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परमपूज्य गुरुदेव की 75 वीं वर्षगांठ की पूर्व वेला में दिया गया सन्देश पार्ट 2

8 मार्च 2021 का ज्ञानप्रसाद -गुरुवर  की धरोहर-  पार्ट 4 

आज का लेख 6  मार्च  के लेख का दूसरा और अंतिम भाग है।  लेख आरम्भ करने से पूर्व अगर हम यह कहें कि इस लेख में गुरुदेव को  हमसे कुछ अपेक्षाएं हैं तो गलत नहीं होगा। आखिर हो भी क्यों न , पिता अपने बच्चों से ही तो अपेक्षा रखता है।  हम सब एक ही विशाल परिवार के समर्पित सदस्य हैं जिसका नाम गुरुदेव ने स्वयं “गायत्री परिवार” रखा था। एक ऐसा परिवार जिसमें हर कोई सदस्य एक से बढ़कर एक करने को तत्पर है ,मर मिटने को तत्पर है। इसका  जीवंत स्वरूप हमने ,आप सब ने पिछले केवल एक -दो दिन में ही देख लिया। 

हमने तो केवल एक सन्देश ही दिया था कि  “ आओ  सब इकट्ठे होकर ,मिलजुल कर गुरुदेव के साहित्य को ,गुरुदेव के विचारों को घर तक पहुंचाएं” तो आप सबने इसका  रिस्पांस देख ही लिया। अधिकतर परिजनों ने ,सहकर्मियों ने  अपना बहुमूल्य समय निकाल कर अपनी अटूट निष्ठा का प्रमाण दिया और शेष परिजनों में प्रेरणा की चिंगारी ज्वलित कर दी।  सभी सहकर्मी इस अभूतपूर्व इंवॉल्वमेंट के लिए  बधाई  के पात्र हैं। धन्यवाद ,धन्यवाद एवं धन्यवाद।  

इतने अच्छे कमेंट देख कर एक बार तो इच्छा हुई थी कि सभी के स्क्रीनशॉट लेकर आप के समक्ष प्रस्तुत कर दिए जाएँ लेकिन उसमें अपनी flattery ( बढ़ाई ) की झलक दिखाई दे रही थी।  जो सहकर्मी हमारे बारे में इतना अच्छा लिख रहे हैं यह उनका बड़पन्न है लेकिन हम हम निस्वार्थ कार्य करने वाले पूज्यवर के निष्ठावान तुच्छ कार्यकर्ता हैं।  हम अपने आप को भाग्यशाली मानते हैं कि  गुरुदेव ने हमें इस कार्य के सक्षम समझा।  कौन कहता है कि “विचार क्रांति नहीं हुई है ,कौन कहता है युग परिवर्तन नहीं हुआ है” – आप जैसी पावन आत्माएं  इस तथ्य  का जीता-जाता प्रमाण हैं।  इतने अच्छे विचार ऐसे ही नहीं आ जाते। 

अपने विवेक के अनुसार आप द्वारा लिखे गए कमैंट्स की summary किसी लेख में प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। अगर सहकर्मियों को कोई दिक्कत न हो तो नाम भी सार्वजनिक किये जा सकते हैं।  इससे हमारे, आप सबके ऑनलाइन ज्ञानरथ को शक्ति मिलने की सम्भावना हो सकती है। 

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हीरों का हार पहनना है

 गुरुदेव कहते हैं हमें हीरों का हार पहनना है। हमारा मन है कि  हम भी कभी मालदार हो जाएँ। हमारा मन है कि हमारे पास दस हजार ऐसे व्यक्ति हों, जिनकी हम माला पहनें, जो हमारे साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलें। हमारी व उनकी आवाज एक  हो, एक दिशा हो तथा लगातार मिलकर लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें। उन्हें किसी बात का डर या भय न हो। इस वर्ष हमारी इच्छा दस हजार हीरे का हार पहनने की है। अगर कोई व्यक्ति मरता है या फांसी पर चढ़ाया जाता है, तो उसकी आखिरी  इच्छा पूछी जाती  है, जो पूरी की जाती है। जैसे किसी की इच्छा होती है कि हम मिठाई खाएं तथा सिगरेट पिएँ, तो उसकी इच्छा पूरी कर दी जाती है। हमारा भी इच्छा  है कि इस वर्ष हम दस हजार हीरों का हार पहनकर शहर में निकलें। 

जब हमारा जुलूस निकले, तो जनता यह समझे कि यह बहुत मालदार आदमी है, बहुत शानदार आदमी है, वजनदार आदमी है।

बेटे, आज मैं कबीर की तरह से पहेली कह बैठा। यहाँ दस हजार हीरों से मेरा मतलब है कि दस हजार ऐसे साथी हो जाएँ, जो नियमित रूप से हमारे कार्य अर्थात् मिशन के लिए समयदान दे सकें। पैसे की इच्छा नहीं है। इसका मतलब यह है कि हमारे हाथ-पाँव मजबूत हो जाएँ। हाथ-पाँव से हमारा मतलब आपसे है। आप हमारे चलते-फिरते हाड़-मांस के शक्तिपीठ बन जाएँ। हमने जो उम्मीद शक्तिपीठों से लगाई थी, वह आप स्वयं पूरा करना शुरू कर दें। हमें ज्ञानरथ के लिए नौकर नहीं चाहिए। हमें इसके लिए आपका समयदान चाहिए। विवेकानंद, गाँधी, विनोबा का काम स्वयं उन्होंने किया। इसी तरह यह काम आपको करने होंगे। आपके पास चौबीस घंटे हैं। आठ घंटे काम के लिए, सात घंटे सोने के लिए, पांच घंटे नित्य काम के लिए रख लें, तो भी आपके पास चार घंटे बचते हैं। आपको नियमित रूप से चार घंटे नित्य मिशन के लिए, समाज के लिए, भगवान् के लिए देना चाहिए।

आप हमारे हाथ पैर बनें, समय दान दें। समयदान आज की अनिवार्य आवश्यकता है। इसके लिए आपको समय निकालना ही चाहिए। मान लीजिए अगर आप बीमार हो जाएँ, तो आपका समय बचेगा कि नहीं? आप यह समझें कि आप चार घंटे नित्य बीमार हो जाते हैं। आप कहेंगे कि गुरुजी हम किस काम के लिए समय दें? जैसा कि मैंने कहा है कि जनजाग्रति के लिए और किसके लिए।  गुरुजी को पंखा झलने

के लिए, पैर दबाने के लिए- नहीं। बेटे हमें तो जनजागृति के लिए समय चाहिए। आप समय की मांग को पूरा कीजिए। इस माँग से हमारा कान फटा जा रहा है, दिमाग पर बोझ-सा धरा है। यह कार्य अकेले से पूरा नहीं हो सकता है। इस कार्य हेतु आपसे समयदान चाहता हूँ। आप हमारे हाथ-पैर बनें, सहायक बनें। 

हमारा साहित्य घर-घर पहुँचाकर क्रांति कर दें।

आपके चार घंटे से हमारा काम बन जाएगा। दो घंटे से कम में तो बन ही नहीं सकता। अगर इतना न बने, तो फिर आप वही हल्ला-गुल्ला करने वाले, जुलूस निकालने वाले बने रहें। हमारे लिए आपकी यही  गुरु दक्षिणा है।  हरिश्चंद्र ने विश्वामित्र से, एकलव्य ने द्रोणाचार्य से, शिवाजी ने समर्थ गुरु रामदास से, विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस से दीक्षा ली थी तथा गुरु-दक्षिणा चुकायी थी। आपको भी गुरु-दक्षिणा के रूप में समय देना चाहिए। 

जनजागृति के लिए आपका समयदान हीरे-मोतियों से, जवाहरात से भी बढ़कर है। इससे कम में युगपरिवर्तन का लक्ष्य पूरा नहीं होगा। आप हमारे बेटे हैं, साथीसहयोगी हैं। आपसे यही अपेक्षा है, आशा है।

आपसे हमारा सम्पर्क कब से है? आपसे हमारा बहुत पुराने संपर्क हैं, जन्म-जन्मांतरों के भी संपर्क हैं। क्योंकि जब हमने तलाश किया तो अपनी आध्यात्मिक शक्ति से तलाश किया कि कौन आदमी हमारे हैं, कौन हमसे संबंधित हैं, कौन हमारे साथ जुड़े हुए हैं? हमने जब यह पता लगा लिया और अखण्ड ज्योति पत्रिका भेजी, चिट्ठियां भेजी, तो मालूम पड़ा कि आप लोग गायत्री परिवार में शामिल हो गए हैं। कब हुए थे? आज से पचास साल पहले। पचास वर्ष के बाद में पीढ़ियां बदलती चली गयीं। कुछ पुराने आदमियों का स्वर्गवास हो गया, कुछ नए बच्चे पैदा हो गए। कुछ पुराने आदमी चले गये। इस तरह से परंपरा ज्यों-की-त्यों बनी रही। हार ज्यों-का-त्यों रहा। यह मिशन ज्यों-का-त्यों रहा, उसमें कोई कमी नहीं आने पाई। 

साथियो! हिंदुस्तान में भगवान् बुद्ध हुए थे, सरदार पटेल हुए थे, जवाहरलाल नेहरू हुए थे, सुभाष चंद्र बोस हुए थे और भी  बहुत से आदमी हुए थे। इसी तरह से प्रभावशाली व्यक्तियों को  हिंदुस्तान से बाहर भी हमने देखा कि इस तरह के कौन से आदमी हैं, जो अपना मुल्क-अपना देश संभाल सकें, वहाँ जागृति पैदा कर सकें और लोगों को ऊँचा उठा सकें, आगे बढ़ा सकें। यही सब बातें हमने देखीं और सबको एक सूत्र में बाँधकर रखा है। आप उसी श्रृंखला में बंधे हुए हैं।

भगवान का संकल्प, भगवान राम जब लंका-विजय के लिए और राम-राज्य की स्थापना के लिए गए थे तो उनके साथ चलने के लिए कोई भी तैयार नहीं हुआ। क्योंकि रावण से लड़ाई करने के लिए कौन तैयार हो? कुंभकरण से लड़ने के लिए कौन तैयार हो? कोई तैयार नहीं हुआ। रामचंद्र जी के भाई भी आये थे, सेना को लेकर जनक जी भी आये थे परंतु कोई भी साथ नहीं आया। कोई राजा-महाराजा, कोई सैनिक-सिपाही भी नहीं आया। मनुष्यों में से कोई तैयार नहीं हुआ। लेकिन रीछ-बंदर आगे आए। ये रीछ-बंदर कौन थे? वे देवता थे। इन देवताओं ने कहा  कि भगवान  हम आपके साथ चलेंगे। उन्होंने अपना देवता का स्वरूप छोड़कर रीछ-बंदर का रूप बना लिया। देवताओं के रूप में आते तो उनको वाहन लाने पड़ते, अपने हथियार लाने पड़ते।   यदि देवता बने रहते तो फिर रामचंद्र जी की सेना में भर्ती कैसे होते ? अतः देवता नहीं, रीछ-बंदर बन गए। रीछ-बंदर बनकर उन्होंने वह काम किया, जो भगवान का संकल्प था। 

भगवान के दो संकल्प थे- एक तो यह कि जो दैत्य-राक्षस हैं और विध्वंस कर रहे हैं उनको समाप्त करें। दूसरा संकल्प यह था कि राम-राज्य की स्थापना करें जिससे धरती पर सुख आए, शान्ति आए, चैन आए, उन्नति हो। ये दोनों संकल्प जब तक पूरे नहीं हुए तब  तक वे देवता, जो रीछ-बंदरों का रूप लेकर आए थे, उनके साथ-साथ बने रहे। उन्होंने रामचंद्र जी  का साथ कभी नहीं छोड़ा। रामचंद्र जी भी समझते रहे कि ये देवता हैं जो रीछ बंदर की शक्ल बनाकर आ गये हैं। जिस तरीके से राम ने रीछ-बानरों को देवता माना और अपनी छाती से लगाकर रखा ठीक यही बात हमारे सामने भी है। आप चाहे हिंदुस्तान में रहते हैं या हिंदुस्तान से बाहर रहते हैं, गायत्री परिवार के जितने भी लोग हैं, उनको हमने अपनी छाती से लगाकर रखा है। आपका काम करने की जिम्मेदारी हमारी है। आप हमारा काम करेंगे और हम आपका काम करेंगे।

जब हम भारत से बाहिर रहने वालों की बात करते हैं तो केवल हमारी  तरह भारतीय  ही नहीं है।  जब गुरुदेव 1971 में अफ्रीकी देशों की यात्रा पर गए थे तो आदिवासियों के साथ भी कई जन्मों का सम्बन्ध मिला था।  

हमारा आश्वासन मित्रो! 

कोई आदमी किसी के यहाँ नौकरी करता है, खेती-बाड़ी करता है, तो उसके बाल-बच्चों के गुजारा करने का इंतजाम वह आदमी करता है कि नहीं, जिसने उसको नौकर रखा है। आपको नौकर तो हमने बनाकर नहीं रखा है, लेकिन अपना कुटुंबी बनाकर रखा है। तो आपके कुटुंब की-जिसमें छोटे बच्चे भी हैं, घर वाले हैं और दूसरे लोग हैं, उनकी देखभाल करने की जिम्मेदारी हमारी है। आपके शरीर की देखभाल हम करेंगे। आपके पैसे की देखभाल हम करेंगे। आपके मन की देखभाल हम करेंगे और कोई मुसीबत आपके ऊपर आएगी, तो हम आपके सामने खड़े होंगे और यह कहेंगे तथा करेंगे कि ये मुसीबत पहले हमारे ऊपर आए।  बाद में इन लोगों के ऊपर आए। ऐसे गुरु को शत  शत नमन। 

इति श्री 

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के  श्री चरणों में समर्पित 

नोट – हम सभी कमेंटस के उत्तर देने का प्रयास भी कर रहे हैं ,धन्यवाद्। 

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