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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा लेख 3- आध्यात्मिक जीवन कठिन है क्या ?

2 जून 2021  का ज्ञानप्रसाद : आध्यात्मिक जीवन कठिन है क्या ?

पिछले कुछ दिनों से परमपूज्य गुरुदेव की  ऑटोबायोग्राफी का वर्णन करते- करते ह्रदय इतना आनंदित हो गया है कि कुछ और लिखने को मन ही नहीं कर रहा।  हमारे समर्पित सहकर्मी जानते हैं कि हर लेख के बाद हम अपडेट देते हैं लेकिन अब एक के बाद लेख लिखे जा रहे हैं।  इसी कड़ी में आज तीसरा लेख प्रस्तुत करते हुए हम अति आनंदित हैं -आनंदित इस लिए कि  हमारे जीवन का बहुत ही उच्च उदेश्य पूर्ण होता दिख रहा है।  हम आपके ह्रदय में सुखमय जीवन की सच्चाई को उतारने में सफल होते दिख रहे हैं। आपके कमैंट्स इस तथ्य के साक्षी हैं। हर कोई बढ़ चढ़ कर एक दूसरे के साथ सम्पर्क बनाने और अपनत्व व्यक्त करने की रेस लगा रहा जो ऑनलाइन ज्ञानरथ की सफलता का एक बहुत ही महत्वपूर्ण सूत्र है। इस सफलता का श्रेय आपको केवल आपको ही जाता है। आज अपडेट का मन तो था ,कुछ महत्वपूर्ण अपडेट हैं भी लेकिन फिर देखा,ऑटोबायोग्राफी में हम सब बहुत श्रद्धा और समर्पण दिखा रहे हैं।  हाँ चलते -चलते संक्षेप में एक अपडेट ज़रूर शेयर कर देते हैं :  आदरणीय अनिल मिश्रा भाई साहिब के प्रयास से हम आदरणीय शशि बहिन  जी से सम्पर्क स्थापित कर सके। उनके परिश्रम से “सलाखों के अंदर गायत्री साधना” शीर्षक से एक लेख /वीडियो शीघ्र ही आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगें। 

तो आइये चलें आज के लेख की ओर :

लोग कहते रहते हैं कि आध्यात्मिक जीवन कठिन है, पर अपनी अनुभूति इससे सर्वथा विपरीत है । वासना और तृष्णाओं से घिरा और भरा जीवन ही वस्तुतः कठिन एवं जटिल है। इस स्तर का क्रिया-कलाप अपनाने वाला व्यक्ति जितना श्रम करता है, जितना चिन्तित रहता है, जितनी व्यथा-वेदना सहता है, जितना उलझा रहता है, उसे देखते हुए आध्यात्मिक जीवन की असुविधा को तुलनात्मक दृष्टि से नगण्य ही कहा जा सकता है । इतना श्रम, इतना चिंतन, इतनी भागदौड़-फिर भी क्षण भर चैन नहीं, कामनाओं की पूर्ति के लिए अथक प्रयास, पर पूर्ति से पहले ही अभिलाषाओं का और सौ गुना हो जाना इतना बड़ा जंजाल है कि बड़ी से बड़ी सफलताएँ पाने के बाद भी व्यक्ति अतृप्त और असन्तुष्ट ही बना रहता है । छोटी सफलता पाने के लिए कितना थकाने वाला श्रम करना पड़ा था, यह जानते हुए भी उससे बड़ी सफलता पाने के लिए चौगुने, दस गुने उत्तरदायित्व और ओढ़ लेता है । गति जितनी तीव्र होती जाती है, उतनी ही समस्याएँ उठती और उलझती हैं । उन्हें सुलझाने में देह, मन और आत्मा का कचूमर निकलता है । सामान्य शारीरिक और मानसिक श्रम सुरसा (राक्षसी) जैसी अभिलाषाओं को पूर्ण करने में समर्थ नहीं होता, अस्तु अनीति और अनाचार का मार्ग अपनाना पड़ता है । 

जघन्य पापकर्म करते रहने पर अभिलाषाएँ कहीं पूर्ण होती हैं ?

निरन्तर की उद्विग्नता( परेशानी) और भविष्य की अन्धतमित्रा दोनों को मिलाकर जितनी क्षति है उसे देखते हुए उपलब्धियों को अति तुच्छ ही कहा जा सकता है । आमतौर से लोग रोते-कलपते, रोष- शोक  से सिसकते बिलखते किसी प्रकार जिन्दगी की लाश ढोते हैं ।  वस्तुतः इन्हीं को तपस्वी कहा जाना चाहिए । इतना कष्ट, त्याग, उद्वेग यदि आत्मिक प्रगति के पथ पर चलते हुए सहा जाता तो मनुष्य योगी, सिद्धपुरुष, महामानव, देवता ही नहीं, भगवान भी बन सकता था । 

बेचारों ने पाया कुछ नहीं, खोजा बहुत । वस्तुतः यही सच्चे त्यागी, तपस्वी, परोपकारी, आत्मदानी, बलिदानी हैं, जिन्होंने अथक परिश्रम से लेकर पाप की गठरी ढोने तक दुस्साहस कर डाला और जो कमाया था उसे साले, बहनोई, बेटे, भतीजों के लिए छोड़कर स्वयं खाली हाथ चल दिये, दूसरे के सुख के लिए स्वयं कष्ट सहने वाले वस्तुतः यही महात्मा, ज्ञानी, परमार्थी  हमें   दीखते हैं। अपने इर्द-गिर्द घिरे असंख्यों मानव देहधारियों के अन्तरंग और बहिरंग जीवन को जब हम देखते हैं तो लगता है

 “इन सबसे अधिक सुखी और सुविधाजनक जीवन हमी ने जी लिया।” हानि अधिक से अधिक इतनी हुई कि हमें कम सुविधा और कम सम्पन्नता का जीवन जीना पड़ा। सामान कम रहा और गरीब जैसे दीखे । सम्पदा न होने के कारण दुनिया वालों ने हमें छोटा समझा और अवहेलना की । बस इससे अधिक घाटा किसी आत्मवादी को हो भी नहीं सकता, पर इस अभाव से अपना कुछ भी हर्ज नहीं हुआ, न कुछ काम रुका । दूसरे षट्रस ( छह प्रकार के रस या स्वाद ) व्यंजन खाते रहे, हमने जौ, चना खाकर काम चलाया । दूसरे जीभ के अत्याचार से पीड़ित होकर रुग्णता (बीमारी का कष्ट सहते रहे, हमारा सस्ता आहार ठीक तरह पचता रहा और नीरोगता बनाये रहा । घाटे में हम क्या रहे । जीभ का क्षणिक जायका खोकर हमने कड़ी भूख में पापड़ ,भूख में चने भी बादाम लगते हैं – होने की युक्ति सार्थक होती देखी, जहाँ तक जायके का प्रश्न है, उस दृष्टि से तुलना करने पर विलासियों की तुलना में हमारी जौ की रोटी अधिक मजेदार थी । धन के प्रयास में लगे लोग बढ़िया कपड़े, बढ़िया घर, बढ़िया साज-सज्जा अपनाकर अपना अहंकार पूरा करने और लोगों पर रौब गाँठने की विडम्बना में लगे रहे । हम स्वल्प साधनों में उनका-सा ठाट तो जमा नहीं सके, पर सादगी ने जो आत्म-सन्तोष और आनन्द प्रदान किया, उससे कम प्रसन्नता नहीं हुई और छिछोरे, बचकाने लोग मखौल उड़ाते रहे हों पर वजनदार लोगों ने सादगी के पर्दे के पीछे झाँकती हुई महानता को सराहा और उसके आगे सिर झुकाया ।”

 नफे में कौन रहा, विडम्बना बनाने वाले या हम ? 

“अपनी कसौटी पर अपने आप को कसने के बाद यही कहा जा सकता है कि कम परिश्रम, कम जोखिम और कम जिम्मेदारी लेकर हम शरीर, मन की दृष्टि से अधिक सुखी रहे और सम्मान भी कम नहीं पाया । पागलों की पागल प्रशंसा करे, इसमें हमें कोई ऐतराज नहीं, पर अपने आप से हमें कोई शिकायत नहीं, आत्मा से लेकर परमात्मा तक और सज्जनों से लेकर दूरदर्शियों तक अपनी क्रिया-पद्धति प्रशंसनीय मानी गई । जोखिम भी कम और नफा भी ज्यादा । खर्चीली, तृष्णा ग्रस्त, बनावटी, भारभूत जिन्दगी पाप और पतन के पहियों वाली गाड़ी पर ही ढोई जा सकती है । अपना सब कुछ हलका रहा, “बिस्तर बगल में दबाया और चल दिए।” न थकान, न चिन्ता । हमारा व्यक्तिगत अनुभव यही है कि “आदर्शवादी जीवन सरल है।” उसमें प्रकाश, सन्तोष, उल्लास सब कुछ है । दुष्ट लोग आक्रमण करके कुछ हानि पहुँचा दें, तो यह जोखिम-पापी और घृणित जीवन में भी कम कहाँ है? सन्त और सेवा-भावियों को जितना त्रास सहना पड़ता है, प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिशोध के कारण भौतिक जीवन में और भी अधिक खतरा रहता है । कत्ल, खून, डकैती, आक्रमण, ठगी की जो रोमांचकारी घटनाएँ आये दिन सुनने को मिलती हैं, उनमें भौतिक जीवन जीने वाले ही अधिक मरते-खपते देखे जाते. हैं । इतने व्यक्ति यदि स्वेच्छापूर्वक अपने प्राण और धन गवाने को तत्पर हो जाते तो उन्हें देवता माना जाता और इतिहास धन्य हो जाता । ईसा, सुकरात, गाँधी जैसे संत या उस वर्ग के लोग थोड़ी-सी संख्या में ही मरे हैं । उनसे हजार गुने अधिक तो पतनोन्मुख ( पतन की ओर जानेवाला ) क्षेत्र में ही हत्याएँ होती रहती हैं । दान से गरीब हुए भामाशाह (महाराणा प्रताप के मित्र, सहयोगी और विश्वासपात्र सलाहकार ) तो उँगलियों पर गिने जाने वाले ही मिलेंगे, पर ठगी, विश्वासघात, व्यसन, व्यभिचार, आक्रमण, मुकद्दमा, बीमारी, बेवकूफी के शिकार होने वाले आये दिन अमीर से फकीर बनते लाखों व्यक्ति रोज ही देखे-सुने जाते हैं । आत्मिक क्षेत्र में घाटा, आक्रमण, दु:ख कम है लेकिन  भौतिक में अधिक । इस तथ्य को यदि ठीक तरह से समझा गया होता तो लोग आदर्शवादी जीवन से घबराने और भौतिक लिप्सा (चाह ) में औंधे मुंह गिरने की बेवकूफी न करते Iहमारा व्यक्तिगत अनुभव यही है कि तृष्णा-वासना के प्रलोभन में व्यक्ति पाता कम, खोता अधिक है। हमें जो खोना पड़ा वह नगण्य है, जो पाया वह इतना अधिक है कि जी बार-बार यही सोचता है कि हर व्यक्ति को आध्यात्मिक जीवन जीने की, उत्कृष्ट और आदर्शवादी परम्परा अपनाने के लिए कहा जाए I

पर बात मुश्किल है । हमें अपने अनुभवों की साक्षी देकर उज्ज्वल जीवन जीने की गुहार मचाते मुद्दत हो गई, पर कितनों ने उसे सुना और सुनने वालों में से कितनों ने उसे अपनाया ?” 

हमारे  लिए यह जीवन अत्यंत  कठिन पड़ता, यदि जीवन का स्वरूप, प्रयोजन और उपयोग ठीक तरह समझने और जो श्रेयस्कर है, उसी पर चलने की हिम्मत एवं बहादुरी न होती । जो शरीर को ही अपना स्वरूप मान बैठा और तृष्णा-वासना के लिए आतुर रहा, उसे आत्मिक प्रगति से वंचित रहना पड़ा है । 

“पूजा-उपासना के छुट-पुट कर्मकाण्डों के बल पर किसी की नाव किनारे नहीं लगी है ।”

 हमें 24  वर्ष तक निरन्तर गायत्री पुरश्चरणों में निरत रहकर उपासना का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय पूरा करना पड़ा, पर उस कर्मकाण्ड की सफलता का लाभ तभी सम्भव हो सका, जब आत्मिक प्रगति की भावनात्मक प्रक्रिया को, जीवन-साधना को उसके साथ जोड़े रखा । यदि दूसरे की तरह हम देवता को वश में करने या ठगने के लिए उससे मनोकामनाएं पूरी कराने के लिए जन्त्र-मन्त्र का कर्मकाण्ड रचते रहते, जीवनक्रम के निर्वाह की आवश्यकता न समझते तो निस्सन्देह अपने हाथ भी कुछ नहीं पड़ता । हम अगणित भजनानन्दी और तन्त्र-मन्त्र के कर्मकाण्डियों को जानते हैं जो अपनी धुन में मुद्दतों से लगे हैं । पूजा-पाठ उनका हमसे ज्यादा लम्बा और चौड़ा है, पर बहुत बारीकी से जब उन्हें परखा तो खोखले मात्र पाया । झूठी आत्म-प्रवंचना उनमें जरूर पाई, जिसके आधार पर वे यह सोचते थे कि इस जन्म में न सही, मरने के बाद उन्हें स्वर्गसुख जरूर मिलेगा, पर हमारी परख और भविष्यवाणी यह है कि इनमें से एक को भी स्वर्ग आदि नहीं मिलने वाला है, न उन्हें कोई सिद्धि-चमत्कार हाथ लगने वाला है ।

क्रमशः जारी To be continued जय गुरुदेव  

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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