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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा- लेख 5-अखंड दीपक यानि हमारे प्राण

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5 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद : “अखंड दीपक यानि हमारे प्राण” “मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत्”
परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा  की शृंखला में आज हम आपके समक्ष लेख नंबर 5  प्रस्तुत कर रहे हैं। कठिन श्रम और अध्यन  पश्चात्  ही यह लेख आपके समक्ष लाये जा रहे हैं और आप इस अमृतपान का आनंद उठा रहे हैं ,ऐसा हमें आपके कमेंटस  से पता चल रहा है। आप सब एक परीक्षार्थी की तरह इन अद्भुत लेखों को पढ़  रहे हैं  और न केवल पढ़ रहे हैं अपनेआप को self-examine भी कर रहे हैं। यह हम इसलिए कह रहे हैं की कमैंट्स करते समय अक्सर लेखों पर ही चर्चा हो रही है और सभी परस्पर विचार-विमर्श के साथ अपनी जिग्यासाओं का निवारण भी किये जा रहे हैं।  यह सभी टॉपिक और आने वाले लेख हैं ही ऐसे कि  आप खाना -पीना सोना भूल सकते हैं लेकिन लेख को बीच में नहीं छोड़ सकते। इसीलिए हमने इनकी लंबाई इतनी रखी  है कि आप आराम से ,पूरे मन से इनको पढ़ सकें। अखंड दीप और अखंड ज्योति पत्रिका का बहुत ही खूसूरत व्याख्यान आज आपको मिलने वाला है। हम जानते हैं कि  आपकी उत्सुकता बड़े ही जा रहा है तो आओ चलते हैं एक और अद्भुत अमृतपान की ओर  आज के  ज्ञानप्रसाद की ओर।  

मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत्  का अर्थ है दूसरे  की पत्नी को अपनी माता के समान समझना और पराये धन को मिटटी के समान समझना।  इस प्रकार के आदर्शों में विरोध  प्रायः युवावस्था में ही होता है ।

काम और लोभ की प्रबलता के भी वही दिन हैं, सो 15 वर्ष की आयु से लेकर 24 वर्षों में 40 तक पहुँचते-पहुँचते वह उफान ढल गया । कामनाएँ, वासनाएँ, तृष्णाएँ, महत्त्वाकांक्षाएँ प्रायः इसी आयु में आकाश-पाताल के कुलावे मिलाती हैं । यह अवधि स्वाध्याय, मनन, चिन्तन से लेकर आत्मसंयम और जप-ध्यान की साधना में लग गई । इसी आयु में बहुत करके मनोविकार प्रबल रहते हैं, सो आमतौर से परमार्थ प्रयोजनों के लिए ढलती आयु के व्यक्तियों को ही प्रयुक्त किया जाता है। -उठती उम्र के लोग अर्थ-व्यवस्था से लेकर सैन्य संचालन तक अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर उठाते हैं और उन्हें उठाने चाहिए । महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए इन क्षेत्रों में बहुत अवसर रहता है । सेवाकार्यों में योगदान भी नवयुवक बहुत दे सकते हैं पर लोक-मंगल के लिए नेतृत्व करने की वह अवधि नहीं है । शंकराचार्य, दयानन्द, विवेकानन्द, रामदास, मौरा, निवेदिता जैसे थोड़े ही अपवाद  ऐसे हैं जिन्होंने उठती उम्र में ही लोक-मंगल के नेतृत्व का भार कन्धों पर सफलतापूर्वक वहन किया हो । आमतौर से कच्ची उम्र गड़बड़ी ही फैलाती है । यश, पद की इच्छा, धन का प्रलोभन, वासनात्मक आकर्षण के बने रहते जो सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, वे उलटी विकृति पैदा करते हैं । अच्छी संस्थाओं का भी सर्वनाश इसी स्तर के लोगों द्वारा होता रहता है । यों बुराई-भलाई किसी आयु विशेष से बँधी नहीं रहती, पर प्रकृति की परम्परा कुछ ऐसी ही चली आती है, जिसके कारण युवावस्था महत्त्वाकांक्षाओं की अवधि मानी गई है । ढलती उम्र के साथ-साथ स्वभावतः आदमी कुछ ढीला पड़ जाता है, तब उसकी भौतिक लालसाएँ भी ढीली पड़ जाती हैं, मरने की बात याद आने से लोक-परलोक, धर्म-कर्म भी रुचता है, इसलिए तत्त्ववेत्ताओं ने वानप्रस्थ और संन्यास के लिए उपयुक्त समय आयु के उत्तरार्द्ध को ही माना है ।

न जाने क्या रहस्य था कि हमें हमारे मार्गदर्शक ने उठतआयु में तपश्चर्या के कठोर प्रयोजन में संलग्न कर दिया और देखते-देखते उसी प्रयास में 40  साल की उम्र पूरी हो गई । हो सकता है वर्चस्व और नेतृत्व के अहंकार का, महत्त्वाकांक्षाओं और प्रलोभनों में बह जाने का खतरा समझा गया हो । हो सकता है आन्तरिक परिपक्वता, आत्मिक बलिष्ठता पाये बिना कुछ बड़ा काम न बन पड़ने की आशंका की गई हो । हो सकता है महान कार्यों के लिए अत्यन्त आवश्यक संकल्प, बल, धैर्य, साहस और सन्तुलन परखा गया हो । जो भी हो अपनी उठती आयु उस साधना क्रम में बीत गई जिसकी चर्चा कई बार कर चुके। 

 असामान्य अखंड दीपक :

उस अवधि में सब कुछ सामान्य चला, असामान्य एक ही था-हमारा गौ-घृत से अहर्निश जलने वाला अखण्ड दीपक । पूजा की कोठरी में वह निरन्तर जलता रहता । इसका वैज्ञानिक या आध्यात्मिक रहस्य क्या था ? कुछ ठीक से नहीं कह सकते । गुरु सो गुरु, आदेश सो आदेश, अनुशासन सो अनुशासन, समर्पण सो समर्पण । एक बार जब ठोक-बजा लिया और समझ लिया कि इसकी नाव में बैठने पर डूबने का खतरा नहीं है तो फिर आँख मूंदकर बैठ ही गये । फौजी सैनिक को अनुशासन प्राणों से भी अधिक प्यारा होता है । अपनी अन्धश्रद्धा कहिए या अनुशासन प्रियता, अत: जीवन की जो दिशा निर्धारित कर दी गई, कार्य-पद्धति जो बता दी गई उसे सर्वस्व मानकर पूरी निष्ठा और तत्परता के साथ करते चले गये । अखण्ड दीपक की साधना-कक्ष में स्थापना भी इसी प्रक्रिया के अन्तर्गत आती है । मार्गदर्शक पर विश्वास किया, उसे अपने आपको सौंप दिया तो उखाड-पछाड़, क्रिया में तर्क-सन्देह क्यों ? वह अपने से बन नहीं पड़ा । जो साधना हमें बताई गई उसमें अखण्ड दीपक का महत्त्व है, इतना बता देने पर उसकी स्थापना कर ली गई और पुरश्चरणों की पूरी अवधि तक उसे ठीक तरह जलाये रखा गया । पीछे तो यह प्राणप्रिय ही बन गया । 24  वर्ष बीत जाने पर उसे बुझाया जा सकता था, पर यह कल्पना भी ऐसी लगती है कि हमारा प्राण ही बुझ जाएगा, सो उसे आजीवन चालू रखा जाएगा हम अज्ञातवास गये थे, अब फिर जा रहे हैं तो उसे धर्मपत्नी सँजोये रखेगी । यदि एकाकी रहे होते, पत्नी न होती तो और कुछ साधना बन सकती थी । अखण्ड दीपक सँजोए रखना कठिन था । कर्मचारी या दूसरे अश्रद्धालु एवं आन्तरिक दृष्टि से दुर्बल लोग ऐसी दिव्य अग्नि को सँजोये नहीं रह सकते । अखण्ड-दीपक स्थापित करने वालों में से अनेकों के जलते-बुझते रहते हैं, वे नाम मात्र के ही अखण्ड हैं। अपनी ज्योति अखण्ड बनी रही, इसका कारण बाह्य सतर्कता नहीं, अन्तर्निष्ठा ही समझी जानी चाहिए, जिसे अक्षुण्ण रखने में हमारी धर्मपत्नी ने असाधारण योगदान दिया ।

हो सकता है अखण्ड दीपक अखण्ड यज्ञ का स्वरूप हो धूपबत्तियों का जलना, हवन-सामग्री की, जप मन्त्रोच्चारण की और दीपक-घी होमे जाने की आवश्यकता पूरी करता हो और इस तरह अखण्ड हवन की कोई स्व-संचालित प्रक्रिया बन जाती हो । हो सकता है जल भरे कलश और ज्वलन्त अग्नि की स्थापना में कोई अग्नि-जल का संयोग रेल-इंजन जैसी भाप शक्ति का सूक्ष्म प्रयोजन पूरा करता हो । हो सकता है अन्तज्योति जगाने में इस बाह्य-ज्योति से कुछ सहायता मिलती हो, जो भी हो अपने को ‘अखण्ड-ज्योति’  में भावनात्मक प्रकाश, अनुपम आनन्द, उल्लास से भरा-पूरा मिलता रहा । बाहर चौकी पर रखा हुआ यह दीपक कुछ दिन तो बाहर ही बाहर जलता दीखा, पीछे अनुभूति बदली और लगा कि हमारे अन्त:करण में यही प्रकाश-ज्योति ज्यों की त्यों जलती है और 

जिस प्रकार पूजा की कोठरी प्रकाश से आलोकित होती है, वैसे ही अपना समस्त अन्तरंग इस ज्योति से ज्योतिर्मय हो रहा है । शरीर, मन और आत्मा में स्थूल, सूक्ष्म और कारण कलेवर में हम जिस ज्योतिर्मयता का ध्यान करते रहे हैं, सम्भवतः वह इस अखण्ड दीपक की ही प्रतिक्रिया रही होगी ।

उपासना की सारी अवधि में भावना-क्षेत्र वैसे ही प्रकाश से जगमगाता रहा है जैसा कि उपासना-कक्ष में अखण्ड दीपक आलोक बिखेरता है। अपना सब कुछ प्रकाशमय है । अन्धकार के आवरण हट गये । अन्धतमित्रा की मोहग्रस्तता जल गई, प्रकाशपूर्ण भावनाएँ, विचारणाएँ और गतिविधियाँ शरीर और मन पर आच्छादित हैं । सर्वत्र प्रकाश का समुद्र लहलहा रहा है और हम तालाब की मछली की तरह उस ज्योति- सरोवर में क्रीड़ा-कल्लोल करते विचरण करते हैं । इन अनुभूतियों, आत्मबल, दिव्यदर्शन औरअन्त:उल्लास  को विकासमान बनाने में इतनी सहायता पहुँचाई कि जिसका कुछ उल्लेख नहीं किया जा सकता । हो सकता है यह कल्पना ही हो, पर सोचते जरूर हैं कि 

यदि यह ‘अखण्डज्योति’ जलाई न गई होती तो पूजा की कोठरी के धुंधलेपन की तरह शायद अन्तरंग भी धुंधला बना रहता । 

अब तो वह दीपक दीपावली के दीप पर्व की तरह अपनी नस-नाड़ियों में जगमगाता दिखता है । अपनी भाव भरी अनुभूतियों के प्रवाह में ही 

“जब 32  वर्ष पूर्व पत्रिका आरम्भ की तो संसार का सर्वोत्तम नाम जो हमें प्रिय लगता था, पसन्द आता था ‘अखण्ड-ज्योति’ रख दिया ।” 

हो सकता है उसी भावावेश में प्रतिष्ठापित पत्रिका का छोटा सा विग्रह संसार में मंगलमय प्रगति की प्रकाश किरणें बिखेरने में समर्थ और सफल हो सका हो । साधना के तीसरे चरण में प्रवेश करते हुए आत्मवत् सर्वभूतेषु” की किरणें फूट पड़ी । मातृवत् परदारेषु और परद्रव्येषु लोष्ठवत् की साधना अपने काय-कलेवर तक ही सीमित थी । दो आँखों में पाप आया तो तीसरी विवेक की आँख खोलकर उसे डरा-भगा दिया । शरीर पर कड़े प्रतिबन्ध लगा दिए और वैसी परिस्थितियाँ बनने की जिनसे आशंका रहती है उनकी जड़ काट दी, तो दुष्ट व्यवहार असम्भव हो गया । मातृवत् परदारेषु की साधना बिना अड़चन के सध गई । मन ने सिर्फ आरम्भिक दिनों में ही हैरान किया । शरीर ने सदा हमारा साथ दिया । मन ने जब हार स्वीकार कर ली तो वह हताश होकर हरकतों से बाज आ गया । बाद में  तो वह अपना पूरा मित्र और सहयोगी ही बन गया । स्वेच्छा से गरीबी वरण कर लेने, आवश्यकताएँ घटाकर अन्तिम बिन्दु तक ले आने और संग्रह की भावना छोड़ने से ‘परद्रव्य'( पराया  धन ) का आकर्षण चला गया । पेट भरने के लिए, तन ढंकने के लिए जब स्व उपार्जन ही पर्याप्त था तो ‘परद्रव्य’ के अपहरण की बात क्यों सोची जाए ? जो बचा, जो मिला-सो देते बाँटते ही रहे । बाँटने और देने का चस्का जिसे लग जाता है, जो उस अनुभूति का आनन्द लेने लगता है, उसे संग्रह करते बन नहीं पाता । फिर किस प्रयोजन के लिए परद्रव्य का पाप कमाया जाए ? गरीबी का, सादगी का, अपरिग्रही ब्राह्मण जीवन, अपने भीतर एक असाधारण आनन्द, संतोष और उल्लास भरे बैठा है, इसकी अनुभूति यदि लोगों को हो सकी होती तो शायद ही किसी का मन परद्रव्य( पराया धन ) की पाप-पोटली सिर पर लादने को करता । अपरिग्रह अनुदान की प्रतिक्रिया अन्त:करण पर कितनी अनोखी होती है, उसे कोई कहाँ जानता है? पर अपने को तो यह दिव्य विभूतियों का भण्डार अनायास ही हाथ लग गया ।

 मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत् की दो मंज़िलों के बाद आती है तीसरी मंज़िल आत्मवत् सर्वभूतेषु’  । अपने समान सबको देखनाकहने सुनने में ये शब्द मामूली से लगते हैं और सामान्यतया नागरिक कर्तव्यों का पालन, शिष्टाचार, सद्व्यवहार की सीमा तक पहुँचकर बात पूरी हो गई दीखती है, पर वस्तुतः इस तत्त्वज्ञान की सीमा अति विस्तृत है । उसकी परिधि वहाँ पहुँचती है, जहाँ परमात्म-सत्ता के साथ घुल जाने की स्थिति आ पहुँचती है। 

क्रमशः जारी : To be continued जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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