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1984 से  लेकर 1990 तक परमपूज्य गुरुदेव द्वारा दिए गए महाप्रयाण के संकेत 

3 अप्रैल 2021 का ज्ञान प्रसाद

1984 से  लेकर 1990 तक परमपूज्य गुरुदेव द्वारा दिए गए महाप्रयाण के संकेत 

मित्रो आज का ज्ञान प्रसाद हमने प्रज्ञावतार हमारे गुरुदेव शीर्षक वाली  अंग्रेजी अनुवादक  पुस्तक “ Gurudev Prophet of New Era”  पर आधारित  किया है।  महामहिम पंडित लीलापत शर्मा  जी द्वारा लिखित इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद आदरणीय  वसंत चौकसी जी ने किया है।  इस लेख का मुख्य उदेश्य गुरुदेव द्वारा अपने महाप्रयाण से 5 -6 वर्ष  पूर्व  दिए गए संकेतों को अंकित करना है।  आप लेख का अध्यन करें और स्वयं पूज्यवर की शक्ति को महसूस करें। अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करके आप के समक्ष इस लेख को प्रस्तुत करना एक अत्यंत challenging  कार्य था विशेषकर तब जब हम सम्पूर्ण जीवन  अंग्रेजी में ही कार्यरत रहे। बोलने में तो ठीक थे लेकिन लिखने का तो कभी भी अवसर न मिला।  गूगल महाराज ने बहुत साथ दिया ,हम उनके चरणों में नतमस्तक हैं।  एक शब्द जिसका हिंदी अनुवाद करने का बहुत परिश्रम किया और  google महाराज भी कोई  पर्याप्त उत्तर न दे सके वह है  “ईथर” तो हम आपसे यही निवेदन करेगें कि भाव को समझने का प्रयास करें न कि word meaning .

तो आरम्भ करते है आज का ज्ञानप्रसाद। 

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1984  में संकेत :

गुरुदेव 1984 में चौथी और संभवत: आखिरी बार हिमालय गए थे। दैवी शक्ति के साथ अपनी  मुलाकात के बारे में ,दादा गुरु सर्वेश्वरानंद, से मिलने के बाद उन्होंने एक बार कहा था :

“यात्रा हमेशा की तरह कठिन  थी, गोमुख तक पहुंचना , वीरभद्र से मिलना  और फिर तपोवन तक बहुत ही  आसानी से पहुंच जाना । लेकिन इस बार की यात्रा में एक बहुत महत्वपूर्ण  अंतर था।  इस बार मुझे  सूक्ष्म शरीर में आने  के लिए बताया गया था। दादा गुरु से मिलते ही ह्रदय में प्रसन्नता की एक विद्युत तरंग कौंध जाती थी।  इस बार भी वैसा ही हुआ। एक क्षण के भीतर ही  अभिवादन और आशीर्वाद-औपचारिकता समाप्त हो गई। मार्गदर्शक के साथ इतने घनिष्ट सम्बन्ध होने के कारण औपचरिकता में व्यर्थ समय नष्ट नहीं किया  जाता था।  तुरंत ही  दिव्य गुरु कहने लगे, 

“अब तक  जो कुछ तुम्हें  बताया और किया गया वह स्थानीय और सरल था। अग्रणी लोग इस तरह का काम पहले भी करते रहे हैं। लेकिन अब हम आपसे जो कह  रहे हैं वह बहुत  ही बड़े स्तर का कार्य  है। ”

सूक्ष्मीकरण :

“भौतिक और ईथर दोनों वायुमंडल इन दिनों बेहद प्रदूषित हो गए हैं। न केवल मनुष्य बल्कि इस ग्रह पर हर प्रकार के  जीवन का अस्तित्व खतरे में है। भविष्य चुनौतियों से भरा है। इस स्थिति से निपटने के लिए, तुम्हे एक  से  पांच ( सूक्ष्मीकरण )  बनना होगा। तुम्हें  अपनी शक्ति को पांच खंडों में विभाजित करना होगा और उससे   पांच गुना काम लेना होगा। ये पाँचों अस्तित्व वातावरण को प्रदूषण से मुक्त करने, प्रतिभाओं के विकास और विनाशकारी संभावनाओं को हटाने,  एक उज्ज्वल भविष्य के लिए आशातीत परिस्थितियाँ बनाने और लाने के लिए जिम्मेदार होंगे। इस विशाल कार्य को सम्पन्न करने  के लिए स्थूल शरीर तो पर्याप्त  नहीं होगा क्योंकि स्थूल शरीर की कुछ  निर्धारित  सी सीमा ही  होती है    इसके लिए अपने शरीर के ईथर भाग के विकास के लिए काम करना “।

1984 की वसंत पंचमी से गुरुदेव ने लोगों से मिलना जुलना  बंद कर दिया। यहां तक ​​कि मिशन-कार्यकर्ताओं ने भी उन्हें  कई  दिनों तक नहीं देखा । माताजी हमें बताती थीं कि हमें यह कदापि  नहीं सोचना चाहिए कि उनके साथ कुछ गलत हो रहा  है यां  उन्हें कोई प्रॉब्लम है।  गुरूजी इस समय अपने गुरु की संगति में है और भौतिक शरीर  से ईथर शरीर  में प्रवेश कर रहे हैं । गुरूजी  न तो थक गए हैं, न ही काम करने  से बचने की कोशिश कर रहे हैं यां बहाने ढूंढ रहे हैं, बल्कि अपनी शक्तियों को और अधिक बड़े पैमाने पर बढ़ा रहे हैं ।

परमपूज्य गुरुदेव ने पहले कभी कहा था, यह  मौन  साधना है और इसे एक विशाल अभियान को सम्पन्न करने से पहले अपनाया जाता है। तब  गुरुदेव ने लिखा था कि भौतिक शरीर में रहने वाली  आत्मा को अगर  सर्वोच्च कार्य करना है तो  कोई  विशेष या असामान्य स्थितियों में पांच भिन्न-भिन्न शरीरों   के माध्यम से ही हो सकता है। यदि कार्य एक ऐसी प्रकृति का है जिसे पांच  अलग-अलग शरीरों  द्वारा बहुत लंबे समय तक किया जाना है, तो भौतिक, मानव शरीर द्वारा सांसारिक कार्यों  को रोकना होगा। मेरे पांच शरीरों  में से एक को विशेष रूप से दुखी, असमर्थ और पीड़ित लोगों की मदद के लिए नियुक्त किया गया है।

गुरुदेव के असंख्य दर्शनार्थी जी हर रोज़ प्रातः चरणस्पर्श करने आते थे इस सूक्ष्मीकरण साधना से बहुत ही दुखी थे क्योंकि गुरुदेव किसी के लिए भी   बिल्कुल  उपलब्ध नहीं थे। लेकिन गुरुदेव इतने दयालु थे कि इसे सहन नहीं कर सके। उन्होंने दर्शन देने के लिए  एक अपनाई गई विधि से सुबह का समय तय किया। 

अपनाई गई विधि इस प्रकार थी: 

गुरुदेव अपने कमरे में बैठकर लेखन कार्य करते थे, दर्शन चाहने वालों के लिए उनके कमरे की खिड़की एक निश्चित समय के लिए खुली रहती थी और लोग केवल बाहर से ही देख कर चले जाते। 

इस तरह से दो साल बीत गए।

1988 के  वसंत  में  परमपूज्य गुरुदेव ने  कहा: 

 ‘यह संभव है कि  आपके गुरुजी  जीवन के 80  वर्ष पूर्ण कर सकते हैं  । जिस क्षण मैं अपने दिए गए अपरिहार्य कार्यों को पूर्ण कर लेता हूँ तो  मैं दूसरों को  अपनी जिम्मेदारी सौंप दूंगा। परिजनों को यह  संदेह हो सकता है कि उनके  उपरांत मिशन की  प्रगति रुक ​​सकती है और कार्यक्रमों में  अव्यवस्था प्रबल हो सकती है।  लेकिन जो लोग गहराई से देखने में सक्षम हैं, वे जानते हैं कि यह मिशन साधारण मानवों के द्वारा  नहीं बल्कि दिव्य सत्ताओं  द्वारा चलाया जा रहा  है। लोगों की साधारण  भाषा में कह सकते हैं  एक बाजीगर (जादूगर) इसे चला रहा है। अगर कोई  गलती होती है, तो वह ही  इसे सही करेगा। हानि या लाभ उसका ही  होगा। हर किसी को मिशन के भविष्य के बारे में इसी  तरह से सोचना चाहिए और निराशा को पास नहीं आने देना चाहिए।

अगले वर्ष 1989 के  वसंत उत्सव में परमपूज्य गुरुदेव ने  कहा:

जो लोग मेरे शरीर के बाद मुझे नहीं देखना चाहते हैं, वे मुझे मेरे  विचारों में, मेरे साहित्य में  देखेंगे। मेरे विचार ही  मेरी मूल शक्ति है। तब भी कई लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था कि गुरुदेव नश्वर शरीर छोड़ने के बारे में बता रहे हैं।

ईथर अवस्था  में प्रवेश करने की प्रक्रिया के बारे में गुरुदेव ने समझाया :

“अब इस जीवन का  एक नया अध्याय शुरू होता है। मैंने हड्डियों और मांस के इस शरीर से उतना ही काम निकाला है जितनी मुझे आवश्यकता थी । अब मुझे और भी  महत्वपूर्ण कार्य करने हैं। ये केवल ईथर  अवस्था के  द्वारा ही  किया जा सकता है । आपको विश्वास होना चाहिए कि इस दशक के अंत तक मैं दुर्लभ ईथर शरीर के साथ काम करूंगा और आप उन कार्यों के परिणामों को देख और अनुभव भी कर पाएंगे।

एक और वर्ष बीत गया और वर्ष 1990 का वसंत आ गया।  गुरुदेव ने कहा कि:

“अगले दस वर्ष युगसंधि की बेला है दो शताब्दियों की संधि की बेला । आप इस नश्वर शरीर को देख सकेंगें  या नहीं  लेकिन विशेष कार्यों के लिए नियुक्त यह सैनिक पूरी जागरूकता के साथ अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करेगा।”

इन शब्दों के बाद भी, भक्त यह विश्वास नहीं कर रहे थे कि गुरुदेव  अपना नश्वर  फ्रेम उतार कर फेंक  देंगे। 

30 अप्रैल, 1990: 

30 अप्रैल, 1990 को परमपूज्य गुरुदेव ने अपने शिष्यों की एक विशेष बैठक बुलाई और भारत के छह बड़े शहरों में छह बड़े ब्रह्मयज्ञों की व्यवस्था करने के लिए कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए। उन्होंने उन्हें   100,000 दीपक प्रज्वलित करने का निर्देश दिया।       

फिर एक दिन गुरुदेव ने यह संदेश लिखा, 

“युग के परिवर्तन को ठीक से तय किया गया है। वर्ष 2000 तक, यह दो युगों के संगम की सुबह होगी। विचारशील, दूरदर्शी लोगों को इस अवधि के दौरान आक्रामकता और उत्साह के साथ काम करना चाहिए। उन्हें आगे  की पंक्ति में खड़े होने का साहस प्रदर्शित करना चाहिए। उन्हें लोगों को व्यक्तिगत रूप से और लोगों के उद्धार के लिए साहस देने के लिए दिल और आत्मा से काम करना चाहिए। “

एक दिन गुरुदेव ने कहा, 

“जब मैं इस शरीर को छोड़ता हूं तो मुझसे इस में लौटने की अपेक्षा न करें। और न ही आपको  इस शरीर से कोई लगाव होना चाहिए। गायत्री-तीर्थ के प्रवेश द्वार पर इस शरीर का दाह संस्कार किया जाना चाहिए। शांतिकुंज में। दाह-संस्कार के बाद मेरे  अवशेषों को पास ही  स्थित प्रखर  प्रज्ञा पर रखा जाना चाहिए। पास का स्थान माताजी के लिए रखा गया है। वह आपके बीच रहेंगीं  और मेरे बाद वह स्वयं आपका मार्गदर्शन करेंगीं”। 

उन्होंने अंतिम संस्कार के संबंध में अन्य दिशा-निर्देश भी दिए। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि उनके शरीर को भक्तों द्वारा दर्शन के लिए नहीं रखा जाना चाहिए लेकिन दाह संस्कार गायत्री जयंती वाले दिन ही  तुरंत किया जाए जो 2 जून 1990 को आता है।

उपरोक्त तिथि से आठ दिन पहले, गुरुदेव ने भोजन और पानी लेना छोड़ दिया, और अपने अनुयायियों से कहा कि समय आ गया है कि वे ईथर अवस्था  में प्रवेश करें और दादा गुरु सर्वेश्वरानंद के साथ विलय करें, उनकी ही तरह  ईथर शक्तियों के माध्यम से  ईथर अवस्था  में काम करें। 

2 जून 1990 का ऐतिहासिक दिन आ गया। सूरज उगने वाला था। 

गुरुदेव ने हाथ जोड़कर कहा,

“हे दिव्य माता, मैं आपके दिव्य चरण में सिर झुकाता हूं” और नश्वर शरीर  को छोड़ दिया।”

उस समय माताजी लगभग 7000 कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रही थीं। जिस क्षण गुरुदेव ने अपना नश्वर शरीर छोड़ा, माताजी ने अपनी  आंखों से आंसू पोंछे और  अपना व्याख्यान जारी रखा। व्याख्यान के बाद, उन्होंने भक्तों को सूचित किया कि गुरुदेव ने अपना शरीर त्याग दिया है और अब हमारे बीच व्याप्त है और हमें उन्हें अपने अंतःकरण में  प्रकट होने देना चाहिए और हमें उनकी कृपा के योग्य बनाना चाहिए।

तो मित्रो  ऐसे होते हैं दिव्य पुरष।  हमने देखा कैसे  उन्होने  अपनी इच्छा से  अपने महाप्रयाण का दिन और समय न केवल  नियत किया बल्कि परिजनों को पांच वर्ष तक संकेत भी देते रहे। वंदनीय माता जी ने कैसे संयम से सब कुछ श और संभाला। 

 ” सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।  

जय गुरुदेव 

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित 

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