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परमपूज्य गुरुदेव श्री अरविन्द आश्रम में श्रीमाँ के साथ पार्ट-2

19 मई 2021 का ज्ञानप्रसाद- परमपूज्य गुरुदेव श्री अरविन्द आश्रम में श्रीमाँ के साथ पार्ट-2
आज का लेख भी बहुत ही संक्षिप्त है। हमारे 16 मई वाले लेख की तरह यह लेख भी लगभग मूलरूप में ही हमारे सहकर्मी आदरणीय विवेक खजांची जी द्वारा फेसबुक पर शेयर हुए लेख में से तैयार किया है। विवेक भाई साहिब का हम ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं कि उन्होंने श्री अरविन्द के ऊपर इतना विस्तृत ज्ञान दो भागों में हम सबके के लिए प्रस्तुत किया। कुछ दिन पूर्व जब हमने इन लेखों को देखा तो उनसे बात करके हमें पता चला कि यह लेख उनके लगभग 6 -7 मास के अथक परिश्रम और वर्षों पुराने गूढ़ ज्ञान का परिणाम है। हम विवेक जी के इस अद्भुत योगदान को नतमस्तक हैं। इस लेख में हमने बहुत ही सामान्य सी एडिटिंग की है जो इस लेख को सरल बनाने (easy to understand ) उदेश्य से की है। अपने सहकर्मियों से आशा करते हैं कि वह संकल्प लें कि इस लेख को किसी कहानी की तरह नहीं बल्कि एक धार्मिक कंटेंट की धारणा से पढ़ेंगें। जिस प्रकार सुप्रसिद्ध टीवी सीरियल महाभारत में संजय युद्धक्षेत्र का विवरण ध्रतराष्ट्र को बताते जाते थे ठीक उसी प्रकार श्रीमां और परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म दृष्टि के कुछ विवरण इस लेख में देखने को मिलेंगें।

पांडिचेरी ( वर्तमान पुदुच्चेरी) स्थित अरविन्द आश्रम में परम्पूज्य गुरुदेव की यात्रा, आकस्मिक आगंतुक की तरह न थी। श्रीमां ने उन्हें श्रीअरविन्द की शिक्षाओं के आलोक में सम्बोधन कर कहा , ” वे ( श्रीअरविन्द ) एक नए मनुष्य के जन्म की दिशा में प्रयत्न कर रहे हैं। जिन शक्तियों ने उन्हें इस कार्य के लिए नियुक्त किया है, उन्हीं ने आपको भी यहां इस आश्रम में बुलाया है। ” श्रीमां ने आगे कहा,“ श्रीअरविन्द मानते हैं कि यह आश्रम , एक प्रयोगशाला है यहां भविष्य के लिए परीक्षण होने चाहिए, वे चल रहे हैं और आप से उनकी कुछ अपेक्षाएं हैं”

पूज्य गुरुदेव की अस्सी वर्षों की जीवन यात्रा में हम यह देख पाते हैं कि उनकी हर यात्रा का एक विशेष उद्देश्य था। इस प्रसंग को उन्होंने एक समय अपने उद्बोधन में प्रस्तुत कर कहा भी था, ” हमारी यात्राओं का उद्देश्य,लोकोत्तर दिव्य आयाम उद्घाटित करना है ” फ्रैंच विदुषी ( विद्वान महिला) श्रीमां ने पूज्य गुरुदेव को अपनी योगजनित साधनोंपलब्ध दृष्टि से सनातन सत्य-चेतन पुरुष, ब्रह्मशक्तिसंपन्न आध्यात्मिक भावराज्य में विचरण करने वाले महायात्री के रूप में पहचानकर योगी, यज्ञ पुरुष कह कर सर्वोच्च सम्मान का प्रदर्शन किया था। यहूदी धर्म के आदर्शों में भारतीय अध्यात्म के मिलन-संयोजन स्वरूप, श्रीमां का यौगिक व्यक्तित्व गठित हुआ था, जो उनके अतिंन्द्रिय भावराज्य का ही एक प्रतिबिंब था।

यह एक ख्यात प्रसंग है कि वे प्रतिदिन प्रार्थना करतीं थीं,-“हे जेहोवा (परमेश्वर) अपने धर्म के मार्ग में मेरा पथ
प्रदर्शन कर, मेरे आगे अपने सीधे मार्ग को दिखा” श्रीमां ने अपनी इस सार्वभौमिक प्रार्थना के साथ सनातन धर्म के प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र में अद्भुत साम्य पाया था। फ्रांस निवास काल में वे अनुभव किया करती थीं कि भारत में वे बहुत से योगियों, साधकों और विभिन्न धाराओं के आचार्यों से मिलेंगी। जिस क्षण श्रीमां ने पूज्य गुरुदेव को प्रथम बार देखा उन्हें यज्ञपुरुष-महासिद्ध की प्रतीति हई। श्रीमाँ ने अनुभव किया कि पूज्य गुरुदेव के सरल, संतुलित, धीर व्यक्तित्व,प्रशान्त एवम् समुज्ज्वल चरित्र तथा पुण्यमय दिव्य स्वरूप के प्रभा मण्डल से आश्रम में नव चेतना का संचार हुआ है। वे पूज्य गुरुदेव के आश्रमवास से अत्यन्त प्रफुल्लित हुईं। आश्रमवासी साधकों के मध्य बैठे,पूज्य गुरुदेव से उन्होंने कहा, ” आप नए हैं, लेकिन हम लोगों के लिए नहीं, किसी मंत्रणा के लिए आपका यहां आना आवश्यक नहीं था, वह पराभौतिक (सूक्ष्म) स्तर पर भी संपन्न होती रहती, इस मिलन का उद्देश्य कुछ ज्यादा गहन है। इसीलिए आपको यहां आश्रम में रोके रखा ” इसके बाद उन्होंने , पूज्य गुरुदेव से बिल्कुल चिर-परिचित अंदाज़ में अतिमानस अवतरण के अन्तर्गत नवयुग के आगमन तथा उसके स्वरूप के विषय में वार्ता की। श्रीमां ने पूज्य गुरुदेव से अपनी अनुभूति बताते हुए कहा, ” संसार क्या है ? इसके सम्बन्ध में मुख्य रूप से तीन धारणाएं हैं:

१ एक अदिशंकर और बुद्ध से मेल खाती है कि संसार एक भ्रांति है,अविद्या है और इस कारण यहां दुःख ही दुःख है। यहां करने योग्य एक ही काम है कि इसमें से निकल जाओ, छुटकारा पा लो और ब्रह्म में लीन हो जाओ।
२ दूसरी धारणा वेदान्त की है कि ईश्वर सर्वव्यापी है। मूल तत्व के रूप में वह हर जगह विद्यमान है, लेकिन उसका व्यक्त रूप विकृत (परिवर्तित) है, तमस (lethargy) से आच्छादित है ,उससे छुटकारा पाने के लिए आत्म चेतना में स्थिर होकर रहो,जगत के बारे में चिन्ता मत करो।
३ तीसरी दृष्टि आधुनिक या नवीन है। यह श्रीअरविन्द ने उन्मीलित की है। उनके अनुसार संसार जैसा अभी है ,वह अपूर्ण है उसे जो होना है, उसका धुंधला और विकृत रूप है। लेकिन उसे वहीं बनना है उसकी रचना भगवान के सभी रूपों और पहलुओं में विकसित होने के लिए है। यह एक बहुत ही वैज्ञानिक व्याख्या है।-Universe is always changing ।

श्रीमां ने पूज्य गुरुदेव के द्वारा नवयुग के नूतन युगनिर्माण के अन्तर्गत, भविष्य में किए जाने वाले आनुष्ठानिक साधना-सत्रों व स्थापनाओं के विषय में अपनी दिव्य दृष्टि से जान लिया था। हम अपने सहकर्मियों को याद दिलाते जाएँ कि यह बातें 1937 में जब पूज्यवर केवल 26 वर्ष के थे तब हो रही थीं। मनुष्य में देवत्व ,धरती पर स्वर्ग के अवतरण और युगनिर्माण योजना की नींव उस समय से ही दिखती थी क्योंकिं यह परमपिता परमात्मा की दिव्य योजना है।

नीलरत्नम की कथा :
श्रीमां, अरविन्द आश्रम के प्रत्येक साधक के आध्यात्मिक जीवन पर पूर्ण दृष्टि रखा करती थीं। श्री नीलरत्नम एक उच्च कोटि के साधक थे। संभवत: सन 1971 के बाद किसी समय वे उत्तर भारत के तीर्थ स्थल, हरिद्वार पहुंचे। वे हरिद्वार स्थित शान्तिकुंज आश्रम के सामने से गुजर रहे थे कि उनके कानों में श्रीमां का स्वर गूंजा,” यहीं है विश्वामित्र की तप:स्थली। जिस यज्ञपुरुष को तुम ध्यान में देखते हो वह महासिद्ध यहीं है और अभी भी विद्यमान है। इस स्वर गुंजन के फलस्वरूप श्री नीलरत्नम चलते-चलते अचानक रुक गए और शान्तिकुंज आश्रम के भीतर प्रविष्ट हुए। शान्तिकुंज आश्रम में उस समय पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी अपने अनेक शिष्यों, प्रशंसकों व अनुरागियों के मध्य घिरे हुए थे। श्री नीलरत्नम ने पूज्य गुरुदेव के प्रथम दर्शन करते ही ठीक पहचान लिया। वे पूज्य गुरुदेव के श्री चरणों में दंडवत लेट गए। पूज्य गुरुदेव को प्रणाम निवेदित करते हुए उन्हें अपने गहन ध्यान अवस्था में दीख पड़ा कि एक विराट यज्ञ हो रहा है, यज्ञ स्थल पर बने यज्ञ कुंडों में उठती हुई ज्वालाओं से एक आकृति के दर्शन होते हैं, ज्वालाओं की शीर्ष जिव्हा उस आकृति की केश राशि में परिवर्तित हो जाती है और मध्य भाग तप्त वर्ण के मुख मण्डल में रूपांतरित हो जाता है। इस दृश्य को श्री नीलरत्नम प्राय: अपनी ध्यान अवस्था में पांडिचेरी आश्रम में देखा करते थे। श्री नीलरत्नम ने पूज्य गुरुदेव को भक्तिभाव से आत्मनिवेदन कर विनयपूर्वक कहा, “आप ही वह दिव्य पुरुष हैं, जिनके दर्शन मैं ध्यान में करता रहा हूं ? इस आश्रम के सामने से गुजरते समय श्रीमांने आपके बारे में संकेत किया उन्होंने ही मुझे यहां भेजा है” पूज्य गुरुदेव ने उन्हें सम्बोधित करते हुए कहा, ” प्रत्यक्ष में लौटो नीलरत्नम ! अपनी अनुभूति को इस तरह सार्वजनिक मत करो”

यह घटना जिस समय घटित हो रही थी तथा जिस क्षण श्रीनीलरत्नम ने पूज्य गुरुदेव के समक्ष समर्पण किया था, ठीक उसी क्षण ,पांडिचेरी के श्रीअरविन्द आश्रम में विराजित, श्रीमां को अपने दिव्य चक्षुओं द्वारा श्री नीलरत्नम को अपने गुरु के चरण स्पर्श व समर्पण विषयक वह घटना दिख गई। श्रीमां ने उसी क्षण आश्रम में अपने निकट खड़ी विमला जालान नामक एक शिष्या को बताया,” नीलरत्नम अपने यज्ञप्रभु के पास पहुंच गया है, वह बहुत आगे जाएगा ” इस लौकिक जगत में समय – समय पर अनेक अलौकिक घटनाएं घटित हुआ करती है जो जीव के नवजागरण का मार्ग प्रशस्त कर दिया करती है। क्षण महत्वपूर्ण है,एकात्मता महत्वपूर्ण है। एन्द्रिक जगत में उस पारलौकिक अनुभव का वह क्षण, ईश्वरादिष्ट मसीहा के प्रत्यक्ष प्रकटन का होता है। स्थिर होकर, एकाग्रचित्त होकर उस परमतत्व को बिल्कुल स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है जो मनुष्यों के सर्वविध कल्याण हेतु भौतिक स्तर पर सौंदर्य रूप में प्रकट होते हैं। स्वाभाविक रूप से पूज्य गुरुदेव में एक ऐसा आकर्षण था जो सामान्यत: इस जड़ जगत में दिखाई नहीं पड़ता। उनकी उपस्थिति में एक ऐसा चुंबकत्व था जो हर किसी को आकृष्ट कर लेता था। उन्हें सभी अपना समझ,अपने अनुभव बताया करते थे। ईसा,बुद्ध,मुहम्मद,चैतन्य,महावीर आदि,अनेक अवतार पुरुषों में जो-जो शक्ति विद्यमान थीं पूज्य गुरुदेव उन सभी का समन्वयात्मक आधार थे। यद्धपि वे बहुत सामान्य दीख़ पड़ते थे किन्तु उनके प्रज्ञालोक का आभास हो ही जाया करता था। उनके सानिध्य में जो भी रहा करता उसे ये स्पष्ट धारणा हुआ करती थी कि यहीं एकमात्र उद्धारक हैं,जो मेरे जीवन में दिव्यता का मार्ग प्रशस्त करेंगे।
पांडिचेरी की श्री मां की दृष्टि में वे महासिद्ध थे जो, अरणी-काठ (लकड़ी ) से ज्वलित यज्ञपुरुष के रूप में यज्ञमय जीवन जीने की प्रेरणा देकर सदा सर्वदा के लिए अपने असंख्यों अनुगमियों के हृदय प्रदेश में विराजित हो जाते थे। हर धर्म के, हर सम्प्रदाय के लिए वे अमूल्य थे। वे इस धरा पर दैव निधि (सम्पति) थे।

यज्ञपुरुष को पहचानने वाली , श्रीमां ने अपने पंचानवे वर्ष की उम्र में (1973 ) समाधि लाभ किया। यह समाधि लाभ उनके जीवन की परिसमाप्ति नहीं था अपितु अनन्त में समाहित हो उस विराट यज्ञ के शुभारम्भ का ब्रह्मनाद था जिसमें श्रीमां ने पूज्य गुरुदेव के देवभाव की युग निर्माण योजना महायज्ञ में मनुष्य में देवत्व का उदय-धरती पर स्वर्ग अवतरण हेतु सुगन्धि आहुतियां प्रदान की थीं। जिस क्षण श्रीमां ने पांडिचेरी आश्रम में अपनी भौतिक देह को सूक्ष्म में विसर्जित किया था उसी क्षण पूज्य गुरुदेव को श्रीमां की महासमाधि में लीन होने का आभास हुआ था।
तो ऐसी होती है दिव्य आत्माएं ,जय गुरुदेव।
सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा और नई उमंग लेकर आए। जय गुरुदेव परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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