा कि न तो आत्म-विद्या का विज्ञान गलत है और न उस मार्ग पर सही ढंग से चलने वाले के लिए आशाजनक सफलता प्राप्त करने में कोई कठिनाई है । इस मार्ग पर चलने वाला आत्मशान्ति, आन्तरिक-शक्ति और दिव्य-अनुभूति की परिधि में घूमने वाली अगणित उपलब्धियों से कैसे लाभान्वित हो सकता है ? इसका प्रत्यक्ष प्रमाण ढूंढने  के लिए भावी शोधकर्ताओं (RESEARCHERS ) को हमारी जीवन-प्रक्रिया बहुत ही सहायक सिद्ध होगी। समयानुसार ऐसे शोधकर्ता उन विशेषताओं और विभूतियों के अगणित प्रमाण, प्रत्यक्ष प्रमाण स्वयं ढूंढ़ निकालेंगे, जो आत्मवादी-प्रभुपरायण जीवन में हमारी ही तरह हर किसी को उपलब्ध हो सकना सम्भव है। 

क्रमशः जारी : To be continued जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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