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क्या हम अपने परमपिता भगवान को निराश कर रहे हैं ? पार्ट 2

 

11 मार्च  2021  का ज्ञानप्रसाद – कल वाले लेख का दूसरा एवं अंतिम भाग

आज का लेख 6  पन्नों का है ,  2  पन्ने अधिक हैं  लेकिन ध्यान से ,सतर्क होकर पढ़ने  की आवश्यकता है।  अत्यंत परिश्रम से लिखे हुए इस लेख से बहुत महत्वपूर्ण मार्गदर्शन मिलने की संभावना  है। 

भगवान का सहारा लीजिए

मित्रो! एक और सहारा है, अगर आप उसे पकड़ लेंगे, तो आपका जीवन कुछ बन सकता है। वह सहारा भगवान का है। आप कहेंगे कि हम तो रोज शंकरजी के मंदिर जाते हैं, पूजा-पाठ करते हैं, परन्तु शंकरजी हमारी कोई मदद नहीं करते हैं। सावन के महीने में हमने बेलपत्र चढ़ाया, पानी का मटका लगाया, परन्तु भगवान शंकर ने कोई मदद नहीं की। मित्रो, शंकर भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए आपको बड़ा कदम उठाना होगा।

मित्रो! बड़े कार्यों के लिए बड़ा कदम, जोखिम भरा कदम उठाना पड़ता है, तब लाभ प्राप्त होता है। शंकर जी ने  रावण को  वरदान दिया था, भस्मासुर को वरदान दिया था  परन्तु उनके व्यवहार एवं कर्म करने के ढंग के कारण रावण एवं भस्मासुर को मरना पड़ा। अगर आपकी विचारधारा ठीक होगी और आप भगवान का अनुदान-वरदान प्राप्त करके इस संसार का कुछ अच्छा करना चाहते हैं तो आपको भगवान का हर प्रकार का सहयोग मिलेगा। बल एवं धन के आधार पर मनुष्य बलवान नहीं हो सकता है। हमको अपने विकास के लिए मजबूत आधार ढूँढ़ना होगा। वह मजबूत आधार केवल भगवान है। भगवान का सहारा लेने के बाद हमारे पास क्या कमी रहेगी? हमें उनका प्यार-अनुदान प्राप्त करके अपना आध्यात्मिक विकास करने का प्रयास करना चाहिए। भगवान के पास अनन्त सुख के भंडार भरे पड़े हैं। 

संबंध हो जाए तो 

गुरुनानक को उनके पिता ने नाराज होकर बीस रुपये व्यापार करने को दिये और कहा जा  व्यापार द्वारा अपना जीवन निर्वाह कर । गुरु नानक देव संत थे उन्होंने बीस रुपये की हींग खरीदी और उस जगह आये जहाँ पर संतों का एक भंडारा चल रहा था। उस समय दाल बन रही थी। उसमें हींग का छौंक लगा दिया तथा सभी के आगे दाल परोस दी। सभी उपस्थित लोगों ने प्रेम से भोजन किया तथा प्रसन्न हुए। प्रात:काल जब नानक घर पहुंचे तो उनके पिता काफी नाराज थे। उन्होंने पूछा कि पैसों का क्या किया? नानक जी ने सारी बात बता दी तथा  कहा  पिताजी हमने ऐसा व्यापार किया है जो भविष्य में हजार गुना होकर वापस आएगा । आज वास्तव में गुरु नानक साहब की याद में अमृतसर में स्वर्ण मंदिर विद्यमान है  जो करोड़ों-अरबों रुपयों  का है। मित्रों, यह भगवान के साथ व्यापार करने का लाभ है। यह आध्यात्मिकता का मूल्य है। भगवान से सम्बन्ध बनाने के बाद मनुष्य  कितना मूल्यवान हो जाता है, यह विचार करने का विषय है। वह बहुत कीमती हो जाता है। नानक, विवेकानंद, मोहम्मद साहब सब  महान हो गये। 

अगर एक औरत की शादी एक सेठ जी के साथ होती है तथा दुर्भाग्य से उसके पति का देहान्त हो जाता है, तो दूसरे दिन से ही वह सेठानी, उसकी सारी जमीन-जायदाद की मालकिन बन जाती है। यही होता है भक्त का भगवान से सम्बन्ध जोड़ने पर। डॉक्टर की पत्नी डॉक्टरनी, वकील की पत्नी वकीलनी, पंडित की पत्नी पंडितानी बन जाती है, चाहे वह पाँचवीं क्लास ही क्यों न पास हो। जिस प्रकार धर्मपत्नी बनकर आत्मा से सम्बन्ध जोड़ने पर वह पति की सारी संपत्ति की मालकिन बन जाती है। ठीक  उसी प्रकार भगवान से सम्बन्ध जोड़ने पर होता है। आपको यहाँ हमने इसलिए बुलाया है कि आपका ब्याह भगवान से करा दें। इसके लिए आपसे  हमने अनुष्ठान प्रारम्भ कराया है। यह अनुष्ठान आपके विवाह के समय हल्दी लगाने तथा बाल सँवारने, वस्त्र आदि से सजाने के बराबर है। 

हम आपकी आत्मा का परमात्मा से मिलन कराना चाहते हैं।

यह बाजीगरी है। हम आपका संबंध भगवान से कराना चाहते हैं ताकि आपका सम्बन्ध मालदार आदमी से हो जाये। मालदार आदमी के साथ सम्बन्ध बना लेने से मनुष्य  को हर समय फायदा ही रहता है।

हम आपकी नौकरी  भगवान से लगाना चाहते हैं जिसके पास आपको सारी चीजें प्राप्त होती रहेंगी। हम चाहते हैं कि आपको भगवान की गोद में रख दें। गोद में रहने वाला व्यक्ति घाटे में नहीं रहता है। बाप कमाता रहता है। बेटा खाता रहता है। बेटे, हम भी आपको बाँटते रहते हैं, आशीर्वाद देते रहते हैं कि आपका कष्ट दूर हो जाये। आपकी मनोकामना पूर्ण हो जाये। आज आप कमजोर हैं हो सकता है कि कल आप मजबूत हो जाएं तथा भगवान का काम कर सकें। आप यह सोचते हैं कि दो साल के बाद गुरुजी चले जाएंगे तथा हमें तपोभूमि या फिर हरिद्वार जाने से क्या मिलेगा? आप इधर-उधर बगलें झाँकने लगते हैं तथा साईं बाबा के पास चले जाते हैं। वहां जाने के बाद हनुमान जी के पास, करौली वाली माँ के पास जाते हैं, इधर-उधर भटकते रहते हैं। जिन्दगी भर आप खाली हाथ रहते हैं। मित्रो, आप  इधर-उधर मत  भटकते रहें, केवल भगवान का पल्ला ही  पकड़ लीजिए और  अपने  जीवन की नैया को  को पार लगा  लीजिए।

मित्रो, जब किसी की  जान पहचान  किसी एम.पी., एम.एल.ए. या मिनिस्टर से होती है तो उसकी  मुसीबतें दूर हो जाती हैं। आज भी हम अपना काम निकलवाने के लिए बड़े-बड़े व्यक्तियों से सम्बन्ध बनाते रहते हैं ,न जाने कौन से हथकंडे अपनाते रहते हैं। अगर हमारा सम्बन्ध केवल भगवान से  ही हो  जाये तो फिर कहना ही क्या ?  मध्यप्रदेश के एक  पूर्व मंत्री हमारे पास आये और कहने लगे  गुरुजी हमें एक दिन के लिए ही मुख्यमंत्री बना दीजिए। वे दो ढाई घंटे तक हमारे पास बैठे रहे। भगवान की कृपा से तुक्का लग गया और वे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गये। 

मित्रो, यह क्या बात है? हमारी जान-पहचान किससे है ? हमारी जान-पहचान भगवान से है।

जान पहचान का चमत्कार 

आदमी की पहचान बड़े आदमी से होने पर काम बन जाता है। एक बार ऐसा ही हुआ  एक पंडित जी थे उन्होंने  एक दुकानदार के पास पाँच सौ रुपये रख दिये। उन्होंने सोचा कि जब बच्ची की शादी होगी तो पैसा ले लेंगे। थोड़े दिनों के बाद जब बच्ची सयानी हो गयी तो पंडित जी उस दुकानदार के पास पैसे लेने  गए। लेकिन दुकानदार ने नकार दिया और कहने लगा आपने  हमें कोई  पैसा नहीं  दिया। उसने पंडित जी से कहा कि क्या हमने कुछ लिखकर दिया है। पंडित जी दुकानदार की इस हरकत से परेशान हो गये और चिंता में डूब गये। थोड़े दिन के बाद उन्हें याद आया कि क्यों न राजा से इस बारे में शिकायत कर दें ताकि वे कुछ फैसला कर दें एवं मेरा पैसा कन्या के विवाह के लिए मिल जाये। वे राजा के पास पहुँचे तथा अपनी फरियाद सुनाई। राजा ने कहा “कल हमारी सवारी निकलेगी, तुम उस लालाजी की दुकान के पास खड़े रहना।” राजा की सवारी निकली। सभी लोगों ने फूल मालाएँ पहनाईं, किसी ने आरती उतारी। पंडित जी लालाजी की दुकान के पास खड़े थे। राजा ने कहा  “गुरुजी आप यहाँ कैसे, आप तो हमारे गुरु हैं, आइये इस बग्घी में बैठ जाइये।” लालाजी यह सब देख रहे थे। उन्होंने आरती उतारी, सवारी आगे बढ़ गयी। थोड़ी दूर चलने के बाद राजा ने पंडित जी को उतार दिया और कहा “पंडित जी हमने आपका काम कर दिया। अब आगे आपका भाग्य।” उधर लालाजी यह सब देखकर हैरान थे कि पंडित जी की तो राजा से अच्छी साँठ-गाँठ है। कहीं वे हमारा कबाड़ा न करा दें। लालाजी ने अपने मुनीम को पंडित जी को ढूंढ़कर लाने को कहा। पंडित जी एक पेड़ के नीचे बैठकर कुछ विचार कर रहे थे। मुनीम जी आदर के साथ उन्हें अपने साथ ले गये। लालाजी ने प्रणाम किया और बोले “पंडितजी हमने काफी श्रम किया तथा पुराने खाते को देखा तो पाया कि हमारे खाते में आपका पाँच सौ रुपये जमा है। पंडित जी दस साल में  ब्याज के साथ आपके  बारह हजार रुपये हो गये। पंडित जी आपकी बेटी हमारी बेटी है। अत: एक हजार रुपये आप हमारी तरफ से ले जाइये तथा उसे लड़की की शादी में लगा देना। इस प्रकार लालाजी ने पंडित जी को तेरह हजार रुपये देकर प्रेम के साथ विदा किया।”

मित्रो, हम बतला रहे थे कि आप भी अगर इस दुनिया के राजा, जिसका नाम भगवान है, से  अपना संबंध  जोड़ लें तो आपकी कोई समस्या, कठिनाई नहीं रहेगी। आपको कोई तंग भी नहीं करेगा। आपके साथ कोई अन्याय भी नहीं कर सकता। इन शक्तियों को आप भी भगवान के पास बैठकर पा सकते हैं। अपनेआप को महान बना सकते हैं। अगर आप अपने आप को तैयार कर लें, तो सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं तथा संत, महामानव स्तर तक पहुँच सकते हैं।

अनुकम्पा की अनुभूति 

मित्रो, सूर्य की रोशनी इस धरती पर पड़ती तो है, परन्तु है यह हमारी आँखों का चमत्कार। अगर आँखें न रहतीं, तो हम यह विभिन्न तरह के रंग कैसे देखते तथा आनन्द अनुभव कैसे करते? आँख का सूर्य अगर ठीक हो तो यह आपको रामायण, भागवत पढ़ा सकता है। आपको  बगीचों का आनन्द  मिल सकता है। अगर आपको बुखार आ जाये तथा तबियत खराब हो जाए तो आप ठीक से  खा नहीं  सकते हैं। यह बात आपको सोचनी चाहिए। एक महिला थी। उसके मरने का समय आ गया। उसे पकौड़ी, नीबू का अचार, रबड़ी दी गयी बहुत पसंद था। लेकिन अब जब उसको यह दिया गया तो  उसका मुँह कड़वा था उसे सब चीजें मिट्टी के समान लगीं। 

अगर आपकी अक्ल खराब हो जाए, तो इस दुनिया की सारी सम्पत्ति आपको किसी काम की नहीं दिखायी पड़ेगी। यह क्या है? जिसके कारण आप दुनिया के सारे आनन्द ले रहे हैं? चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ राजकुमार की तरह रह रहे हैं। यह है भगवान की अनुकम्पा, भगवान की कृपा, जो निरंतर आपके ऊपर बरस रही है। हमें यह महसूस करना चाहिए कि भगवान हमारे सारे अंग-अंग में, सारे रोम-रोम में समायें हुए हैं  तथा उसकी शक्ति हमारे अन्दर समायी हुई है। वह हमें महान बना रहे हैं।  जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ा रहे हैं । हमारा कायाकल्प कर रहे हैं । 

साथियो! हमारी काया के भीतर ऐसे सेल्स (cells)  भरे पड़े हैं, जिसमें हीरे-मोती, सोना-जवाहरात भरे पड़े हैं। अगर आप उसे जगा लें तो मालामाल हो सकते हैं। आप पारस, कल्पवृक्ष हो सकते हैं। आपका सम्पर्क जिस किसी से होगा उसको आप धन्य करते चले जायेंगे। आपका विकास होता चला जाएगा। भगवान को हर प्राणी प्यारा है। वह सबका बराबर ध्यान रखते हैं ।भगवान अपने हर अंग को सुन्दर और सुडौल देखना चाहते हैं । भगवान के ऊपर पक्षपात का दोष नहीं लगाया जा सकता है। वह सबको बराबर देते हैं  परन्तु मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव, श्रम, आलस्य के कारण पिछड़ जाता है। अगर आपकी पात्रता हो, तो आप सारी चीजें प्राप्त कर सकते हैं। आप अपनी प्रगति के लिए न जाने कहाँ-कहाँ घूमते हैं, किस-किस को गुरु बनाते फिरते हैं। हम भी 13  से  15  वर्ष की उम्र तक इसी चक्कर में पड़े रहे तथा तमाशा देखते रहे। हमने भी बहुत पैसा फेंका है मात्र यह बाजीगरी देखने के लिए।

नकली व असली गुरु

मित्रो! इन दो सालों में हमने हिन्दुस्तान के किसी भी सिद्ध पुरुष, महात्मा, योगी को नहीं छोड़ा जो आज बाजीगर की तरह नाम बताते हैं तथा सोना बनाते हैं। अगर आप चाहें, तो हम उनका नाम आपको बता सकते हैं। एक बार हमने एक सिद्ध पुरुष की बात सुनी तथा उसके लिए हमने बहुत बड़ा जोखिम उठाया, प्राणों की बाजी लगा दी। वो सिद्ध पुरुष घने जंगल की एक गुफा में रहते थे। लोगों ने बताया कि वे सबका नाम-पता तथा भूत-भविष्य, वर्तमान सब कुछ बता देते हैं। हम पहुँच गये उनके पास। बाबा ने सब बताया। हमें दाल में कुछ काला नजर आया। हम वहीं रुक गए तथा पैर में मोच का बहाना बना दिया। यह बात उनके चेले को बता दी और एक कोने में पड़े रहे। एक दिन एक अध्यापक आया। हमने उसे बता दिया कि यह बेकार आदमी है। इसके चेले धंधा करते हैं। हमने अध्यापक से कहा कि आप सब नाम-पते आदि गलत-सलत बताना। उसने चेलों से अपना नाम-पता सब गलत बतला दिया। दूसरे दिन महात्माजी मिले, तो उन्होंने भी वैसा ही बतलाया। अध्यापक तथा हम दोनों यह सब देखकर मुस्कुरा पड़े। यह उन चेलों ने देख लिया था। हमने किसी प्रकार धोती-कुरता समेटा और तोलिया लपेटकर दीर्घशंका का बहाना बनाकर वहाँ से भाग लिये। जाना था पूरब की ओर लेकिन  पश्चिम की ओर निकल गये। किसी तरह  प्राण बचाकर तीन दिन तक जंगल में भटकने के बाद अपने स्थान पर पहुंचे।

साथियो! हमने उस गुरु को भी देखा है, जो पंद्रह वर्ष की उम्र पूरी होने पर वसंत पंचमी के दिन हमारे पास आया था। उसने हमारे तीन जन्मों का दृश्य हमें दिखाया और हमें गायत्री उपासना में लगाया, जिसे हमने चौबीस साल तक विधि विधान पूर्वक किया। हमने अपने गुरुदेव से एक प्रश्न पूछा कि पूज्यवर हमारी एक शंका है। आप बतलायें कि गुरुओं की खोज में लोग छुट्टी लेते हैं, मेडिकल लीव लेते हैं, घर-बार छोड़ते हैं, तब जाकर शायद किसी कोने में कोई सच्चा गुरु मिलता है परन्तु आप तो स्वयं हमारे पास चले आये, यह क्या बात है? 

पूज्यवर ने बताया “बेटे! धरती क्या बादलों के पास जाती है या बादल स्वयं आते हैं धरती पर? हमने कहा बादल स्वयं आते हैं एवं धरती पर बरस जाते हैं। बादलों को चलना पड़ता है। बादल स्वयं बरसते रहते हैं। उन्होंने कहा कि आकाश में बादलों की तरह सिद्ध पुरुषों की भी कमी नहीं है जो बादलों की तरह बरसने के लिए सुपात्र की खोज करते रहते हैं। दिव्य आत्माओं की वे तलाश करते रहते हैं।”

मित्रो! आपने देखा होगा कि जब इस धरती पर मरी हुई लाश, कुत्ते आदि पड़े रहते हैं, तो गीध, कौवे, चील स्वयं आ जाते हैं तथा उसे नोच-नोच कर खा जाते हैं। उसी प्रकार भगवान्, दिव्य पुरुष, संत भी ऊपर से तलाश करते हैं कि इस धरती पर कौन दिव्य पुरुष है  जिसे भगवान गुरु, संत की कृपा, वरदान, आशीर्वाद की आवश्यकता है और वह वहाँ पर पहुँच कर सारा काम करते हैं। वे देखते हैं कि कौन दया के पात्र हैं। हम बद्रीनाथ, रामेश्वर जाते हैं, किन्तु वे भी हमारे पास आते हैं एवं हमारी परख करके चले जाते हैं। केवट की भक्ति, श्रद्धा महान थी। उसे देखकर भगवान राम स्वयं उसके पास आये और दर्शन दिया। केवट रामचंद्र जी के पास नहीं गया था। शबरी के पास रामचंद्र स्वयं आये थे। शबरी नहीं गई थी। श्रीकृष्ण गोपियों के पास गये थे तथा उन्हें प्यार दिया था, गोपियाँ नहीं गई थी। मित्रो! उसी प्रकार पात्रता देखकर गुरु शिष्य के पास आता है तथा उसे धन्य कर जाता है। अगर वास्तव में पात्रता हो, तो ऋद्धि-सिद्धियाँ पाई जा सकती हैं तथा निहाल हुआ जा सकता है। पात्रता ही है महान् तत्त्व। भगवान के यहाँ अनंत वैभव, कृपा, अनुदान भरा पड़ा है। वह केवल ऐसे आदमी को मिलता है, जिनकी पात्रता है। भगवान आते हैं तो मनुष्य के सोचने का, विचार करने का, कार्य करने का ढंग बदल जाता है। उसकी अवाज बदल जाती है। उसे सारे लोगों के प्रति श्रद्धा-निष्ठा हो जाती है। वह दूसरों को प्यार देता है, दूसरों के दुखों को देखकर द्रवित होता है। भगवान की खुशामद करने से कोई काम नहीं चलेगा। पात्रता ही महान तत्व है। जिसमें पात्रता होती है सरकार उसे फिर बुला लेती है। उसको काम देती है। प्रेम महाविद्यालय के प्रिंसीपल ९० वर्ष के होने को आये, परन्तु गवर्नमेन्ट ने उन्हें नहीं छोड़ा। हर साल उन्हें नया पद मिल जाता।

मित्रो! प्रतिभाओं की माँग, योग्यता की माँग, गुणों की माँग हर जगह होती है। हमारा भी यही उद्देश्य है कि आप आगे बढ़े। हम चाहते हैं कि आपके अंदर भी वे चीजें आ जाएँ, भगवान आ जाएँ तथा आपका विकास हो जाये। इसीलिए हमने आपका ब्याह भगवान से कराने का निश्चय किया है। परन्तु मित्रो, अगर कन्या अस्वस्थ हो, बीमार हो, कमजोर हो, तो उसका विवाह अच्छे लड़के के साथ कैसे हो सकता है। उसी तरह आपकी पात्रता कमजोर हो, तो भगवान कैसे आपको अपनायेगें।  अगर राजकुमार से विवाह करना हो, तो लड़की भी ठीक होनी चाहिए। अगर आप कोढ़ी है, तो अच्छी लड़की आपको नहीं मिलेगी। आप अपाहिज हैं, तो भगवान के साथ विवाह नहीं कर सकते हैं। स्वस्थ, निरोग शरीर, स्वच्छ-पवित्र मन की आवश्यकता है। 

भगवान से विवाह

स्वच्छ मन, स्वस्थ-निरोग शरीर बनाने के लिए आपको यहाँ बुलाया गया है, ताकि आप भगवान से जुड़ सकें। आपको हम गायत्री महापुरश्चरण करा रहे हैं। हमें प्रसन्नता है कि आप बहुत प्रात:काल ही उठकर पूजा, ध्यान, जप, प्राणायाम में लग जाते हैं। यह सब देखकर हमें खुशी होती है। अगर आप इन करने वाले कर्मकाण्डों से कुछ प्रेरणा ले सकें तथा अपनी पात्रता का विकास कर सकें, अपनेआप  को जीवंत बना सकें, तो आप यकीन रखें कि आपका विवाह भगवान से हो जायेगा। तथा आपके पास सारी ऋद्धि-सिद्धियाँ, वैभव स्वतः ही आ जाएंगे, जिसके लिए आप रातोदिन परेशान रहते हैं। आपकी परेशानी दूर हो जायेगी। हम भगवान के पास होकर आये हैं। उनके पास ढेरों हीरे की तरह  बाल-बच्चे हैं, जिसे चाहे उठाकर ले आओ। मित्रो! यह विवाह किसी प्रकार घाटे का सौदा नहीं है। आप इसे निभाना। इसमें हमें प्रसन्नता होगी।

इति श्री 

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित 

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