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“आत्मा और परमात्मा के समन्वय” का दूसरा और अंतिम भाग

14 मार्च 2021 का ज्ञानप्रसाद

आज का लेख “आत्मा और परमात्मा के समन्वय” का दूसरा और अंतिम भाग है। दोनों लेखों को हमने अधिक से अधिक सरल बनाने का प्रयास किया है ,कितना सफल हुए हैं यह तो आप सब ही बतायेगें लेकिन एक बात पूर्णतया स्पष्ट है क़ि यह टॉपिक बहुत ही पेचीदा और confusing है। हम भी इसको लिखते-लिखते कई बार इधर-उधर भटकता अनुभव कर रहे थे परन्तु फिर अपनेआप को झकझोर कर गुरुदेव के श्रीचरणों में समर्पित कर गए। आप को भी यही निवेदन कर रहे हैं कि आप इस लेख को धीरे -धीरे संयम से ,चिंतन करते हुए अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। हमारा विश्वास है आपको जीवन के कई पेचीदा प्रश्नों के उत्तर मिलने की सम्भावना है।
एक -एक sub-head को ध्यान से पढें और कमेंट करके बताएं।


चिंतन में लाएँ भगवान

मित्रो! जब आत्मा और परमात्मा का मिलन शुरू होता है तो उसमें स्पार्क पैदा होता है ,आरम्भ होता है। स्पार्क किसे कहते हैं? स्पार्क कहते हैं-आदर्शों को। आदमी के व्यक्तिगत जीवन में आदर्श, आदर्शों की हूक, आदर्शों की उमंग, आदर्शों की ललक इस कदर छूटती है कि आदमी अपने आप को बेकाबू अनुभव करता है। सारे-के-सारे बंधन एक ओर और आदर्शों की हूक एक ओर, आदर्शों की ललक एक ओर, आदर्शों के प्रति निष्ठा एक ओर और आदर्शों के प्रति कठोरता एक ओर। ये सारी-की-सारी चीजें स्पार्क के रूप में चली आती हैं। तो आप भगवान को क्या कहते हैं? चलिए मैं भगवान को आदर्शों और उत्कृष्टताओं का समुच्चय कह सकता हूँ। चिंतन में जब भगवान आते हैं तो हमारे भीतर उत्कृष्टता ले आते है। उत्कृष्टता का अर्थ है व्यवहार में श्रेष्ठता, उत्तमता, excellence। जब भगवान हमारे अन्तःकरण में आते हैं तो इस प्रकार परिवर्तन होने आरम्भ होते हैं। इन परिवर्तनों को अपने जीवन में, व्यवहार में लाना इतना कठिन भी नहीं है। जब परमात्मा हमारे अंतःकरण में वास् करने लगते हैं तो आदर्श कर्तृत्व के रूप में दिखाई पड़ता है। आप पूछेंगें परमात्मा आँख से दिखाई देने लगते हैं ,आँख से दिखाई नहीं देते बेटे। आँख से न तो किसी ने परमात्मा को देखा हैऔर न हीं हम आँख से परमात्मा के दर्शन करना चाहते हैं। आप बदरीनाथ जाते हैं ,इतनी कठिन यात्रा करके आप परमात्मा को देखने जाते हैं ।आप कहते भी ऐसे ही हैं ,” परमात्मा के दर्शन करने जा रहे हैं ” तो क्या आपको परमात्मा के दर्शन होते हैं ,नहीं न ,केवल पत्थर की मूर्ति। वहां आप परमात्मा को देखते हैं य परमात्मा की मूर्ति को। आँख से भगवान नहीं दिखता। आँख तो मिट्टी की, पत्थर की बनी है और यह केवल मिट्टी और पत्थर को ही दिखा सकती है। हमारा जो यह चेतन ( आत्मा ) है, चेतन को दिखा सकता है। चेतन जड़ के द्वारा नहीं देखा जा सकता। आप हमारे प्राण को देखिए। किससे देखेंगे ?माइक्रोस्कोप से। भगवान को आँखों से नहीं देखा जा सकता। आँख से किसी ने नहीं देखा। मित्रो! भगवान को आँख से देखने की उम्मीदें करना गलत है। तो भगवान को कैसे देखा जा सकता है ? बेटे! भावनाओं के द्वारा देखा जा सकता है, अनुभव किया जा सकता है। यह केवल फील ही करने वाली अनुभूति है। बेटे! जब हम दोनों को मिला देते हैं तो योग हो जाता है अर्थात जब हम अपनेआप को परमात्मा के साथ मिला देते हैं, आदर्शों के साथ मिला देते हैं, तब हम योगी हो जाते हैं। कभी प्राइमरी क्लासों में गणित की पुस्तकों में ऐसे प्रश्न अवश्य आए होंगें, ” दो और दो का योग (जोड़ ) कितना होता है ” सबका आदर करना हमारा परम् धर्म और कर्तव्य है लेकिन आज का योग हमें क्या सिखा रहा है सबके समक्ष है। योग का तात्पर्य है अपनी विचारणा को आदर्शवादिता के साथ मिला देना और तप का अर्थ है अपने बहिरंग जीवन को आदर्शवादिता के सिद्धांतों के साथ तपा देना और घुला देना।

यह तप और योग है। योग और तप में क्या अंतर है? अगर हम योग और तप की व्यावहारिक जीवन में व्याख्या करने लगें तो हम इसे सभ्यता और संस्कृति कह सकते हैं। अब आप सोशियोलॉजी ( sociology ) पर, समाज विज्ञान पर आ जाइए, सिविकसेंस (civic sense) पर आ जाइए। यह तो कठिन शब्द हैं ,थोड़े टेक्निकल से हैं

तो चलिए इसको व्यावहारिक भाषा में ,बोलचाल की भाषा में समझने का प्रयास करते हैं ।

सभ्यता और संस्कृति

तप का अर्थ है सभ्यताऔर सभ्यता का अर्थ है कि हमको समाज के प्रति और दूसरों के प्रति अपने कर्तव्यों का किस तरीके से निर्वाह करना चाहिए । सिविकसेंस इसी में आता है। शिष्टाचार इसी में आता है। कानून का पालन इसी में आता है। लॉ एंड आर्डर इसी में आता है। डिसिप्लिन इसी में आता है। ये सारे-के-सारे कायदे इसी में आते हैं जिसको हम तप कहते हैं। मित्रो सभ्यता का अर्थ है कि हमें चरित्रनिष्ठ और समाजनिष्ठ होना चाहिए। श्रेष्ठ और शालीन होना चाहिए। उत्कृष्ट और भला आदमी होना चाहिए। यह सारे तप के हिस्से हैं । तप का अभ्यास करने के लिए कई तरह के काम करने पड़ते हैं जैसे कि शरीर की कलाइयाँ मजबूत करने के लिए कई बार अखाड़े में जाना पड़ता है। कई बार दंड पेलने पड़ते हैं। कई बार दंड-बैठक करनी पड़ती है। उसी तरीके से अपने आपको सभ्य बनाने के लिए हमको कई तरह की कसरत करनी पड़ती है। तप करने के लिए कौन सी कसरतें करनी पड़ती हैं ? तप वाली कसरतों को तपश्चर्या कहते हैं। इन कसरतों का उदेश्य अपने व्यावहारिक जीवन में शालीनता लाने का है। सजनता का जीवन जिएँ, शराफत का जीवन जिएँ, अच्छाई का जीवन जिएँ। जिसका अभ्यास करने के लिए जो हमारे कुसंस्कार हैं, उनको निकालने के लिए, मारने के लिए, तोड़ने के लिए जो खास किस्म के व्यायाम कराए जाते हैं, उनको तप कहते हैं। व्यायाम करने का फायदा है कि हमारी कलाइयाँ, हमारी मांसपेशियाँ और हमारा नर्वस सिस्टम मजबूत हो जाता है। तप हमारे कुसंस्कारों को दबाने में और सुसंस्कारों को जगाने में, सुसंस्कारों को उभारने में काम आता है। तप हमारे बहिरंग जीवन को स्मार्ट बनाता है। इन सारी-की-सारी प्रक्रियाओं को साधने के लिए साधना करते हैं। अपने आप को साध लेने का नाम साधना है। अपने बहिरंग जीवन को साध लेने का नाम तपश्चर्या है, तितिक्षा है। इसको आप दूसरे शब्दों में कहना चाहें, तो सभ्यता कह सकते हैं।

योग किसे कहते हैं ?

संस्कृति क्या होती है ? संस्कृति कहते हैं-कल्चर को। कल्चर क्या होता है? कल्चर का अर्थ है हमारी विचारणाएँ, हमारी आस्थाएं , हमारी मान्यताएँ, हमारी इच्छाएँ और आकांक्षाएँ। संस्कृति हमारी चेतना का विषय है और सभ्यता हमारे शरीर का विषय है, हमारे व्यवहार का विषय है। अगर सभ्यता और संस्कृति दोनों को मिला दें तो आप यह मान सकते हैं कि योग से क्या मतलब होना चाहिए? तप से क्या मतलब होना चाहिए? योग और तप बड़े कठिन शब्द हैं । दो उद्देश्यों को पूरा करने के लिए, हमारी जीवात्मा को संस्कारवान बनाने के लिए कई तरह की कसरतें करनी पड़ती हैं। मित्रो! वे कसरतें जो हमको संस्कारवान बनाने का अर्थात हमारी चेतना का स्तर ऊँचा उठाने का जो उद्देश्य है उसको पूरा करती है। इन सबको हम योगाभ्यास कह सकते हैं। हम जो भी कसरत करेंगे, जो भी व्यायाम इस काम को पूरा करेंगे, उनको हम योगाभ्यास कह सकते हैं। वे हमारे बहिरंग जीवन को, हमारे व्यावहारिक जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं। इन सब चीजों को हम तप कह सकते हैं। तप और योग का उद्देश्य यही है। योग और तप हमारी साधना की दो दिशाएँ हैं।

हमारे बहिरंग जीवन को समर्थ बनाने के लिए तप और हमारे अंतरंग जीवन को समर्थ बनाने के लिए योग है।

योग की भी कुछ क्रियाएँ हैं। तप की भी कुछ क्रियाएँ हैं। इन क्रियाओं के साथ-साथ विचारणा जुड़ी हुई है। विचारणा अगर तप के साथ न जुड़ी हो तो भी वह बेकार है। विचारणाएँ, आस्थाएँ, विश्वास और मान्यताएँ अगर आपकी योगाभ्यास क्रियाओं के साथ नहीं जुड़ी होंगी तो भी बेकार हैं, निष्प्राण हैं, जानरहित हैं। निर्जीव, जीवनरहित हैं। केवल उनकी शक्ल है। योग की शक्ल है, तप की शक्ल है, लेकिन उनके अंदर प्राण नहीं है। मित्रो! मैं चाहता था कि आपका योगाभ्यास प्राणवान बने, आपका तप प्राणवान बने। ऐसा प्राणवान बने जैसे कि ऋषियों ने योग का महत्त्व बताया है, तप का महत्त्व बताया है। आप ठीक उसी क्रिया के आधार पर करते हैं तो वैसे ही लाभ उठाकर जाते और धन्य हो जाते और आपका शिविर धन्य हो जाता। आपका आगमन धन्य हो जाता और आपको बुलाना धन्य हो जाता। मैं चाहता हूँ किआगे से इस ब्रह्मवर्चस की उपासना जो योग और तप दोनों के ऊपर टिकी हुई हैआपके लिए लाभकारी हो

तो मित्रो हमने आध्यात्मिक जीवन के लिए योग और तप की बात बताई। सांसारिक जीवन के लिए श्रम की बात बताई, आलस्य और प्रमाद को छोड़कर श्रम की बात बताई, व्यवस्थित जीवन जीने की बात बताई। बस यही है आध्यात्मिक जीवन की भूमिका जिसे हमें अपनी दिनचर्या में उतारना है।

इति श्री

आपको इधर ही छोड़ने की आज्ञा लेते हैं और आप प्रतीक्षा कीजिये एक और नवीन लेख की।

जय गुरुदेव
परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्रीचरणों में समर्पित ।

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