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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा-लेख 2- परमेश्वर का परम पवित्र निवासगृह

1 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद :  परमेश्वर का परम पवित्र निवासगृह 

आप सब ने परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा का प्रथम भाग बहुत ही ध्यान और श्रद्धा से अध्यन किया ,न केवल  अध्यन किया अपने आत्मपरिष्कार का प्रयास किया।  विचारों का हो तो सारा खेल है ,यही है विचार क्रांति – यही है मनुष्य में देवत्व का अवतरण ,यही है युगनिर्माण -नया  युग -नया  सवेरा। 

तो प्रस्तुत है आज का लेख : लेख 2 

शरीर के स्वार्थ और अपने स्वार्थ :

शरीर को बहाना भर माना, वस्तुओं को निर्वाह की भट्टी जलाने के लिए ईंधन भर समझा । महत्त्वाकांक्षाएं बड़ा आदमी बनने और झूठी वाहवाही लूटने की कभी भी नहीं उठीं । मन यही सोचता रहा हम आत्मा हैं, तो क्यों न आत्मोत्कर्ष के लिए, आत्म-कल्याण के लिए, आत्म-शान्ति के लिए और आत्म-विस्तार के लिए जियें ? शरीर और अपने को जब दो भागों में बाँट दिया, शरीर के स्वार्थ और अपने स्वार्थ अलग बाँट दिये तो वह अज्ञान की एक भारी दीवार गिर पड़ी और अँधेरे में उजाला हो गया । जो लोग अपने को शरीर मान बैठते हैं, इन्द्रिय तृप्ति तक अपना

आनन्द सीमित कर लेते हैं, वासना और तृष्णा की पूर्ति ही जिनका जीवन उद्देश्य बन जाता है, उनके लिए पैसा, अमीरी, बड़प्पन, प्रशंसा, पदवी पाना ही सब कुछ हो सकता है । वे आत्म-कल्याण की बात भुला सकते हैं और लोभ-मोह की सुनहरी हथकड़ी-बेड़ी भावपूर्वक पहने रह सकते हैं । उनके लिए श्रेय पथ पर चलने की सुविधा न मिलने का बहाना सही हो सकता है । अन्तःकरण की आकांक्षाएँ ही सुविधाएं जुटाती हैं । जब भौतिक सुख-सम्पत्ति ही लक्ष्य बन गया तो चेतना का सारा प्रयास उन्हें ही जुटाने लगेगा । 

उपासना  एक खिलवाड़ :

उपासना तो फिर एक हल्की-सी खिलवाड़ रह जाएगी । कर ली तो ठीक, न कर ली तो ठीक । लोग प्रायः उपासना को कौतूहल की दृष्टि से देखा करते हैं कि इसका भी थोड़ा तमाशा देख लें, कुछ मिलता है या नहीं । थोड़ी देर, अनमनी तबियत से, कुछ चमत्कार मिलने की दृष्टि से उलटी-पुलटी पूजा-पत्री चलाई तो उस पर विश्वास नहीं जमा, सो वह छूट गई । छूटनी भी थी। सच तो यह है कि श्रद्धा और विश्वास के अभाव में, जीवन उद्देश्य को प्राप्त करने की तीव्र लगन के अभाव में कोई भी आत्मिक प्रगति न कर सका । यह सब तथ्य हमें अनायास ही विदित थे, सो शरीर-यात्रा और परिवार व्यवस्था जमाये भर रहने के लिए जितना अनिवार्य रूप से आवश्यक था, उतना ही ध्यान उस ओर दिया । उन प्रयत्नों को “मशीन का किराया” भर चुकाने की दृष्टि से किया । अन्त:करण-लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तत्पर रहा सो भौतिक प्रलोभनों और आकर्षणों में भटकने की कभी जरूरत ही अनुभव नहीं हुई।

परमेश्वर का परम पवित्र निवासगृह :

जब अपना स्वरूप आत्मा की स्थिति में अनुभव होने लगा और अन्त:करण परमेश्वर का परम पवित्र निवासगृह दीखने लगा तो चित्त अन्तर्मुखी हो गया । सोचने का तरीका इतना भर सीमित रह गया कि परमात्मा के राजकुमार आत्मा को क्या करना, किस दिशा में चलना चाहिए। 

प्रश्न सरल थे और उत्तर भी सरल:

केवल उत्कृष्ट जीवन जीना चाहिए और केवल आदर्शवादी कार्य-पद्धति अपनानी चाहिए । जो इस मार्ग पर नहीं चले, उन्हें बहुत डर लगता है कि यह रीति-नीति अपनाई तो बहुत संकट आयेगा, न जाने कौन-सी गरीबी, तंगी, भर्त्सना (निंदा) और कठिनाई सहनी पड़ेगी । अपने को भी उपहास और भर्त्सना सहनी पड़ी । घर-परिवार के लोग ही सबसे अधिक आड़े आये । उन्हें लगा कि हमारी सहायता से जो भौतिक लाभ उन्हें मिलते या मिलने वाले हैं उनमें कमी आ जाएगी, सो वे अपनी हानि जिसमें समझते, उसे हमारी मूर्खता बताते थे, पर यह बात देर तक नहीं चली । अपनी आस्था ऊँची और सुदृढ़ हो तो झूठा विरोध देर तक नहीं टिकता । कुमार्ग पर चलने के कारण जो विरोध-तिरस्कार उत्पन्न होता है, वही स्थिर रहता है । नेकी अपने आप में एक विभूति है, जो स्वयं को तारती है और दूसरे को भी । विरोधी और निन्दक कुछ ही दिनों में अपनी भूल समझ जाते हैं और रोड़ा अटकाने के बजाय सहयोग देने लगते हैं । आस्था जितनी ऊँची और जितनी मजबूत होगी, प्रतिकूलता उतनी ही जल्दी अनुकूलता में बदल जाती है । परिवार का विरोध देर तक नहीं सहना पड़ा, उनकी शंका-कुशंका वस्तुस्थिति समझ लेने पर दूर हो गई । आत्मिक जीवन में वस्तुत: घाटे की कोई बात नहीं है । बाहरी दृष्टि से गरीब जैसा दिखने पर भी ऐसा व्यक्ति आत्मिक शान्ति और सन्तोष के कारण बहुत प्रसन्न रहता है । यह प्रसन्नता और संतुष्टि हर किसी को प्रभावित करती है और विरोधियों को सहयोगी बनाने में बड़ी सहायक सिद्ध होती है। अपनी कठिनाई ऐसे ही हल हुई। बड़प्पन की, लोभ-मोह-वाहवाही की एवं तृष्णा की हथकड़ी, बेड़ी कटी तो लगा कि अब बन्धनों से मुक्ति मिल गई । इन्हीं तीन जंजीरों में जकड़ा हुआ प्राणी इस भवसागर (  संसार रूपी समुद्र) में औंधे मुँह घसीटा जाता रहता है और अतृप्ति, उद्विग्नता (परेशानी ) की व्यथा-वेदना से कराहता रहता है । इन तीनों की तुच्छता समझ ली जाए और लिप्सा (इच्छा)  को श्रद्धा में बदल लिया जाए तो समझना चाहिए कि माया के बन्धन टूट गये और जीवित रहते ही मुक्ति पाने का प्रयोजन पूरा हो गया ।  

              “नजरें, तेरी बदली कि नजारा बदल गया” 

वाली उक्ति के अनुसार अपनी भावनाएँ आत्म-ज्ञान होते ही समाप्त हो गई और जीवन-लक्ष्य पूरा करने की आवश्यकता उँगली पकड़ कर मार्ग-दर्शन करने लगी । फिर न अभाव रहा, न असन्तोष I

यह शब्द परमपूज्य  गुरुदेव के लिखे हैं और हमें तो तब हैरानी हुई जब हमने इन पंक्तियों की रिसर्च की। 1951 की सुप्रसिद्ध बॉलीवुड फिल्म छोटी बहु में लता मंगेशकर ने यह गीत गया था और इस गीत में  कितनी भावना छिपी है।  यह सारा नज़र का ही तो खेल है। 

शरीर को जीवित भर रखने के लिए, सीमित साधनों से सन्तुष्ट रहने की शिक्षा देकर लोभ, लिप्सा की जड़ काट दी । मन उधर से भटकना बंद कर दे तो कितनी अपार शक्ति मिलती है और जी कितना प्रफुल्लित रहता है, यह तथ्य कोई भी अनुभव करके देख सकता है, पर लोग तो लोग ही ठहरे, तेल से आग बुझाना चाहते हैं । तृष्णा को दौलत से और वासना को भोग से तृप्त करना चाहते हैं । इन्हें कौन समझाये कि ऐसे प्रयास केवल दावानल ( वन की आग)  ही भड़का सकते हैं । इस पथ पर चलने वाला मृगतृष्णा में ही भटक सकता है । मरघट के प्रेत-पिशाच की तरह उद्विग्न ही रह सकता है, कुकर्म ही कर सकता है । इसे कौन समझाए , किसे समझाये ? समझने और समझाने वाले दोनों बिडम्बना मात्र करते हैं। सत्संग और प्रवचन बहुत सुने पर ऐसे ज्ञानी न मिले जो अध्यात्म के अन्तरंग में उतर कर अनुकरण की प्रेरणा देते । प्रवचन देने वाले के जीवन क्रम को उघाड़ा, तो वहाँ सुनने वालों से भी अधिक गन्दगी पायी । सो जी खट्टा हो गया । बड़े-बड़े सत्संग, सम्मेलन होते तो, अपना जी किसी को देखने-सुनने के लिए न करता । 

प्रकाश मिला तो अपने ही भीतर । आत्मा ने ही हिम्मत की और चारों ओर जकड़े पड़े जाल-जंजाल को काटने की बहादुरी दिखाई तो ही काम चला । दूसरों के सहारे बैठे रहते तो ज्ञानी बनने वाले शायद अपनी ही तरह हमें भी अज्ञानी बना देते । लगता है यदि किसी को प्रकाश मिलना होगा तो भीतर से ही मिलेगा । कम से कम अपने सम्बन्ध में तो यही तथ्य सिद्ध हुआ है । 

आत्मिक प्रगति में बाह्य अवरोधों के जो पहाड़ खड़े थे उन्हें लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा रखे बिना,

श्रेय-पथ पर लाने का दुस्साहस संग्रह किए बिना निरस्त नहीं किया जा सकता था, सो अपनी हिम्मत ही काम आई । जब अड़ गये तो सहायकों की भी कमी नहीं रही । गुरुदेव ( दादा गुरु )       से लेकर भगवान तक सभी अपनी मंजिल को सरल बनाने में सहायता देने के लिए निरन्तर आते रहे और प्रगति-पथ पर धीरे-धीरे किन्तु सुदृढ़ कदम आगे ही बढ़ते चले गये । अब तक की मंजिल इसी क्रम से पूरी हुई है।

क्रमशः जारी  (To be continued )

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् ,जय गुरुदेव  

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