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आइये सब सहकारिता से कार्य करें

10 मई 2021 का ज्ञानप्रसाद
आज का लेख बहुत ही भावनात्मक और प्रेरणा से भरपूर है। यह इसलिए है कि हमारे परमपूज्य गुरुदेव की दिव्य उँगलियों से उनके मार्गदर्शक के निर्देश पर लिखे हुए लेखों में से चुन कर यह लेख आपके समक्ष प्रस्तुत है। अखंड ज्योति जनवरी 1962 में प्रकाशित हुआ लेख आज हमारे,आप सबके ऑनलाइन ज्ञानरथ के संदर्भ में पूरी तरह उतरता है।

लेख आरम्भ करने से पहले हम अपने पाठकों को 1962 के दिनों में ले जाने का प्रयास करेंगें। इस अंक के मुख पृष्ठ पर देखने से पता चलता है कि एक कॉपी का मूल्य केवल 4 आना था और वार्षिक मूल्य 3 रूपए था। आज 2021 में एक अंक का मूल्य 19 रूपए है और वार्षिक चंदा केवल 220 रूपए है। यह तुलना हम इसलिए कर रहे हैं कि जिन लाखों करोड़ों की मशीनों पर यह पत्रिका प्रिंट होती है और बाकि के प्रोसेस को अगर हम नज़रअंदाज़ भी कर दें तो इनका मूल्य लगभग फ्री ही है। आज के युग की इससे भी बड़ी बात यह है कि गुरुदेव का लगभग सारा साहित्य ऑनलाइन फ्री पढ़ने के लिए उपलब्ध है। हम अपने पाठकों को अनुरोध करेंगें कि इस दिव्य पत्रिका का नियमित अध्यन किया जाये और अपने परिजनों में शेयर भी किया जाये। इस पत्रिका का अमृत पान करने से अवश्य ही जीवन दान मिलता है। तो आओ चलें आज के लेख की ओर।

अग्नि से अग्नि उठेगी :
गुरुदेव अखंड ज्योति पत्रिका के बारे में लिखते हैं कि इसमें जो लेख लिखे जाते हैं उनमें जीवन का निर्माण करने का तत्व होता है। इन लेखों को ह्रदय की स्याही में अपनी कलम डुबोकर,अपने प्राणो की भाषा से अक्षर चुन -चुन कर पूरे मनोयोग की कलम से लिखा हुआ है। इन लेखों में जीवन और प्रकाश की मात्रा मौजूद है। यह प्रकाश अवश्य ही आपके जीवन में आग लगाने में सफल होगा। आप जानते ही हैं कि जब कभी आग लगती है उसको रोकना अत्यंत कठिन होती है। आग का काम है फैलना ,इसने तो फैलना ही है।

हम ऑनलाइन ज्ञानरथ पाठकों का ह्रदय जानते हैं। यह अत्यंत स्वाभाविक है कि जब आपको कोई नई बात का पता चलता है तो आप छोटे बच्चे की तरह भाग -भाग कर बताने में उत्सुक होते हैं। आपकी उत्सुकता का लेवल और भी अधिक होता है जब आप किसी कार्य में सफल होते हैं जैसे कि परीक्षा में फर्स्ट आना। ऐसी ही प्रसन्नता और उत्सुकता गुरुदेव के साहित्य को पढ़ने में होनी चाहिए जो हम सम्पूर्ण समर्पण से आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं।
गुरुदेव अखंड ज्योति पत्रिका को एक ” पावर हाउस ” का नाम देते हैं। जिस प्रकार पावर हाउस में से बिजली generate होती है और घर- घर को प्रकाशमय बनाती है ठीक उसी तरह युग निर्माण योजना का हर कोई सदस्य एक बल्ब की तरह प्रकाश फैलाने का कार्य करेगा/कर रहा है । अखंड ज्योति का पाठक केवल एक धार्मिक पत्रिका का पाठक मात्र न रह कर एक लौकिक शिक्षक के रूप में अपने आप को प्रस्तुत करेगा। जब अँधेरा छट जाता है तो प्रकाश से सारा विश्व जगमग हो जाता है। हमारे पाठक इस बात से सहमत होंगें कि

“अज्ञान ही मानव जाति का सबसे बड़ा शत्रु है।”

संसार से सारे कुकर्म इसी अंधकार में पनपते हैं उल्लू ,चमगादड़ ,सर्प ,बिच्छू ,कनखजूरे अँधेरे में ही तो बैठे रहते हैं ,क्यों ? क्योंकि यह प्रकाश सहन नहीं कर पाते। प्रकाश में इन प्राणियों की आँखें चुंदीआं जाती हैं। आपने कई बार देखा होगा – प्रकाश दिखते ही cockroach कैसे भाग उठते हैं। इसी सन्दर्भ को हम आज के युग के उन लोगों के साथ compare कर सकते हैं जिनको ज्ञान की बात समझ आना तो दूर सुनने को भी तैयार नहीं हैं। क्योंकि उनके ऊपर अज्ञान की भारी परत उन्हें कुछ अच्छा करने ही नहीं देती।

गुरुदेव कहते हैं – धन का दान करने वाले तो बहुत हैं परन्तु ” समय का दान ” तो कोई-कोई ही कर सकता है। धन से सड़क बन सकती है ,भवन बन सकता है लेकिन चरित्र बनाने के लिए एक समर्पित शिक्षक का बहुमूल्य समय ही काम आता है। हम यह कतई नहीं कह रहे कि धनवान लोगों की आवश्यकता नहीं है यां धनवान लोगों में कोई बुराई है। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि धनवान के पास समय का अभाव है और वह पहले अपना लाभ देखता है – He is a business man। एक शिक्षक अगर सही मायने में शिक्षक है तो वोह पहले समाज का ,सेवा का ,पुरषार्थ का सोचता है ,इसीलिए उसे Nation Builder कहा गया है। एक शिक्षक अपना पूरा समय अपने आप को परिष्कृत करने और ज्ञान अर्जित करने में लगाता है और फिर उस ज्ञान को बाँटने में तत्पर रहता है। इसके लिए समय की आवश्यकता होती है और फिर समय दान की। युगनिर्माण के इस महान कार्य में समयदान के लिए हर कोई तत्पर रहेगा,कोई भी कंजूसी नहीं दिखाएगा ऐसा हमारा अटल विश्वास है।

शिक्षक द्वारा ज्ञान प्राप्ति के उपरांत उसमें फिर वही उत्सुकता जाग उठती है जो एक बच्चे में सभी को बताने में होती है। हमें भी जब कोई ज्ञान की प्राप्ति होती है तो हम जब तक आपके समक्ष प्रस्तुत नहीं कर लेते हमें नींद तक नहीं आती। हम न दिन देखते हैं न रात्रि। एक बार ,दो बार और कितनी ही बार पढ़ कर परिष्कृत करने के उपरांत ही आपके समक्ष प्रस्तुत करने का साहस करते हैं।

जब शिक्षक की बात हो रही है तो हम सत्यम भूषण जी का कमेंट आपके साथ शेयर करना चाहेंगें। भूषण जी लिखते हैं कि यूँ लग रहा है कि हम किसी एक ऐसे विद्यालय के विद्यार्थी हैं जिनके शिक्षक आदरणीय डॉक्टर साहिब हैं और प्रधान शिक्षक परमपूज्य गुरुदेव हैं। भूषण जी आपके कमेंट का सम्मान करते हुए हम यही कहना चाहेंगें कि परमपूज्य गुरुदेव के साथ हमारा क्या मुकाबला, वह तो स्वयं ही सूर्य हैं और अगर हमें उनसे थोड़ी सी भी प्रेरणा मिलती हो और हम कुछ कर सकने में समर्थ होते हैं तो इसमें आप सबका बहुत बड़ा योगदान है। शिक्षक अकेले कुछ भी नहीं कर सकता अगर शिष्य समर्पित न हो। शिक्षक -शिष्य का समन्वय अटूट है , इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं इस तथ्य को साबित करने के लिए।

34 वर्षीय सूर्य कुशवाहा जी का कमेंट भी बहुत ही प्रेरणादायक है। सारा कमेंट तो शेयर नहीं करेंगें लेकिन इतना अवश्य कहेंगें कि कुशवाहा जी ने ऑनलाइन ज्ञानरथ के कार्य के लिए, इसके सहकर्मियों के लिए बहुत ही सराहनीय शब्द प्रयोग किए हैं। कुशवाहा जी ने झाँसी गायत्री शक्तिपीठ में 15 माह और मुंसियारी चेतना केंद्र में समयदान करके अपनी श्रद्धा और समर्पण को प्रकट किया है । ऑनलाइन ज्ञानरथ के लिए भी सम्पूर्ण समर्पण के साथ सहयोग करने की इच्छा व्यक्त की है। उनके उत्तर में हम कहना चाहते हैं आपका ऑनलाइन ज्ञानरथ में स्वागत है और हमारा सौभाग्य है कि आप जैसे युवा हमारे ज्ञानरथ को गति देने में तत्पर हैं। आज जितने भी सहकर्मी अपनी सहकारिता का प्रमाण दे रहे हैं उन्होंने ने भी अपना -अपना कार्यभार अपनी समर्था के अनुसार अपने कन्धों पर ले लिया था और आज तक अनवरत हमारे साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहे हैं।

इस ऑनलाइन ज्ञानरथ का मुख्य उदेश्य ज्ञान -प्रचार और ज्ञान -प्रसार है। अगर ज्ञान का प्रचार-प्रसार न हो तो हम बेशक सैंकड़ों पुस्तकें खरीद लें सब अर्थहीन होगा और ज्ञान का अनादर होगा। इसीलिए हम बार-बार इस बात को दोहराते आए हैं कि हमारे लेखों की readership और वीडियो की viewership बढ़नी चाहिए। युवा शक्ति इसमें बहुत योगदान दे सकती है। कुशवाहा जी के साथ और युवा साथियों को हम सुझाव दे सकते हैं कि लेखों और वीडियो की popularity पर दृष्टि बनाये रखें और अपने क्षेत्र में अधिक से अधिक शेयर करें। युवा शक्ति भारत कि सबसे बड़ी शक्ति क्योंकि इस देश में युवाओं की संख्या और शक्ति विश्व में सबसे अधिक है।

जब हम readership और viewership के नंबरों की बात कर रहे हैं तो इसका कतई अर्थ नहीं है कि हम इसमें कोई आर्थिक लाभ लेना चाहते हैं यां इसमें हमारा कोई स्वार्थ है । हम तो केवल निस्वार्थ सेवारत होना चाहते हैं। हमें तो न यश चाहिए न उत्कर्ष चाहिए, जीवन भर संघर्ष चाहिए ,अजय विजय की चिंता क्या जब जाग्रत हमारी हस्ती है, नित नूतन हमारी हस्ती है जब गुरुदेव हमारे अंग संग हैं ,रोम रोम में हैं।

यह दोनों कमेंट हमने आज के लेख के सन्दर्भ में होने के कारण शेयर किए हैं। इच्छा तो सदैव यही रहती है कि सब कमैंट्स का रिप्लाई किया जाये लेकिन हो नहीं सकता। उसके दो कारण है -एक समय का अभाव ,दूसरा हमारे सहकर्मी हमसे अच्छे उत्तर दे रहे हैं और सभी की भावनाओं को पढ़ रहे हैं। लेकिन फिर भी कहीं-कहीं ,कभी -कभी हम रिप्लाई कर भी देते हैं इससे हमें भी संतुष्टि होती है।

हम अपने पाठकों को यह बताना चाहेंगें कि पूज्यवर ने यह बातें आज के लगभग 6 दशक पूर्व लिखी थीं और आज उनके द्वारा लगाया गायत्री परिवार का पौधा एक विशाल वृक्ष बन कर विश्व भर में संरक्षण प्रदान कर रहा है। लगभग 15 करोड़ सदस्यों का यह परिवार ,जिसका प्रत्येक सदस्य अपने गुरुदेव का ही प्रतिबिम्ब है , मनुष्य में देवत्व का उदय करने को कृतसंकल्प है। यह पीले वस्त्रों वाले साधकों की विशाल सेना गुरुदेव के स्वप्न को साकार करने में कृतसंकल्प है। हम अगर गुरुदेव के समर्पित और सच्चे सैनिक हैं तो गुरुदेव स्वयं ही हमारा चयन करके अपने चरणों में स्थान देंगें।

आज के ज्ञान प्रसाद में बस इतना ही। आशा करते हैं आप भी इस विश्व को प्रकाशमय बनाने में अपना योग दान देंगें और ज्ञानरथ को गति देंगें।
जय गुरुदेव

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